ससुराल में क्रूरता की शिकार महिला क्या करे?

समस्या-

दिल्ली से प्रशान्त चौहान ने पूछा है –

मेरी मौसेरी बहन मूल रूप से दिल्ली की निवासी है और दिल्ली में ही वर्ष 2004 में उसका विवाह हुआ था। उस के माता-पिता मध्यम वर्गीय परिवार से हैं औऱ वह इकलौती संतान है। विवाह में सामर्थ्य अनुसार दहेज़, जेवर, एवं अन्य घरेलू उपयोगी सामान उसे प्रदान किया गया था।  उसके ससुराल में श्वसुर की विगत पखवाड़े मृत्यु हुई है, अब उसके ससुराल परिवार में पति, सास, जेठ, एवं ननद हैं।  पति प्राइवेट नौकरी में है।  विवाह के 2-3 वर्षों बाद से ही उसे पति सहित परिवार के अन्य सदस्यों द्वारा छोटी-छोटी बातों पर लड़ाईयां की जाती एवं उसके माता पिता को भला बुरा कहा जाता। विभिन्न  त्योहारों और अवसरों पर उसे अपने मायके से उपहार/ पैसे आदि लाने की मांग की जाती जिसे कि समय समय पर मेरे मौसा-मौसी पूरी करते रहे।  जिससे उनकी पुत्री याने मेरी बहन को कोई कष्ट न हो और उसके ससुराल वाले भी संतुष्ट रहे। किन्तु वे आदतन उसे किसी न किसी बात पर बुरा भला कहते एवं अनावश्यक रूप से उस से झगडा करते।  इस कृत्य में उसके पति, सास, ससुर, ननद (वर्तमान में विवाहित) बराबरी के साझेदार रहते।  उनके असंतोष का एक  कारण विवाह पश्चात बहन को अभी तक संतान प्राप्ति ना होना भी है। जिसका योग्य इलाज भी उसके मायके में रहकर चलता रहा है। कभी कभी मेरी बहन इन सब प्रताड़नाओं से थक हार कर कई महीनों तक अस्पताल में भी भर्ती रही है। बीच बीच में वो अपने माता पिता के पास आ जाती लेकिन उसके पति वापस माफ़ी मांग कर उसे वापस ले जाते।  किन्तु उनका व्यवहार थोड़े दिन सही रहता फिर वो सब अपनी वाली पर आ जाते।  उसके साथ घरेलू नौकरानी जैसा व्यवहार करते आये हैं। घर में भी उसे कोने में कमरा दे रखा था।  बनाना-खाना सब अलग था। पिछले कुछ वर्षों से उस पर हाथ भी उठाने लगे।  कुछ समय तक मान मर्यादा के डर से बहन ने यह बात सबसे छुपायी।  किन्तु जब अति होने लगी तब उसने ये बात अपने  माता पिता को बताई।  चूँकि वे भी दिल्ली में अकेले हैं एवं ज्यादा संपर्क भी उनका नहीं है और वे बात को ज्यादा बढ़ाना भी नहीं चाहते थे तो उन्होंने भी बेटी को समझा बुझा कर वापस भेजा और दामाद को भी अपना व्यवहार सुधारने को बोला।  किन्तु सब कुछ तात्कालिक रहता।  इन सब परिस्थितियो से मेरी बहन शारीरिक रूप से काफी कमजोर हो गई है। विगत पखवाड़े उसके श्वसुर की अस्वस्थता के चलते म्रत्यु हो गई।  इसके बाद तो हद ही हो गयी।  उनके अंतिम संस्कार पश्चात से ही उसे ससुराल वालों की असहनीय प्रताड़नाओं से गुजरना पड़ा। उसके पति, ननद, जेठ, सास एवं अन्य उपस्थित परिजनों ने उसे मारा पीटा एवं घर में हुई उसके ससुर की मौत का कारण बहन को बताया।  उसे घर के कोने के कमरे में बंद कर के बाहर से साँकल लगा दी। 2-3 दिन उसे बंद रखा।  इस दौरान उसे सिर्फ पानी की बोतल दी वो भी फेंक कर।  उन सभी ने और उसकी सास ने कहा कि  तेरी वजह से ही मेरे पति की म्रत्यु हुई है।  बहन को शोक बैठक में नहीं बैठने दिया जाता और घर आये लोगों के सामने अपशब्द कहे जाते।  उक्त शोक के चलते मेरे मौसी एवं मौसा अपनी पुत्री के ससुराल शोक व्यक्त करने गए तो उन्हीं के सामने बहन को बाल पकड़ कर मारा पीटा एवं बीच बचाव करने आये उसके माता पिता को भी धक्का देकर गिरा दिया।  इस कृत्य में उपरोक्त उल्लेखित सभी ससुराल वाले शामिल थे।  इस कृत्य की सूचना तत्काल मेरे मौसाजी ने पुलिस कंट्रोल रूम पर दी, पुलिस आई भी लेकिन कि घर में शोक का समय देख कर दोनों पक्षों को समझा कर चली गई।  पुलिस के जाने के बाद उसके पति, सास और अन्य सभी ने बहन को उसके माता पिता सहित घर के बाहर निकाल दिया।  अब मेरी बहन एवं उसके माता पिता दोबारा उस घर में अपनी पुत्री को नहीं भेजना चाहते। वहाँ उसकी जान को भी खतरा है।  इसके अतिरिक्त इतनी दुःख तकलीफ जो उनकी बेटी ने भौगी है उसके विरुद्ध वे कानूनी कार्यवाही करना चाहते हैं। जिस में मूल रूप से शारीरिक प्रताड़ना देना, दहेज़ की मांग, मारपीट इत्यादि की शिकायत मुख्य हैं।  उन्हें उनके कृत्य की कड़ी से कड़ी सजा मिले इस हेतु उन्हें क्या विधिक कार्यवाही करनी चाहिए इस सम्बन्ध में योग्य कानूनी मार्गदर्शन प्रदान करें।

समाधान-

Desertedप की मौसेरी बहिन के वैवाहिक जीवन के आरंभ से ही अमानवीय व्यवहार हुआ है। इस व्यवहार की आप के मौसा-मौसी अनदेखी करते रहे जो नहीं की जानी चाहिए थी। इस में आप के मौसा मौसी की भी गलती है। वह उन की इकलौती लड़की है। दिल्ली जैसे नगर में रहते हुए उन्हें चाहिए था कि वे अपनी बेटी को पढ़ाते-लिखाते, कोई ट्रेनिंग कराते जिस से वह अपने पैरों पर खड़ी होती और जीवन को मजबूती से जीने की क्षमता प्राप्त करती। लेकिन उन्हों ने ये मार्ग अपनाने के स्थान पर उम्र होने पर उस का कन्यादान कर अपने कर्तव्य की इतिश्री समझ ली। आज यदि आप की बहिन अपने पैरों पर खड़ी होती तो वह अपनी लड़ाई खुद मजबूती से लड़ने के साथ साथ अपने माता पिता का संबल बन सकती थी। लेकिन अभी भी कुछ बिगड़ा नहीं है।

जिस दिन आप के मौस-मौसी की उपस्थिति में उन की बेटी के साथ दुर्व्यवहार हुआ, बुलाने पर पुलिस आई और समझा कर चली गई। उसी दिन बाद में तीनों को घर से बाहर निकाल दिया गया। तभी आप को मौसा मौसी को पुलिस में लिखित रिपोर्ट देनी चाहिए थी। यदि अभी तक नहीं दी है तो अब दे दें। पुलिस इस मामले में धारा 498-ए, 323 व धारा 406 आईपीसी का मुकदमा बनाएगी। यदि पुलिस इस तरह का मुकदमा बनाने में कोताही करे तो आप की बहिन को चाहिए कि वह सीधे न्यायालय में इस के लिए परिवाद प्रस्तुत करे। न्यायालय उस परिवाद पर पुलिस को मुकदमा दर्ज कर कार्यवाही करने का निर्देश दे देगा।

स क्रूरतापूर्ण व्यवहार के कारण आप की बहिन के पास अपने पति से अलग अपने माता पिता के साथ रहने का पूरा हक है, साथ ही अपने पति से गुजारा भत्ता प्राप्त करने का अधिकार है। आप की बहिन को न्यायालय में अपने गुजारे के लिए आवश्यक धनराशि प्रतिमाह अपने पति से प्राप्त करने के लिए धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत तथा घरेलू हिंसा अधिनियम के अंन्तर्गत आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करने चाहिए। इस से सुनवाई के उपरान्त आप की बहिन को प्रतिमाह गुजारा भत्ता पति से प्राप्त करने का आदेश हो जाएगा।

लेकिन यह अंतिम मंजिल नहीं है। आप की बहिन को अंतिम रूप से अपने पति से अलग हो जाने के बारे में सोचना चाहिए। मेरी राय में आप की बहिन को इन सब कार्यवाहियों के साथ साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार के आधार पर विवाह विच्छेद की अर्जी भी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करनी चाहिए। विवाह विच्छेद होने के उपरान्त भी जब तक आप की बहिन दुबारा विवाह नहीं कर लेती है उस के पति को यह गुजारा भत्ता उसे देना होगा। इस के साथ साथ आप की बहिन को चाहिए कि वह अपने पैरों पर खड़े होने का प्रयास करे। यदि वह पढ़ी लिखी है तो किसी तरह की नौकरी के लिए प्रयास कर सकती है। यदि ऐसा नहीं है तो वह अपने माता-पिता के घर से किसी तरह का व्यवसाय आरंभ कर सकती है। दिल्ली में ऐसे अनेक व्यवसाय हैं जो घर पर रह कर महिलाएँ चला सकती हैं। एक बार आप की बहिन यदि अपने पैरों पर खड़ी हो जाए तो अपने पति और उस के परिवार से पूरा (गुजारा भत्ता प्राप्त करने तक का) संबंध समाप्त कर अपना स्वतंत्र जीवन आरंभ कर सकती है। यही सब से उत्तम उपाय है। यह भी हो सकता है कि धारा 498-ए, 323 व धारा 406 आईपीसी में दण्ड के भय से आप कि बहिन के पति और ससुराल वाले नरमी दिखाने लगें। लेकिन उन की यह नरमी पूरी तरह से फर्जी होगी। उन बातों में आने की कतई जरूरत नहीं है। हाँ यह हो सकता है कि वे दबाव में आ कर सहमति से तलाक का प्रस्ताव कर सकते हैं लेकिन जब तक पर्याप्त राशि आजीवन भरण पोषण के रूप में वे आप की बहिन को देने को तैयार न हों तब तक ऐसे प्रस्ताव पर विचार करने और उसे स्वीकार करने का कोई अर्थ नहीं है।

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3 टिप्पणियाँ

  1. Comment by पीयूष:

    बहुत खूब प्रशान्तजी जो अपने अपनी मौसेरी बहन के भलाई के बारे मे देर से सही लेकिन सोचा तो सही,आपको अपनी बहन का पूरा साथ देना चाहिए,वो भी शबूत के साथ वैसे शबूत व गवाह नही भी मिलेँगे तो भी कोई बात नही आपके बहन के साथ कानून है ना आपको पता होना चाहिए कि 498 व अन्य घरेलू हिँसा के केश मे जज साहब या कानून का पूरा समर्थन स्त्रियोँ के साथ होता है और पुरूष बेगुनाह होकर भी अपराधी होता है।ऐसे मौके को आपको नही छोड़ना चाहिए और 4-5 लाख की राशी लेकर अपनी बहन का भविष्य सुरक्षित करने का इससे अच्छा मौका और कहां,वैसे भी आपने अपनी बहन की जिन परेशानियोँ का जिक्र किया हुआ उसे पढ़कर तो रूँगटे खड़े हो गए,आपके बहन के ससुराल वाले इंसान नही हो सकते क्योँकि इंसानो की अलग पहचान होती है उनमे दया,प्रेम,सद्भावना,ममता आदि मानविय गुण होना चाहिए जो उनमे जरा भी प्रतीत नही होते।इसके लिए उन्हे सजा जरूर मिलनी चाहिए।लेकिन सच्चाई के साथ क्योँकि बेगुनाह को सजा दिलाने एवं परेशान करने से पहले उनके परिवार व जिँदगी के बारे मेँ भी विचार विमर्श अतिआवश्यक है,वरना दिल से निकलने वाली हाय जरूर लगती है।क्या है न कि कारण कोई और होता और पुलिश के पास जाने पर दहेज एवं घरलू हिँसा का प्रारूप(formate)बना हुआ मिल जाता है बस नाम परिवर्तन करना पड़ता है और केस दर्ज कितना ख्याल रखा जाता स्त्रियोँ का फिर भी पुरूषो के भेजा मे कुछ अंदर जाता ही नही शादी करने की जल्दी पड़ी रहती है अब 4-6 साल तक लगाते रहो कोर्ट के चक्कर सब मस्ती और कमाई चली जाएगी और निराशा एवं कुंठा के कारण आत्महत्या भी कुछ लोग करते है आप को बता दूं कि भारत मे हर वर्ष लगभग 15000 महिलाएँ एवं 20000 पूरूष इसी बिमारी के नाम से आत्महत्या करते हैँ। “किसी जुड़े हुए दिल को तोड़ने से अच्छा है रिश्तोँ के बंन्धन मेँ जो गाँठ पड़ जाए उसे काट कर अलग करने के बजाय उसे सुलझा लिया जाए तो इतनी जिँदगियोँ को बचाया जा सकता है.।” ‘स्त्री की आँखे रोती है पर पुरूष का भी सीना रोता है कुछ अपवाद को छोड़कर उसके पास भी दिल है जिसके टूटने पर उसेभी दर्द होता है।…..’
    अंन्त मे अगर मेरी किसी विचार से किसी के दिल या भावना को ठेँस पहुचता है तो उसके लिए माफी चाहता हूँ क्योँकि ये मेरा अपना विचार और अनुभव है।

    वकील साहब मेरी भी एक बहोत बड़ी समस्या है मै आपसे सलाह चाहता हूँ लेकिन मोबाईल से हिन्दी मे अपनी समस्या नही भेज पा रहा हूँ मै क्या करूँ?

    • Comment by तीसरा खंबा:

      आप को अपनी समस्या भेजने के लिए कंप्यूटर का प्रयोग करना पड़ेगा। वहाँ तीसरा खंबा के पेज पर कानूनी सलाह को क्लिक करने पर उपलब्ध फार्म में अपनी समस्या टाइप कर दें।

  2. Comment by सुरजीत सिंह:

    अच्छी सलाह है सर

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