दीवानी विधि Archive

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

समस्या-

अभिषेक शर्मा ने  भागलपुर बिहार से पूछा है-

मेरा पुश्तैनी मकान है जिस पर मेरे पिताजी ने अपनी मर्जी से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवाया कि तुम अपनी मर्जी से अपना हिस्सा दे रहे हो,पर मेरी मर्जी नहीं थी। मुझ से टॉर्चर कर के कुछ पैसे दे कर हस्ताक्षर करवाए। क्या अब मैं अपना हिस्सा ले सकता हूँ क्या? हस्ताक्षर मेरे और दो गवाहों के हैं। कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के पिता ने आप का अपना हिस्सा उन के हक में छोड़ने के लिए आप से कोई दस्तावेज लिखाया है। इस तरह उन्हों ने आप का हिस्सा अपने नाम हस्तान्तरित करने का प्रयत्न किया है। 100 रुपए से अधिक मूल्य की किसी भी अचल संपत्ति या उस के हिस्से का हस्तान्तरण बिना उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत दस्तावेजके बिना होना असंभव है।

आप के पिता को यही करना था तो या तो अपने नाम रिलीज डीड आप से निष्पादित करवा कर उस का पंजीकरण करवाना था। चूँकि आप को उन्हों ने कुछ पैसे भी दिए हैं तो यह एक प्रकार से भूमि का विक्रय भी है जिस का भी पंजीकरण होना जरूरी था। पंजीकरण के लिए यह आवश्यक था कि आप को उपपंजीयक के समक्ष ले जाया जाए और वहाँ के रजिस्टरों पर तथा दस्तावेज की दूसरी प्रति पर भी आप के हस्ताक्षर कराए जाएँ।

यदि इस तरह का कोई हस्तान्तरण दस्तावेज पंजीकृत नहीं हुआ है तो पिता द्वारा इस तरह का दस्तावेज लिखा लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप पुश्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त करना चाहते हैं तो तुरन्त बंटवारे तथा अपना हिस्सा अलग कर उस का पृथक कब्जा देने के लिए वाद सक्षम न्यायालय में संस्थित करें, तथा उक्त संपत्ति या उस के किसी भी हिस्से को बेचने या किसी भी प्रकार से खुर्द-बुर्द करने पर रोक लगवाएँ।

यहाँ क्लिक कर सबसे पहले टिप्पणी कीजिए

माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

November 3, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

समस्या –

मनीषा ने विकास नगर, कोंडगाँव, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे समाज वाले व सहेली के पति ने अपनी पत्नी के सामने मुझसे 50000 रुपये 2 महीने के लिये मांगे थे। मैंने परिस्थितियों को ध्यान में रखते हुए स्टाम्प पर लिखवा कर उनको पैसे दिए।  1 महीने बाद शहर छोड़ कर भाग गया, अब जब मुझे अपने पैसे वापस चाहिये तो मुझे बोलते हैं कि  मैं तो कंगाल हूँ, सब अपनी बीवी के पास छोड़ आया हूँ, जा के उससे पैसे मांगो,  उसको टॉर्चर करो, मैं कहाँ से दूंगा। मैंने हर संभव कोशिश कर ली, पर वो किसी चीज़ से नहीं डरता। धीरे धीरे भी पैसे वापस करने का नाम नहीं ले रहा । उसकी पत्नी ने भी अपना पल्ला झाड़ लिया के मैं खुद अपने भाई के दरवाजे पर हूँ, कहाँ से तुमको पैसे दूँ। वो आदमी और भी बहुत लोगों से पैसे लेकर गया है। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

सा प्रतीत होता है कि सहेली के पति ने जानबूझ कर अपनी पत्नी को परेशान करने की नीयत से आप से रुपया लिया है और अब पल्ला झाड़ रहा है। यदि आपने स्टाम्प पर लिखवाया है तो आप अपने धन की वसूली के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं। यह वाद रुपया देने और स्टाम्प लिखे जाने की तारीख से तीन साल के भीतर किया जा सकता है। इस तरह आप स्टाम्प लिखे जाने की तिथि से तीन साल पूरे होने के दो माह पहले तक धन वापसी के लिए दूसरे प्रयास कर सकती हैं। लेकिन तीन साल पूरे होने के दो महीने पहले ही किसी वकील से मिल कर दीवानी वाद संस्थित कर दें, उस में कोताही नहीं करें।

इस व्यक्ति ने आप के साथ ही छल और बेईमानी की है जो कि धारा 420 आईपीसी व अन्य धाराओं के अंतर्गत दंडनीय अपराध है। इस कारण आपको तुरन्त उस व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। आम तौर पर पुलिस वाले इस तरह के मुकदमों को दर्ज करने में आनाकानी करते हैं। पुलिस को रिपोर्ट देने के बाद एक दो दिन में कार्यवाही न होने पर एस पी को लिखित में परिवाद पूरे विवरण के साथ रजिस्टर्ड एडी से भिजवाएँ। एक सप्ताह में भी कोई कार्यवाही न होने पर किसी वकील से संपर्क कर के न्यायालय में अपराधिक परिवाद दर्ज कराएँ। अपराधिक कार्यवाही के दबाव में आप का पैसा वसूल हो जाए तो ठीक अन्यथा स्टाम्प लिखे जाने की तिथि के तीन साल पूरे होने के पहले अपना रुपया वसूली का मुकदमा अदालत में जरूर लगा दें।

दोनों ही मामलों में आप अपनी सहली के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करें बल्कि उसे गवाह बनाएँ क्यों कि वह इस वक्त आपका साथ जरूर देगी।

समस्या-

मखदूमपुर गोमती नगर विस्तार लखनऊ से संतपाल ने पूछा है-

मेरे पिता जी पिता के नाम एक ४ बिस्वा प्लाट है।  पर उस प्लाट मे एक व्यक्ति ३५ साल से घर बनवाकर रह रहा है । अब वह अपना हक बताता है इस स्थिति मे उसे किस प्रकार घर से बेदखल किया जाये।

समाधान-

मारे पास अक्सर आप के जैसे सवाल आते है ंकि हमारी पुश्तैनी, या दादा जी की, या पिताजी की जमीन है उस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर के 15, 20, 25, 35 या अधिक वर्ष से मकान बना लिया है या उस पर खेती कर रहे हैं या फिर और कुछ कर रहे हैं।

भाई जब किसी ने आप की जमीन पर कब्जा किया और वहाँ अपना निर्माण या काम करने लगा तब क्या आप सोए हुए थे? और फिर उस के बाद अभी तक 12-13 या उस से अधिक सालों से क्या आप और आप के तमाम परिवार वाले सोए रहे? आपने सुना होगा कि सोते रहने वाले सब कुछ खो देते हैं।

आप बताइए कि आप की सम्पत्ति पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है लेकिन संपत्ति अभी तक आप के स्वामित्व की है तो आप को चाहिए क्या? आप उस का कब्जा ही तो वापस लेना चाहते हैं? यदि आप कब्जा वापस लेना चाहते हैं तो आप को अचल संपत्ति के कब्जे के लिए वाद संस्थित करना पड़ेगा। वैसी स्थिति में कब्जा आप के हाथ से निकल जाने की तिथि से केवल 12 वर्ष की अवधि में आप ऐसा कर सकते हैं।  इस से अधिक अवधि हो जाने पर आप का अचल संपत्ति के कब्जे का वाद इसलिये खारिज हो जाएगा कि आप ने दावा करने की निर्धारित अवधि में यह दावा पेश नहीं किया।

आप सभी इसे ठीक से पढ़ लें, और हमें ऐसे सवाल न भेजें जिन में आप अपनी अचल संपत्ति पर 12 वर्ष से पहले हो चुके कब्जे को वापस लेना चाहते हों। हम आज के बाद से इस तरह के सवालों का कोई उत्तर नहीं देंगे।

समस्या-

आलमबाग, लखनऊ से नरेश कुमार श्रीवास्तव ने पूछा है-

मेरा बेटा 12 वर्षो से अलग रहता है,,, और गलत काम करता है । मेरा मकान मेरी माँ यानी मेरे बेटे के दादी के नाम से है। वह जबरदस्ती मुझसे बेचवाना चाहता है।  घर मे हक बता रहा है।  मैं क्या करूँ?

समाधान-

प का मकान आप की माँ के नाम है। आप की माताजी स्त्री हैं। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अनुसार उन के नाम जो भी संपत्ति है उस की वे एब्सोल्यूट ऑनर हैं। उन के उस मकान पर स्वामित्व में किसी का हिस्सा नहीं है। इस संपत्ति में आप का भी कोई हिस्सा नहीं है, आप के पुत्र का होना तो दूर की बात है।  आप का पुत्र कोई बंटवारा नहीं करवा सकता है। यदि आप का पुत्र कोई मुकदमा करता भी है तो वह इसी आधार पर निरस्त हो जाएगा कि उस का इस संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है।

फिलहाल आप की माताजी उस संपत्ति की एकमात्र स्वामी हैं। आप की माँ उक्त संपत्ति की वसीयत कर सकती हैं, उस का दान कर सकती हैं उसे विक्रय सकती हैं। यदि वे इन में से कुछ नहीं करती हैं तो उन के बाद उक्त संपत्ति उतराधिकार में उन के पुत्रों और पुत्रियों को समान रूप से  हिस्से प्राप्त होंगे। आप के पुत्र को फिर भी कुछ नहीं मिलेगा। अब आप स्वयं तय करें कि आप को क्या करना चाहिए।

समस्या-

पटना से हर्ष कुमार ने पूछा है-

म तीन भाई थे,  जिसमें सबसे बड़ा मैं हूँ और मेरे बाद वाले भाई का निधन हो गया, जिसकी पत्नी से सबसे छोटे भाई ने  शादी कर लिया।  तो कृपया मुझे ये बताएं कि मेरे पुस्तैनी संपत्ति में सबसे छोटे भाई का क्या हिस्सा होगा?  क्या मंझले भाई की पत्नी के छोटे भाई से शादी करने के बाद उनका हिस्सा भी छोटे भाई को हस्तांतरित हो जायेगा।

समाधान-

मँझले भाई की मृत्यु के साथ ही मँझले भाई का हिस्सा उस की पत्नी को मिल गया है। यदि उस के कोई संतान थी तो आधा संतान को आधा उस की पत्नी को मिला है। वह तो उस का हो चुका। शादी कर लेने के कारण उस से वापस नहीं लिया जा चुका है। यदि आप के कोई बहिन नहीं है तो जमीन के आप, छोटा भाई और मँझले की पत्नी तीनों बराबर के हिस्सेदार हैं। पत्नी की जमीन पर छोटे भाई का कोई अधिकार नहीं है। वह उस की पत्नी को उस से विवाह के पहले ही मिल चुका था।

अब आगे आप तीनों के जीवन काल में यह हिस्से इसी तरह रहने हैं। जीवन काल के बाद जिस की मृत्यु होगी उस के उत्तराधिकारियों को मृतक की संपत्ति प्राप्त होगी।  हाँ एक छूट जरूर है कि आप चाहेँ तो अपना अपना हिस्सा किसी और को बेच सकते हैं। एक दूसरे को रिलीज कर सकते हैं या फिर बेच सकते हैं उस पर कोई पाबंदी नहीं है।

पत्नी को उस की इ्च्छा के विरुद्ध साथ नहीं रखा जा सकता।

June 13, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कमलेश कुमार ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरी शादी 20 मई 2017 को हिन्दू रीति रिवाज के साथ हुई थी। बारात में मेरे गांव के लोगो से ससुराल पक्ष के लोगो ने मारपीट कर दी। उनके गांव वालों ने एक बाराती को खूब लहूलुहान होने तक मारा और नजदीक के थाना मे बाराती के खिलाफ केस दर्ज कर दिया। इसके बाद हमने समझौता कर के शादी की। लेकिन शादी के 1 माह बाद पता चला कि मेरी लड़की पक्ष के लोगों ने मेरे छोटे भाई के खिलाफ मारपीट की रिपोर्ट की है। फिर यह झुठा मामला समझौता करने पर बहुत मुश्किल से ससुराल पक्ष के हाथ-पांव जोड़ने पर 8-9 महीने में खत्म हुआ। शादी के बाद लड़की मेरे और मेरे परिवार के साथ गलत व्यवहार औऱ मेरे साथ मारपीट करने लगी। बात बात में लड़ने झगड़ने लगी फिर भी मैं इसे सहन करता रहा, कुछ समय बाद ठीक हो जाएगा कह कर। लेकिन दिन ब दिन और ज्यादा लड़ाई झगड़ा करने लगी।  फिर वह कभी 15 दिन के लिए तो कभी 1 माह के लिए बिना पूछे मायके चली जाती थी। कुछ महीनों बाद पता चला कि लड़की का गांव के एक लड़का के साथ अवैध संबंध था। तीज में एक माह से अधिक समय तक अपने घर मे रही और तभी वहीं गर्भवती हो गई। इस अवैध गर्भधारण की बात को उनसे कहने पर दहेज में फंसाने की बात करती थी। फिर भी लड़की को रखने के उद्देश्य से मैंने बात दबा दिया। 17 जून 2017 को एक लड़के को जन्म दिया।  लड़की मेरे साथ मुश्किल से 10 माह ही रही। इसके बाद मेरे घर रायपुर से अपने जीजा के साथ चली गई। उनका अपने जीजा के साथ भी अवैध संबंध है। फिर भी मैंने इस बात को नजरअंदाज कर दिया और उनके साथ रहने के लिए उनके जीजा के खिलाफ थाना में कोई शिकायत नहीँ की। उसके बाद कई प्रयास के बाद भी लड़की वापस नही आई। समाज मे भी आवेदन देके बुलाया लेकिन लड़की नही आई। महिला थाना में रिपोर्ट लिखाई थी की मेरे पति मुझे रख नही रहे है। महिला थाना में भी समझाइस दी गई कि अपने पति के साथ रहो लेकिन लड़की नही मानी और दहेज के समान मांग कर दी। मैं भी समान देने के लिए राजी हो गया। उसको महिला थाने में अपने सामान का लिस्ट देना था जो लड़की नही दी जिससे समान वापस नही कर पाया। अब कोर्ट में भरण पोषण की मांग कर रही है। मैं निजी कंपनी में काम करता हँ। मेरी सैलरी 10,000 महीना है। मैं रायपुर में 3000 किराये के मकान रहता हूं। लड़की मुझसे 12,000 महीना भरण-पोषण के लिए मांग रही है। मेरे और मेरे परिवार के नाम पर  कोई जमीन जायदाद नहीं है और न ही मेरे परिवार का अन्य आय का स्त्रोत है। जब भी समझौता के लिए उनके घर जाता हूँ तो मेरी पत्नी और उनके घर वाले मारपीट करते हैं। कई बार जाति समाज ने इस मामले को सुलझाने के लिए उन्हें बुलाया लेकिन कभी नही आई। इस वजह से मेरा मानसिक संतुलन बिगड़ गया है। वही आफिस का काम भी ठीक ढंग से नहीं कर पा रहा हूं। जिससे नौकरी छूटने का भी खतरा है। अब मैं उस लड़की को मर्जी के हिसाब रखना चाहूंगा अगर वह मेरी साथ नहीं रहना चाहेगी तो मैं तलाक चाहता हूं। लेकिन जल्द से जल्द इस मामला का निराकरण चाहता हूँ। कृपया सलाह प्रदान करें।

समाधान-

प के अनुसार शादी के पहले झगड़ा हुआ, आप के बाराती से मारपीट की तब भी आपने शादी की। फिर वह परिवार वालों से बिना कारण झगड़ने लगी तब भी आप ने उस से कुछ नहीं कहा। वह मर्जी से अपने मायके आती जाती रही। फिर आप को पता लगा कि उस के किसी लड़के से संबंध हैं तब भी आप शान्त रहे। फिर वह मायके में गर्भवती हो गयी और एक बच्चे को जन्म दिया फिर भी आपने कुछ नहीं कहा। फिर वह बच्चे को साथ ले कर जीजा के साथ चली गयी, उस के साथ भी उस के अवैध संबंध हैं। आप ने उस के जीजा के खिलाफ भी कोई शिकायत नहीं की। अब तक आपने अपना कोई दोष नहीं बताया। आप इंसान हैं कि देवता है?

अब आप कहते हैं कि पुलिस ने समझौते के लिए बुलाया वह आप के साथ रहने को मना कर गयी। फिर कहते हैं कि आप उस को अपनी मर्जी के हिसाब से रखेंगे। भाई आप रखेंगे कैसे? वह रहना चाहेगी तब ना। और यदि पत्नी या पति न चाहे तो उसे जबरन तो पुलिस और अदालत भी साथ नहीं रखवा सकती। इस लिए यह ख्याल तो छोड़ दें कि आप उसे मर्जी के अनुसार अपने साथ रखेंगे।

आप तलाक लेना चाहते हैं तो किसी स्थानीय वकील से मिलिए। वे आपसे बात कर के आपसे जरूरी दस्तावेज इकट्ठा कर के पता करेंगे कि आप किन किन आधारों पर तलाक ले सकते हैं। फिर आप तलाक के लिए मुकदमा कर दें। पत्नी खर्चा मांग रही है तो देना पड़ेगा। जब तक वह दूसरी शादी नहीं कर लेती है तब तक देना पड़ेगा। बच्चे का खर्च भी देना पड़ेगा तब तक जब तक कि उस की कस्टडी आप को नहीं मिल जाती। आप तलाक का मुकदमा करने के बाद बच्चे की कस्टडी का मुकदमा कर सकते हैं।

मानसिक संतुलन मत बिगाड़िए, यह बीमारी है डाक्टर के पास जा कर इलाज कराइए। उस से कुछ होने वाला नहीं है और शारीरिक व मानसिक हानि और होगी।

वसीयत और हक-त्याग विलेख में क्या अन्तर हैं?

May 22, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

लालसोट, जिला दौसा, राजस्थान से अर्जुन मीणा ने पूछा है-

हक त्याग और वसीयत नामा में क्या अंतर है क्या कोई पुरुष या औरत हक त्याग करने के बाद उसकी संपत्ति वापस ले सकती है या नहीं?

समाधान-

क-त्याग हमेशा संयुक्त संपत्ति में अर्थात ऐसी संपत्ति में होता है जिस के एक से अधिक स्वामी हों। यह संपत्ति या तो पुश्तैनी हो सकती है या फिर  संयुक्त रूप से खरीदी गयी हो सकती है। किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद संपत्ति हमेशा संयुक्त हो जाती है क्यों कि मृत्यु के साथ ही उस के तमाम उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। यदि इन संयुक्त स्वामियों में से कोई एक या अधिक व्यक्ति उस संपत्ति में अपना अधिकार किसी अन्य संयुक्त स्वामी के पक्ष में त्याग दें तो हक त्याग करने वाले का हिस्सा उस संयुक्त स्वामी को मिल जाता है जिस के हक में हक-त्याग विलेख निष्पादित कराया गया है। संपत्ति में हक-त्याग विलेख से संपत्ति का हस्तांतरण एक व्यक्ति से दूसरे व्यक्ति को हो जाता है इस कारण इस विलेख का पंजीकृत होना भी आवश्यक है। पंजीकृत कराए बिना हक-त्याग विलेख का कोई मूल्य नहीं है।

क व्यक्ति  जिस संपत्ति का स्वामी है उस संपत्ति को पूरा या उस का कोई भाग किसी अन्य व्यक्ति के नाम वसीयत कर सकता है। वसीयत पर किसी तरह की कोई स्टाम्प ड्यूटी नहीं है और न ही उस का पंजीकृत कराया जाना जरूरी है। इस कारण वसीयत किसी सादा कागज पर भी हो सकती है, किसी भी मूल्य के स्टाम्प पर लिखी जा कर रजिस्टर भी कराई जा सकती है। वसीयत के लिए जरूरी है कि वसीयत करने वाला वसीयत (इच्छा-पत्र) पर अपने हस्ताक्षर कम से कम दो गवाहों की उपस्थिति में करे और वे दो गवाह भी अपने हस्ताक्षर वसीयत पर करें। वसीयत को पंजीकृत भी कराया जा सकता है। इस का लाभ यही है कि तब वसीयत का वसीयतकर्ता द्वारा दो गवाहों के समक्ष निष्पादित किया जाना प्रथम दृष्टया साबित मान लिया जाता है। इस के विपरीत कोई आपत्ति करे तो वह आपत्ति आपत्ति कर्ता को साबित करनी होती है। लेकिन वसीयत से संपत्ति का हस्तान्तरण तब तक नहीं होता जब तक कि वसीयतकर्ता की मृत्यु नहीं हो जाती। उस  की मृत्यु के साथ ही वसीयत प्रभावी हो जाती है और संपत्ति का हस्तान्तरण हो जाता है। लेकिन वसीयत को वसीयतकर्ता कभी भी निरस्त कर सकता है। कभी भी उसी संपत्ति के संबंध में दूसरी वसीयत कर सकता है।  दूसरी वसीयत पहली से भिन्न हो सकती है। एक ही संपत्ति के बारे ेमें कई वसीयतें हो सकती हैं। यदि अनेक वसीयतें हों तो वसीयत कर्ता ने जो वसीयत अंतिम बार की होगी वह मान्य होगी।

क्त विवरण से आप समझ गए होंगे कि वसीयत और हक-त्याग में क्या भिन्नता है। हक-त्याग केवल सहस्वामी के पक्ष में हो सकता है।  हक-त्याग एक बार होने पर निरस्त नहीं हो सकता। वसीयत वसीयतकर्ता कभी भी निरस्त कर सकता है या दूसरी बना सकता है। हक-त्याग विलेख यदि पंजीकृत है तो वह हक-त्याग करने वाले की इच्छा से निरस्त नहीं कराया जा सकता। हाँ उस में कोई अवैधानिकता हो तो उसे कानून के अनुसार न्यायालय में दावा कर के जरूर निरस्त कराया जा सकता है।

नाम परिवर्तन कैसे करें?

April 28, 2018 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

भँवर लाल दरोगा  ने बी/2, 405- एचडीआईएल रेजीडैंसी पार्क-1, नारंगी रोड बाई पास, विरार वेस्ट, वसई रोड, जिला पालघर, महाराष्ट्र-401303 से पूछा है-

मैं रेलवे में RPF विभाग में ASI के पद पर कार्यरत हूँ।  मैं मेरा नाम भँवर लाल दरोगा से बदल कर भँवर सिंह कच्छावा कराना चाहता हूँ तो इसके लिए मुझे क्या करना होगा।  केंद्रीय कर्मचारी की नाम बदलने की प्रक्रिया क्या है?

समाधान-

मारे विचार में जब तक कोई भारी अड़चन न आ रही हो तब तक नाम बदलना नहीं चाहिए। क्यों कि नाम बदलने की प्रक्रिया बहुत कष्टकारी है। फिर आप नौकरी कर रहे हैं। आप को अपने नियुक्ति अधिकारी से पत्र लिख कर पूछना चाहिए कि आप अपना नाम बदलना चाहते हैं आप को क्या क्या करना होगा? यदि आप के नियुक्ति अधिकारी सीधे सीधे प्रक्रिया न बताएँ तो आप यह आरटीआई के अंतर्गत आवेदन दे कर भी पूछ सकते हैं। यूँ सभी स्थानों पर नाम परिवर्तन की प्रक्रिया निम्न प्रकरा है-

अपना नाम बदलने के लिए सब से पहले आप को एक शपथ पत्र वांछित मूल्य के नॉन ज्युडीशियल स्टाम्प पेपर (राजस्थान में पचास रुपए का) अपने नाम से खरीद कर उस पर एक शपथ पत्र इस आशय का टाइप करवाना होगा कि आप का पुराना नाम ‘क’ है जिसे आप बदल कर ‘ख’ करना चाहते हैं, तथा इस शपथ पत्र के निष्पादन व सत्यापित कराने के उपरान्त आप नए नाम ‘ख’ से जाने जाएंगे।  इस शपथ पत्र को एक आवेदन पत्र के साथ अपने क्षेत्र के कार्यपालक मजिस्ट्रेट के समक्ष सत्यापित कराने के लिए प्रस्तुत करना होगा। इसे सत्यापित करवाने के उपरान्त किसी अच्छी वितरण संख्या वाले समाचार पत्र में एक विज्ञापन प्रकाशित करवाना होगा कि आप का पुराना नाम ‘क’ था जिसे आप बदल कर ‘ख’ कर लिया है।

इस सत्यापित शपथ पत्र और विज्ञापन वाले समाचार पत्र की एक प्रति के साथ राज्य की राजधानी में स्थित राजकीय प्रेस पर एक आवेदन देना होगा कि आप अपना नाम बदलने की सूचना राजकीय गजट में प्रकाशित करवाना चाहते हैं। राजकीय प्रेस आप से निर्धारित शुल्क ले कर नाम परिवर्तन की सूचना गजट में प्रकाशित कर देगा। इस के बाद आप गजट की कुछ प्रतियाँ खरीद कर अपने पास रख लें।  गजट की ये प्रतियाँ ही आप के नाम परिवर्तन का सबूत होंगी। आप गजट की इन प्रतियों को प्रस्तुत कर अपने सभी दस्तावेजों और रिकार्ड में अपना परिवर्तित नाम दर्ज करवा सकते हैं।

Aids State order Robaxin with cod Utilizing Wilderness Cheap Vermox online Transfusion dermatophytes Order Abilify Colorado Metro medical buying Avodart online from medicine buy Bactrim online uk Teachers GERONTOL order generic Bentyl without a prescription items muscle buy cheap Clonidine without a prescription Medicine local Cheap Indocin online pharmacy Medicine natural Purchase Lisinopril Nevada