दीवानी विधि Archive

समस्या

राहुल ने अजमेर राजस्थान से पूछा है-

हमने उपखण्ड अधिकारी न्यायालय में राजस्थान कास्तकारी अधिनियम की धारा 251 अ के अंतर्गत नए रास्ते के लिए आवेदन कर रखा है। उपखण्ड अधिकारी के आदेशानुसार पटवारी ने नए रास्ते के लिए 2 विकल्प बातये हैं, और कुछ विकल्प छोड़ दिए हैं।  जब कि उपरोक्त दोनों विकल्पों से अच्छा विकल्प छोड़ दिया है।  मैंने जब पटवारी से बात करी तो उसने कहा की उपखण्ड अधिकारी से रिवाइज्ड रिपोर्ट बनवाने का आर्डर करवा दो, फिर मैं रिवाइज्ड रिपोर्ट बना दूंगा।  क्या उपखण्ड अधिकारी से वापस मौके की रिवाइज्ड रिपोर्ट बनवाने का निवेदन किया जा सकता है? यदि निवेदन किया जा सकता है तो किस आधार पर किया जा सकता है? क्या रिवाइज्ड रिपोर्ट मंगवाने का कोई विधि सम्मत नियम है क्या? और क्या उपखण्ड अधिकारी रिवाइज्ड रिपोर्ट के निवेदन को मान सकता है?

समाधान –

आप की समस्या न्यायालय की प्रक्रिया से संबद्ध है। राजस्थान कास्तकारी अधिनियम तथा भू-राजस्व अधिनियम दोनों में तहसीलदार या पटवारी की रिपोर्ट मंगाने के संबंध में किसी तरह का कोई उपबंध नहीं है। लेकिन तहसीलदार और पटवारी दोनों एक उपखंड अधिकारी के अधीनस्थ होते हैं और वे न्याय करने में आसानी के लिए उन से मदद ले सकते हैं। न्यायालय ने मौके की स्थिति और रास्ते के विकल्प जानने के लिए पटवारी की रिपोर्ट मंगाई है। आप के अनुसार मौके की रिपोर्ट में कुछ विकल्प और सब से आसान विकल्प छूट गए हैं।

राजस्थान के राजस्व न्यायालयों में प्रक्रिया के दीवानी प्रकिया संहिता प्रभावी है। इस की धारा 151 में न्यायालयों को अंतर्निहित शक्तियाँ प्रदान की गयी हैं जो निम्न प्रकार है-

  1. Saving of inherent powers of court.-Nothing in this Code shall be deemed to limit or otherwise affect the inherent power of the court to make such orders as may be necessary for the ends of justice, or to prevent abuse of the process of the court.

151- न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियोँ की व्यावृत्ति – इस संहिता की किसी भी बात के बारे में यह नहीं समझा जाएगा कि वह ऐसे आदेशों के देने की न्यायालय की अन्तर्निहित शक्ति को परिसीमित या अन्यथा प्रभावित करती है, जो न्याय के उद्देश्यों के लिएया न्यायालय की आदेशिका के दुरुपयोग का निवारण करने के लिए आवश्यक है।

इस तरह जब प्रक्रियागत किसी बात के लिए संहिता या अन्य कानून में कोई विधि या नियम न हो तो न्याय हित में न्यायालय अपनी अंतर्निहित शक्तियों के अंतर्गत आदेश दे सकता है।

आप के मामले में भी यह हो सकता है। आप धारा 151 सीपीसी के अंतर्गत आवेदन न्यायालय को दे सकते हैं, और न्यायालय को यह बता सकते हैं कि पटवारी की रिपोर्ट में इस से भी आसान रास्ते का विकल्प छूट गया है, इस आवेदन में आप स्वयं विकल्प सुझाते हुए यह निवेदन कर सकते हैं कि आप के द्वारा बताए गए विकल्प या विकल्पों पर पटवारी की रिपोर्ट मंगाई जाए। इस आवेदन की सुनवाई कर न्यायालय पुनः पटवारी की रिपोर्ट मंगा सकता है अथवा आप के द्वारा इस आवेदन में सुझाए गए आसान विकल्प के संबंध में स्वयं निर्णय दे सकता है।

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मुकदमा जीतने के लिए वकील अनुभवी और जानकार हो

December 28, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

पंडित रानूकुमार ने महावीरपुरा झाँसी से पूछा है-

मेरे पिताजी के चाचा के नाम रजिस्टर्ड मकान पर लगभग 50 वर्षों से मेरे पिताजी का कब्जा है। मेरे पिताजी का निधन 2018 में हाल ही में हो गया। लेकिन सन 2017 में मेरे दादा जी के वारिसान ने मेरे पिताजी पर एक सिविल सूट फाइल कर दिया, जिसके नोटिस मेरे पिताजी ने तामील हो गए थे, लेकिन उसका जवाबदावा नहीं दिया था। अब उनकी मृत्यु के पश्चात हम लोगों ने अपना नाम नगर पालिका परिषद के अभिलेखों में दर्ज कराने के लिए प्रार्थना पत्र दिया है।  क्या नामांतरण किया जा सकता है, या नहीं? मेरे पिताजी का नाम नगर पालिका में अभिलेखों में दर्ज है, और नल, बिजली, गैस कनेक्शन इसी पते पर दर्ज हैं।  मेरे पास मकान से संबंधित किसी प्रकार के कागजात उपलब्ध नहीं हैं। मुकदमा में जीतने के लिए हमें क्या करना चाहिए? मेरे पिताजी के चाचा की वारिसान गुजरात में निवास करते हैं, हम लोगों के पास मकान से संबंधित कागजात नहीं है। आगे की कार्रवाई के लिए उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

आप ने यह नहीं बताया कि आप के दादाजी के वारिसान ने किस आधार पर किस राहत के लिए सिविल सूट फाइल किया है। जब तक यह पता न हो तब तक क्या कुछ कहा जाए।  आप जानना चाहते हैं कि मुकदमे को जीतने के लिए क्या करना चाहिए तो इस सवाल का जवाब तब दिया जा सकता है जब पता है को मुकदमा किस बात का है।

यदि नगरपालिका के अभिलेख में आप के पिता का नाम उस के कब्जेदार/स्वामी के रूप में लिखा है तो नामांतरण हो जाएगा। बशर्ते कि कोई अन्य उस पर आपत्ति नहीं करे। वैसे नामान्तरण किसी संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं होता। इस कारण उस पर ज्यादा कंसंट्रेट करने की जरूरत नहीं है। बस इतना ध्यान दें कि किसी और के नाम से नामान्तरण न हो।

यदि मकान पिताजी के चाचाजी का है तो वे त आप के चाचाजी के वारिस तो नहीं थे। आप के पिता के पास कब्जा किसी खास रूप में नहीं था तो आप के पिताजी कह सकते हैं कि यह मकान चाचाजी ने  उन्हें देदिया था और अब आप के पिताजी का एडवर्स पजेशन है। केवल इसी आधार पर  ही उस संपत्ति के संबंध में आप के पिताजी के खिलाफ किया गया कोई भी मुकदमा खारिज हो सकता है। पिताजी का नाम नगर पालिका में अभिलेखों में दर्ज होना और नल, बिजली, गैस कनेक्शन इसी पते पर दर्ज होने से आप के पिताजी का उस संपत्ति पर  50 वर्षों का कब्जा  साबित हो ही जाएगा। जो मुकदमा आप के पिताजी के खिलाफ किया गया था उस में भी विधिक प्रतिनिधि /कायम मुकाम रिकार्ड पर लाने की जिम्मेदारी दावा करने वाले पक्ष की है। आप को उस की भी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। जब समन मिलें तब अदालत मे हाजिर हों और अपना पक्ष रखें। सब से बड़ी बात यह कि आप अपना वकील अनुभवी और दीवानी मामलों का अच्छा जानकार रखें।

समस्या-

राहुल ने A-12 कोटला, मुबारकपुर, नई दिल्ली से पूछा है-

मेरे ताऊ मुझे मेरे मकान से हटा कर खुद कब्जा करना चाहते हैं। मेरे मकान की रजिस्ट्री नहीं है। मैं अपने मकान पर पिछले 32 सालों से रहता आ रहा हूँ। मेरे पास 1988 के गैस कनेक्शन की पासबुक है। जिस पर मेरा नाम और घर का पता लिखा हैं और 2012 के बिजली बिल, वोटर कार्ड आदि हैं। अभी मैं भी उसी पते पर रहता हूँ। मेरे ताऊ ने कुछ दिन पहले उस पर कब्जा करने की कोशिश की पर वो असफल रहे और उनके खिलाफ FIR हो गयी। जिसमें घर मे घुसने के धारायें लगी हैं। मैं उसने अपने मकान को बचने के लिए क्या करूँ?

समाधान-

आप मकान पर काबिज हैं और एक लंबे कब्जे के दस्तावेजी सबूत आप के पास हैं। जबरन कब्जा करने का आप के ताऊ का प्रयास असफल हो चुका है। ताऊ पर अपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो चुका है और चल रहा है। इस कारण आप अभी राहत में हैं। तुरन्त आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।

पहले से ही मकान पर कब्जा करने का अपराधिक मुकदमा चलते रहने के कारण यह तो साबित है ही कि कब्जा अभी आप के ताऊ का न हो कर आप का है। अब वे जबरन कब्जा करने की कोशिश नहीं करेंगे। करते हैं तो फिर से एक अपराधिक मुकदमा उन पर बन जाएगा।

फिर भी आप यदि सोचते हैं कि ताऊ किसी प्रकार से आप को मकान से बेकब्जा करने का प्रयत्न कर सकते हैं तो आप अपने ताऊ और अन्य व्यक्ति जिन से आप को ऐसा अंदेशा हो उन के विरुद्ध इस आशय स्थायी निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर सकते हैं कि प्रतिवादीगण आप को बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बेदखल न करें। इस वाद में ही अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र दाखिल कर अस्थायी निषेधाज्ञा आप प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

गौरव मिश्रा ने ग्राम-मोहान, जिला-कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मने और हमारे बड़े भाई जी ने हमारे बड़े ताऊ जी यानी हमारे पिता जी के बड़े भाई से 12.02.2004 को उनके भूमि के 1/2 भाग यानि उनकी संपूर्ण जमीन का पंजीकृत बैनामा कराया था। जिसका दाख़िल ख़ारिज भी हो चुका था। हमारे ताऊ जी का यानी विक्रेता का सन 2015 में स्वर्गवास हो चुका है, अब विक्रेता (ताऊ जी) की इकलौती विवाहित पुत्री कहती है कि हमारे पिता से बैनामा धोखे से फर्ज़ी तरीके से के करा लिया गया है।  उसने किसी के कहने पर पर हमारे खिलाफ (दीवानी न्यायलय) में बैनामा निरस्त करने के लिए 23.02.2018 को मुकदमा डाल दिया है, यानी बैनामा होने के 14 वर्ष बाद।  हम यह जानकारी चाहते हैं कि बैनामा होने के कितने वर्ष बाद तक बैनामा निरस्त कराने के लिये मुकदमा डाला जा सकता है, और जो हमारा मुकदमा चल रहा है उसे ख़ारिज कैसे करायें, जिससे हमारा समय और पैसे बर्बाद ना हो?

समाधान-

प ने और आप के भाई ने अपने ताऊजी से जमीन खरीद ली, उस के विक्रय पत्र का पंजीयन हो गया। इस पंजीयन के 14 वर्ष बाद ताऊजी की पुत्री ने उस विक्रय को धोखे से, फर्जी तरीके से कराने का आरोप लगाते हुए दीवानी वाद संस्थित किया है। आम तौर पर इस तरह का वाद दस्तावेज के निष्पादन की तिथि अर्थात पंजीयन की तिथि के तीन वर्ष की अवधि के भीतर ही किया जा सकता है, उस के उपरान्त नहीं। उस के उपरान्त ऐसा वाद दाखिल होने पर निर्धारित अवधि समाप्त हो जाने के कारण ग्रहण के योग्य ही नहीं रहता है और न्यायालय ऐसे वाद को पंजीकृत करने के पूर्व ही निरस्त कर सकता है। लेकिन आप के मामले में वाद को पंजीकृत भी किया गया है और आप को उस के समन भी प्राप्त हो चुके हैं। इस से स्पष्ट है कि वाद को निर्धारित अवधि में लाने के लिए कुछ न कुछ कथन वाद-पत्र में किए गए होंगे। आप को वे कथन यहाँ अपनी में हमें बताने चाहिए थे। जिस से समाधान करने में हमें सुविधा होती।

ह तो स्पष्ट है कि आप के विरुद्ध विक्रय पत्र के पंजीयन को निरस्त कराने के लिए फ्रॉड/ जालसाजी करने का आधार लिया गया है। इस के लिए लिमिटेशन एक्ट की धारा 17 में अलग से उपबंध दिए गए हैं। इस में यह कहा गया है कि यदि जालसाजी या किसी त्रुटि से निर्मित किए गए दस्तावेज को प्रतिवादी ने ही छुपा कर रखा है तो उस मामले में लिमिटेशन तब आरंभ होगी जब कि जालसाजी से निर्मित दस्तावेज की जानकारी वादी को होगी। आप के मामले में वाद प्रस्तुत करने के लिए इसी उपबंध का सहारा लिया गया प्रतीत होता है।

दि आप ने भूमि का क्रय करने के बाद दस्तावेज को सार्वजनिक नहीं किया है और अपने पास रखा है तो निश्चित रूप से आप के ताऊ की पुत्री को तभी उस की जानकारी हुई होगी जब ताऊ जी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति  को उन की पुत्री ने अपने नाम नामांतरण कराना चाहा होगा और जमीन का रिकार्ड देखा होगा। इस तरह आप के ताऊजी की मृत्यु से तीन वर्ष की अवधि में आप के विरुद्ध वाद फ्रॉड के आधार पर ही लाया जा सकता था।

ब इस वाद का समापन केवल और केवल दोनों पक्षों की साक्ष्य के उपरान्त ही किए गए निर्णय से ही हो सकता है। इस का कोई शॉर्टकट नहीं है। मुकदमा आप को लड़ना होगा। उस की अपील भी लड़नी होगी। तब तक लड़ना होगा जब तक खुद वादिनी थक हार कर घर नहीं बैठ जाती है। इस के सिवा कोई उपाय नहीं है।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

समस्या-

नितिका चौहान ने ग्राम खेडली, पोस्ट भद्रबाद, जिला हरिद्वार, उत्तराखंड से पूछा है-

मेरा जन्म 1992 में हुआ था। मेरे मेरे दादाजी के दो पुत्र मेरे ताऊजी आदित्य कुमार और मेरे पिताजी रविंद्र कुमार थे। मैं रविंद्र कुमार जी की इकलौती संतान हूँ। मेरे पिताजी रविंद्र कुमार जी का देहांत 1994 में हो गया था।  उसके पश्चात मेरे दादा जी का देहांत 2011 में हो गया। मेरे दादाजी के बैंक खाते में जो धनराशि थी, मेरे दादाजी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी ने उसको निकाल लिया और उसमें मुझे कोई हिस्सा नहीं दिया। मुझे बैंक जाकर पता चला कि मेरे ताऊजी ने परिवार रजिस्टर की जो नकल वहां लगाई थी उसमें मेरे ताऊजी ने मुझे अपनी पुत्री दर्शाते हुए बैंक खाते से धनराशि प्राप्त कर ली है।  मैं जानना चाहती हूं कि क्या उस धनराशि पर मेरा भी उतना ही हक था, जितना कि मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी का था।

समाधान-

बिलकुल आप ने सही कहा। उस धनराशि पर आप का उतना ही अधिकार था जितना की आप के ताउजी को था। किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत तय होता है। धारा 8 में सब से पहले उन लोगों का बराबर का अधिकार होता है जो अधिनियम की अनुसूची की प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हों। उस में पुत्र और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र-पुत्री एक साथ रखे गए हैं। क्यों कि आप अपने पिता की इकलौती संतान हैं तो आप का अपने दादाजी की संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि आप के ताऊजी को है।

बैंक किसी भी प्रकार से आप के ताऊ जी को यह धन नहीं देता और उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की मांग करता। लेकिन आप के ताऊजी ने आप को अपनी पुत्री बता दिया। जीवित पुत्र की पुत्री तो प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी नहीं है इस कारण बैंक ने वह धन आप के ताऊजी को दे दिया।

लेकिन इस तरह गलत सूचना दे कर बैंक से धन प्राप्त करना धारा 402 भारतीय दंड संहिता व अन्य कुछ धाराओं के अंतर्गत अत्यन्त गंभीर अपराध है। यदि आप पुलिस में रिपोर्ट करें या पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद करें और आप के ताऊजी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित हो तो उन्हें हर हाल में कारावास की सजा हो जाएगी।

स के अतिरिक्त आप जितना धन आप के ताऊजी ने बैंक से प्राप्त किया है उस के आधे धन और वह धन प्राप्त करने से लेकर उस की अदायगी तक के ब्याज प्राप्त करने के लिए आप दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

समस्या-

हरगोबिंद सिंह ने ग्राम पो. मालारामपुरा, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से पूछा है-

त्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने किसी महिला से शादी कर ली, तो इस पुरुष की मौत के बाद इस दूसरी जीवित पत्नी का जमीन-संपत्ति पर क्या हक होगा? मृत पुरुष के दोनों पत्नियों से दो-दो बच्चे इसी पुरूष की संतान हैं।

समाधान-

पुरुष ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह किया है इस तरह दूसरी पत्नी उस की उसी तरह वैध पत्नी है जैसे पहली पत्नी वैध थी। इस कारण इस दूसरी पत्नी को वही अधिकार प्राप्त होंगे जो अधिकार पहली पत्नी को उस के पति के मरने के बाद हासिल होते।

इस पुरुष की दो  संतानें पहली पत्नी से और दो ही संतानें दूसरी पत्नी से हैं। इस कारण से उस की चारों ही सन्ताने भी वैध संतानें हैं। दूसरी पत्नी से उत्पन्न होने वाली संतानों को भी उसी तरह अधिकार प्राप्त होंगे जैसे पुरुष की पहली पत्नी से मृत्यु नहीं हुई थी और बाद वाली दोनों संतानों का जन्म भी पहली पत्नी से ही हुआ है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से मृत हिन्दू पुरुष का उत्तराधिकार तय होगा। यदि खेती की जमीन है तो उस का उत्तराधिकार भी धारा 8 से ही तय होगा। इस धारा के अनुसार माता (यदि जीवित हो तो), पत्नी और सभी सन्तानों को बराबर उत्तराधिकार प्राप्त होगा। आप के मामले में लगता है कि माता जीवित नहीं है। वैसी स्थिति में प्रथम श्रेणी के पाँच उत्तराधिकारी हैं। चारों संतानें और पत्नी। पाँचों में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। खेती की जमीन में मृत्यु के कारण खुलने वाले नामान्तरण (फौती इन्तकाल) में पाँचों के नाम 1/5 हिस्सा दर्ज होगा। शेष अचल संपत्ति में भी पाँचो को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

समस्या-

रमाकांत तिवारी ने ग्राम व पोस्ट- सुरहुरपुर, मुहम्मदाबाद गोहना, जिला- मऊ उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे मित्र रोशन के दादाजी चार भाई थे। उसके दूसरे नंबर वाले दादाजी का लड़का (रोशन का चाचा), रोशन को बार- बार, जब भी झगडा होता है या किसी अन्य अवसर पर कई बार पंचायत में बोल चुका है कि तुम अपने बाप के लड़के नहीं हो, तुम मेरे लड़के हो। वह अपनी और रोशन की माताजी का फोटो दिखाता है कि देखो ये फोटो है जो कि तुम्हारी मां ने मेरे साथ खिचवाईं थी। वो फोटो बिल्कुल सामान्य है। उसे देख के ऐसा कुछ भी नहीं लगता है। वो केवल रोशन को गांव वालो के सामने अपमानित करता है।
इस बारे में कुछ कानूनी मशविरा दें जिसकी मदद से वो शर्मिंदा होने से बच सके। क्या उस पे मानहानि का मुकदमा किया जा सकतेा है? रोशन के पास सबूत के तौर पर एक वीडियो है, जिसमें रोशन का चाचा बोल रहा है कि तुम मेरे बेटे हो, अपने बाप के नहीं। अगर मानहानि का मुकदमा होता है तो उसे कितने साल तक की सजा दिलाई जा सकती है और यह मुकदमा कहाँ दायर किया जा सकता है?

समाधान-

प के मित्र रोशन का चाचा इस तरह की हरकत करते हुए न केवल रोशन को अपमानित करता है अपितु वह रोशन की माताजी को भी अपमानित करता है। जो वीडियो रोशन के पास है उसे किस प्रकार किस ने रिकार्ड किया था और उस की प्रतिलिपियाँ कितनी, कैसे और किसने बनाई इस बात को वीडियो रिकार्ड करने वाले व्यक्ति और उस की प्रतिलिपियाँ बनाने वाले व्यक्ति की मौखिक साक्ष्य से प्रमाणित करना पड़ेगा। इस के अतिरिक्त खुद रोशन का व उन व्यक्तियों के बयान कराने पड़ेंगे जिन के सामने ऐसा कहा गया है। जितनी बार के बारे में रोशन ऐसा कहना साबित करना चाहता है उतनी बार के संबंध में उपस्थित व्यक्तियों की गवाही से साबित करना पड़ेगा कि ऐसा कहा गया है और इस से रोशन की बदनामी हुई है और समाज में उस की प्रतिष्ठा कम हुई है।

मानहानि के लिए दो तरह के मुकदमे किए जा सकते हैं। एक मुकदमा तो दीवानी अदालत में मानहानि के लिए हर्जाने का किया जा सकता है जिस में हर्जाने की राशि मांगी जा सकती है। दूसरी तरह का मुकदमा अपराधिक न्यायालय में परिवाद के माध्यम से धारा 500 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत संस्थित किया जा सकता है। अपराधिक मुकदमे में अधिकतम दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का दंड दिया जा सकता है।

दूसरी तरह के धारा 500 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराधिक मुकदमे के लिए रोशन को वकील की मदद लेनी होगी। इस के लिए उसे पहले किसी अच्छे वकील से मिलना चाहिए और रोशन को एक नोटिस दिलाना चाहिए कि वह सार्वजनिक रूप से अपने किए की माफी मांगे और रोशन को हर्जाना अदा करे। नोटिस की अवधि निकल जाने पर परिवाद संस्थित किया जा सकता है। यह परिवाद जिस पुलिस थाना क्षेत्र में रोशन निवास करता है उस थाना क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में संस्थित करना होगा। परिवाद प्रस्तुत होने पर मजिस्ट्रेट रोशन और एक दो गवाहों के बयान ले कर उसे लगता है कि मामला चलने योग्य है तो उस पर संज्ञान ले कर रोशन के चाचा के नाम न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए समन जारी करेगा। इस के बाद मुकदमा वैसे ही चलेगा जैसे सभी फौजदारी मुकदमे चलते हैं। रोशन इस मुकदमे के साथ साथ चाहे तो हर्जाने के लिए दीवानी वाद भी संस्थित कर सकता है।

समस्या-

भागलपुर, बिहार से अभिषेक शर्मा ने पूछा है-

मारा पुश्तैनी मकान है और मेरे पिताजी हमें अपने मकान में जाने नहीं देते हैं, इसलिए हम 10 बरसों से बाहर रह रहे हैं। जब मैं अपने पिताजी से अपना हक़ हिस्सा माँगने के लिए गया तो मेरे पिताजी ने एक स्टाम्प पेपर बनवा के रखा था,जिस पर लिखा था कि मैं अपनी मर्ज़ी से प्रॉपर्टी कुछ पैसे के लिए पिता के ना कर रहा हूँ और उन्होने हस्ताक्षर करवा कर मुझे बेदखल कर दिया। क्या मैं अपनी प्रॉपर्टी वापस ले सकता हूँ, उनके उपर 420 का केस कर सकता हूँ। मेरे पिताजी ने सिग्नेचर प्रेशर डाल कर के मुझसे ज़बरदस्ती करवाया है, इस घटना को एक साल हो गया। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, अब अपना हिस्सा कैसे ले सकते हैं?

समाधान-

भिषेक जी, आप के पिता ने आप से एक वर्ष पूर्व दबाव डाल कर जबरन आप से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवा लिए। इस दस्तावेज में मकान में अपना हिस्सा पैसा ले कर छोड़ने की बात लिखा जाना आप बताते हैं। लेकिन आपने यह नहीं बताया कि कितना पैसा लेना लिखा है? आप पिता के विरुद्ध 420 का केस करने की इच्छा रखते हैं, पर इस में 420 जैसा क्या है? फिर आप उस की शिकायत एक साल बाद कैसे कर सकते हैं? इस तरह की शिकायत इतने दिन बाद करने का आधार क्या है? इस कारण धारा 420 या किसी अन्य अपराधिक मामले की रिपोर्ट करना तो इस मामले में बिलकुल असंभव है। आप करेंगे तो भी उस का कोई नतीजा नहीं निकलेगा।

यदि आप की संपत्ति पुश्तैनी है और उस में आप का भी हिस्सा है इस बात की पुष्टि इस बात से होती है कि आप के पिता ने स्टाम्प पर लिखवा कर वह हिस्सा छुड़वाने की कोशिश की है।

किसी भी पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में बच्चे का जन्म से ही अधिकार होता है। आप का भी उस संपत्ति में जन्म से अधिकार है और आप का हिस्सा उस संपत्ति में है। यह हिस्सा रजिस्ट्रार के कार्यालय में विक्रय पत्र या रिलीज डीज निष्पादित कर उस का पंजीयन कराए बिना पिता के हक में चला जाना संभव नहीं है। आप के पिता द्वारा स्टाम्प पर लिखा लिए जाने के बावजूद भी आप का हिस्सा आप का ही है। अब आप का हिस्सा प्राप्त करने के लिए आप अपने पिता के विरुद्ध बंटवारे का दावा दीवानी न्यायालय में कर सकते हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप आप के क्षेत्र के जिला न्यायालय में जा कर किसी अच्छे दीवानी वकील से मिलें और विभाजन का वाद पेश करवाएँ। इसी तरीके से आप पुश्तैनी जायदाद में हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

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