मुस्लिम विधि Archive

समस्या-

श्रीमती तबस्सुम रिज़वी ने बाटला हाउस, जामिया नगर, नई दिल्ली से पूछा है-

मेरी शादी 1996 में हुई थी, मेरे चार भाई, और हम दो बहने हैं। मेरे पिताजी का एक मकान 200 गज़ का यहीं कालिन्दी कुंज, नई दिल्ली में है। मेरे पिता मुझे मेरी शादी में कुछ भी समान नहीं दे पाए थे जिसका उन्हें हमेशा दुख रहता था। जिसका ज़िक्र वो बार बार मेरे भाइयों और मेरी मां के सामने करते हुए कहते थे, जिस दिन मैं इस मकान को बेचूँगा या लड़कों को हिस्सा दूँगा तो अपनी बेटी को भी बराबर का हिस्सा दूँगा। साल 2017 मैं हार्ट अटॅक की वजह से मेरे पिता की मौत हो गयी। जिसके बाद मेरे चारों भाइयों ने हम बहनों की अपने पर्मनेंट अड्रेस ग्राम लोहिया तहसील सारधना मीरूत और शाहीन बाघ न्यू देल्ही के घर मैं हमारी मां से मिलने या जाने के लिए एंट्री बंद कर दी और मेरे भाई मेरी मां को भी मेरे पास मिलने नहीं आने देते। मैं अब किस तरह अपने घर में से कितने हिस्से के मालिकाना हक़ ले सकती हूँ या मुझे मेरा हिस्सा मुस्लिम लॉ के हिसाब से कितना मिलना चाहिए।

समाधान-

आप के भाई आपको हिस्सा नहीं देना चाहते इस लिए आप की एन्ट्री उन्हों ने अपने घर में बंद कर दी है। कहीँ आप से मिल कर आप की माँ भी अलग हिस्सा न मांग ले इस कारण वे माँ को भी आप से नहीं मिलने देते हैं।

मुस्लिम लॉ के मुताबिक यदि आप के बताए लोगों के सिवा आप के पिता का कोई अन्य वारिस नहीं है तो जो भी जायदाद आप के पिता ने छोड़ी है उस में आप की माँ का 1/8 हिस्सा है। उस के बाद जो भी बचेगा उस में से दस हिस्से होंगे। एक एक हिस्सा आप बहनों के हक का है और दो दो हिस्से आप के भाइयों के हिस्से के हैं।

आप को चाहिए कि जिस क्षेत्र में आप के पिता की संपत्ति स्थित है उस क्षेत्र के जिला न्यायालय के समक्ष आप बंटवारे का वाद संस्थित करें और बंटवारा करते हुए अपने हिस्से पर अलग से कब्जा दिलाने की प्रार्थना करें। इस के साथ ही अस्थायी निषेधाज्ञा का एक आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त यह आदेश पारित करने की प्रार्थना करें कि बंटवारे के दावे का निर्णय होने तक आप के भाई उस जायदाद को किसी को हस्तान्तरित न करें उस का कब्जा किसी अन्य को हस्तान्तरित न करें।

समस्या-

मोहम्मद दानिश खान ने मानिकपुर, तहसील कुन्दा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा जी का देहांत 1953 को हुआ है, मेरे पिताजी 2 भाई और एक बहिन हैं। मेरे दादा जी का पैतृक मकान है, जिसका कुछ भाग मेरे चाचा के लड़कों ने सिर्फ़ स्टांप पेपर के ज़रिये बेच दिया है। जिसे किराएदार बनवा रहा है। मेरी फूफी की मौत हो चुकी है, उनकी लड़की ने अपने हिस्से के लिए मुक़दमा दायर किया है। क्या उन्हें हिस्सा मिलेगा? क्या मेरी फूफी की बेटी स्टे ले सकती है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि हम किस तरह अर्जेंट्ली स्टे ले सकते हैं। मेरे पिता जी ने अपना हिस्सा न्ही बेचा है। अभी तक बँटवारा भी क़ानूनी तौर पे नहीं हुआ था, फिर भी मेरे चाचा के लड़कों ने कुल मकान का 1/2 भाग बेच दिया है।

समाधान-

आप एक मुस्लिम हैं, आप का दाय मुस्लिम विधि के अनुसार तय होगा। आपके दादाजी की मृत्यु के उपरान्त आप के पिता, चाचा और फूफी तीनों का उन की संपत्ति पर अधिकार है। पुत्री का हिस्सा पुत्रों के हिस्से से आधा होता है, यह कहा जा सकता है कि पुत्री का 1 हिस्सा होता है तो पुत्रों के 2-2 हिस्से होते हैं।

इस गणना के अनुसार आप के पिता व चाचा को संपत्ति के 2/5-2/5 हिस्से पर अधिकार है और 1/5 हिस्से पर फूफी का अधिकार है। इस तरह चाचा का अधिकार संपत्ति के ½ हिस्से पर नहीं है। उसने यदि ½ हिस्सा बेच दिया है तो वह उसके हिस्से से अधिक है और अवैधानिक है।

यदि आप की फूफी ने बंटवारे का दावा किया है तो उन्हें तुरन्त उसी दावे में मकान में निर्माण कार्य को रुकवाने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर निर्माण कार्य रुकवाना चाहिए। यह तुरन्त हो सकता है। बंटवारे के उसी दावे में आप के पिता भी पक्षकार हैं तो वे फूफी के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं या खुद भी उसी दावे में अलग से स्टे के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्ततु कर सकते हैं।

खतना का निर्णय केवल पिता ही ले सकता है।

December 18, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राही अकेला ने ग्राम पोस्ट मरार दक्षिण, जिला खगरिया, बिहार से पूछा है-

मैं आईटी सेक्टर में सॉफ्टवेयर इंजीनियर हूँ। मैं किसी भी धर्म में विश्वास नहीं करता, यानी मैं नास्तिक हूँ। मेरे परिवार में भी मां और बहन के अलावा सभी नास्तिक प्रवृति के हैं। जैसा कि आप जानते हैं भारत एक संकीर्ण मानसिकता वाली सभ्यता है, इसलिए हमें शादी किसी मुस्लिम परिवार में ही करना पड़ा। क्योंकि हमारे पूर्वज मुस्लिम थे। दुर्भाग्य से मेरी शादी ऐसे परिवार में हो गयी, जो निहायत धार्मिक प्रवृत्ति के हैं। अब मेरी समस्या यह है कि 2 साल का मेरा पुत्र है, जिस पर मैं किसी धर्म की शिक्षा-दीक्षा या किसी धर्म का आडम्बर  नहीं थोपना चाहता। मुस्लिम धर्म के हिसाब से सभी मुस्लिम का खतना करवाना जरूरी होता है। लेकिन मैं चाहता हूं कि मैं अपने बच्चे का खतना 18 साल से पहले न करवाऊँ। क्योंकि ऐसा करना उस पर मुस्लिम धर्म थोपना होगा। वो जब बालिग होगा तो अपना खतना खुद करवाना चाहेगा तो करवाएगा। तब मेरी कोई आपत्ति नहीं होगी। लेकिन अभी मुझे आपत्ति है क्योंकि उसकी मम्मी और नाना,नानी जो कि बहुत धार्मिक है, उसके खतना करवाने पर बहुत जोर दे रहे हैं। आप हमें बताएं कि भारतीय कानून में ऐसा कोई प्रावधान है, जो मेरे बच्चे को 18 साल तक खतना होने से रोक सके। इसके लिए हमें क्या करना होगा, कृपया करके हमें जरूर बताएं। मैं बहुत असमंजस की स्थिति में हूँ।

समाधान-

हमने आप की समस्या पर विभिन्न कानूनों की रोशनी में अत्यन्त गंभीरता पूर्वक विचार किया है। हमने पाया है कि खतना मुस्लिम लॉ में शरीयत का हिस्सा नहीं है। खतना कुरआन पूर्व की सुन्नत है और नबी इब्राहीम से चली आती है। मुस्लिम समुदाय के अतिरिक्त यहूदी और अन्य समुदाय भी इस सुन्नत को मानते हैं। यह सुन्नत उसी प्रकार है, जैसे मुस्लिम पुरुष दाढ़ी रखना इसलिए सुन्नत मानते हैं  क्यों कि उन के नबी मुहम्मद साहेब भी दाढ़ी रखते थे। लेकिन यदि कोई मुस्लिम पुरुष दाढ़ी न रखे तो इसी कारण से वह इस्लाम से खारिज नहीं किया जा सकता है। इसी तरह खतना भी एक सुन्नत है और हर मुसलमान  के लिए जरूरी नहीं है।

इस का दूसरा पक्ष यह है कि किसी भी बच्चे के बारे में केवल उस का संरक्षक ही निर्णय ले सकता है। मुस्लिम विधि में केवल और केवल पिता ही किसी बच्चे का संरक्षक है और केवल वही यह निर्णय ले सकता है कि उस का खतना होगा या नहीं। किसी भी प्रकार से अन्य व्यक्ति को कोई अधिकार नहीं है कि वह किसी नाबालिग बच्चे के बारे में कोई निर्णय ले सके।  आप की पत्नी और उस के पिता या रिश्तेदार यह निर्णय नहीं ले सकते कि बच्चे का खतना कराया जाए या नहीं। आप के पुत्र का खतना कराने का आप के जीवित रहते किसी अन्य को कोई अधिकार नहीं है। दूसरे यह कि यह भी जरूरी नहीं है कि खतना नाबालिग अवस्था में ही हो। खुद इब्राहीम के लिए कहा जाता है कि उन का खतना उन्हों ने खुद 99 वर्ष की उम्र में किया था। ऐसी अवस्था में जब कानूनन कोई बच्चा बालिग हो जाए तब खतना कराने का खुद निर्णय ले सकता है।

खतना में किसी बच्चे के शरीर से एक अंग का एक हिस्सा काट कर अलग कर दिया जाता है। यह एक तरह का आपरेशन है और इसे चिकित्सकीय रूप से किसी भी व्यक्ति के स्वास्थ्य के लिए आवश्यक होने पर ही किया जाना चाहिए। खतना के संबंध में यह  तर्क दिया जाता है कि यह स्वास्थ्य के लिए लाभदायक है। लेकिन अभी तक यह न तो वैज्ञानिक रूप से सिद्ध है कि यह लाभदायक है। कुछ चिकित्सक इसे लाभदायक मानते हैं लेकिन बहुमत इसे सही नहीं मानता है। ऐसी स्थिति में यह एक चाइल्ड एब्यूज है।

ऊपर हमने बताया कि खतना के संबंध में निर्णय करने का अधिकार किस का है। उस के अनुसार आप के पुत्र का खतना कराने के संबंध में एक मात्र अधिकार आप का है, आप का कोई भी रिश्तेदार इस माम ले में आप को सुझाव दे सकता है, सामाजिक धार्मिक दबाव डाल सकता है लेकिन जबरन आप के बच्चे का खतना नहीं करवा सकता। यदि वे ऐसा करते हैं तो यह अपराधिक हो सकता है, एक तरह का दुष्कृत्य तो होगा ही।  बालिग होने पर बच्चा या तुरन्त आप जबरन ऐसा कराने वाले के विरुद्ध हर्जाने का दावा कर सकते हैं।

यदि आप को अंदेशा है कि आप की संतान का आप की इच्छा के विरुद्ध यहाँ तक कि आप की जानकारी मैं लाए बगैर खतना कराया जा सकता है तो जिन लोगों द्वारा ऐसा कराए जाने का अंदेशा हो आप उन के विरुद्ध स्थायी निषेधाज्ञा का वाद संस्थित कर सकते हैं और साथ ही अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकते हैं। इस के लिए आपको एक अच्छा और शोध करने वाले वकील की सहायता लेनी पड़ेगी जो कि वाद पत्र और प्रार्थना पत्र को ठीक से बना सके। साथ के साथ सभी संभावित तर्कों को साक्ष्यों और सबूतों के साथ अदालत के समक्ष रख सके। यदि ऐसा हुआ तो केवल इस आधार पर कि आप के पुत्र का खतना कराने या न कराने का अधिकार केवल आप का है आप इस मामले में अपनी पत्नी सहित सभी संभावित व्यक्तियों के विरुद्ध न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त करने में सफल हो सकते हैं।

समस्या-

रोशनी खातून ने ग्राम हमीरपुर जिला कटिहार, बिहार से पूछा है-

मैं मुस्लिम धर्म से हूँ। मेरी शादी 7 महीने पहले हुई थी मेरे पति मेरे साथ मारपीट और दहेज़ की मांग करते थे।  उसके खिलाफ महिला थाना में आवेदन दिया।  थाने में उस ने दरोगा को पैसे देकर अपने पक्ष में कर लिया। एक एफिडेविट दिया कि मारपीट नहीं करेंगे और पति-पत्नी की तरह रहेंगे और थाने से ही मेरी विदाई हुई। ससुराल पहुँचने के बाद फिर से वही ताने, मारपीट, दहेज़ की डिमांड होने लगी। फिर मैंने अपनी माँ को फ़ोन कर के बताया तो वो मुझे ससुराल से मायके ले आयी।

अब मैं 2 महीने से गर्भवती हूँ , इसकी सूचना अपने पति को फ़ोन करके दी तो कहता है मैंने तुमसे शादी ही नहीं की है, तो ये मेरा बच्चा कैसा हुआ। अब मैं क्या करूँ? गर्भपात कराऊँ या बच्चे को इस दुनिया में आने दूँ। इस बच्चे का भविष्य क्या होगा ? मेरे पति मुझसे शादी सिर्फ दहेज़ के लिए किये थे।

अब वो दूसरी शादी करने वाले हैं। क्या वो मुझसे बिना तलाक लिए शादी कर सकता है?  इस बच्चे का क्या करूँ?  उसपर कौन सा केस करूँ।  केस कितने सालों तक चलेगा? क्या शादी में दिया हुआ सामान वो वापस करेगा? समाज में मेरे परिवार की बदनामी हो रही है, इसलिए मैं आत्महत्या करने की सोच रही हूँ क्यूंकि क़ानून से न्याय मिलने में मुझे पता नहीं कितने साल लग जाएंगे। कृपया मुझे सलाह दें।

समाधान-

प के विवाह को सात माह हुए हैं और उस में आप पर तमाम कहर टूट पड़े हैं। आप का परेशान होना स्वाभाविक है। लेकिन इन तमाम परिस्थितियों को ले कर आत्महत्या करने की सोचना बिलकुल भी ठीक नहीं है। आपने और न ही आप के परिवार ने कोई गुनाह नहीं किया है। ऐसा कोई भी काम नहीं किया है जिस से बदनामी हो।  बदनामी तो उस शख्स और परिवार की होनी चाहिए जिस ने आप के साथ इंसान की तरह नहीं। होता यह है कि जब भी कोई गलत काम करता है तो उस का परिणाम आने के पहले ही झूठा प्रचार आरंभ कर देता है। इस से पीड़ित पक्ष को लगता है कि उस की बदनामी हो रही है। लेकिन ऐसा नहीं है। आप को चाहिए कि आप धीरज रखें और अपने विरुद्ध हुई ज्यादतियों के विरुद्ध कानूनी कार्यवाही करें।

आप को जब एक बार शपथ पत्र दे कर आप का पति ले गया था और उस के विपरीत उस ने व्यवहार किया है तो आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए। आप का कहना है कि पहले पुलिस ने पैसा खा कर काम नहीं किया। लेकिन यह गलत भी हो सकता है। आम तौर पर पुलिस को यह निर्देश हैं कि पहली बार में पति पत्नी के बीच समझौता कराने की कोशिश करनी चाहिए थी। उस दफे भी आप यदि जाने से इन्कार कर देतीं तो पुलिस किसी हालत में समझौता नहीं कराती। हो सकता है यह करते हुए भी पुलिस के किसी अधिकारी ने सामने वाले पक्ष से पैसा लिया हो। लेकिन आप को दुबारा पुलिस में रिपोर्ट करानी चाहिए कि आपके साथ फिर से मारपीट हुई है, ताने मारे गए हैं, दहेज मांगा गया है जिस के कारण आपको पति का निवास छोड़ने पर मजबूर होना पड़ा है। पति ने आप का तमान स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया है इस तरह पति ने धारा 323, 498ए, 406 आईपीसी का अपराध किया है। । यदि थाना रिपोर्ट करने से मना करे तो वही रिपोर्ट एक पत्र के साथ रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से एस.पी. को भेजनी चाहिए। यदि फिर भी कोई कार्यवाही न हो तो  मजिस्ट्रेट के न्यायालय में वकील की मदद से परिवाद दाखिल करना चाहिए। इस के अलावा मजिस्ट्रेट के न्यायालय में तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 के अन्तर्गत आवेदन दे कर भऱण पोषण की मासिक राशि की मांग करनी चाहिए।

यह सही है कि मुस्लिम विधि में चार विवाह तक किए जा सकते हैं। लेकिन यह भी प्रावधान है कि सभी पत्नियों को एक जैसा व्यवहार मिलना चाहिए तथा दूसरी शादी के लिए पहली की सहमति होनी चाहिए। आप चाहें तो दूसरा विवाह रुकवाने के लिए दीवानी अदालत से स्थायी व अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करने के लिए वाद व प्रार्थना कर सकती हैं। यदि फिर भी पति दूसरा विवाह कर ले तो आप को हक है कि आप भी अदालत से तलाक के लिए प्रार्थना पत्र दे कर तलाक ले सकें।

जहाँ तक गर्भ रह जाने की बात है। बच्चे का भविष्य तो अभी अनिश्चित ही है। पिता गंभीर नहीं है तो उसे पिता का प्रेम और स्नेह तो मिलने से रहा। वैसी स्थिति में हमारी नजर में उस का दुनिया में आना ठीक नहीं है। फिर भी यह निर्णय तो केवल माँ ही ले सकती है कि उसे अपनी संतान को दुनिया में लाना है या नहीं। यदि अभी गर्भाधान को तीन माह नहीं हुए हैं तो स्वैच्छिक गर्भपात कराया जा सकता है।

जहाँ तक मुकदमों के चलने के समय की बात है तो यह स्थानीय परिस्थितियों पर निर्भर करता है कि वहाँ अदालतों में कितने मुकदमें हैं। कितने ही मुकदमे चल रहे हों पर अन्याय के विरुद्ध लड़ने का आपके पास यही रास्ता है और आपको मजबूती के साथ इस लड़ाई को लड़ना चाहिए। आप अवश्य जीतेंगी।

समस्या-

एम. के. पठान ने आनन्द गुजरात से पूछा है-

मुस्लिम पर्सनल लॉ के अंतर्गत परिवार में एक पुत्र और दो पुत्रियाँ हों। पुत्री शादी शुदा हो उस के पुत्र भी कमाते हों। लड़की के पिता की 1990 में मृत्यु हो और वह पिता की विरासत में हिस्सा मांग रही हो तो मुस्लिम लाँ के अंतर्गत उस का हिस्सा कितना होगा?

समाधान-

दि पुत्री और पुत्र दोनों हों और अन्य कोई भी शेयरर उत्तराधिकारी नहीं हो तो पुत्र और पुत्रियों में इस तरह संपत्ति का बंटवारा होगा कि पुत्र/पुत्रों का हिस्सा पुत्रियों को मिलने वाले हिस्से से दुगना हो। आपके मामले में एक पुत्र और दो पुत्रियाँ हैं। दो हिस्से पुत्र के तथा एक एक हिस्सा पुत्रियों का है। इस तरह संपत्ति के कुल चार हिस्से होंगे आधा पुत्र का तथा दोनों पुत्रियों को चौथाई हिस्सा प्राप्त होगा। इस तरह पुत्री का हिस्सा कुल संपत्ति का चौथाई होगा। पुत्री शादीशुदा है या नहीं उस के बच्चे हैं या नहीं और बच्चे कमाते हैं या नहीं इस का इस पर कोई असर नहीं है।

समस्या-

मेरे पिताजी दो भाई थे, जिनके पास एक पुश्तैनी जमीन 14×70 स्क्वायर फुट की थी जिसके खसरे में मेरे दादा का  नाम दर्ज है। दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से 40 वर्ष पूर्व जमीन का बंटवारा आधा-आधा कर लिया किन्तु कोई विलेख नही लिखवाया। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के 14×35 के प्लाट पर स्वयं के खर्च से 40 वर्ष पूर्व मकान बनवा लिया था तथा जिसका किसी ने विरोध नही किया था, जिसका गृहकर 38 वर्षो से पिताजी के नाम से ही जमा होता है, पिताजी जी की मृत्यु के बाद मेरे नाम से गृहकर जमा होता है और मकान पर मेरा ही कब्जा है। मेरे चाचा जिनके हिस्से में 14×35 का प्लाट था उन्होंने अपने हिस्से के प्लाट में अभी तक कोई निर्माण नही करवाया  और उनकी मृत्यु भी हो चुकी है। अब विवाद का विषय ये है कि चाचा का पुत्र 40 वर्ष पूर्व हुए आपसी बंटवारे को नही मान रहा, उसका कहना है कि चूंकि 14×70 के पूरे प्लाट का खसरा उसके दादा के (पिता के पिता) नाम पर है और बंटवारे का कोई विलेख नही इसलिए घर का और खाली जमीन का बंटवारा करो और अपने घर मे से हमको भी हिस्सा दो। छोटे दादा के पुत्र द्वारा झूठे केस में फसाने की साजिश की जा रही और मारने की धमकी दी जा रही। क्या कानूनी तौर पर वह मेरे दादा जी का मकान हड़प सकता है? सर हमारे पास घर के 38 वर्षों का गृहकर की रसीद (जो पिताजी के नाम से है), घर का 12 वर्षों का बिजली का बिल (मेरे स्वयं के नाम से),16 वर्षो का जलकर की रसीद (पिताजी के नाम पर), पिताजी का राशन कार्ड, माताजी का राशन कार्ड और मेरे दादाजी के नाम वाला नगर पंचायत आफिस से जारी 14×35 स्क्वायर फुट के प्लाट (जिसमे पिताजी के द्वारा बनवाया मकान है) का खसरा है। क्या कानूनी तौर पर चाचा का पुत्र मेरे मकान पर कब्जा पा सकता है?

-मोनू अहमद,  नगर पंचायत रुद्रपुर, जिला-देवरिया, (उ. प्र.)

समाधान-

दि 40 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था तो उस के गवाह अवश्य होंगे। आवश्यकता पड़ने पर साक्षियों  के बयान करवा कर बंटवारे को साबित किया जा सकता है। इस संबंध में आप Karpagathachi And Ors vs Nagarathinathachi 1965 AIR 1752 के प्रकरण को देखें। आप के पास पिताजी के नाम से 38 वर्ष से गृहकर की रसीद है। घर बनाने के बाद ही तो गृहकर आरंभ हुआ है यह एक सहायक सबूत है जो कहता है कि मकान बने हुए हिस्से पर आपका इतने लंबे समय से कब्जा है। 16 वर्षों का जलकर र 12 वर्ष से बिजली के बिल भी सहायक सबूत हैं। आप अच्छे से बंटवारा और मकान का निर्माण साबित कर सकते हैं। प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) के तर्क का भी सहारा लिया जा सकता है। इस तरह कानूनी रूप से आपके मकान को हड़प करना इतना आसान नहीं है।

आप अपने चचेरे भाई को कह दीजिए कि वह दुबारा से बंटवारा चाहता है तो बंटवारे का दावा कर दे। फैसला अदालत में हो। आप यदि मुकदमे को मुस्तैदी से लड़ेंगे तो आप की संपत्ति आपके पास ही रहेगी।

समस्या-

विवाहित हिन्दू स्त्री का इस्लाम धर्म अपनाने के बाद क्या उसके पहले पति से विवाह रहता है या टूट जाता है, वह दूसरी शादी के लिए तलाक ले या नहीं?

-सुलेमान,  तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ राज्य राजस्थान

समाधान-

को भी हिन्दू स्त्री-पुरुष जब एक बार हिन्दू विधि से विवाह कर लेते हैं तो वे दोनों उस विवाह में तब तक रहते हैं जब तक कि उस विवाह के विच्छेद की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती है। यदि उन में से कोई भी धर्म परिवर्तन कर लेता है तब भी यह विवाह बना रहता है, वे साथ साथ रह सकते हैं।।  किन्तु धर्म परिवर्तन से धर्म परिवर्तन करने वाले के पति या पत्नी को यह अधिकार उत्पन्न हो जाता है कि वह धर्म परिवर्तन के आधार पर अपने साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सके और वह  हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(ii) में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकता है और साथी के धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है। तब वह दूसार विवाह कर सकता/ सकती है।

यदि आप का प्रश्न यह है कि किसी स्त्त्री द्वारा इस्लाम ग्रहण कर लेने के बाद उसे दूसरा विवाह करने के लिए अपने पूर्व पति से तलाक लेना जरूरी तो नहीं? तो उस का उत्तर यह है कि उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा कर अपने पूर्व पति से  विवाह विच्छेद करना होगा। इस्लाम धर्म के अनुसार भी एक स्त्री एक विवाह में रहते हुए निकाह नहीं कर सकती। उसे पहले पूर्व विवाह से तलाक लेना पड़ेगा और फिर इद्दत की अवधि भी व्यतीत करनी होगी। इस मामले में हिन्दू स्त्री को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाने के बाद भी अपने हिन्दू पति से हिन्दू विधि से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करनी होगी। डिक्री पारित होने के उपरान्त इद्दत की अवधि गुजर जाने पर ही वह इस्लामी शरीयत के अनुसार निकाह कर सकती है।

 

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने एक जमीन 1998 में खरीदी थी। मेरे पति की मृत्यु हो गयी। उन से मेरी चार लड़कियाँ हैं। मेरा और मेरी लड़कियों का जमीन में कितना कितना हिस्सा होगा। मेरे देवर जो मेरे पति के सगे भाई हैं उन का क्या हक है, जब कि वह जमीन उन की पुश्तैनी नहीं है यह जमीन मेरे पति ने अकेले ही खरीदी थी। कृपया मुस्लिम ला के मुताबिक पूरी जानकारी दें।

समाधान-

मुस्लिम व्यक्तिगत विधि में पुश्तैनी जमीन जैसा कोई सिद्धान्त नहीं है और कोई संपत्ति पुश्तैनी नहीं होती। जो भी संपत्ति होती है वह व्यक्तिगत होती है हाँ यदि किसी मृतक व्यक्ति की संपत्ति का बंटवारा न हो और किसी उत्तराधिकारी की पहले ही मृत्यु हो जाए तो वैसी संपत्ति में मृतक का हित बना रहता है और वह उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाता है। इस तरह आप के पति की जमीन चाहे उन्हों ने खुद खरीदी हो या पूर्वजों से प्राप्त हुई है वह व्यक्तिगत ही है।

मुस्लिम विधि के अनुसार आप के पति की संपत्ति में से 1/8 आप को, 2/3 सभी लड़कियों को मिला कर और 1/6 हिस्सा आप के पति के भाई अर्थात आप के देवर को मिलेगा। शेष बचा हुआ हिस्सा भी लड़कियों को मिलेगा। आप अपने पति की संपत्ति के 24 हिस्से बनाएँ, उस में से 3 हिस्से आप के, 4 हिस्से आप के देवर के तथा 17 हिस्से लड़कियों को संयुक्त रूप से प्राप्त होंगे।। प्रत्येक लड़की को कुल संपत्ति का 4.25 हिस्सा मिलेगा।

पता लगने पर एकतरफा फैसले को रद्द कराया जा सकता है।

April 27, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जूही ने पीलीभीत, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरा विवाह सन 2013 मे अमेठी उत्तरप्रदेश के मुसाफिरखाना निवासी इरशाद अली से हुआ। विवाह के बाद मुझे सास ने बहुत प्रताड़ित किया। मुझे बार् बार मायके ज़बरदस्ती भेज देती है। मेरे दोनों बेटे सिज़ेरियन से मेरे मायके में हुए। दोनों बार न कोई मेरे ससुराल से बच्चो को देखने आया न ही कोई खर्च दिया।  परिवार परामर्श केंद्र पीलीभीत में मेरा समझौता हुआ, लेकिन मेरे पति मुझे लेकर नहीं गये, बल्कि पुलिस में मेरे भाइयों के खिलाफ मारपीट की झूठी रिपोर्ट लिखा दी।  सितम्बर 2016 को उन्हीं ने मेरे खिलाफ विदाई का मुकदमा दायर कर दिया। लेकिन आज तक कोई सम्मन या नोटिस हमें नहीं मिला। पति से बात की तो कह रहे थे कि हमने नोटिस पर गलत पता लिखवाया है। मेरे पति ने गलत पता क्यों लिखवाया? जानकारी के भाव मे हम किसी पेशी पर नही पहुँच सके तो अब क्या कोर्ट मेरे खिलाफ फैसला दे देगा?


समाधान-

गता है आप की आप के पति से बातचीत फोन पर हो जाती है। यदि ऐसा है तो आप फोन पर अस्थाई रूप से हर काल को रिकार्ड करने की व्यवस्था कर लें। जब भी पति या ससुराल से कोई फोन आए तो वह रिकार्ड हो जाए फिर उन काल्स को आप स्थाई रूप से रिकार्ड में रख सकती हैं। ये सबूत के बतौर काम आएंगे।

आप का झगड़ा आप के पति से नहीं लगता। लेकिन आप की सास आप को बिलकुल नहीं देखना चाहती और आप के पति कुछ नहीं बोलते। यह स्थिति ठीक नहीं है। एक स्त्री चाहे वह किसी जाति व धर्म या मुल्क की हो यदि उस की अपनी स्वयं की पर्याप्त आय नहीं है जिस से वह अपनी और अपने बच्चों की देखभाल पालन पोषण कर सके तो सब कुछ पति और रिश्तेदारों पर निर्भर हो जाता है तब जिन्दगी या तो नर्क हो जाती है या फिर स्वर्ग हो जाती है। बेहतर है कि स्त्रियाँ पैरों पर खड़ी हों और किसी दूसरे के भरोसे जिन्दगी जीना बन्द करें।

परिवार परामर्श केन्द्र के समझौते का कोई बड़ा महत्व नहीं है। आप के पति ने विदाई का मुकदमा किया है और आप का गलत पता दिया है तो यह इरादा रहा हो सकता है कि किसी तरह अदालत से एक तरफा फैसला ले लिया जाए। पर उस तरह के फैसले से कोई लाभ आपके पति को नहीं मिलेगा। जब भी आप को उस फैसले की कोई जानकारी मिले आप उस फैसले को देने वाली अदालत में दर्ख्वास्त दे कर उस फैसले को रद्द करवा कर दुबारा सुनवाई करवा सकती हैं।

बिन मांगी सलाह है कि ऐसे में इस शादी में बने रहने का कोई अर्थ नहीं है। तब भी जब कि पति का थोड़ा बहुत झुकाव आप की तरफ हो। क्यों कि जो अपनी माँ या किसी के कहने पर अपनी ही पत्नी के साथ इस तरह का व्यवहार करे उसे पति बने रहने काअधिकार नहीं है। आप उस के व्यवहार के आधार पर कोर्ट से विवाह विच्छेद की मांग कर सकती हैं और आप को मिल सकता है। आप धारा 125 दं.प्र.संहिता में अपने लिए व अपने बच्चों के लिए भरण पोषण की मांग भी कर सकती हैं जो आप के पति को देना ही पड़ेगा, न देने पर अदालत उन्हें जेल में भिजवा सकती है। यदि आप विवाह विच्छेद भी करा लें तब भी आपको को दूसरा विवाह करने तक यह भरण पोषण राशि मिलती रह सकती है।


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