संपत्ति Archive

समस्या-

सुजीत कुमार ने पटौर लाला टोला, पूर्व चम्पारन, मोतीहारी, बिहार से पूछा है-

समाधान-

कोई भी जो संपत्ति का पूर्ण स्वामी नहीं है वह किसी संपत्ति के केवल उस हिस्से को गिरवी या बंधक रख सकता है जिस पर उस का स्वामित्व है, न कि पूरी संपत्ति को। यदि संपत्ति उस के कब्जें में हो तो वह गिरवी रखने पर संपत्ति का कब्जा जरूर दूसरे को दे सकता है।

गिरवी अथवा बंधक कई प्रकार है होते हैं। आपने नहीं बताया कि बंधक किस प्रकार का है। उसमें गिरवी रखने वाले ने आपको प्लाट का कब्जा भी सौंप दिया है अथवा नहीं। यदि उसने कब्जा सौंप दिया है तो आप लाभ में हैं।

अब आप के पास प्लाट का कब्जा है और आप उस प्लाट के हिस्सेदार भी हैं। यदि वह आप को आप की धनराशि चुका कर कब्जा वापस लेना चाहता है तो आप उसे कह सकते हैं कि वह आपसी समझदारी से बंटवारा करा ले और अपने हिस्से का कब्जा ले ले, क्यों कि इस प्लाट में भी उस का केवल हिस्सा है। यदि वह मना करे तो उसे कहें कि वह अदालत में अपने अधिकार के लिए दावा करे।

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समस्या-

हरिओउम् ने झाँसी, उत्तर प्रदेश से पूझा है-

मेरी माता जी की निर्वसीयती सम्पत्ति में मेरे पिता ने नगर पंचायत में खुद को वारिस दर्ज करवा रखा है। मेरे पिता अब किसी दूसरी महिला के साथ रहते हैं।  मुझे डर है कि पिता वह सम्पत्ति उक्त महिला को हस्तांतरित न कर दें। नगर पालिका का कहना है कि एक बार जो नाम दर्ज हो गया तो हो गया, अब तुम्हारा नाम दर्ज नहीं किया जा सकता है। बगैर कोर्ट में जाये माता जी की सम्पत्ति में उत्तराधिकार दर्ज कैसे कराया जा सकता है?

समाधान-

नगर पालिका संपत्ति का जो रिकार्ड रखती है उसमें वह नामान्तरण दर्ज करती है। लेकिन कानूनन नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व का प्रमाण नहीं होता है। फिर भी नामान्तरण एक बार कर दिया जाए तो केवल नामान्तरण आदेश की अपील कर के अपीलीय अधिकारी के आदेश से ही परिवर्तित कराया जा सकता है। यदि नामान्तरण में परिवर्तन करा भी लिया जाए तो भी आप की समस्या बनी रहेगी।  आप के पिताजी फिर भी उस संपत्ति को किसी अन्य को विक्रय पत्र, दानपत्र या अन्य किसी प्रकार का हस्तान्तरण विलेख पंजीकृत करवा कर हस्तान्तरित कर सकते हैं।  उन्हें रोकने के लिए तो आप को न्यायालय की शरण लेनी ही पड़ेगी।

आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप की माता जी के उत्तराधिकारी, आप आप के भाई और बहिन तथा आप के पिता हैं। इस तरह आज की तिथि में माताजी की वह संपत्ति एक अविभाजित संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है। इस संपत्ति के बँटवारे के लिए कोई भी एक हिस्सेदार दीवानी वाद संस्थित कर सकता है।

सबसे बेहतर तो यही है कि आप या कोई भी अन्य हिस्सेदार उक्त संपत्ति के विभाजन और अपने हिस्से का पृथक कब्जा प्राप्त करने का दावा दीवानी न्यायालय में प्रस्तुत करे। उस के साथ ही संपति को पिता द्वारा खुर्द बुर्द करने की संभावना के आधार पर उसी दावे में अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर इस आशय की अस्थायी निषेधाज्ञा जारी करा ले कि विभाजन का वाद निर्णीत होने तक पिता उस संपत्ति या उस का कोई भी भाग खुर्द बुर्द न करें। इस के सिवा अन्य कोई उपाय पिता को रोकने का नहीं है।

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समस्या-

मोहम्मद दानिश खान ने मानिकपुर, तहसील कुन्दा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा जी का देहांत 1953 को हुआ है, मेरे पिताजी 2 भाई और एक बहिन हैं। मेरे दादा जी का पैतृक मकान है, जिसका कुछ भाग मेरे चाचा के लड़कों ने सिर्फ़ स्टांप पेपर के ज़रिये बेच दिया है। जिसे किराएदार बनवा रहा है। मेरी फूफी की मौत हो चुकी है, उनकी लड़की ने अपने हिस्से के लिए मुक़दमा दायर किया है। क्या उन्हें हिस्सा मिलेगा? क्या मेरी फूफी की बेटी स्टे ले सकती है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि हम किस तरह अर्जेंट्ली स्टे ले सकते हैं। मेरे पिता जी ने अपना हिस्सा न्ही बेचा है। अभी तक बँटवारा भी क़ानूनी तौर पे नहीं हुआ था, फिर भी मेरे चाचा के लड़कों ने कुल मकान का 1/2 भाग बेच दिया है।

समाधान-

आप एक मुस्लिम हैं, आप का दाय मुस्लिम विधि के अनुसार तय होगा। आपके दादाजी की मृत्यु के उपरान्त आप के पिता, चाचा और फूफी तीनों का उन की संपत्ति पर अधिकार है। पुत्री का हिस्सा पुत्रों के हिस्से से आधा होता है, यह कहा जा सकता है कि पुत्री का 1 हिस्सा होता है तो पुत्रों के 2-2 हिस्से होते हैं।

इस गणना के अनुसार आप के पिता व चाचा को संपत्ति के 2/5-2/5 हिस्से पर अधिकार है और 1/5 हिस्से पर फूफी का अधिकार है। इस तरह चाचा का अधिकार संपत्ति के ½ हिस्से पर नहीं है। उसने यदि ½ हिस्सा बेच दिया है तो वह उसके हिस्से से अधिक है और अवैधानिक है।

यदि आप की फूफी ने बंटवारे का दावा किया है तो उन्हें तुरन्त उसी दावे में मकान में निर्माण कार्य को रुकवाने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर निर्माण कार्य रुकवाना चाहिए। यह तुरन्त हो सकता है। बंटवारे के उसी दावे में आप के पिता भी पक्षकार हैं तो वे फूफी के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं या खुद भी उसी दावे में अलग से स्टे के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्ततु कर सकते हैं।

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समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

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पुश्तैनी संपत्ति में हिस्से का दावा

January 11, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

विक्रान्त सिंह ने इटावा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे गांव में हमारा पुस्तैनी घर है। चूँकि हमारे बाबा शहर रहने लगे तो गंव वाले घर और खेती पर ध्यान ही नहीं दिया। अब बाबा और पिताजी के गुजरने के बाद हम अपने गांव के घर पर दावा करना चाहते हैं। लेकिन हमारे पास उस घर और खेती के कोई दस्तावेज़ भी नहीं हैं और जो परिवार के लोग है वहां हैं वो लोग कोई हेल्प नहीं कर रहे। उन्होंने उन सब पर कब्ज़ा कर रखा है। कृपया उचित सलाह दें कैसे हम उस घर और खेती को वापस पा सकते हैं।

समाधान-

आम तौर पर जिस स्थायी संपत्ति पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो गया हो और किसी ने इस अवधि में उस पर अपना मालिकाना हक का दावा न किया हो तो उस संपत्ति पर कब्जेदार का प्रतिकूल कब्जा हो जाता है। कब्जा प्राप्त करने का दावा करने की अवधि  आप से कब्जा छिनने से 12 वर्ष की अवधि होने के कारण इस प्रतिकूल कब्जे को वापस लेना संभव नहीं होता। लेकिन यदि संपत्ति पुश्तैनी हो जिस का विभाजन न हुआ हो और परिवार का ही कोई हिस्सेदार उस संपत्ति पर काबिज हो तो यह माना जाता है कि संपत्ति के सभी हिस्सेदारों का उस पर कब्जा है और कोई भी हिस्सेदार उस संपत्ति पर अपने हिस्से को अलग कराने के लिए वाद संस्थित कर सकता है।

 आप अपनी संपत्ति  को पुस्तैनी बता रहे हैं इस कारण आप का उस में हिस्सा हो सकता है। आपने खेती की जमीन का उल्लेख किया है। खेती की जमीन के सभी रिकार्डिस आजकल ऑनलाइन देखे जा सकते हैं।  आप पहले पता कीजिए कि आप के परिवार के अन्य लोग जिन्हों ने खेती और  मकान पर कब्जा कर रखा है वे किन खसरा नंबरों की जमीन पर काबिज हैं। फिर उन खसरा नंबरों को रिकार्ड में तलाश कीजिए।इस से पता लग जाएगा कि वे जमीनें किस किस के नाम हैं। बाद में उन खसरा नंबरों का उस वक्त का रिकार्ड तहसील या आप के गाँव की तहसील के रिकार्डरूम में जा कर तलाश कीजिएगा। इस संबंध में उस तहसील में काम करने वाले राजस्व मामलों के वकील और उन के मुंशी  आप की मदद कर सकते हैं।

एक बार आप को यह पता लग जाए कि आप की जमीन पूर्व में आप के किस पूर्वज के नाम थी और आप के बाबा का उस में क्या हिस्सा था। तब आप अपने बाबा के वंशज होने के आधार पर जमीन के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं, उसी के आधार पर मकान में अपने हिस्से के लिए मकान के बंटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। यही आप के लिए तथा आप जैसे लोगों के लिए एक मात्र रास्ता है।

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हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।

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कानून के उल्लंघन पर अदालत के चक्कर काटना लाजमी है।

January 2, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

वनराजसिंह चौहण ने धामतवाण दश्कोई, अहमदाबाद से पूछा है-


मेरे दादाजी के पास 2 ऐकर पुश्तैनी जमीन है। दादाजी को 7 संतान हैं। 4 लडके 3 लड़कियाँ है। लडकियों की शादी हो चुकी है। दादाजी का ही पूरे 2 ऐक़ड़ में नाम है। वो जमीन दादाजी ने पैसे ले कर बेचदी है। कबजा भी दे दिया है। पैसा भी सब मिल गया है। दादाजी की 3 में से 1 लडकी ने सिविल कोर्ट में 2005 के उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन एक्ट के तहत हिस्सा मांगा है। दादाजी को कोर्ट के चक्कर काटने पड़े हैं। और जमीन का पैसा चारों लडकों को दे दिया है। इसका समाधान बताइए।

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन को अस्तित्व में आए 13 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। अभी तक भी यदि उसे लागू करने की इच्छा इस अधिनियम के अंतर्गत हिन्दू शब्द की परिभाषा में आने वाले तमाम समाजों में सहदायिक/ पुश्तैनी संपत्ति में पुत्रियों को पुत्रों के समान हिस्सा देने की मानसिकता नहीं बनी है और वे अपनी इच्छा से लड़कियों को दूसरे तरीकों से संपत्ति से वंचित करने की कोशिश करेंगे तो ये दिन तो देखने को मिलेंगे।

आप के दादाजी ने काम ही ऐसा किया है कि उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़ें। कोई भी व्यक्ति यदि कानून के विरुद्ध या उस के उल्लंघन में कोई काम करेगा तो उसे कभी भी और कितने भी समय तक के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ सकते हैं। चक्कर तो उसे भी काटने पड़ेंगे जिस ने दादाजी से यह माल खरीदा है। चूंकि हिस्सा मांगा है इस कारण से चारों पुत्रों और दो दूसरी पुत्रियों को भी अदालत का मुहँ देखना पड़ रहा होगा।

आप के दादाजी ने उस पुश्तैनी संपत्ति को बेच कर जो धन प्राप्त किया है वह भी सहदायिक संपत्ति है जो अब चारों भाइयों के पास है। इस कारण आप की बहिनें चारों भाइयों और दादाजी के विरुद्ध जमीन में या विक्रय से प्राप्त धन से अपना हि्स्सा मांग सकती हैं।

अब तो इस का एक ही रास्ता है। चारों भाई मिल कर तीनों बहिनों को मनाएँ और कहें कि वे उन्हें उनके हिस्से के बदले नकद धन देने को तैयार हैं। तीनों बहिनों को बिठा कर बात करें और एक समझौते पर पहुँचें जिस में तीनों बहिनें यह लिख कर देने को तैयार हों कि उन्हें जमीन बेचने से प्राप्त धनराशि में से उन के हिस्से की धनराशि मिल गयी है और अब इस मुकदमे को वे नहीं चलाना चाहती हैं। यह समझौता अदालत में पेश हो और इस के अनुसार अदालत अपना निर्णय पारित कर यह फैसला दे कि सभी उत्तराधिकारियों को उन का हिस्सा मिल चुका है। तभी इस विवाद से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

मुकदमा जीतने के लिए वकील अनुभवी और जानकार हो

December 28, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

पंडित रानूकुमार ने महावीरपुरा झाँसी से पूछा है-

मेरे पिताजी के चाचा के नाम रजिस्टर्ड मकान पर लगभग 50 वर्षों से मेरे पिताजी का कब्जा है। मेरे पिताजी का निधन 2018 में हाल ही में हो गया। लेकिन सन 2017 में मेरे दादा जी के वारिसान ने मेरे पिताजी पर एक सिविल सूट फाइल कर दिया, जिसके नोटिस मेरे पिताजी ने तामील हो गए थे, लेकिन उसका जवाबदावा नहीं दिया था। अब उनकी मृत्यु के पश्चात हम लोगों ने अपना नाम नगर पालिका परिषद के अभिलेखों में दर्ज कराने के लिए प्रार्थना पत्र दिया है।  क्या नामांतरण किया जा सकता है, या नहीं? मेरे पिताजी का नाम नगर पालिका में अभिलेखों में दर्ज है, और नल, बिजली, गैस कनेक्शन इसी पते पर दर्ज हैं।  मेरे पास मकान से संबंधित किसी प्रकार के कागजात उपलब्ध नहीं हैं। मुकदमा में जीतने के लिए हमें क्या करना चाहिए? मेरे पिताजी के चाचा की वारिसान गुजरात में निवास करते हैं, हम लोगों के पास मकान से संबंधित कागजात नहीं है। आगे की कार्रवाई के लिए उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

आप ने यह नहीं बताया कि आप के दादाजी के वारिसान ने किस आधार पर किस राहत के लिए सिविल सूट फाइल किया है। जब तक यह पता न हो तब तक क्या कुछ कहा जाए।  आप जानना चाहते हैं कि मुकदमे को जीतने के लिए क्या करना चाहिए तो इस सवाल का जवाब तब दिया जा सकता है जब पता है को मुकदमा किस बात का है।

यदि नगरपालिका के अभिलेख में आप के पिता का नाम उस के कब्जेदार/स्वामी के रूप में लिखा है तो नामांतरण हो जाएगा। बशर्ते कि कोई अन्य उस पर आपत्ति नहीं करे। वैसे नामान्तरण किसी संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं होता। इस कारण उस पर ज्यादा कंसंट्रेट करने की जरूरत नहीं है। बस इतना ध्यान दें कि किसी और के नाम से नामान्तरण न हो।

यदि मकान पिताजी के चाचाजी का है तो वे त आप के चाचाजी के वारिस तो नहीं थे। आप के पिता के पास कब्जा किसी खास रूप में नहीं था तो आप के पिताजी कह सकते हैं कि यह मकान चाचाजी ने  उन्हें देदिया था और अब आप के पिताजी का एडवर्स पजेशन है। केवल इसी आधार पर  ही उस संपत्ति के संबंध में आप के पिताजी के खिलाफ किया गया कोई भी मुकदमा खारिज हो सकता है। पिताजी का नाम नगर पालिका में अभिलेखों में दर्ज होना और नल, बिजली, गैस कनेक्शन इसी पते पर दर्ज होने से आप के पिताजी का उस संपत्ति पर  50 वर्षों का कब्जा  साबित हो ही जाएगा। जो मुकदमा आप के पिताजी के खिलाफ किया गया था उस में भी विधिक प्रतिनिधि /कायम मुकाम रिकार्ड पर लाने की जिम्मेदारी दावा करने वाले पक्ष की है। आप को उस की भी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। जब समन मिलें तब अदालत मे हाजिर हों और अपना पक्ष रखें। सब से बड़ी बात यह कि आप अपना वकील अनुभवी और दीवानी मामलों का अच्छा जानकार रखें।

समस्या-

राहुल ने A-12 कोटला, मुबारकपुर, नई दिल्ली से पूछा है-

मेरे ताऊ मुझे मेरे मकान से हटा कर खुद कब्जा करना चाहते हैं। मेरे मकान की रजिस्ट्री नहीं है। मैं अपने मकान पर पिछले 32 सालों से रहता आ रहा हूँ। मेरे पास 1988 के गैस कनेक्शन की पासबुक है। जिस पर मेरा नाम और घर का पता लिखा हैं और 2012 के बिजली बिल, वोटर कार्ड आदि हैं। अभी मैं भी उसी पते पर रहता हूँ। मेरे ताऊ ने कुछ दिन पहले उस पर कब्जा करने की कोशिश की पर वो असफल रहे और उनके खिलाफ FIR हो गयी। जिसमें घर मे घुसने के धारायें लगी हैं। मैं उसने अपने मकान को बचने के लिए क्या करूँ?

समाधान-

आप मकान पर काबिज हैं और एक लंबे कब्जे के दस्तावेजी सबूत आप के पास हैं। जबरन कब्जा करने का आप के ताऊ का प्रयास असफल हो चुका है। ताऊ पर अपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो चुका है और चल रहा है। इस कारण आप अभी राहत में हैं। तुरन्त आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।

पहले से ही मकान पर कब्जा करने का अपराधिक मुकदमा चलते रहने के कारण यह तो साबित है ही कि कब्जा अभी आप के ताऊ का न हो कर आप का है। अब वे जबरन कब्जा करने की कोशिश नहीं करेंगे। करते हैं तो फिर से एक अपराधिक मुकदमा उन पर बन जाएगा।

फिर भी आप यदि सोचते हैं कि ताऊ किसी प्रकार से आप को मकान से बेकब्जा करने का प्रयत्न कर सकते हैं तो आप अपने ताऊ और अन्य व्यक्ति जिन से आप को ऐसा अंदेशा हो उन के विरुद्ध इस आशय स्थायी निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर सकते हैं कि प्रतिवादीगण आप को बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बेदखल न करें। इस वाद में ही अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र दाखिल कर अस्थायी निषेधाज्ञा आप प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

अमन ने 510 धानमंडी, जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी ने खुद के पैसे से 1976 में एक मकान खरीदा था। 1976 से अभी तक मैं और मेरी माताजी साथ रह रहे हैं। मेरी चार शादीशुदा बहनें हैं। मेरे पिताजी की 2001 में निर्वसीयत मृत्यु हो चुकी है। अभी मैंने मकान को वापस बनाया है। कानून मे बेटियों को 2005 में  हक दिया गया था। अब क्या मुझे बहनों हक-तर्कनामा की जरूरत पडेगी। मैने सुना है कि अगर बेटी अपना हक माँगती है तो पिता 9 दिसंबर 2005 को जीवित होना चाहिए। जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु 2005 अधिनियम लागू होने से पहले 2001 में हो चुकी है। अतः अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

आप 2005 के जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं वह कानून केवल पुश्तैनी / सहदायिक संपत्तियों के संबंध में है। आप का मकान आप के पिता ने खुद अपने धन से 1976 में खरीदा था। इस कारण वह उन की स्वअर्जित संपत्ति है। उस का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। आप के मामले में 1905 का संशोधन अधिनियम प्रभावी नहीं है।

धारा -8 के अनुसार मृतक पुरुष की पत्नी, पुत्र व पुत्रियाँ और माता समान हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप का मकान आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस में आप की माताजी, चार बहनों तथा आप सब को 1/6 हिस्सा प्राप्त है। इन में से कोई भी विभाजने की मांग कर सकता है और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

यदि आप की बहनें चाहती हैं कि उन का हिस्सा औऱ आप की माँ का हिस्सा भी आप को ही प्राप्त हो तो आप को आप की बहनों और माताजी से हक-त्याग विलेख या रीलीज डीड अपने हक में निष्पादित करानी होगी। तभी आप उक्त मकान के एक मात्र स्वामी हो सकते हैं।

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