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समस्या-

मोहम्मद दानिश खान ने मानिकपुर, तहसील कुन्दा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा जी का देहांत 1953 को हुआ है, मेरे पिताजी 2 भाई और एक बहिन हैं। मेरे दादा जी का पैतृक मकान है, जिसका कुछ भाग मेरे चाचा के लड़कों ने सिर्फ़ स्टांप पेपर के ज़रिये बेच दिया है। जिसे किराएदार बनवा रहा है। मेरी फूफी की मौत हो चुकी है, उनकी लड़की ने अपने हिस्से के लिए मुक़दमा दायर किया है। क्या उन्हें हिस्सा मिलेगा? क्या मेरी फूफी की बेटी स्टे ले सकती है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि हम किस तरह अर्जेंट्ली स्टे ले सकते हैं। मेरे पिता जी ने अपना हिस्सा न्ही बेचा है। अभी तक बँटवारा भी क़ानूनी तौर पे नहीं हुआ था, फिर भी मेरे चाचा के लड़कों ने कुल मकान का 1/2 भाग बेच दिया है।

समाधान-

आप एक मुस्लिम हैं, आप का दाय मुस्लिम विधि के अनुसार तय होगा। आपके दादाजी की मृत्यु के उपरान्त आप के पिता, चाचा और फूफी तीनों का उन की संपत्ति पर अधिकार है। पुत्री का हिस्सा पुत्रों के हिस्से से आधा होता है, यह कहा जा सकता है कि पुत्री का 1 हिस्सा होता है तो पुत्रों के 2-2 हिस्से होते हैं।

इस गणना के अनुसार आप के पिता व चाचा को संपत्ति के 2/5-2/5 हिस्से पर अधिकार है और 1/5 हिस्से पर फूफी का अधिकार है। इस तरह चाचा का अधिकार संपत्ति के ½ हिस्से पर नहीं है। उसने यदि ½ हिस्सा बेच दिया है तो वह उसके हिस्से से अधिक है और अवैधानिक है।

यदि आप की फूफी ने बंटवारे का दावा किया है तो उन्हें तुरन्त उसी दावे में मकान में निर्माण कार्य को रुकवाने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर निर्माण कार्य रुकवाना चाहिए। यह तुरन्त हो सकता है। बंटवारे के उसी दावे में आप के पिता भी पक्षकार हैं तो वे फूफी के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं या खुद भी उसी दावे में अलग से स्टे के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्ततु कर सकते हैं।

समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

पुश्तैनी संपत्ति में हिस्से का दावा

January 11, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

विक्रान्त सिंह ने इटावा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे गांव में हमारा पुस्तैनी घर है। चूँकि हमारे बाबा शहर रहने लगे तो गंव वाले घर और खेती पर ध्यान ही नहीं दिया। अब बाबा और पिताजी के गुजरने के बाद हम अपने गांव के घर पर दावा करना चाहते हैं। लेकिन हमारे पास उस घर और खेती के कोई दस्तावेज़ भी नहीं हैं और जो परिवार के लोग है वहां हैं वो लोग कोई हेल्प नहीं कर रहे। उन्होंने उन सब पर कब्ज़ा कर रखा है। कृपया उचित सलाह दें कैसे हम उस घर और खेती को वापस पा सकते हैं।

समाधान-

आम तौर पर जिस स्थायी संपत्ति पर किसी अन्य व्यक्ति का कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो गया हो और किसी ने इस अवधि में उस पर अपना मालिकाना हक का दावा न किया हो तो उस संपत्ति पर कब्जेदार का प्रतिकूल कब्जा हो जाता है। कब्जा प्राप्त करने का दावा करने की अवधि  आप से कब्जा छिनने से 12 वर्ष की अवधि होने के कारण इस प्रतिकूल कब्जे को वापस लेना संभव नहीं होता। लेकिन यदि संपत्ति पुश्तैनी हो जिस का विभाजन न हुआ हो और परिवार का ही कोई हिस्सेदार उस संपत्ति पर काबिज हो तो यह माना जाता है कि संपत्ति के सभी हिस्सेदारों का उस पर कब्जा है और कोई भी हिस्सेदार उस संपत्ति पर अपने हिस्से को अलग कराने के लिए वाद संस्थित कर सकता है।

 आप अपनी संपत्ति  को पुस्तैनी बता रहे हैं इस कारण आप का उस में हिस्सा हो सकता है। आपने खेती की जमीन का उल्लेख किया है। खेती की जमीन के सभी रिकार्डिस आजकल ऑनलाइन देखे जा सकते हैं।  आप पहले पता कीजिए कि आप के परिवार के अन्य लोग जिन्हों ने खेती और  मकान पर कब्जा कर रखा है वे किन खसरा नंबरों की जमीन पर काबिज हैं। फिर उन खसरा नंबरों को रिकार्ड में तलाश कीजिए।इस से पता लग जाएगा कि वे जमीनें किस किस के नाम हैं। बाद में उन खसरा नंबरों का उस वक्त का रिकार्ड तहसील या आप के गाँव की तहसील के रिकार्डरूम में जा कर तलाश कीजिएगा। इस संबंध में उस तहसील में काम करने वाले राजस्व मामलों के वकील और उन के मुंशी  आप की मदद कर सकते हैं।

एक बार आप को यह पता लग जाए कि आप की जमीन पूर्व में आप के किस पूर्वज के नाम थी और आप के बाबा का उस में क्या हिस्सा था। तब आप अपने बाबा के वंशज होने के आधार पर जमीन के बंटवारे का वाद संस्थित कर सकते हैं, उसी के आधार पर मकान में अपने हिस्से के लिए मकान के बंटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। यही आप के लिए तथा आप जैसे लोगों के लिए एक मात्र रास्ता है।

हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।

समस्या-

सत्यम ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी एक फ्रेंड है, उसका हस्बैंड उसको मारता पीटता है, मेंटली टॉर्चर करता है, बिना बात के ही लड़ता रहता है। आज तो उसने हद ही कर दी, सुबह से बिना बात के लड़ने लगा और बोलता है कि मेरे घर में सिगड़ी नहीं चलना चाहिए। वाइफ बोलती है, सिगड़ी ना जलाओ तो मर जाऊं क्या ठंड में। तो हस्बैंड बोलता है कि मर जा, अब यदि सिगड़ी जलाई तो वही सिगड़ी तेरे ऊपर डाल दूंगा जलती हुई। उस लड़की की लाइफ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। घर से निकलने नहीं देता। किसी रिलेटिव पहचान वालों के यहां जाने नहीं देता। कहता है कि मैं जिस से बोलूंगा उससे मिलेगी, उससे बात करेगी, नहीं तो किसी से नहीं करेगी। बिना बात के लड़ता रहता है। लड़की को डिवोर्स भी नहीं देता है, बोलता है कि मैं तुझे छोड़ने नहीं दूंगा। सबसे ज्यादा शक करता। उसको कहीं आना जाना नहीं देता और मारने के लिए हाथ उठाता है। एक दो बार मारा भी। लड़के की फिजिकल रिलेशन किसी और के साथ है शायद। वह दूसरी लड़के को घर में लाना चाहता है। लड़की बोलती है कि तेरे को देख के साथ रहना है, जिसको लाना है ले आ। बस मुझे शांति से रहने दे। इस पर लड़का बोलता कि मैं ना तुझे जीने दूंगा, ना मरने दूंगा। लड़की करे तो क्या करे? लड़की के पास कोई सबूत नहीं है कि उसका हस्बैंड कहीं और रिलेशन में है। लड़की का साथ देने वाला कोई नहीं है कि वह अपने हस्बैंड के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा सके। लड़की तो अपने हस्बैंड से बात करना पसंद नहीं करती, तो क्या करें? कोई रास्ता बताइए।

समाधान-

लड़की के साथ घरेलू हिंसा हो रही है। भंयकर अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार किया जा रहा है। मारपीट भी हुई है। यह सब विवाह विच्छेद के लिए पर्याप्त है। इस के अलावा धारा 498ए आपीसी में संज्ञेय अपराध भी है, जिस की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यह रिपोर्ट कोई भी परिजन या मित्र भी कर सकता है।

न्यायालय में किसी भी मामले में निर्णय होने में हमारे यहाँ समय लगता है। इस का मुख्य कारण हमारे मुल्क के पास जरूरत की चौथाई अदालतें भी नहीं होना है। अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 140 अदालतें हैं जब कि भारत में मात्र 12 इस तरह वहाँ के अनुपात में हमारी अदालतों की संख्या 8 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सभी तरह के विक्टिम पुलिस या न्यायालय के पास जाने के बजाए यातनाएँ भुगतते रहते हैं। इसी कारण अनेक प्रकार के अपराध पलते रहते हैं। हर रिपोर्ट कराने आने वाले को हतोत्साहित करती है कि रिपोर्ट कराने के बजाए भुगतते रहो, क्यों कि उसे भी अपने रिकार्ड में अपराध कम दिखाने होते हैं।

जहाँ तक स्त्रियों का मामला है वे तब तक पुलिस के पास जाने में झिझकती हैं जब तक कि उन्हें यह पक्का विश्वास न हो जाए कि उन के पास जीवन जीने और सुरक्षा के पर्याप्त विकल्प हैं। जब कभी कोई परिचित इस तरह की रिपोर्ट करा भी दे तो स्त्रियाँ पुलिस के या अपने पति व ससुराल वालों के दबाव के कारण टूट जाती हैं और कह देती हैं कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहती। वैसी स्थिति में वह परिचित बहुत बुरी स्थिति में फँस जाता है। अक्सर लड़की के मायके वाले भी उस का साथ नहीं देते, क्यों कि हमारा तो विचार ही यह है कि लड़कियाँ परायी होती हैं। इस विचार के अनुसार लड़कियाँ समाज में सब के लिए पराई होती हैं, वे कभी किसी की अपनी नहीं होतीं।

इस मामले में यदि आप मन, वचन कर्म से चाहते हैं कि लड़की उन यातनाओं से मुक्त हो अच्छा जीवन जिए तो आप को उसे विश्वास दिलाना होगा कि उस के पास सुरक्षित जीवन  जीने के न्यूनतम वैकल्पिक साधन हैं। आप को भी प्रयास करना होगा कि वह किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। तभी वह यह लड़ाई लड़ सकती है। यदि आप आश्वस्त हैं कि लड़की को न्यूनतम वैकल्पिक जीवन साधन उपलब्ध होने का विश्वास दिला सकते हैं तो आप पुलिस को रिपोर्ट करें, पुलिस कार्यवाही न करे तो एस.पी. को मिलें। यदि फिर भी काम न चले तो मजिस्ट्रेट को शिकायत दें। लड़की को उस के पति की कारा से मुक्ति दिलाएँ।

लड़की के मुक्त हो जाने पर उस की ओर से विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन, धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण के लिए परिवार न्यायलय में आवेदन प्रस्तुत कराएँ। घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण, वैकल्पिक आवास तथा लड़की के आसपास न फटकने के लिए निषेधात्मक आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं। इस से लड़की को जो मदद आप अभी उपलब्ध करा रहे हैं उस की जरूरत कम हो जाएगी।  आप लड़की को कोई नियोजन दिला कर उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें। उसे नियोजन मिल जाने पर वह स्वावलंबी हो जाएगी। जब उस का विवाह विच्छेद हो जाए तो वह निर्णय कर सकती है कि उसे एकल स्त्री की तरह जीना है अथवा एक अच्छा जीवन साथी तलाश कर उस के साथ जीवन व्यतीत करना है।

कर्मचारी का चरित्र सत्यापन

December 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

हमें सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के किसी कर्मचारी के चरित्र सत्यापन के संबंध में अनेक तरह से प्रश्न पूछे जाते हैं। हर प्रश्नकर्ता को उस के प्रश्न का पृथक से उत्तर देना संभव नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में नियोजन प्राप्त करते समय कर्मचारी द्वारा पूर्व में किसी अपराध के लिए अभियोजित किए जाने या दोष सिद्ध पाए जाने और दंडित किए जाने के तथ्य को छुपाने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (ए.आई.आर. 2016 सुप्रीमकोर्ट 3598)  के मामले में स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह स्थिति इस प्रकार है…

किसी अभ्यर्थी द्वारा दोषसिद्धि, गिरफ्तारी या किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के बारे में, सेवा में प्रवेश करने से पहले या बाद में नियोजक को दी गई जानकारी, सही होना चाहिए और आवश्यक जानकारी का कोई दमन या गलत उल्लेख नहीं होना चाहिए।

झूठी जानकारी देने के लिए सेवाओं की समाप्ति या उम्मीदवारी को रद्द करने का आदेश पारित करते समय, कर्मचारी द्वारा ऐसी जानकारी देते समय यदि कोई विशेष परिस्थितियाँ रही हों तो उन पर विचार कर सकता है। निर्णय लेने के समय नियोक्ता, कर्मचारी पर लागू सरकार के आदेशों / निर्देशों / नियमों को ध्यान में रखेगा।

यदि किसी आपराधिक मामले में शामिल होने की जानकारी को छुपाने या गलत जानकारी देने का मामला हो, जिसमें आवेदन / सत्यापन फॉर्म भरने से पहले ही दोषी ठहराया या बरी कर दिया गया था और ऐसा तथ्य बाद में नियोक्ता के ज्ञान में आता है, तो वह कोई भी निम्नलिखित में से मामले के लिए उपयुक्त कोई भी कदम उठा सकता है: –

  1. तुच्छ प्रकृति के मामलों में, जिनमें दोषसिद्धि दर्ज की गयी हो, जैसे कम उम्र में नारे लगाना, या एक छोटे से अपराध के लिए, जिसके बारे में अगर बता दिया गया होता तो भी कर्मचारी को पद के लिए अयोग्य नहीं माना गया होता, नियोक्ता अपने विवेक से गलत जानकारी देने या उसे छुपाने की कर्मचारी की गलती की अनदेखी कर सकता है।
  2. जहां दोषसिद्धि दर्ज की गई है जो प्रकृति में तुच्छ नहीं है, नियोक्ता कर्मचारी की उम्मीदवारी को रद्द कर सकता है या कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर सकता है।
  3. यदि तकनीकी आधार पर नैतिक अवमानना ​​या जघन्य / गंभीर प्रकृति के अपराध से जुड़े मामले में कर्मचारी पहले ही बरी हो चुका था, और यह पूरी तरह से बरी होने का मामला नहीं हो, या संदेह का लाभ दिया गया है, तो नियोक्ता उपलब्ध अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर पूर्ववृत्त के रूप में विचार कर सकता है, और कर्मचारी की निरंतरता के रूप में उचित निर्णय ले सकता है।
  1. ऐसे मामले में, जहाँ कर्मचारी ने एक निष्कर्षित आपराधिक मामले की सत्यता से घोषणा की है, नियोक्ता अभी भी पूर्ववृत्त पर विचार कर सकता है और उसे उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
  2. ऐसे मामले में जहाँ चरित्र सत्यापन में रूप में तुच्छ प्रकृति के आपराधिक मामले का लंबित होना कर्मचारी द्वारा घोषित किया गया है तब नियोक्ता मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, अपने विवेक से उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्णय ले सकता है।
  3. जहाँ कर्मचारी कई लंबित मामलों के संबंध में जानबूझकर तथ्य छुपाने का मामला हो वहाँ इस तरह की झूठी जानकारी देने को अपने आप में महत्वपूर्ण मान कर एक नियोक्ता उस व्यक्ति की नियुक्ति के आदेश को जिसके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित थे ,उचित नहीं मानते हुए उसे रद्द कर सकता है या सेवाओं को रद्द कर सकता है।

7.यदि आपराधिक मामला लंबित था, लेकिन फॉर्म भरने के समय उम्मीदवार को पता नहीं था, फिर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियुक्ति प्राधिकारी अपराध की गंभीरता को देखते हुए निर्णय ले सकता है।

  1. यदि कर्मचारी की सेवा में पुष्टि हो जाती है, तो तथ्यों को छुपाने या सत्यापन के रूप में गलत जानकारी प्रस्तुत करने के आधार पर सेवा से हटाने या बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले विभागीय जांच करना आवश्यक होगा।
  2. सूचनाएँ छुपाने या गलत सूचनाओं के निर्धारण के लिए सत्यापन / सत्यापन-प्रपत्र अस्पष्ट नहीं अपितु विशिष्ट होना चाहिए। ऐसी जानकारी जिसका विशेष रूप से उल्लेख किया जाना आवश्यक हो उसका खुलासा किया जाना चाहिए। यदि जानकारी नहीं मांगी जाए, लेकिन नियोक्ता के ज्ञान के लिए प्रासंगिक हो तो उस मामले में उद्देश्यपूर्ण तरीके से फिटनेस के मामले पर विचार किया जा सकता है लेकिन ऐसे मामलों में गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
  3. यदि किसी व्यक्ति को गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर दोषी ठहराए जाने से पहले, यह तथ्य उसके ज्ञान में लाया जाना और उसे सफाई का अवसर दिया जाना चाहिए।

मुकदमा जीतने के लिए वकील अनुभवी और जानकार हो

December 28, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

पंडित रानूकुमार ने महावीरपुरा झाँसी से पूछा है-

मेरे पिताजी के चाचा के नाम रजिस्टर्ड मकान पर लगभग 50 वर्षों से मेरे पिताजी का कब्जा है। मेरे पिताजी का निधन 2018 में हाल ही में हो गया। लेकिन सन 2017 में मेरे दादा जी के वारिसान ने मेरे पिताजी पर एक सिविल सूट फाइल कर दिया, जिसके नोटिस मेरे पिताजी ने तामील हो गए थे, लेकिन उसका जवाबदावा नहीं दिया था। अब उनकी मृत्यु के पश्चात हम लोगों ने अपना नाम नगर पालिका परिषद के अभिलेखों में दर्ज कराने के लिए प्रार्थना पत्र दिया है।  क्या नामांतरण किया जा सकता है, या नहीं? मेरे पिताजी का नाम नगर पालिका में अभिलेखों में दर्ज है, और नल, बिजली, गैस कनेक्शन इसी पते पर दर्ज हैं।  मेरे पास मकान से संबंधित किसी प्रकार के कागजात उपलब्ध नहीं हैं। मुकदमा में जीतने के लिए हमें क्या करना चाहिए? मेरे पिताजी के चाचा की वारिसान गुजरात में निवास करते हैं, हम लोगों के पास मकान से संबंधित कागजात नहीं है। आगे की कार्रवाई के लिए उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

आप ने यह नहीं बताया कि आप के दादाजी के वारिसान ने किस आधार पर किस राहत के लिए सिविल सूट फाइल किया है। जब तक यह पता न हो तब तक क्या कुछ कहा जाए।  आप जानना चाहते हैं कि मुकदमे को जीतने के लिए क्या करना चाहिए तो इस सवाल का जवाब तब दिया जा सकता है जब पता है को मुकदमा किस बात का है।

यदि नगरपालिका के अभिलेख में आप के पिता का नाम उस के कब्जेदार/स्वामी के रूप में लिखा है तो नामांतरण हो जाएगा। बशर्ते कि कोई अन्य उस पर आपत्ति नहीं करे। वैसे नामान्तरण किसी संपत्ति के स्वामित्व का सबूत नहीं होता। इस कारण उस पर ज्यादा कंसंट्रेट करने की जरूरत नहीं है। बस इतना ध्यान दें कि किसी और के नाम से नामान्तरण न हो।

यदि मकान पिताजी के चाचाजी का है तो वे त आप के चाचाजी के वारिस तो नहीं थे। आप के पिता के पास कब्जा किसी खास रूप में नहीं था तो आप के पिताजी कह सकते हैं कि यह मकान चाचाजी ने  उन्हें देदिया था और अब आप के पिताजी का एडवर्स पजेशन है। केवल इसी आधार पर  ही उस संपत्ति के संबंध में आप के पिताजी के खिलाफ किया गया कोई भी मुकदमा खारिज हो सकता है। पिताजी का नाम नगर पालिका में अभिलेखों में दर्ज होना और नल, बिजली, गैस कनेक्शन इसी पते पर दर्ज होने से आप के पिताजी का उस संपत्ति पर  50 वर्षों का कब्जा  साबित हो ही जाएगा। जो मुकदमा आप के पिताजी के खिलाफ किया गया था उस में भी विधिक प्रतिनिधि /कायम मुकाम रिकार्ड पर लाने की जिम्मेदारी दावा करने वाले पक्ष की है। आप को उस की भी चिन्ता करने की कोई जरूरत नहीं है। जब समन मिलें तब अदालत मे हाजिर हों और अपना पक्ष रखें। सब से बड़ी बात यह कि आप अपना वकील अनुभवी और दीवानी मामलों का अच्छा जानकार रखें।

आत्महत्या का प्रयास अपराध नहीं

December 27, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

शोएब चिश्ती ने भुजौली कालोनी चौराहा‚ देवरिया‚ उ०प्र०  से पूछा है-

क्या आत्महत्या अपराध है‚ यदि हां, तो जब व्यक्ति ही नहीं रहेगा तो उसके उपर किस प्रकार का अपराधिक मुकदमा चलेगा?  क्या इस कानून के तहत उसके परिवार पर तो कोई आंच नही आती?  यदि इसे प्राणदान का नाम देकर किया जाय तो क्या तब भी आत्महत्या ही मानी जाएगी। यदि कोई व्यक्ति इच्छामृत्यु चाहता है तो उसे किससे इजाजत लेनी होती है। कृपया कानूनी दृष्टि से इच्छामृत्यु‚ आत्महत्या व प्राणदान इन तीनों में क्या अंतर होता है?

समाधान-

आत्महत्या भारतीय कानून के अंतर्गत अपराध नहीं है। यदि होता तब भी कानूनी स्थिति यह है कि अभियुक्त की मृत्यु हो जाने पर न तो उस पर कोई अभियोजन चलाया जा सकता है और न ही उसे दंडित किया जा सकता है। इस कारण आत्महत्या को अपराध बनाया जाना संभव भी नहीं है।

आत्महत्या के प्रयास को भारतीय दंड संहिता की धारा 309 में अपराध मानते हुए दंड का विधान दिया गया है। यह धारा निम्न प्रकार है-

  1. आत्महत्या करने का प्रयत्नजो कोई आत्महत्या करने का प्रयत्न करेगा, और उस अपराध के करने के लिए कोई कार्य करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि एक वर्ष तक की हो सकेगी, [या जुर्माने से, या दोनों से,] दण्डित किया जाएगा।

आप ने पूछा है कि इच्छामृत्यु‚ आत्महत्या व प्राणदान में क्या अंतर है। तीनों शब्द एक दूसरे के पर्यायवाची शब्द हैं तीनों का अर्थ एक ही है, किसी भी व्यक्ति द्वारा स्वयं अपने प्राण लेने की हर कोशिश आत्महत्या ही है। किसी भी तरह के शब्द परिवर्तन से वह आत्महत्या की श्रेणी से अलग नहीं हो सकती। कानूनी दृष्टि से भी तीनों का अर्थ एक ही है।

आप ने यह भी पूछा है कि किसी के आत्महत्या कर लेने पर किसी परिवार वाले पर कोई आँच तो नहीं आती। सामान्य तौर पर तो किसी भी परिवार वाले पर कोई आंच नहीं आती। किन्तु यदि यह पाया जाए कि मृतक को आत्महत्या के लिए किसी व्यक्ति या व्यक्तियों ने प्रेरित किया है तो आत्महत्या के लिए प्रेरित करना एक अलग अपराध है जो धारा 305 व 306 आईपीसी में दंडनीय है। धारा 305 में किसी बालक या विक्षिप्त व्यक्ति को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने पर मृत्युदंड या आजीवन कारावास या 10 वर्ष तक के  कारावास से दंडित करने का विधान है। धारा 306 में किसी भी आत्महत्या कर लेने वाले को आत्महत्या के लिए प्रेरित करने पर 10 वर्ष तक के  कारावास से दंडित करने का विधान है।

आत्महत्या की कोशिश करने को भी अपराध पुस्तिका से हटाने के लिए एक लंबे समय से प्रयास चला आ रहा है। इस संबंध में 2013 में एक बिल भी संसद मे प्रस्तुत किया गया था लेकिन अभी तक उसे पारित नहीं किया जा सका है। लेकिन मेंटल हेल्थ केयर एक्ट – 2017 के द्वारा यह अपराध की श्रेणी से स्वतः ही हट गया है। इस अधिनियम की धारा 115 निम्न प्रकार है-

Section 115. PRESUMPTION OF SEVERE STRESS IN CASE OF ATTEMPT TO COMMIT SUICIDE.

(1) Notwithstanding anything contained in section 309 of the Indian Penal Code any person who attempts to commit suicide shall be presumed, unless proved otherwise, to have severe stress and shall not be tried and punished under the said Code.

(2) The appropriate Government shall have a duty to provide care, treatment and rehabilitation to a person, having severe stress and who attempted to commit suicide, to reduce the risk of recurrence of attempt to commit suicide.

इस धारा 115 की उपधारा (1) में यह विधान है कि यदि कोई व्यक्ति धारा 309 भारतीय दंड संहिता के अनुसार आत्महत्या का प्रायस करता है तो जब तक अन्यथा प्रमाणित न  हो जाए यह माना जाएगा कि वह मानसिक तनाव में था और उस के विरुद्ध अभियोजन नहीं चलाया जाएगा। उपधारा (2) में यह विधान किया गया है ऐसे व्यक्ति की चिकित्सा व केयर प्रदान करना राज्य सरकार का दायित्व होगा जिस से वह दुबारा आत्महत्या का प्रयास न करे।

समस्या-

राहुल ने A-12 कोटला, मुबारकपुर, नई दिल्ली से पूछा है-

मेरे ताऊ मुझे मेरे मकान से हटा कर खुद कब्जा करना चाहते हैं। मेरे मकान की रजिस्ट्री नहीं है। मैं अपने मकान पर पिछले 32 सालों से रहता आ रहा हूँ। मेरे पास 1988 के गैस कनेक्शन की पासबुक है। जिस पर मेरा नाम और घर का पता लिखा हैं और 2012 के बिजली बिल, वोटर कार्ड आदि हैं। अभी मैं भी उसी पते पर रहता हूँ। मेरे ताऊ ने कुछ दिन पहले उस पर कब्जा करने की कोशिश की पर वो असफल रहे और उनके खिलाफ FIR हो गयी। जिसमें घर मे घुसने के धारायें लगी हैं। मैं उसने अपने मकान को बचने के लिए क्या करूँ?

समाधान-

आप मकान पर काबिज हैं और एक लंबे कब्जे के दस्तावेजी सबूत आप के पास हैं। जबरन कब्जा करने का आप के ताऊ का प्रयास असफल हो चुका है। ताऊ पर अपराधिक प्रकरण भी दर्ज हो चुका है और चल रहा है। इस कारण आप अभी राहत में हैं। तुरन्त आप को कुछ भी करने की जरूरत नहीं है।

पहले से ही मकान पर कब्जा करने का अपराधिक मुकदमा चलते रहने के कारण यह तो साबित है ही कि कब्जा अभी आप के ताऊ का न हो कर आप का है। अब वे जबरन कब्जा करने की कोशिश नहीं करेंगे। करते हैं तो फिर से एक अपराधिक मुकदमा उन पर बन जाएगा।

फिर भी आप यदि सोचते हैं कि ताऊ किसी प्रकार से आप को मकान से बेकब्जा करने का प्रयत्न कर सकते हैं तो आप अपने ताऊ और अन्य व्यक्ति जिन से आप को ऐसा अंदेशा हो उन के विरुद्ध इस आशय स्थायी निषेधाज्ञा का वाद दाखिल कर सकते हैं कि प्रतिवादीगण आप को बिना वैधानिक प्रक्रिया अपनाए बेदखल न करें। इस वाद में ही अस्थायी निषेधाज्ञा का प्रार्थना पत्र दाखिल कर अस्थायी निषेधाज्ञा आप प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

शमशेर ने बीकानेर, राजस्थान से पूछा है-

हत्या का प्रयास करने वाले अपराधी को पुलिस को सौंप दिया। लेकिन पुलिस ने उसे बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये छोड़ दिया।  अब पुलिस कहती है कि उसकी जमानत हो गयी है। क्या पुलिस थाने में जमानत होती है? क्या अगर होती है, तो पुलिस उसे वापिस कब लाएगी?

समाधान-

शमशेर भाई, साधारण लोग चीजों को ठीक से समझने की कोशिश नहीं करते। असल में चीजें बिना कोशिश के समझ नहीं आतीं। आप थोड़ा कोशिश करते तो यह सब आप को भी समझ आ जाता। कोशिश से हमारा मतलब कुछ आसपास के जानकार लोगों से पूछना और जरूरत पड़ने पर किसी किताब का सहारा लेना भी है। खैर, आप का यहाँ यह सवाल पूछना भी एक कोशिश ही है, इस कोशिश के लिए आप को बधाई¡

सब से पहली बात तो ये कि आप ने “अपराधी” शब्द का गलत प्रयोग किया है। अपराधी का अर्थ होता है जिस के विरुद्ध किसी अपराध का आरोप अदालत ने सिद्ध मान लिया हो। जब तक उस पर आरोप होता है वह “अभियुक्त” या “मुलज़िम” कहलाता है। जैसे ही अपराध सिद्ध हो जाता है, उसे “अपराधी” या “मुज़रिम” कहा जा सकता है। यहाँ आप को इस के लिए अभियुक्त शब्द का प्रयोग करना चाहिए था।

दूसरी बात ये कि जमानत पुलिस थाना में भी होती है और अदालत में भी होती है। अपराध दो तरह के होते हैं, एक तो संज्ञेय और दूसरे असंज्ञेय। संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस उसे प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप  में दर्ज करती है और अनुसंधान आरंभ कर देती है, असंज्ञेय अपराधों के मामले में सूचना को पुलिस केवल रोजनामचे में दर्ज करती है और सूचना देने वाले को कहती है कि यह असंज्ञेय मामला है इस कारण वह सीधे मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद प्रस्तुत करे। असंज्ञेय मामलों पर मजिस्ट्रेट प्रसंज्ञान ले कर सुनवाई के लिए तलब कर सकता है।

अब संज्ञेय मामलों में भी दो तरह के मामले होते हैं। जमानती और ग़ैरजमानती। जमानती मामलों में अभियुक्त के गिरफ्तार होने पर पुलिस खुद जमानत ले लेती है, बल्कि ऐसे मामलों में अभियुक्त से पुलिस को पूछना जरूरी होता है कि वह जमानत पेश करे तो उसे छोड़ दिया जाएगा। अभियुक्त अक्सर जमानत पेश करते हैं और रिहा हो जाते हैं। गैर जमानती मामलों में पुलिस जमानत नहीं ले सकती। उसे गिरफ्तार करने पर 24 घंटों में अदालत में पेश करना होता है। वहाँ अभियुक्त जमानत की अर्जी पेश कर सकता है और मजिस्ट्रेट जमानत ले कर उसे रिहा कर सकता है।

जो अपराध गैरजमानती हैं उनमें भी अभियुक्त चाहे तो पहले से सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दे सकता है और सेशन न्यायालय पुलि से उस मामले की डायरी मंगा कर सुनवाई कर सकती है। उचित होने पर उसे अग्रिम जमानत का लाभ देते हुए आदेश दे सकती है कि उसे गिरफ्तार करने की जरूरत हो तो उसे जमानत ले कर छोड़ दिया जाए।

हत्या का प्रयास करने का अपराध गैरजमाती है। इस कारण यदि अभियुक्त को पुलिस को सौंप दिया गया है तो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना पुलिस के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि अभियुक्त ने पहले से ही अग्रिम जमानत का आदेश ले रखा है तो पुलिस को उसे जमानत पर छोड़ना जरूरी है। आप के मामले में यही हुआ होगा। अब जब पुलिस मजिस्ट्रेट के समक्ष उस मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत करेगी तब अभियुक्त को सूचित करेगी और उसे मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। वहाँ उसे दुबारा जमानत पेश करनी होगी।


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