Possession Archive

समस्या-

भागलपुर, बिहार से अभिषेक शर्मा ने पूछा है-

मारा पुश्तैनी मकान है और मेरे पिताजी हमें अपने मकान में जाने नहीं देते हैं, इसलिए हम 10 बरसों से बाहर रह रहे हैं। जब मैं अपने पिताजी से अपना हक़ हिस्सा माँगने के लिए गया तो मेरे पिताजी ने एक स्टाम्प पेपर बनवा के रखा था,जिस पर लिखा था कि मैं अपनी मर्ज़ी से प्रॉपर्टी कुछ पैसे के लिए पिता के ना कर रहा हूँ और उन्होने हस्ताक्षर करवा कर मुझे बेदखल कर दिया। क्या मैं अपनी प्रॉपर्टी वापस ले सकता हूँ, उनके उपर 420 का केस कर सकता हूँ। मेरे पिताजी ने सिग्नेचर प्रेशर डाल कर के मुझसे ज़बरदस्ती करवाया है, इस घटना को एक साल हो गया। हमारी आर्थिक स्थिति ठीक नहीं है, अब अपना हिस्सा कैसे ले सकते हैं?

समाधान-

भिषेक जी, आप के पिता ने आप से एक वर्ष पूर्व दबाव डाल कर जबरन आप से दस्तावेज पर हस्ताक्षर करवा लिए। इस दस्तावेज में मकान में अपना हिस्सा पैसा ले कर छोड़ने की बात लिखा जाना आप बताते हैं। लेकिन आपने यह नहीं बताया कि कितना पैसा लेना लिखा है? आप पिता के विरुद्ध 420 का केस करने की इच्छा रखते हैं, पर इस में 420 जैसा क्या है? फिर आप उस की शिकायत एक साल बाद कैसे कर सकते हैं? इस तरह की शिकायत इतने दिन बाद करने का आधार क्या है? इस कारण धारा 420 या किसी अन्य अपराधिक मामले की रिपोर्ट करना तो इस मामले में बिलकुल असंभव है। आप करेंगे तो भी उस का कोई नतीजा नहीं निकलेगा।

यदि आप की संपत्ति पुश्तैनी है और उस में आप का भी हिस्सा है इस बात की पुष्टि इस बात से होती है कि आप के पिता ने स्टाम्प पर लिखवा कर वह हिस्सा छुड़वाने की कोशिश की है।

किसी भी पुश्तैनी / सहदायिक संपत्ति में बच्चे का जन्म से ही अधिकार होता है। आप का भी उस संपत्ति में जन्म से अधिकार है और आप का हिस्सा उस संपत्ति में है। यह हिस्सा रजिस्ट्रार के कार्यालय में विक्रय पत्र या रिलीज डीज निष्पादित कर उस का पंजीयन कराए बिना पिता के हक में चला जाना संभव नहीं है। आप के पिता द्वारा स्टाम्प पर लिखा लिए जाने के बावजूद भी आप का हिस्सा आप का ही है। अब आप का हिस्सा प्राप्त करने के लिए आप अपने पिता के विरुद्ध बंटवारे का दावा दीवानी न्यायालय में कर सकते हैं और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं। इस के लिए आप आप के क्षेत्र के जिला न्यायालय में जा कर किसी अच्छे दीवानी वकील से मिलें और विभाजन का वाद पेश करवाएँ। इसी तरीके से आप पुश्तैनी जायदाद में हिस्सा प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

अर्पण कुमार जैन ने सिद्धेकेला, जिला बोलानगीर, उड़ीसा से पूछा है-

रीब पचास साल पहले मेरे पापा ने एक जमीन खरीदी थी, पेपर में हाथ से लिखवा क़े। पर उस जमीन मेरे पापा के चाचा के लड़के ने अपने नाम पर करवा लिया।  पर उस जमीन पर हम ही इस्तेमाल करते हैं। अभी हम घर तोड़ के नया घर बना रहे हैं। तो हो नाम भी नहीं करने दे रहे और जमीन के भी एक हिस्सा मांग रहे है।

समाधान-

प की समस्या बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है। बस यह समझ आ रहा है कि आप के पिता ने किसी से एक जमीन खरीदी जिस का एग्रीमेंट किसी कागज पर हाथ से लिखा गया। उस जमीन पर मकान बना कर आप का परिवार निवास करता है। आप के पिता के चाचा के लड़के ने उस जमीन को अपने नाम करा लिया है। यह स्पष्ट नहीं किया है कि उस ने अपने नाम कैसे कराया है? किस रिकार्ड में वह जमीन पिता के चाचा के लड़के के नाम हुई है। जिस के कारण वह नया घर बनाने में अड़चन पैदा कर रहा है और जमीन का एक हिस्सा मांग रहा है।

आप के पिता ने एक हाथ से लिखे एग्रीमेंट के अंतर्गत जमीन खरीदी और उस का कब्जा ले लिया और मकान बना कर उस पर निवास कर रहे हैं।  किसी भी स्थायी संपत्ति जिस में मकान जमीन वगैरा शामिल हैं  उस का मूल्य 100 रुपए या उस से अधिक है तो उस संपत्ति के विक्रय का पंजीकरण होना आवश्यक है। आपने जो विवरण दिया है उस से लगता है कि आप के पिता ने उस का पंजीयन नहीं कराया था।

संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 53 ए में यह प्रावधान है कि किसी संविदा के अंतर्गत विक्रय की गयी संपत्ति का कब्जा यदि क्रेता को दे दिया गया है तो यह संविदा का आंशिक पालन है और ऐसा आंशिक पालन हो जाने के उपरान्त यदि पंजीयन न भी हो तो उस संपत्ति का कब्जा क्रेता से वापस नहीं लिया जा सकता है। हम इस तरह की समस्या का उत्तर पहले भी एक समस्या (संपत्ति अंतरण की किसी लिखत के अनुसार कब्जा दे दिए जाने पर किसी तरह वापस नहीं लिया जा सकता।) में दे चुके हैं।

आप के मामले में भी यही स्थिति है। इस तरह आप के या आप के पिता के पास जो संपत्ति है उस का कब्जा आप से या आप के पिता से कोई नहीं ले सकता। पिता के चाचा का लड़का यदि मकान को तुड़ा कर बनाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है तो आप के पिता या आप उस समय जमीन खरीद की कागज पर लिखत के आधार दीवानी न्यायालय में वाद संस्थित के कह सकते हैं कि जमीन आप के पिता ने इस लिखत से खऱीदी थी और उस पर मकान बना कर आप 50 वर्ष से निवास कर रहे हैं। इस तरह आप उस जमीन पर बहैसियत स्वामी काबिज हैं। इस मकान को तुड़ा कर दूसरा बनाना चाहते हैं ओर प्रतिवादी ( पिता के चाचा का लड़का) इस में बाधा बनता है और जमीन में हिस्सा मांगता है। उसे आप की जमीन पर दखल से रोका जाए और आदेश दिया जाए कि वह आप के मकान को तुड़ा कर नया बनाने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करे। इसी वाद में आप इस तरह के दखल के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त कर सकते है। बेहतर है कि आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे दीवानी मुकदमे लड़ने वाले वकील से मिलें और उस से परामर्श कर के यह वाद संस्थित करें। अस्थई निषेधाज्ञा प्राप्त होने के बाद आप जमीन पर बना मकान तोड़ कर नया बना सकते हैं।

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

समस्या-

स्वाति साहू ने राजा तालाब, गाँधी चौक, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे दादा जी ने अपने स्वयं के पैसे से लिये हुए मकान में मेरी बेवा माता जी और हम पांच बहनों को अपने साथ रखा है, पिछले 30 साल से। दादा जी का निधन होने पर मेरे बड़े पापा और चाचा हम लोगों को घर खाली करने के लिए धमकी दे रहे हैं। दादा जी ने मम्मी के नाम पर वसीयत किये हैं। पर वो रजिस्टर्ड नहीं हुआ है, नोटरी से अटेस्टेड कराया है। जो कि तहसील में मान्य नही है। हमे क्या करना चाहिए जिससे हमें कोई घर से निकाल न पाए?

समाधान-

दादाजी की वसीयत के अनुसार मकान आप की मम्मी का है और आप को वहाँ से निकाला जाना गैर कानूनी होगा। इस कारण से आप सभी वहाँ से निकलने से साफ मना कर दें। बड़े पापा और चाचा वगैरा से कह दें कि वे यदि यह समझते हैं कि वे मकान खाली कराने के अधिकारी हैं तो अदालत में दावा करें, यदि अदालत से फैसला हो जाता है कि मकान हमें खाली करना होगा तो कर देंगे। पर किसी के कहने से न करेंगे।

किसी भी वसीयत का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है, यहाँ तक कि किसी स्टाम्प पेपर तक पर होना जरूरी नहीं है। वसीयत एक खाली कागज पर भी लिखी जा सकती है। आप को किस ने कह दिया कि यह तहसील में मान्य नहीं है? वसीयत पर वसीयत करने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए और दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए जिन की उपस्थिति में वह वसीयत की गयी हो. नोटेरी से अटेस्टेशन हुआ है इस से नोटेरी एक और गवाह हो गया है तथा नोटेरी का रजिस्टर वसीयत के सही होने का एक ठोस सबूत है। इस वसीयत को आप लोग जब भी कोई मुकदमा चलेगा तब अदालत में गवाहों के बयान से प्रमाणित करा सकते हैं।

आप के चाचा ताऊ को उन के पिता की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने का आधिकार है। लेकिन आप की माँ के नाम मकान की वसीयत है तो उसे प्राप्त करने का चाचा ताऊ का अधिकार समाप्त हो चुका है।  यदि आप को लगता हो कि आप के चाचा, ताऊ जबरन आप को मकान से बेदखल कर सकते हैं तो आप अदालत में दावा कर के गैर कानूनी तरीके से मकान से बेदखल करने पर रोक लगाने के लिए स्थायी और अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

रियाज़ुद्दीन ने बिलासपुर, जिला गौतम बुद्ध नगर, (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरे ससुर साहब ने 15 साल पहले एक प्लॉट खरीदा था शाइन बाग दिल्ली में उस समय किसी व्यक्ति ने मेरे ससुर साहब से कह कर कि एक ग़रीब फैमिली है अपने यहाँ रेंट पर रख लो। उन्होंने उस को रख लिया, वो भी विना रेंट के  15 साल तक उस से कोई किराया भी नहीं लिया। अब उनको उस प्लाट पर निर्माण करना है। लेकिन वह औरत उस प्लाट को खाली नहीं कर रही। बोलती है मुझ को दो फ्लोर बना कर दो या आधा मकान दो। मेरी पास इस के पेपर हैं, सब कुछ है, और एक दो बदमाशों से भी जा कर मिल ली है वो। उस औरत के आदमी की मृत्यु भी हो चुकी है। अब हम क्या कर सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें।

समाधान-

रियाजुद्दीन जी, अपनी किसी संपत्ति पर जब भी किराएदार या लायसेंसी के रूप में किसी को व्यक्ति को कब्जा दिया जाए तो उस की लिखित संविदा की जानी चाहिए, जिस पर दोनों पक्षकारों के सिवा कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों।  बेहतर हो यदि उस संविदा को उचित मूल्य के गैरन्यायिक स्टाम्प पर लिखा जाए और नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। नोटेरी के रजिस्टर में पक्षकारों के साथ-साथ गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए जाएँ। इस दस्तावेज को सुरक्षित रखा जाए। इस से भविष्य में यह साबित करने में आसानी रहे कि भूमि या परिसर किराए पर या लायसेंस पर उपयोग के लिए दिया गया था। यदि आप के ससुर साहब के पास इस तरह का कोई दस्तावेज या मामूली लिखत भी हो तो इस स्थिति में वह काम आएगा। यदि कोई भी दस्तावेज नहीं हो तो वहाँ जिस का कब्जा है उसकी किसी तरह की अभिस्वीकृति हो जिस का कोई सीधा या परिस्थिति जन्य सबूत हो।

यदि यह सब नहीं है तो यह माना जाएगा कि आप के ससुर ने उक्त संपत्ति को खुला छोड़ दिया था और फिर वर्तमान कब्जाधारी उस पर अपना काम करने लगा और आप के ससुर ने 12 वर्ष से अधिक से उस संपत्ति पर अपना कोई दावा नहीं किया। अवधि अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार 12 वर्ष से अधिक का कोई कब्जा हो जाने पर उस से कब्जा वापस लेने के लिए दावा नहीं किया जा सकता। इसी को एडवर्स पजेशन कहा जाता है। यदि उस से जबरन कब्जा लिया जाता है तो यह गैर कानूनी होगा और वर्तमान कब्जाधारी धारा  145 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कब्जा वापसी का प्रार्थना पत्र दे सकता है और उसे कब्जा वापस दिलाया जा सकता है।

आप के ससुर साहब के पास उस प्लाट के स्वामित्व का कोई सबूत जरूर होगा। उस के साथ यदि आप उस कब्जाधारी का कब्जा 12 वर्ष से कम का साबित कर सकें, या फिर यह साबित कर सकें कि वह जमीन / परिसर किराए पर दिया गया था और कम से कम एक बार किराया जरूर लिया गया था। तो आप को दीवानी का कोई अच्छा वकील उस प्लाट पर अपना कब्जा वापस प्राप्त करने का रास्ता सुझा सकता है। इसलिए हमारा सुझाव है कि आप ये सब सबूत या गवाही इकट्ठा करें और फिर किसी अच्छे दीवानी काम करने वाले वकील से मिलें और रास्ता निकालें। वैसे हमें लगता है कि इस जमीन का कब्जा वापस लिया जा सकता है। कानूनी रास्ते में अभी हमारे देश में बहुत समय लगता है। इस कारण लोग मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाने के स्थान पर बहुत कम प्रतिफल में समझौते करना पसंद करते हैं। यदि आप को लगे कि कोई सबूत नहीं हैं जिस से कानूनी तरीके से संपत्ति को वापस लिया जा सके तो बेहतर है कि आपस में ऊंच नीच कर के ही किसी तरह से संपत्ति वापस प्राप्त की जाए। पूरी नहीं तो आधी ही प्राप्त की जाए।

समस्या-

मेरे पिताजी दो भाई थे, जिनके पास एक पुश्तैनी जमीन 14×70 स्क्वायर फुट की थी जिसके खसरे में मेरे दादा का  नाम दर्ज है। दोनों भाइयों ने आपसी रजामंदी से 40 वर्ष पूर्व जमीन का बंटवारा आधा-आधा कर लिया किन्तु कोई विलेख नही लिखवाया। मेरे पिताजी ने अपने हिस्से के 14×35 के प्लाट पर स्वयं के खर्च से 40 वर्ष पूर्व मकान बनवा लिया था तथा जिसका किसी ने विरोध नही किया था, जिसका गृहकर 38 वर्षो से पिताजी के नाम से ही जमा होता है, पिताजी जी की मृत्यु के बाद मेरे नाम से गृहकर जमा होता है और मकान पर मेरा ही कब्जा है। मेरे चाचा जिनके हिस्से में 14×35 का प्लाट था उन्होंने अपने हिस्से के प्लाट में अभी तक कोई निर्माण नही करवाया  और उनकी मृत्यु भी हो चुकी है। अब विवाद का विषय ये है कि चाचा का पुत्र 40 वर्ष पूर्व हुए आपसी बंटवारे को नही मान रहा, उसका कहना है कि चूंकि 14×70 के पूरे प्लाट का खसरा उसके दादा के (पिता के पिता) नाम पर है और बंटवारे का कोई विलेख नही इसलिए घर का और खाली जमीन का बंटवारा करो और अपने घर मे से हमको भी हिस्सा दो। छोटे दादा के पुत्र द्वारा झूठे केस में फसाने की साजिश की जा रही और मारने की धमकी दी जा रही। क्या कानूनी तौर पर वह मेरे दादा जी का मकान हड़प सकता है? सर हमारे पास घर के 38 वर्षों का गृहकर की रसीद (जो पिताजी के नाम से है), घर का 12 वर्षों का बिजली का बिल (मेरे स्वयं के नाम से),16 वर्षो का जलकर की रसीद (पिताजी के नाम पर), पिताजी का राशन कार्ड, माताजी का राशन कार्ड और मेरे दादाजी के नाम वाला नगर पंचायत आफिस से जारी 14×35 स्क्वायर फुट के प्लाट (जिसमे पिताजी के द्वारा बनवाया मकान है) का खसरा है। क्या कानूनी तौर पर चाचा का पुत्र मेरे मकान पर कब्जा पा सकता है?

-मोनू अहमद,  नगर पंचायत रुद्रपुर, जिला-देवरिया, (उ. प्र.)

समाधान-

दि 40 वर्ष पूर्व बंटवारा हो चुका था तो उस के गवाह अवश्य होंगे। आवश्यकता पड़ने पर साक्षियों  के बयान करवा कर बंटवारे को साबित किया जा सकता है। इस संबंध में आप Karpagathachi And Ors vs Nagarathinathachi 1965 AIR 1752 के प्रकरण को देखें। आप के पास पिताजी के नाम से 38 वर्ष से गृहकर की रसीद है। घर बनाने के बाद ही तो गृहकर आरंभ हुआ है यह एक सहायक सबूत है जो कहता है कि मकान बने हुए हिस्से पर आपका इतने लंबे समय से कब्जा है। 16 वर्षों का जलकर र 12 वर्ष से बिजली के बिल भी सहायक सबूत हैं। आप अच्छे से बंटवारा और मकान का निर्माण साबित कर सकते हैं। प्रतिकूल कब्जे (एडवर्स पजेशन) के तर्क का भी सहारा लिया जा सकता है। इस तरह कानूनी रूप से आपके मकान को हड़प करना इतना आसान नहीं है।

आप अपने चचेरे भाई को कह दीजिए कि वह दुबारा से बंटवारा चाहता है तो बंटवारे का दावा कर दे। फैसला अदालत में हो। आप यदि मुकदमे को मुस्तैदी से लड़ेंगे तो आप की संपत्ति आपके पास ही रहेगी।

समस्या-

मेरे पति की असामयिक मृत्यु हो गयी है।  मेरे पति को पैतृक संपत्ति में 4 बीघा जमीन हिस्से में आई थी।  क्या मेरे पति की मृत्यु के बाद मेरा कोई हक उस पैतृक संपत्ति में बनेगा अथवा नही?  मैंने अभी कोई दूसरी शादी नही की है। अगर मेरे मां बाप मेरी दूसरी शादी कर देते हैं तो मेरा पैतृक संपत्ति जो मेरे पति की थी क्या मैं उस पर दावा कर सकती हूँ?

-लता देवी,  2/881 कोर्ट रॉड सहारनपुर

समाधान-

प के पति की जो भी स्वअर्जित संपत्ति थी अथवा पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति में जो भी उन का हिस्सा था वह आप के पति की मृत्यु के साथ ही उत्तराधिाकार में आप को प्राप्त हो चुका है। आप उसे प्राप्त करने के लिए दावा कर सकती हैं।

यदि आप दूसरा विवाह करती हैं तो भी आप का इस संपत्ति पर यह अधिकार बना रहेगा। वह आप के विवाह करने से समाप्त नहीं होगा। आप चाहें तो विवाह के बाद भी दावा कर सकती हैं। लेकिन आप को यह दावा समय रहते करना चाहिए। क्यों कि अक्सर ऐसा होता है कि आप दावा करते हैं तब तक दावा करने की कानूनी समयावधि समाप्त हो जाती है और आप दावा करने से वंचित हो सकती हैं। इस कारण आप को चाहिए कि तुरन्त किसी वकील से परामर्श कर के कार्यवाही करें।

समस्या-

मखदूमपुर गोमती नगर विस्तार लखनऊ से संतपाल ने पूछा है-

मेरे पिता जी पिता के नाम एक ४ बिस्वा प्लाट है।  पर उस प्लाट मे एक व्यक्ति ३५ साल से घर बनवाकर रह रहा है । अब वह अपना हक बताता है इस स्थिति मे उसे किस प्रकार घर से बेदखल किया जाये।

समाधान-

मारे पास अक्सर आप के जैसे सवाल आते है ंकि हमारी पुश्तैनी, या दादा जी की, या पिताजी की जमीन है उस पर कुछ लोगों ने कब्जा कर के 15, 20, 25, 35 या अधिक वर्ष से मकान बना लिया है या उस पर खेती कर रहे हैं या फिर और कुछ कर रहे हैं।

भाई जब किसी ने आप की जमीन पर कब्जा किया और वहाँ अपना निर्माण या काम करने लगा तब क्या आप सोए हुए थे? और फिर उस के बाद अभी तक 12-13 या उस से अधिक सालों से क्या आप और आप के तमाम परिवार वाले सोए रहे? आपने सुना होगा कि सोते रहने वाले सब कुछ खो देते हैं।

आप बताइए कि आप की सम्पत्ति पर कुछ लोगों ने कब्जा कर लिया है लेकिन संपत्ति अभी तक आप के स्वामित्व की है तो आप को चाहिए क्या? आप उस का कब्जा ही तो वापस लेना चाहते हैं? यदि आप कब्जा वापस लेना चाहते हैं तो आप को अचल संपत्ति के कब्जे के लिए वाद संस्थित करना पड़ेगा। वैसी स्थिति में कब्जा आप के हाथ से निकल जाने की तिथि से केवल 12 वर्ष की अवधि में आप ऐसा कर सकते हैं।  इस से अधिक अवधि हो जाने पर आप का अचल संपत्ति के कब्जे का वाद इसलिये खारिज हो जाएगा कि आप ने दावा करने की निर्धारित अवधि में यह दावा पेश नहीं किया।

आप सभी इसे ठीक से पढ़ लें, और हमें ऐसे सवाल न भेजें जिन में आप अपनी अचल संपत्ति पर 12 वर्ष से पहले हो चुके कब्जे को वापस लेना चाहते हों। हम आज के बाद से इस तरह के सवालों का कोई उत्तर नहीं देंगे।

समस्या-

निशी ने उदयपुर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या 25 वर्ष पूर्व शपथ पत्र के माध्यम से बक्शीश या दान में दी गई अचल सम्पत्ति जिसे ग्रहिता ने स्वीकार कर निर्माण किया और वर्तमान में भी काबिज है को दानदाता अपने जीवन में किसी अन्य के नाम पंजीकृत कर सकता या सकती है? जिसका पता ग्रहिता को दाता की मौत के बाद चले, तो क्या उससे वह सम्पत्ति पंजीकृत कराये दूसरे व्यक्ति को मिल जायेगी या होगी जबकि दानग्रहिता जीवित है और सम्पत्ति पर काबिज है?

समाधान-

चल संपत्ति का दान या बख्शीश शपथ पत्र के माध्यम से नहीं हो सकता। दान और बख्शीश संपत्ति का अंतरण हैं और संपत्ति का मूल्य 100 रुपए से अधिक होने के कारण उस का पंजीकृत होना आवश्यक है। आप  दान या बख्शीश पंजीकृत विलेख से नहीं होने के कारण अमान्य है। लेकिन यह दस्तावेज बताता है कि दान प्राप्तकर्ता को उक्त संपत्ति का कब्जा खुद उस के मालिक ने दिया था। कब्जे को 25 वर्ष हो चुके हैं। 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने तथा उस पर ग्रहीता द्वारा निर्माण कार्य भी कराया गया है।

यदि उक्त संपत्ति मूल स्वामी के द्वारा किसी को पंजीकृत विलेख से हस्तांतरित कर भी दी गयी हो तब भी उस का कब्जा तो वास्तविक रूप से नहीं दिया गया है। हस्तांतरण से संपत्ति का स्वामित्व प्राप्त करने वाले को ग्रहीता से संपत्ति का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित करना होगा। यह वाद मियाद के बाहर होने के कारण निरस्त हो सकता है। क्यों कि 25 वर्ष का अबाधित कब्जा होने से ग्रहीता का कब्जा प्रतिकूल हो चुका है और उस से संपत्ति का कब्जा मूल स्वामी या हस्तान्तरण से स्वामित्व प्राप्त व्यक्ति मियाद के बाहर होने से प्राप्त करने में अक्षम रहेगा।

समस्या-

संदीप कुमार ने ब्यावर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता की पहली पत्नी से 1979 में सीमाजिक रीति से तलाक हो चुका था, उस से एक पुत्र का जन्म हुआ था। दूसरी पत्नी से चार पुत्र तथा एक पुत्री का जन्म हुआ। जिनमें से दो अविवाहित पुत्रियों तथा एक विवाहिता पुत्री की मृत्यु हो गई। इसके बाद मेरे पिताजी का भी स्वर्गवास हो गया है। अब मेरे पिताजी की निर्वसीयती सम्पत्ती पर किस किस का अधिकार है। जबकि पहली पत्नी के पुत्र से पिताजी के जीवन काल में कोई वास्ता नहीं था। कृपया सुझाव दें।

समाधान-

दि आप की पिता की पहली पत्नी का तलाक सामाजिक रीति से हुआ था और न्यायालय ने विवाह विच्छेद की डिक्री पारित नहीं की थी तो आप के पिता का दूसरा विवाह अवैध है इस कारण दूसरी पत्नी को वैधानिक दर्जा नहीं मिलेगा। किन्तु सभी संतानों को बराबर उत्तराधिकार मिलेगा।

इस प्रकार यदि न्यायालय में यह कहा गया और साबित हुआ कि दूसरा विवाह वैध नहीं था तो पिताजी की संपत्ति में दूसरी पत्नी को कोई हिस्सा नहीं मिलेगा। जितने जीवित पुत्र पुत्री हैं उन सभी को एक एक हिस्सा मिलेगा तथा एक विवाहित पुत्री जिस की मृत्यु हो गयी है, यदि उस की संतानें और पति जीवित है तो उस का हिस्सा उन्हें प्राप्त होगा। आप ने जो विवरण दिया है उस में यह तथ्य सही अंकित है कि दूसरी पत्नी से चार पुत्र व एक पुत्री हुई है, तो फिर दो अविवाहित व एक विवाहित पुत्री की मृत्यु कहाँ से हो गयी है। आप अपने तथ्यों के हिसाब से इस राय को दुरुस्त कर सकते हैं।

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