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भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1861 : भारत में विधि का इतिहास-77

ब्रिटिश संसद ने 1861 में भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम पारित किया और इसी के साथ भारत में उच्च न्यायालयों के इतिहास का आरंभ हुआ। इस अधिनियम द्वारा ब्रिटिश
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उच्च न्यायालयों की स्थापना के लिए अधिनियम : भारत में विधि का इतिहास-76

ब्रिटिश भारत में 1861 तक जो न्यायिक व्यवस्था विकसित हुई थी वे दो भिन्न प्रकार की थीं। प्रेसीडेंसी नगरों मद्रास, कलकत्ता और मुम्बई में सुप्रीम कोर्ट स्थापित थे
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मध्य प्रांत और अवध की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-75

मध्य प्रांत की न्यायिक व्यवस्था मध्य भारत के ब्रिटिश क्षेत्रों के लिए जिन्हें मध्य प्रांत कहा जाता था, 1865 के 14वें अधिनियम के द्वारा न्यायिक व्यवस्था को सुचारू
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पंजाब की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-74

पंजाब को 1849 में ब्रिटिश भारत में सम्मिलित कर लिया गया। वहाँ जो न्यायिक व्यवस्था स्थापित की गई वह एक ही प्राधिकारी के अधीन सौंपी गई, जिसे न्यायिक
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प्रथम विधि आयोग और अविनियमित प्रान्तों की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-73

मद्रास, बम्बई और कलकत्ता प्रेसीडेंसियों में विधि व्यवस्था का विकास अलग अलग हुआ था और उन में पर्याप्त भिन्नता थी। इन दिनों जो न्यायिक व्यवस्था भारत के कंपनी
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बम्बई की पुलिस व्यवस्था, राजस्व मामले और विधि प्रवर्तन : भारत में विधि का इतिहास-72

बम्बई में जिले के कलेक्टर को मजिस्ट्रेट की शक्तियाँ प्राप्त थीं। उस के कार्यों में सहायता के लिए जिला पुलिस अधिकारी और ग्राम मुखिया नियुक्त थे। ग्राम मुखिया
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बम्बई में 1827 के बाद की न्यायिक व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-71

दीवानी न्याय व्यवस्था  बम्बई प्रेसीडेंसी में जल्द ही यह महसूस होने लगा कि 1827 के न्यायिक सुधारों में और भी बहुत कुछ करने की जरूरत है। 1828 में
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बम्बई में न्यायिक व्यवस्था का विकास : भारत में विधि का इतिहास-70

बम्बई में क्षेत्रीय प्रभुता का विस्तार शनैः शनैः हुआ। इस कारण से वहाँ न्यायिक समस्याएँ भी कम रहीं और न्यायिक व्यवस्था का विकास भी सीमित हुआ। 1793 में
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मद्रास में राजस्व और पुलिस व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-69

राजस्व व्यवस्था मद्रास में 1786 में भू-राजस्व मंडल की स्थापना की गई थी, जिस का उद्देश्य भू-राजस्व व्यवस्था को सुचारू बनाना था। 1794 में मंडल के अधीन प्रत्येक
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मद्रास में थॉमस मनरो के सुधारों के बाद की दांडिक न्याय व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-68

मद्रास प्रेसीडेंसी में दांडिक न्याय लॉर्ड कॉर्नवलिस के सुधारों के अनुरूप ही प्रचलित था। 1807 में कार्यपालिका और न्यायपालिका के पार्थक्य के सिद्धांत को लागू करने पर गवर्नर
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