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मुकदमों में देरी अदालतों की बहुत कम संख्या के कारण होती है।

समस्या-

संजु देवी ने गांव- ऱानोली, तहसील- खाटुश्यामजी, जिला- सीकर, राजस्थान से पूछा है-,

मैं अपने पिता की सबसे छोटी पुत्री हूँ। मेरे पिता की मौत बचपन में हो चुकी थी। शादी के बाद मैंने पिता की पैतृक संपति में हिस्से का वाद दो साल पहले कर दिया था। लेकिन मेरे भाई ने अभी तक न्यायालय में कोई जवाब नहीं दिया। इस तरह मेरे केस को कमजोर कर दिया गया है? न्यायालय के स्टे के बाद भी मेरी माँ का सम्पूर्ण भूमि से हकत्याग करवा कर अपने नाम पर चढवाने की कोशिश की गई है।  लेकिन मैंने पटवारी को पूरी बात बताकर उस हकत्याग को निरस्त करवाने के लिये एक और वाद दायर किया है, अब मेरी मॉ चल बसी है। क्या मेरे केस का कुछ भविष्य है? स्टे के बाद भी वो लोग मुझे नुकसान पहुँचाने की पूरी कोशिशें कर के मुझे एक तरह से बेदखल करना चाहते हैं। सर मार्गदर्शन देवे।

समाधान-

प की समस्या भारत के तमाम न्यायार्थियों की समस्या है।  हमारे देश में न्यायालयों की बहुत कमी है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 140 से अधिक अदालतें हैं, जब कि भारत में 10 लाख की आबादी पर केवल मात्र 12-13 अदालतें हैं। ऐसी स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका के मुकाबले में हमारी अदालतों पर 10 गुना से भी अधिक मुकदमों के निपटारे का बोझा है। हमारे यहाँ कम अदालतें होने का एक कारण यह है कि हमारी सरकारें अदालतों की संख्या को बढ़ाने पर कोई रुचि नहीं लेतीं क्यों कि वे समझती हैं कि अदालते बढ़ा देने से उनकी पार्टी को अगले चुनाव में मिलने वाले वोटों में कोई इजाफा नहीं होने वाला है। वे सारे फण्डस को इस तरह उपयोग में लेते हैं जिस से वे अगले चुनाव में वोट प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल कर सकें।

दालतें इन मुकदमों को निपटाने के लिए कोशिश भी करती है। अधिक मुकदमे होने और पुराने मुकदमों की भरमार होने के कारण नए मुकदमों में जरा जरा सी बात के लिए पेशी की तारीख बदल दी जाती है। इस वर्ष उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने सभी अधीनस्थ न्यायालयों को निर्देश दिए हैं कि वे साल के अंत तक 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों का निपटारा कर दें। इस के बावजूद बहुत सी अदालतें ऐसी हैं जहाँ 20 वर्षे से अधिक पुराने मुकदमो का निपटारा भी नहीं हो सकेगा।

प के मामले में हो सकता है कि आपके भाइयों ने अदालत के सम्मन लेने में ही देरी की हो। इस कारण कुछ पेशियाँ हो गयी हों वर्ना अब यह नियम है कि प्रतिवादी की तामील होने के 90 दिनों के भीतर उसे अनिवार्य रूप से जवाब दावा पेश करना होगा। यदि 90 दिनों के भीतर जवाब दावा पेश न हुआ हो तो आप अदालत पर दबाव बनाएं कि वह प्रतिवादीगण के जवाब के अवसर को समाप्त करते हुए आगे की कार्यवाही करे।

प सोच रही हैं कि देरी करने से आप का मुकदमा कमजोर हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है। बस आप यह ध्यान रखें कि आप का वकील अच्छा हो और पैरवी में किसी तरह की कमजोरी या भूल न हो। यह आप की स्वयं की मुस्तैदी से ही संभव है। नतीजें में देरी हो सकती है लेकिन  नतीजा आप के पक्ष में आएगा।

हाँ तक पूरी न्याय व्यवस्था को गति प्रदान करने की बात है तो उस के लिए जरूरी है कि जनता का दबाव भी राजनेताओँ और राज्य सरकार पर होना चाहिए। अभी अवय्स्क बालिकाओं के प्रति यौन अपराधों के मामले में दबाव था तो सरकारों को इस तरह की नयी अदालतें बड़ी संख्या में खोलनी पड़ीं हैं। इस से उस तरह के अपराधों में साल-छह माह में ही फैसले आने लगेंगे। इसी तरह का दबाव समूची न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पड़े तो बात बन सकती है, पर वह पूरे देश के स्तर का मसला है।

माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

पृथक आवास, हिंसा पर रोक व गुजारे भत्ते के लिए महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में परिवाद दाखिल करें।

समस्या-

मैंने अपने पति इरशाद अली  पर भरण पोषण का मुकदमा किया था, जिसका फैसला 1 दिसम्बर 2017 को मेरे पक्ष में हुआ। मेरे लिये 5000 और दोनों बेटो के लिये 2500, 2500 रुपये का प्रतिमाह का खर्चा निश्चित किया गया। परंतु उस के दूसरे दिन मेरे पति और उनकी बहन ने मुझे वापस ससुराल ले जाने के लिये ज़ोर देने शुरू कर दिया और सामाजिक दबाव के चलते मुझे वापस ससुराल आना पड़ा।  मुझे बताये बिना मेरे पति ने न्यायालय के आदेश के खिलाफ अपील लगायी है, परंतु न तो वो खुद किसी तारीख पर गये न मुझे जाने दिया। मुझे मेरे मायके भी नहीं जाने देते,  न ही किसी को मुझसे मिलने देते हैं, मुझे मारते पीटते हैं, मेरी सास मुझे और मेरे बच्चों को खाने का सामान भी नहीं देती है। कई बार मेरे पति गैस का सिलेंडर निकाल कर कमरे में बंद कर देते हैं। मेरी सास राशन के कमरे में ताला लगा कर रखती हैं, मेरे पति मुझे तलाक भी नहीं देना चाहते और दूसरा विवाह करना चाहते हैं। 2 बार जब मेरे पति ने मुझे बुरी तरह मारा पीटा तब मैंने महिला हेल्प लाइन को 181 पर कॉल की थी उन लोगो ने केवल समझौता करा दिया। लेकिन उसके बाद से मेरे सास और पति ने मेरे कमरे का बिजली का कनेक्शन काट दिया ताकि मैं मोबाइल चार्ज न कर पाऊँ।  मेरा मायका ससुराल से 360 किलोमीटर दूर है, मैं अपनी सास के घर में नही रहना चाहती। मेरी इच्छा है कि मैं किसी किराये के कमरे में अपने दहेज़ का सामान ले आऊं और जो खर्च न्यायालय द्वारा मुझे मिलना तय हुआ था वो मै यहाँ अपने ससुराल के क्षेत्र के न्यायालय से प्राप्त कर सकूँ। क्या यह कानूनी रूप से सम्भव है? यदि हां तो इसके लिये मुझे क्या करना होगा?

– जूही, मुसाफिरखाना, अमेठी, उत्तर प्रदेश

समाधान-

धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता में जो मेंटीनेंस का आदेश हुआ है उस के अनुसार आप के पति को आप को प्रतिमाह गुजारा भत्ता देना चाहिए। वे नहीं दे रहे हैं तो आप धारा 125(3) के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत कर सकती हैं जिस में गुजारा भत्ता ने देने के लिए हर माह आप के पति को जैल भेजा जा सकता है। लेकिन यह आवेदन मजिस्ट्रेट के उसी न्यायालय में प्रस्तुत करना पड़ेगा जिस ने उक्त धारा 125 का आदेश प्रदान किया था।

आप अलग निवास स्थान चाहती हैं जिस का खर्चा आप का पति दे और आप को धारा 125 के अंतर्गत जो आदेश हुआ है उस के मुताबिक आप को अपने और बच्चों के लिए मुआवजा मिल सके। इस के लिए आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा-12 के अंतर्गत स्थानीय (जहाँ आप के पति का निवास है और आप रह रही हैं) न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होगा।

इस परिवाद में आप सारी परिस्थितियों का वर्णन कर सकती हैं। कि किस तरह धारा 125 का गुजारे भत्ते का आदेश हो जाने पर आप को धोखा दे कर आप के पति ले आए और उस के बाद आप के साथ लगातार हिंसा का व्यवहार हो रहा है। परिस्थितियाँ ऐसी हैं कि आप अपने पति के साथ या ससुराल वालों के साथ नहीं रह सकतीं। इस लिए पति को आदेश दिया जाए कि वह आप के लिए अलग आवास व्यवस्था करे और आप के व बच्चों के लिए प्रतिमाह गुजारा भत्ता दे। इस के साथ ही पति व उस के ससुराल वालों को पाबंद किया जाए कि वे आप के प्रति किसी तरह की हिंसा न करें और आप से दूर ही रहें। इस के लिए आप को किसी स्थानीय वकील से मिलना होगा जो इस तरह का आवेदन कर सके।

खेत में जाने के रास्ते के लिए एसडीओ को आवेदन प्रस्तुत करें।

समस्या-

नवरतन सैन ने रानीसर, बीकानेर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरा खेत जो कि मेरे पास के गांव बबलु की कांकड़ में पड़ता है उस खेत का मार्ग किसी व्यक्ति ने रोक दिया है और बोल रहा है कि तुम्हारा मार्ग नहीं है। जब मैंने इस सम्बन्ध में पटवारी से बात की तो वह बोला कि तुम्हारा कागजों में कटान का मार्ग नहीं है! तो अब मैं अपने खेत केसे जाउंगा और मुझे अपने खेत का ( कटान) का मार्ग कैसे मिलेगा?

समाधान-

प के खेत पर जाने का मार्ग आप को कितने वर्षों से प्राप्त था यह आप ने नहीं बताया जिस से यह निर्धारित किया जा सके कि क्या यह आप का सुखाधिकार था। यदि आप को यह मार्ग 20 वर्ष से अधिक से मिला हुआ था तो वह  सुखाधिकार हो सकता है। यदि ऐसा है तो फिर उस आधार पर सिविल न्यायालय में भी वाद किया जा सकता है और आप को उस रास्ते से जाने से रोकने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है।

यदि आप के खेत पर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है और आप को अपने खेत तक जाने के लिए किसी के खेत से गुजरना ही हो तो आप राजस्थान टीनेंसी एक्ट 1955 की धारा 251 ए के अंतर्गत एसडीओ के न्यायालय में सब से कम दूरी वाला रास्ता दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

विधवा और उस की पुत्री को विभाजन कराने का अधिकार है।

समस्या-

सौरव ताया ने रसीना, कैथल, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

20 दिन पहले मेरे भाई की मौत हो गई है और अब से 2 साल पहले मेरे पापा की मौत हो गई थी। मेरे भाई की शादी को 2 साल 6 माह हो गए है। क्या उसकी पत्नी और डेढ़ साल की बेटी का उनकी सम्पत्ति पर अधिकार है? जबकि उनके पास मेरे भाई के नाम सहित कोई भी दस्तावेज नहीं है और मेरे पिता के बाद उनकी सम्पति का बंटवारा नहीं हुआ। उन की संपत्ति अपने आप मेरी मां और हम 3 भाईयों के हिस्से में आ गई थी। भाभी हमारे घर रहना नहीं चाहती और ना ही अपनी बेटी को छोड़ रही है।

समाधान-

प के पिता के देहान्त के उपरान्त पिता की संपत्ति के चार हिस्सेदार हुए आप तीन भाई और माँ। इस संपत्ति में एक हिस्सा आप के मृत भाई का था। जेसै आप के पिता की संपत्ति आप चारों के नाम अपने आप आ गयी थी, उसी तरह आप के भाई के हिस्से की संपत्ति उस की पत्नी और बेटी के नाम आ चुकी हैं।

आप की भाभी आप के साथ नहीं रहना चाहती तो यह उन की मर्जी है उन्हें साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता। डेढ़ वर्ष की उन की बेटी उन की जिम्मेदारी है, वह उन के साथ ही रहेगी जब तक वह वयस्क हो कर उस का विवाह नहीं हो जाता।

आप की जिस संपत्ति में ¼ हिस्सा आप की भाभी व भतीजी का है वे उस हिस्से को प्राप्त करने की अधिकारी हैं। आप स्वैच्छा से दें तो ठीक अन्यथा आप की भाभी विभाजन का वाद संस्थित कर के भी अपना हिस्सा अलग प्राप्त कर सकती हैं।

रास्ते खुला रखने के लिए दीवानी न्यायालय में स्थाई व्यादेश का वाद संस्थित करें।

समस्या-

महावीर ने गाँव सुमाड़ी भरदार, पो0 तिलवाड़ा, जिला रूद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड  समस्या भेजी है कि-

मुख्य रास्ते से मेरे घर जाने का रास्ता मेरे पड़ोसियों के खेत से जाता है।  इन्होंने मेरे पिता जी की मृत्यु के बाद यह रास्ता बन्द कर दिया है, जबकि यह रास्ता पूर्व से ही खेत में कृषि कार्य के लिए निर्धारित होने पर भी मेरे पिता ने 100रू देकर लिया था।  मेरी माँ रास्ता बन्द करने की सूचना SDM कार्यालय में दर्ज कराने पर भी निर्माण न रूकने पर DM के समक्ष उपस्थित होकर प्रार्थना पत्र देने पर भी हमारी गैरमौजूदगी में रास्ता बन्द कर दिया है। जिस रास्ते को हमें उपयोग हेतु बता रहे हैं उस पर बरसात में भयंकर बरसाती पानी बहता है। जिसका वीडियो DM साहब को भी दिखाया दिया है। कृपया रास्ता खुलवाने हेतु जानकारी दें।

समाधान-

पने घर और अपनी संपत्ति पर आने जाने के रास्ते का अधिकार अत्यन्त महत्वपूर्ण अधिकार है। 100 रुपए दे कर रास्ता खरीदने की बात कुछ जम नहीं रही है। वैसे 99 रुपए तक की कोई स्थावर संपत्ति खरीदी जाए तो उस की रजिस्ट्री कराना जरूरी नहीं है। यदि 99 रुपए या  उस से कम का सौदा हुआ हो और उस की लिखत हो तो उसे काम मेें लिया जा सकता ैहै। अन्यथा उस रास्ते का उपयोग करते हुए आप को 20 वर्ष से अधिक तो हो ही गए होंगे तो आप का उस खेत में से गुजरने का अधिकार आप का सुखाधिकार का अधिकार है। इस अधिकार का प्रवर्तन दीवानी न्यायालय द्वारा कराया जा सकता है।

आप तुरन्त दीवानी न्यायालय में राज्य सरकार को तहसीलदार के माध्यम से पक्षकार बनाते हुए विपक्षी पक्षकार के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में स्थाई ्व्यादेश का वाद प्रस्तुत करें और साथ में अस्थाई व्यादेश का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त निर्माण को रुकवाने और आने जाने में बाधा पैदा न करने का आदेश करावें। यदि रास्ता स्थाई रूप से बंद कर दिया गया हो तो फिर घोषणा की प्रार्थना भी साथ ही इसी वाद में करनी होगी।  राज्य सरकार के विरुद्ध कोई भी वाद  60 दिन का नोटिस दे कर ही प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन आवश्यक होने पर बिना नोटिस के वाद पेश करने की अनुमति के लिए आवेदन धारा 80 सीपीसी के साथ वाद तुरन्त प्रस्तुत किया जा सकता है।

शारीरिक संंबंध होने और उस से संतान हो जाने मात्र से पुरुष की संपत्ति में स्त्री को कोई अधिकार नहीं मिलता।

rp_courtroom1.jpgसमस्या-

बृजलाल ने दिल्ली से बिहार राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे मित्र अजय की 16 साल की उम्र में एक शादीशुदा औरत के साथ शारीरिक सम्बन्ध बने। अब वह 30 साल का है और शादीशुदा है और उसकी दो बेटियां भी है। समस्या यह है कि वो औरत अब ये कह रही है की उसकी एक बेटी मेरे दोस्त से बने सम्बन्ध से हुई है, और वो इस वजह से मेरे दोस्त की प्रॉपर्टी में हिस्सेदारी मांगने का दावा कर रही है। क्या यह कानूनी तौर पर संभव है?

समाधान

जय के किसी स्त्री से शारीरिक संबंध बने और उस से उसे एक पुत्री उत्पन्न हो गयी। अब वह स्त्री अजय की संपत्ति में हिस्सेदारी मांगने का दावा कर रही है। विवाह हो जाने के बाद भी पत्नी पति की संपत्ति में कोई हिस्सा मांगने की अधिकारी नहीं है। वैसी स्थिति में इस स्त्री को अजय की संपत्ति में हिस्सा मांगने का कोई अधिकार नहीं है। वह किसी भी अधिकार से हिस्सा नहीं मांग सकती।

दि किसी तरह यह साबित भी हो जाए कि उस स्त्री की पुत्री का पिता अजय है तब भी वह पुत्री अजय से किसी भी प्रकार से उस की संपत्ति में किसी तरह का हिस्सा नहीं मांग सकती। क्यों कि किसी भी संपत्ति के स्वामी के जीवित रहते उस में पुत्र, पुत्री या पत्नी का कोई हिस्सा नहीं होता। यदि कोई व्यक्ति अपनी संपत्ति की वसीयत न करे तो उस की मृत्यु के उपरान्त उस की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उत्तराधिकारियों को प्राप्त होती है। लेकिन कोई व्यक्ति अपनी संपूर्ण संपत्ति को वसीयत कर दे तो उस के पुत्र, पुत्री व पत्नी का उत्तराधिकार समाप्त हो जाता है और संपत्ति वसीयतियों को प्राप्त होती है।

स कारण आप के मित्र अजय के जीवन काल में न उस स्त्री का और न ही उस स्त्री की पुत्री का अजय की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। यदि अजय अपनी संपूर्ण संपत्ति वसीयत कर देता है और उस स्त्री और उस की पुत्री को वसीयत में कुछ नहीं देता है तो तब भी उन्हें किसी तरह का अधिकार प्राप्त नहीं होगाष यदि अजय कोई वसीयत नहीं करता है तो पहले उस स्त्री की पुत्री को साबित करना होगा कि उस का जैविक पिता अजय है तभी वह उस की निर्वसीयती संपत्ति में कोई अधिकार प्राप्त कर सकेगी।

 

किसी भी व्यक्ति की आय पर किसी का कोई अधिकार नहीं।

Say-Noसमस्या-

विकास चंद ने शाहजहाँपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क्या सरकारी सेवारत पत्नी के वेतन में पति अथवा सास ससुर का कोई अधिकार है यदि ससुराल पक्ष से इस हेतु पत्नी को प्रताडित किया जाये तो कानूनी रूप से उसकी क्या सुरक्षा हो सकती है?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की आय में किसी दूसरे का कोई अधिकार नहीं होता। चाहे वह पत्नी हो या पति, सास, ससुर, पुत्र, पुत्री कोई भी क्यों न हो। किसी भी व्यक्ति की आय उस की अपनी आय होती है उसे वह अपने इच्छानुसार खर्च कर सकता है या बचत कर सकता है और संपत्ति बना सकता है।

लेकिन सामाजिक जीवन में प्रत्येक व्यक्ति के कुछ दायित्व होते हैं। जैसे यदि पति अशक्त हो और उसे जीवन यापन के लिए खर्च की जरूरत हो तो पत्नी का दायित्व है कि वह उसे भरण पोषण के लिए पर्याप्त साधन जुटाए। जैसे एक पति का दायित्व होता है कि वह अपनी पत्नी और बच्चों का भरण पोषण करे। जैसा पिता का दायित्व बच्चों के प्रति है वैसा ही माता का भी दायित्व बच्चों के प्रति होता है। हाँ एक पुत्र वधु के प्रति न तो सास-ससुर का कोई दायित्व होता है और न ही किसी प्रकार का कोई अधिकार। पति का भी पत्नी की आय पर कोई अधिकार नहीं होता। यदि उसे किसी तरह के भरण पोषण की आवश्यकता है तो वह न्यायालय में दावा प्रस्तुत कर सकता है। न्यायालय यह तय करेगा कि वास्तव में उसे पत्नी से भरण पोषण की आवश्यकता है या नहीं है।

दि इस हेतु पत्नी को प्रताड़ित किया जाता है तो यह सीधे सीधे घरेलू हिंसा का मामला है पत्नी तीनों के विरुद्ध घरेलू हिंसा से महिलाओं के बचाव के कानून के अन्तर्गत कार्यवाही कर सकती है। यह कार्यवाही इस बात पर निर्भर करती है कि पत्नी को क्या राहत चाहिए। यदि यह हिंसा धारा 498ए के दायरे की हुई तो पत्नी धारा 498ए में भी पति और सास-ससुर के विरुद्ध शिकायत दर्ज करा सकती है।

प ने अत्यन्त ही संक्षेप में अपनी समस्या रखी है, जो सैद्धान्तिक है। यदि आप ने समस्या का वास्तविक स्वरूप और परिस्थितियाँ भी सामने रखी होतीं तो हम उस का समाधान अधिक स्पष्ट आप को सुझा सकते थे।

अनुकम्पा नियुक्ति अधिकार नहीं, बल्कि अन्य को अधिकार से वंचित करना है।

Compassionate Appointmentसमस्या-

विशाल शर्मा ने सीहोर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय सीहोर(म0प्र0) में सहा ग्रेड-2 के पद पर पदस्थ थे उनकी मृत्यु 27/05/2003 को हो गई। उस समय मेरी आयु 16 वर्ष थी तब मैं ने अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। मेरी आयु 18 वर्ष की न होने के कारण उस समय मेरे आवदेन पर विचार नहीं किया गया। दिसम्बर 2005 में 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने के पश्चात मैं ने पुनः आवेदन किया तब मेरा प्रकरण यह कहके टाल दिया कि विभाग में पद खाली नहीं है। सन् 2006 में मेरी बड़ी बहन ने पारिवारिक आवश्यकताओं को देखते हुए संविदा शिक्षक की परीक्षा पास की तथा वह संविदा शिक्षक बन गई। तदुपरांत 1वर्ष पूर्ण होने के बाद मैं पुनः विभाग में गया तो उन्होने मेरे प्रकरण यह कहके बंद कर दिया की आपकी बहन नौकरी में है। इसलिए आपको पात्रता नहीं आती। उसकी 2008 में शादी हो गई, उसके बाद में फिर विभाग में गया शपथ पत्र लेकर लेकिन मेरी बात नहीं सुनी गई । तत्पश्चात मैं ने 2009 में हाईकोर्ट जबलपुर में रिट पिटिशन दायर की । मेरे अधिवक्ता द्वारा विभाग को नोटिस दिया गया लेकिन चार वर्ष पूर्ण होने के बाद भी विभाग की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। तब 05/2013 को मैं केस जीता ओर विभाग को 3 माह का समय दिया गया कि इनका निराकरण कर माननीय उच्च न्यायालय को सूचित करें। अथक प्रयासों के बाद 09/2013 को जिला कलेक्ट्रेट सीहोर मे मुझे सहा0 ग्रेड-3 के पद के लिए नियुक्ति आदेश दिया गया। मैं यह जानना चाहता हूँ की विभाग की लापरवाही के कारण मेरे परिवार को उन 8 सालों में जो आर्थिक और मानसिक हानि हुई है क्या माननीय उच्च न्यायालय द्वारा मुझे कुछ राहत मिल सकती है।

समाधान-

नुकम्पा नियुक्ति किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार नहीं है। यह अनुकम्पा है। पूरी तरह नियोजक की अनुकम्पा पर निर्भर है। यह नागरिकों के समानता के मूल अधिकार के विरुद्ध भी है। शासकीय सेवाओं पर देश के सभी नागरिकों का समान अधिकार है। मृतक आश्रितों को नौकरी देने का नियम उस का अपवाद है। एक मृतक आश्रित को नौकरी देना अनेक व्यक्तियों को योग्यतानुसार शासकीय नौकरी प्राप्त करने के अधिकार को वंचित करता है। मृतक आश्रितों को सरकार अन्य आर्थिक सहायता प्रदान करना उचित हो सकता है। लेकिन अनुकम्पा नियुक्ति तो सीधे सीधे समानता के अधिकार से लोगों को वंचित करती है।

स तरह यदि आप को जद्दोजहद के उपरान्त नौकरी मिल गई है तो यही पर्याप्त है। आप ने नौकरी के लिए उच्च न्यायालय में रिट याचिका की थी। आप वहाँ रिट याचिका में आनुषंगिक राहत के रूप में नौकरी के साथ क्षतिपूर्ति की राहत भी मांग सकते थे, या खुद उच्च न्यायालय नौकरी देने की राहत देने के साथ आप को क्षतिपूर्ति की राहत भी प्रदान कर सकता था। लेकिन वह राहत उस रिट याचिका में नहीं दी गई। अब आप वह राहत किसी अन्य कानूनी कार्यवाही के माध्यम से प्राप्त नहीं कर सकते।

व्यक्ति के जीवनकाल में उस की स्वअर्जित संपत्ति पर किसी अन्य का कोई अधिकार नहीं।

Adoptionपसमस्या-
अशोक कुमार ने अलीगढ़ उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे पिताजी सेवानिवृत्त अध्यापक हैं। वे अपना कमाया हुआ सारा धन मेरे भाई के बेटे पर खर्च कर रहे हैं। इस बात से मुझे कोई एतराज नहीं है, लेकिन मैं चाहता हूँ कि जितना पैसा उसके ऊपर खर्च हो उतना ही मुझे भी मिले। मगर पापा ने साफ मना कर दिया है। अब मुझे क्या करना चाहिए कोई कानून है जिस से मुझे मेरा हक़ मिल सके।

समाधान-

प की तरह बहुत लोगों को यह भ्रम है कि पिता के जीते जी उन की स्वअर्जित संपत्ति पर उन का अधिकार है। वस्तुतः किसी भी व्यक्ति की संपत्ति पर उस के सिवा किसी भी अन्य व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं है। पुत्र वयस्क होने तक, पुत्री वयस्क होने तक और उस के बाद विवाह तक पिता से भरण पोषण के अधिकारी हैं। पत्नी और निराश्रित माता पिता भी भरण पोषण के अधिकारी हैं। लेकिन इन में से किसी का भी उस व्यक्ति की संपत्ति पर कोई अधिकार नहीं है।

प के पिता अपनी संपत्ति को किसी भी प्रकार से खर्च कर सकते हैं। यदि वे आप को नहीं देना चाहते तो आप को उन से पाने का कोई अधिकार नहीं है। फिर वे आप के भाई के बच्चे की पढ़ाई पर खर्च कर रहे हैं, वे चाहते हैं कि वह पढ़ लिख कर कुछ बन जाए। जब कि आप को ईर्ष्या हो रही है कि आप को भी उतना ही मिलना चाहिए। ईर्ष्या से कोई अधिकार सृजित नहीं होता।

प अपने पिता से कोई धनराशि पाने के अधिकारी नहीं हैं। आप के भाई और उस के बेटे को भी ऐसा कोई अधिकार नहीं है। बस आप के पिता उन की इच्छा से यह सब कर रहे हैं, और वे कर सकते हैं।

प के पिता के जीवनकाल के बाद यदि आप के पिता ने अपनी संपत्ति की वसीयत नहीं की हो तो आप हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार उन की संपत्ति के हिस्से के अधिकारी हो सकते हैं।

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