Tag Archive


Agreement Cheque Civil Suit Complaint Contract Coparcenary Court Cruelty Dispute Dissolution of marriage Divorce Government Husband India Indian Penal Code Justice Lawyer Legal History Legal Remedies legal System Maintenance Marriage Mutation Supreme Court wife Will अदालत अपराध कानून कानूनी उपाय क्रूरता चैक बाउंस तलाक नामान्तरण न्याय न्याय प्रणाली न्यायिक सुधार पति पत्नी भरण-पोषण भारत वकील वसीयत विधिक इतिहास विवाह विच्छेद

कर्मचारी का चरित्र सत्यापन

हमें सरकारी या सार्वजनिक क्षेत्र के किसी कर्मचारी के चरित्र सत्यापन के संबंध में अनेक तरह से प्रश्न पूछे जाते हैं। हर प्रश्नकर्ता को उस के प्रश्न का पृथक से उत्तर देना संभव नहीं है। सार्वजनिक क्षेत्र में नियोजन प्राप्त करते समय कर्मचारी द्वारा पूर्व में किसी अपराध के लिए अभियोजित किए जाने या दोष सिद्ध पाए जाने और दंडित किए जाने के तथ्य को छुपाने के मामले में उच्चतम न्यायालय ने अवतार सिंह बनाम यूनियन ऑफ इंडिया (ए.आई.आर. 2016 सुप्रीमकोर्ट 3598)  के मामले में स्थिति को पूरी तरह स्पष्ट कर दिया है। यह स्थिति इस प्रकार है…

किसी अभ्यर्थी द्वारा दोषसिद्धि, गिरफ्तारी या किसी आपराधिक मामले के लंबित होने के बारे में, सेवा में प्रवेश करने से पहले या बाद में नियोजक को दी गई जानकारी, सही होना चाहिए और आवश्यक जानकारी का कोई दमन या गलत उल्लेख नहीं होना चाहिए।

झूठी जानकारी देने के लिए सेवाओं की समाप्ति या उम्मीदवारी को रद्द करने का आदेश पारित करते समय, कर्मचारी द्वारा ऐसी जानकारी देते समय यदि कोई विशेष परिस्थितियाँ रही हों तो उन पर विचार कर सकता है। निर्णय लेने के समय नियोक्ता, कर्मचारी पर लागू सरकार के आदेशों / निर्देशों / नियमों को ध्यान में रखेगा।

यदि किसी आपराधिक मामले में शामिल होने की जानकारी को छुपाने या गलत जानकारी देने का मामला हो, जिसमें आवेदन / सत्यापन फॉर्म भरने से पहले ही दोषी ठहराया या बरी कर दिया गया था और ऐसा तथ्य बाद में नियोक्ता के ज्ञान में आता है, तो वह कोई भी निम्नलिखित में से मामले के लिए उपयुक्त कोई भी कदम उठा सकता है: –

  1. तुच्छ प्रकृति के मामलों में, जिनमें दोषसिद्धि दर्ज की गयी हो, जैसे कम उम्र में नारे लगाना, या एक छोटे से अपराध के लिए, जिसके बारे में अगर बता दिया गया होता तो भी कर्मचारी को पद के लिए अयोग्य नहीं माना गया होता, नियोक्ता अपने विवेक से गलत जानकारी देने या उसे छुपाने की कर्मचारी की गलती की अनदेखी कर सकता है।
  2. जहां दोषसिद्धि दर्ज की गई है जो प्रकृति में तुच्छ नहीं है, नियोक्ता कर्मचारी की उम्मीदवारी को रद्द कर सकता है या कर्मचारी की सेवाएं समाप्त कर सकता है।
  3. यदि तकनीकी आधार पर नैतिक अवमानना ​​या जघन्य / गंभीर प्रकृति के अपराध से जुड़े मामले में कर्मचारी पहले ही बरी हो चुका था, और यह पूरी तरह से बरी होने का मामला नहीं हो, या संदेह का लाभ दिया गया है, तो नियोक्ता उपलब्ध अन्य प्रासंगिक तथ्यों पर पूर्ववृत्त के रूप में विचार कर सकता है, और कर्मचारी की निरंतरता के रूप में उचित निर्णय ले सकता है।
  1. ऐसे मामले में, जहाँ कर्मचारी ने एक निष्कर्षित आपराधिक मामले की सत्यता से घोषणा की है, नियोक्ता अभी भी पूर्ववृत्त पर विचार कर सकता है और उसे उम्मीदवार को नियुक्त करने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता है।
  2. ऐसे मामले में जहाँ चरित्र सत्यापन में रूप में तुच्छ प्रकृति के आपराधिक मामले का लंबित होना कर्मचारी द्वारा घोषित किया गया है तब नियोक्ता मामले के तथ्यों और परिस्थितियों में, अपने विवेक से उम्मीदवार को नियुक्त करने का निर्णय ले सकता है।
  3. जहाँ कर्मचारी कई लंबित मामलों के संबंध में जानबूझकर तथ्य छुपाने का मामला हो वहाँ इस तरह की झूठी जानकारी देने को अपने आप में महत्वपूर्ण मान कर एक नियोक्ता उस व्यक्ति की नियुक्ति के आदेश को जिसके खिलाफ कई आपराधिक मामले लंबित थे ,उचित नहीं मानते हुए उसे रद्द कर सकता है या सेवाओं को रद्द कर सकता है।

7.यदि आपराधिक मामला लंबित था, लेकिन फॉर्म भरने के समय उम्मीदवार को पता नहीं था, फिर भी इसका प्रतिकूल प्रभाव पड़ सकता है और नियुक्ति प्राधिकारी अपराध की गंभीरता को देखते हुए निर्णय ले सकता है।

  1. यदि कर्मचारी की सेवा में पुष्टि हो जाती है, तो तथ्यों को छुपाने या सत्यापन के रूप में गलत जानकारी प्रस्तुत करने के आधार पर सेवा से हटाने या बर्खास्तगी का आदेश पारित करने से पहले विभागीय जांच करना आवश्यक होगा।
  2. सूचनाएँ छुपाने या गलत सूचनाओं के निर्धारण के लिए सत्यापन / सत्यापन-प्रपत्र अस्पष्ट नहीं अपितु विशिष्ट होना चाहिए। ऐसी जानकारी जिसका विशेष रूप से उल्लेख किया जाना आवश्यक हो उसका खुलासा किया जाना चाहिए। यदि जानकारी नहीं मांगी जाए, लेकिन नियोक्ता के ज्ञान के लिए प्रासंगिक हो तो उस मामले में उद्देश्यपूर्ण तरीके से फिटनेस के मामले पर विचार किया जा सकता है लेकिन ऐसे मामलों में गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर कार्रवाई नहीं की जा सकती है।
  3. यदि किसी व्यक्ति को गलत जानकारी प्रस्तुत करने या जानबूझ कर छुपाने के आधार पर दोषी ठहराए जाने से पहले, यह तथ्य उसके ज्ञान में लाया जाना और उसे सफाई का अवसर दिया जाना चाहिए।

अपराधिक मामलों में बदलते दीवानी मामले।

समस्या-Havel handcuff

हर्ष सिकन्द ने अमृतसर, पंजाब से समस्या भेजी है कि-

मैं लुधियाना का रहने वाला हूँ। मैं एक फार्म में पार्टनर हूँ। मेरी वाइफ भी हमारी फर्म की हिस्सेदार है। हमारी फर्म जो सामान बनाती है उसको बेचने का अधिकार सिर्फ हमारे अधिकारिक डीलरों के पास ही है। हम जिसको भी अपना डीलर बनाते हैं उनके साथ लिखित इकरारनामा भी करते हैं, जिसमे हमारी सभी शर्तें तय होती हैं। हमने नवंबर 2013 में एक और फर्म जो राजस्थान की है उसके साथ पांच लाख में डील फाइनल की थी। जिसके तहत उन्होंने हमारे उत्पाद को पूरे राज्य में सेल करने का अधिकार लिया था। जिस फ़र्म के साथ हमारी डील हुई थी वो राजस्थान के हीरापुरा, अजमेर की है। जिस वक्त उन्होंने हमें पेमेंट का चेक दिया था तो उन्होंने हमारी शर्तों के पेपर एवं इकरारनामा बाद में करने की बात कह कर बात को टाल दिया था। वो फर्म के मालिक काफी बड़ी राजनीतक पार्टी के नेता भी हैं एवं और भी काफी बड़े बिजनसमैन हैं। परन्तु उस वक्त हमने भी सोचा की चलो अगर पार्टी अच्छा बिजनेस करने वाली है तो कोई बात नहीं इकरारनामा बाद में हो जाएगा। उन को हमने अपनी फर्म के जो हम स्टील के उत्पाद बनाते हैं उनके सैम्पल भी भेजे थे जो कि अब तक उनके पास ही हैं। उनकी कीमत 30000 (तीस हज़ार है) जिसके बिल और सभी कागजात हमारे पास मौजूद हैं। उसके कुछ समय बाद तक भी हमें उनकी तरफ से कोई आर्डर न मिला। वो पहले तो बात नहीं करते थे, फिर एक दिन उन्होंने फ़ोन पे बात करते हुए कहा कि हम काम नहीं करेंगे और हमारे पैसे वापिस कर दो। हमने उन्हें एक बार हमारे साथ टेबल पर बैठ कर बात करने को बोला तो उन्होंने फोन काट दिया। उसके बाद हमने एक दो बार कोशिश की कि बातचीत के जरीये इस मसले का हल निकाला जा सके। परंतु उनसे बात तक नहीं हो सकी। हालाँकि पैसे भी उन्होंने ही लेने थे। उसके बाद हमने अपने वकील के जरीये सिविल केस फ़ाइल् किया जिस में हमने अपनी शर्तों का हवाला देते हुए उनको कोर्ट में आकर मामले को हल करने को बोला। परन्तु उसके समन अभी तक उन्होंने रिसीव नहीं किये हैं। उस के कुछ ही दिनों बाद हमारे पास थाना किशनगढ़ से पुलिस अधिकारी आये और सीधे उन्होंने बताया की आपके खिलाफ़ हमारी विरोधी पार्टी ने पैसे खा जाने की शिकायत दर्ज करवाई है। आपको हमारे साथ चलना पड़ेगा। तो हमने उन्हें सारी बात सच सच बता दी और उन्हें कोर्ट में चल रहे सिविल केस की कापी भी दी। तो उन्होंने कहा की आपको चलना तो फिर भी पड़ेगा, तो इस मामले की गंभीरता को देखते हुए मैं ने उन्हें बोला कि इसके अलावा कोई और रास्ता तो उन्होंने मुझे एक और रास्ता बताया की आप हमें पोस्ट डेटेड चेक दे सकते हो। तो मैने उनको दो चेक दिए जिनकी तारीख जुलाई और सितम्बर 2014 डाली थी। हमारे दिल में ऐसी कोई भी मंशा नहीं थी की हम ये चेक बाउंस करवाएंगे, परंतु उसी समय के दौर में जो स्टील का सामान हम बनाते हैं, उसकी बिक्री बहुत कम हो गई और हमारी काफी सारी रकम मार्किट में फंस गई जो अभी तक भी रुकी हुई है। दूसरा हमारे वकील साहिब ने भी बोल दिया था कि आपको घबराने की जरूरत नहीं है। इसका मामला अदालत में है, चेक की तारीख भी तीन महीने की ही होतीं है। इस वक्त उन चेक की तारीख निकले भी ६ महीने से ऊपर हो गए हैं। तो अब दो दिन पहले मेरे पास थाना गांधीनगर जिला अजमेर (राजस्थान) से पुलिस की पूरी टीम आई जिनके साथ गांधीनगर के एस एच ओ, इस के इलावा और स्टाफ उनके साथ था। उन्होंने बतया की आपके खिलाफ़ एक एफ आई आर धारा 420/306/120बी के तहत दर्ज है जिसका नम्बर भी उन्होंने मुझे दिया और इसकी जांच पड़ताल के सबंध में आपको 15 दिनों के भीतर हमारे पास पेश होना पड़ेगा और पार्टी के साथ बैठ कर उन्हें पैसे वापिस लौटा दीजिये तुरंत अन्यथा आपके वारंट जारी हो जायेंगे। वो उन्होंने मेरे सामने बैठ कर ही लिखा था। परन्तु ऑनलाइन सर्चिंग में तो मुझे उस FIR का कोई स्टेटस नहीं मिला।

11 मार्च को मैं जयपुर गया था, परन्तु वहां पर जिस ऐएसआई की डयूटी इस केस को हेंडल करने पर लगाई हुई है उस से ही मीटिंग हुई थी, मैंने उसके सामने अपना पक्ष भी रखा जो की मैंने आपको बताया हुआ है उसी तरह से। और मैने उस से कुछ वक्त माँगा क्योंकि मेरी विरोधी पार्टी भी उस दीं किसी काम की वजह से वहां पर नहीं आ सकी। परन्तु मुझे लिखित रूप में तो पुलिस ने कुछ नहीं दिया और न ही मुझसे कुछ लिखित में अभी तक लिया है। हाँ वैसे उनसे मैने 15 अप्रैल तक का समय और लिया है ताकि इस मसले के लिए कानूनी राय गम्भीरता से ली जा सके।  मेरे पास इस वकत देने के लिए पैसे नहीं हैं। उस ऐ एस आई का यही कहना है की पार्टी के साथ बिना पैसों के बात करना आपके लिए और मुश्किल बढ़ा सकता है, क्योंकि उस पार्टी का सम्बन्ध एक बहुत बड़ी राजनीतक पार्टी के करीबी मिनिस्टर से है जो इस समय राजस्थान की सरकार में है।  ये शिकायत भी आपके खिलाफ़ बनती तो नहीं थी, परन्तु ये एक राजनैतक दबाव ही समझें। आप 15 अप्रैल तक जितना हो सकता है उतने पैसों का इंतजाम करके आओ, फिर इस मसले को देखा जा सकेगा। मैने ऑनलाइन ऍफ़ आई आर स्टेटस निकाल कर देखा था, जो अभी पेंडिंग ही बता रहा है। मुझे तो उसने ये भी नहीं बताया की आपके खिलाफ़ ये सिर्फ शिकायत है या ऍफ़ आई आर दर्ज हो चुकी है। अब अगर FIR दर्ज हो गयी है तो क्या पार्टी से समझौता करने के उपरांत वो ख़तम हो सकती है क्या? एंव इसके इलावा क्या इस केस में हमें पहले ही जमानत ले लेनी चाहिए? एवं अगर जमानत पहले ही अप्लाई करें तो उसके लिए पुलिस का क्या रिएक्शन हो सकता है? अगर पहले जमानत की अर्जी दायर करें तो कितने की जमानत मांगी जा सकती है? इस केस की? क्या ये मामला अपराधिक बनता है या सिविल है? जो हमारे पास यहाँ मामला चल रहा है क्या ये मामले का कोई महत्व नहीं है?

समाधान-

मारे देश की सभी अदालतों के पास मुकदमों की भरमार है और कोई भी विवाद जो पक्षकारों के मध्य होता है एक बार अदालत में जाने के बाद इतना उलझ जाता है कि उसे समाप्त होने में बरस लग जाते हैं। इस कारण साधारण से साधारण व्यक्ति भी अपने साधारण लेन देन के मामलों को निपटाने के लिए अपराधिक मामला बना कर प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराने की कोशिश करता है। यदि ऐसे व्यक्ति के पास राजनैतिक रसूख हो तो फिर उस के लिए यह काम आसान हो जाता है। वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज करवा कर कोशिश करता है कि दूसरे पक्षकार पर दबाव डाल कर बीच का रास्ता निकाल ले। एक बार दूसरा पक्षकार दबाव में आ जाता है तो उस पर यह भी दबाव डाला जाता है कि जो धनराशि उसे देनी है उस का ब्याज या क्षतिपूर्ति भी उसे मिल जाए। आप के साथ यही हो रहा है।

ब आप के विरुद्ध जो मामला बनाया है या बनाए गए हैं वे सभी एक धन के लेन देन से संबंधित दीवानी मामले से उपजे हैं। यदि पक्षकारों के बीच समझौता हो जाता है तो पुलिस इस तरह के मामलों में यह रिपोर्ट न्यायालय को प्रस्तुत कर देती है कि मामला दीवानी प्रकृति का है, अपराध होना नहीं पाया जाता है। इस तरह मामला वहीं समाप्त हो जाता है, आप का भी हो सकता है। इस के लिए आप को उतने धन की व्यवस्था करनी होगी जितने धन में सामने वाले पक्षकार से समझौता हो जाए। इस मामले में धन की व्यवस्था कर के आप को सीधे सामने वाले पक्षकार से बात कर के मामले को समाप्त कर लेना चाहिए। आप की समस्या धन न होने की है। लेकिन विवाद तो धन के बिना समाप्त नहीं हो सकता।

ब पहले पुलिस आप के पास आई थी तब तक मामला साधारण दीवानी था। लेकिन पुलिस को आप ने चैक दे कर उस मामले में खुद सबूत पैदा कर दिए हैं। इस कारण यह मामला गंभीर हो सकता है।

प की गिरफ्तारी पूर्व जमानत (अग्रिम जमानत) हो सकती है। इस के लिए आप को संबंधित सेशन्स न्यायालय के समक्ष जमानत की अर्जी देनी होगी। यदि सेशन्स न्यायालय ऐसी जमानत की सुविधा देने से इन्कार करता है तो आप उच्च न्यायालय को आवेदन कर सकते हैं। एक बार जमानत की सुविधा मिल जाने के बाद पुलिस कुछ नहीं कर सकती। वह केवल आप से अदालत में उपस्थित होने के लिए जमानत मांगेगी। उस के बाद न्यायालय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत कर देगी और फिर मामला चलता रहेगा। जमानत की राशि कुछ भी हो सकती है जो जमानत का आदेश पारित करने वाले जज की संतुष्टि पर निर्भर करेगी। लेकिन उस के लिए परेशान होने की जरूरत नहीं है जमानत नकद नहीं देनी पड़ती है। बल्कि कोई हैसियत वाला व्यक्ति बंध पत्र दाखिल करता है कि अभियुक्त निर्धारित समय पर न्यायालय में उपस्थित न हुआ तो यह जमानत जब्त कर ली जाएगी और जमानत देने वाले व्यक्ति से जमानत की राशि की वसूली की जाएगी।

स मामले में बेहतर यही है कि आप सामने वाले पक्षकार से समझौता कर मामलों को समाप्त कराएँ। यदि चैक की राशि का भुगतान करें तो तभी करें जब तुरन्त आप को चैक वापस मिल रहा हो। तथा किसी स्टाम्प पेपर पर यह अवश्य लिखा लें कि आप दोनों पक्षकारों के बीच अब लेन देन का कोई मामला शेष नहीं रहा है।

नवविवाहित अन्तर्जातीय युगल को अपने परिजनों से खतरा हो तो पुलिस संरक्षण के लिए रिट याचिका प्रस्तुत करे।

liveinसमस्या-

सुरभित ने सीतापुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने अपनी प्रेमिका से एक साल पहले शादी की थी, आर्य समाज में। अभी ये बात दोनों में से किसी के घर वालों को नहीं मालूम है। पत्नी अभी अपने घर पर ही रहती है। अब हम लोग साथ रहना चाहते हैं। दोनों ही अलग अलग जाति के हैं लेकिन हिन्दू दोनों लोग है। कौन सा ऐसा कदम उठायें कि जिस से पत्नी के घर वाले मेरे और मेरे घर वालों को कोई नुक्सान न पहुँचाएँ।

समाधान-

प इस बात से डरे हुए हैं कि जैसे ही आप की पत्नी अपने परिवार को छोड़ कर आप के साथ रहने लगेगी वे आप के विरुद्ध पुलिस में शिकायत करेंगे या फिर आप के साथ कोई अपराधिक गतिविधि करेंगे। यदि वे पुलिस में शिकायत करते हैं तो आप की पत्नी के बयान पर निर्भर करेगा कि वे आप के व आप के परिवार वालों के साथ क्या करते हैं। यदि आप अपनी पत्नी पर विश्वास करते हैं तो उसे अपने साथ ला कर रह सकते हैं।

दि आप को पत्नी के परिजनों द्वारा आप के या आप के परिवार के साथ कोई अपराध करने का अंदेशा है तो आप दोनों सीधे उच्च न्यायालय में एक संयुक्त रिट याचिका लगाएँ कि आप विवाहित हैं लेकिन आप के परिजन इस अंतर्जातीय विवाह के कारण आप दोनों के साथ और एक दूसरे के परिजनों के साथ कोई भी अपराध घटित कर या करवा सकते हैं। आप को पुलिस और प्रशासन के संरक्षण की आवश्यकता है। उच्च न्यायालय आप को पुलिस संरक्षण प्रदान करने का आदेश संबंधित पुलिस अधिकारियों को दे सकता है।

आचरण नियमों में विहित जरूरी सूचना न देना दंडनीय अपचार हो सकता है …

कानूनी सलाहसमस्या-

विवेक सिंह ने दुर्ग, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं नौ वर्षों से छत्तीसगढ़ स्थित भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रम में अधिकारी पद पर नौकरी कर रहा हूँ, कुछ महीने पूर्व मेरे एक रिश्तेदार से विवाद होने के बाद मारपीट की घटना हुई थी। जिस के बाद धारा 323, 506 के तहत दुर्ग न्यायालय मे मामला दर्ज हुआ, राजीनामा नहीं होने के कारण कुछ हफ्ते पहले न्यायालय ने दोषसिद्ध करते हुए मुझे व मेरे रिश्तेदार दोनों को चेतावनी देकर छोड़ दिया। अब जब कि दोषसिद्ध हो चुका है तो क्या भविष्य में मेरे नियोक्ता द्वारा मेरे विरुद्ध कोई कार्यवाही की जा सकती है। क्या मुझे स्वयं यह जानकारी नियोक्ता को देनी चाहिए। भारत सरकार के सार्वजनिक उपक्रमों में कार्यवाही करने के क्या नियम हैं? कृपया आगे मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प के विरुद्ध जो मामला था वह असंज्ञेय तथा जमानतीय था। इस कारण आप के नियोक्ता को सूचना तभी मिल सकती है जब कोई शिकायत करे या आप स्वयं सूचना दें। मामला ऐसा नहीं है जिस में नियोक्ता आप के विरुद्ध कोई कार्यवाही कर सके। लेकिन यह केवल आप के संस्थान के स्थाई आदेश या जो भी नियम बने हुए हैं उन्हें देख कर ही बताया जा सकता है। यदि आप के अनुशासनिक कार्यवाही के नियमों में उक्त अपराध में दोषसिद्ध होना एक अपचार है तो आप के विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है। यदि वह अपचारों में शामिल नहीं है तो फिर आप को चिन्ता करने की आवश्यकता नहीं है।

लेकिन आप के कंडक्ट रूल्स (आचरण नियम) में आप के विरुद्ध किसी अपराध का अभियोजन चलनेऔर आप को दोषसिद्ध किए जाने का निर्णय होने पर उस की सूचना देना जरूरी कर्तव्य हो सकता है। यदि ऐसा है और आप सूचना नहीं देते हैं तो यह कंडक्ट रूल्स का उल्लंघन होगा जो कि आम तौर पर एक अपचार होता है जिस के लिए नियोजक को अपने कर्मचारी को दंडित करने का अधिकार होता है। आप कंडक्ट रूल्स का अध्ययन करें यदि उस में इस मुकदमे और निर्णय की सूचना देना जरूरी कर्तव्य हो तो आप को अपने नियोजक को सूचित करना चाहिए।

सार्वजनिक उपक्रमों में अपने अपने स्थाई आदेश, कंडक्ट रूल्स आदि बने होते हैं जो आम तौर पर अलग अलग संस्थानों के भिन्न भिन्न होते हैं।

असंज्ञेय अपराधों के लिए सीधे मजिस्ट्रेट को परिवाद प्रस्तुत करें

Havel handcuffसमस्या-

समीर मलहोत्रा ने जबलपुर मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

क व्यक्ति जो कि मेरा पड़ौसी होने के साथ-साथ परिवार का भी है वह आए दिन अकारण ही हमारे खिलाफ अपशब्दों का प्रयोग करता है और झगड़ा करने का प्रयास करता है। हम झगड़े से बचने का प्रयास करते हैं लेकिन उसको बिल्कुल भी शर्म नहीं आती है। वह बहुत ही बदतमीज किस्म का व्यक्ति है। अगर हम उस आदमी के खिलाफ कानूनी कार्यवाही करना चाहे तो किन-किन धाराओं के अंतर्गत कानून हमारी मदद कर सकता है और उस पर कार्यवाही की जा सकती है जिस से कि वह आगे से किसी के खिलाफ झगड़ा करने का प्रयास न करें और न ही दूसरे व्यक्ति को परेशान करने का प्रयास करें।

समाधान-

प ने जितना विवरण दिया है उस से हम इस नतीजे पर पहुँचे हैं कि वह व्यक्ति जो व्यवहार/ कृत्य आप के साथ कर रहा है वह सब भारतीय दंड संहिता की धारा 504 के अन्तर्गत दंडनीय अपराध है। धारा 504 निम्न प्रकार है-

  1. लोकशांति भंग कराने को प्रकोपित करने के आशय से साशय अपमान–जो कोई किसी व्यक्ति को साशय अपमानित करेगा और तद्द्वारा उस व्यक्ति को इस आशय से, या यह सम्भाव्य जानते हुए, प्रकोपित करेगा कि ऐसे प्रकोपन से वह लोक शान्ति भंग या कोई अन्य अपराध कारित करेगा, वह दोनों में से किसी भांति के कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

क्यों कि उक्त अपराध संज्ञेय अपराध नहीं है इस कारण पुलिस को रिपोर्ट करने पर भी वह कोई कार्यवाही स्वयं नहीं कर सकती। इस मामले में प्रसंज्ञान आप के क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाला न्यायिक मजिस्ट्रेट ही ले सकता है। इस कारण आप को इस धारा के अन्तर्गत स्वयं परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना पड़ेगा तथा आप को अपने बयान व गवाहों के बयान कराने होंगे। इस के उपरान्त ही मजिस्ट्रेट इस मामले पर प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त को समन से बुलाएगा और उस के विरुद्ध कार्यवाही करेगा। सभी असंज्ञेय अपराधों के लिए सीधे मजिस्ट्रेट को ही परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए।

दि आप की शिकायत पर उस व्यक्ति के विरुद्ध प्रसंज्ञान लिया जा कर कार्यवाही होती है और उस के दौरान वह दुबारा या तिबारा या कभी भी ऐसी हरकत करता है तो आप हर बार उस के विरुद्ध एक नया परिवाद प्रस्तुत करें। एकाधिक परिवादों में उस के विरुद्ध कार्यवाही होने पर निश्चित रूप से उस व्यक्ति को सबक प्राप्त होगा। वास्तविकता तो यह है कि अदालत में कार्यवाहियों पर जाने की परेशानी के कारण इस तरह के मामलों में अधिकांश लोग कार्यवाही करने से बचते हैं और इस कारण से ऐसे लोग अपनी मनमानी करते रहते हैं। यदि ऐसे लोगों की हर हरकत पर कार्यवाही होने लगे तो उस का सामान्य प्रभाव समाज पर यह हो सकता है कि कोई भी व्यक्ति ऐसी हरकत करने से डरने लगेगा।

चरागाह भूमि पर खेती करना अतिक्रमण है।

चरागाहसमस्या-

जरौद, रायपुर, छत्तीसगढ़ से प्रेमनाथ लहरी ने पूछा है –

मेरे पिता जी, 1978-80 से घास भूमि (चरागाह) पर कास्तकारी कृषि कार्य कर जीवन यापन कर रहे हैं। उसके अलावा हमारे पास और कोई जमीन नहीं है, न दादा जी के पास थी और न ही काबिल कास्त मिला है। लेकिन पंचायत हमें हटाना चाहती है और मामला तहसीलदार के पास भेज दिया है। तहसीलदार ने हमे 3000/- जुरमाना भी किया है। अब हम क्या करें? कृपया उचित सलाह दे ।

समाधान-

किसी भी गाँव के पालतू पशु चारे के लिए इधर उधर न घूमें और फसलों को नष्ट न करें इस के लिए प्रत्येक गाँव की भूमि में चरागाह की भूमि को छोड़ा जाता है। इस भूमि को किसी भी व्यक्ति को काश्त करने की अनुमति नहीं दी जा सकती है। ऐसी भूमि चरागाह के लिए ही सुरक्षित रहती है। ऐसी भूमि पर यदि कोई व्यक्ति कृषि कार्य या अन्य कोई कार्य करता है तो यह अतिक्रमण है जिस के लिए दंडित किया जा सकता है।

प के पिताजी ने चरागाह भूमि पर खेती कर के अतिक्रमण किया है। उस भूमि से उन का कब्जा हटाए जाने का जो भी आदेश तहसीलदार ने दिया गया है वह सही है। आप के पिताजी को वह भूमि छोड़नी पड़ेगी और जुर्माना भी देना होगा। अन्यथा आप के पिताजी को कारावास के दंड से भी दंडित किया जा सकता है।

स तरह के मामले में एक ही बचाव हो सकता है कि आप यह साबित करें कि जिस भूमि पर आप के पिताजी ने खेती की है वह चरागाह या किसी तरह की सरकारी भूमि नहीं है।

हैकिंग आई टी एक्ट में गंभीर अपराध है।

समस्या-

दुर्ग, छत्तीसगढ़ से सचिन ने पूछा है-

ई लोगों से करोड़ों की ठगी कर एक शातिर व प्रभावशील ठग पिछले तीन साल से फरार है आरोपी के राजनैतिक प्रभाववश पुलिस आज तक मामले को लटका कर रखी है।  एक पीड़ित ने आरोपी का ई-मेल हेक किया उस में कई सबूत प्राप्त हुए तथा उसके कुछ अन्य साथियों के बारे में जानकारी व सबूत प्राप्त हुए हैं।  सबूत अत्यंत महत्वपूर्ण हैं जिससे उसका व उसके सहयोगियों का अपराध सिद्ध हो सकता है, मगर समस्या यह है कि उन सबूतों का किस तरह से उपयोग करें ताकि उस ठग व उसके सहयोगियों पर कार्यवाही हो सके? क्या इस तरह से प्राप्त सबूत आई टी एक्ट का उलंघन हैं?  क्या हम उस सबूतों का उपयोग न्यायालय में कर सकते हैं?

समाधान-

Hackingबूत तो सबूत हैं।  वे किस तरह हासिल किए गए हैं यह महत्वपूर्ण नहीं है।  हैकिंग आई टी एक्ट में एक गंभीर अपराध है।  लेकिन इस अपराध साबित करने के लिए अभियोजन पक्ष को साबित करना होगा कि वाकई हैकिंग की गई थी।  उस के लिए हैकर के विरुद्ध सबूत अभियोजन कैसे हासिल करेगा  यह आप को कोई तकनीकी व्यक्ति ही बता सकता है।

दि आप को सबूत प्राप्त हुए हैं तो आप उन का उपयोग न्यायालय में परिवाद के माध्यम से कर सकते हैं।  परिवाद को धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस को अन्वेषण के लिए भेजा जा सकता है।  पुलिस उन्हीं सबूतों को कानूनी रूप से प्राप्त कर सकती है।  पुलिस कार्यवाही को त्वरित और असरदार बनाने के लिए मीडिया का उपयोग किया जा सकता है।

पत्नी नहीं चाहे तो कोई भी जबरन उसे आप के साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकता। बेहतर है विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर लें

समस्या-

बेगूसराय, बिहार से सत्यप्रकाश ने पूछा है-

मेरा विवाह एक मंदिर में हिन्दू विधि से हुआ था। बाद में विवाह का पंजीयन भी करा लिया। मेरे पास विवाह का कोई चित्र नहीं है।  विवाह के दस माह बाद मेरी पत्नी ने न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया कि वह विवाहित नहीं है और मैं ने उस से जबर्दस्ती से शादी के रजिस्ट्रेशन पर हस्ताक्षऱ करवा लिए हैं। इस के उपरान्त मेरी पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। मैं ने परिवार न्यायालय में वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन किया है। मेरी पत्नी उस प्रकरण में उपस्थित नहीं हुई न्यायालय ने एक तरफा कार्यवाही घोषित कर दी है। अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प की पत्नी जिस ने आप के साथ विवाह किया है अब उस विवाह को जारी नहीं रखना चाहती है। उस ने इस के लिए आप के विरुद्ध परिवाद प्रस्तुत किया है कि आप ने जबरदस्ती रजिस्ट्रेशन आवेदन पर हस्ताक्षर करवा लिए हैं। लेकिन पंजीकरण मात्र हस्ताक्षर करने से नहीं होता। पति पत्नी को विवाह पंजीयक के समक्ष उपस्थित होना होता है। इस कारण से परिवाद तो चलेगा नहीं।

प की पत्नी ने दूसरा विवाह कर लिया है। एक विवाह में रहते हुए दूसरा विवाह वैध नहीं है। आप की पत्नी का उस के दूसरे पति के साथ रहना ठीक नहीं है। यह धारा 494 भा.दंड संहिता के अंतर्गत अपराध भी है। आप चाहें तो अपनी पत्नी के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट करवा सकते हैं या फिर न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

लेकिन यदि आप चाहते हैं कि आप की पत्नी आप के साथ आ कर रहे तो यह तब तक संभव नहीं है जब तक वह स्वयं आप के साथ नहीं रहना चाहती है। यदि आप वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए एक तरफा डिक्री भी प्राप्त कर लेते हैं और वह फिर भी आप के साथ नहीं रहना चाहती है तो कोई भी उसे जबरन आप के साथ रहने को बाध्य नहीं कर सकता। अधिक से अधिक आप तब अपनी पत्नी के विरुद्ध वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना की डिक्री की पालना न करने पर विवाह विच्छेद की डिक्री के लिए आवेदन कर सकते हैं। ऐसा आवेदन तो आप अभी भी उस के द्वारा किए गए परिवाद और दूसरे विवाह की साक्ष्य प्रस्तुत कर जारता के आधार पर भी प्रस्तुत कर सकते हैं और विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं और ऐसी डिक्री प्राप्त हो जाने पर अन्य स्त्री के साथ विवाह कर सकते हैं। मेरे विचार में आप के लिए अपनी पत्नी से विवाह विच्छेद कर दूसरी स्त्री के साथ विवाह करना ही उचित है।

बेशक प्रेम विवाह कर सकते हैं, लेकिन चार वर्ष बाद

समस्या-

गंगानगर, राजस्थान से राजासिंह ने पूछा है –

मेरी उम्र 17 वर्ष की है। क्या मैं प्रेम विवाह कर सकता हूँ।

समाधान-

बेशक, आप प्रेम विवाह कर सकते हैं, लेकिन कम से कम चार वर्ष आप को प्रतीक्षा करनी पड़ेगी। भारतीय कानून में विवाह की न्यूनतम आयु पुरुषों के लिए 21 वर्ष और स्त्रियों के लिए 18 वर्ष है। इस से पहले विवाह कर के आप अपराध करेंगे जिस का आप पर और आप का विवाह कराने वाले पुरोहित पर अपराधिक मुकदमा चलाया जा सकता है जिस में कारावास के दंड से दंडित किया जा सकता है।

वैसे भी अभी आप की उम्र कुछ बनने की है। शायद आप अभी विवाह का अर्थ नहीं समझते। विवाह से अनेक दायित्व मनुष्य पर उत्पन्न होते हैं। पहले इंसान को उन दायित्वों को पूरा करने के लायक होना आवश्यक है। दूसरों पर या पैतृक संपत्ति पर निर्भर करते हुए इन दायित्वों को पूरा करना बहुत दुष्कर होता है। यदि आप किसी से प्रेम करते हैं और उस से विवाह करना चाहते हैं तो यह और भी जरूरी है कि विवाह कोई अपराध नहीं हो। आप को अपने प्रेम को और विकसित करना चाहिए। इस के लिए आप के पास चार वर्ष का समय है। इस में न केवल आप अपना विकास करें अपितु अपने प्रेम की प्रगाढ़ता में वृद्धि करें। जब विवाह की आयु प्राप्त कर लें तो फिर विवाह करें।

सब से पहले अपने विरुद्ध कार्यवाही होने के भय को त्यागें और उचित कार्यवाहियाँ करें

समस्या –

 लखनऊ, उत्तर प्रदेश से वैभव पूछते हैं –

मेरी शादी २०फ़रवरी २००८ में महमूदाबाद, जिला सीतापुर से हिन्दू रीतिरिवाज से हुई थी। उस समय मैं संगीत की पढ़ाई कर रहा था, जिसमे मैं ने हमेशा उच्च स्थान प्राप्त किया। किन्तु मेरे  भाग्य की विडंबना कुछ और ही थी।  मेरी पत्नी ने शादी की पहली रात में ही  यह बताया कि उसकी शादी बिना उस की मर्जी के हुई है, छोड़ दो नहीं तो फँस जाओगे। उस के बाद मैं ने उसे काफी समझाया।  लेकिन वह मुझे गन्दी गन्दी गलियाँ देने लगी। तब  मैंने यथास्थिति से अपने  माता-पिता व  पत्नी के माता पिता को अवगत करवाया।  पत्नी के माता-पिता उनके अन्य रिश्तेदार भी साथ में आये और उन्होंने ने भी समझाया।  परन्तु उनके जाते ही पत्नी के स्वाभाव में एकदम से उग्रता आ गयी और घर में रखी वस्तुएँ इधर उधर फेंकने लगी और गन्दी गन्दी गलियाँ देने लगी।  उस के बाद से ही स्थिति ऐसी हो गई कि वह छत पर चढ़ कर चिल्लाती और अभद्रतापूर्ण वार्तालाप करती।  वह नए नए तरीकों से परेशान करती।  मेरे पिता हृदय, डायबिटीज व उच्चरक्तचाप रोगों से पीड़ित हैं तथा मेरी माता जी डायबिटिक व उच्चरक्तचाप से ग्रसित हैं।  रात में भी ३.०० बजे हो या दिन हो पत्नी को उन पर भी कोई दया नहीं आती।  हाथ जोड़ कर समझाने पर भी उस पर कोई प्रभाव नहीं पड़ता।  बल्कि उसने मेरे ६५-७० वर्ष के माता पिता को धक्का दे दिया जिस से उन्हें काफी चोट भी लग गयी।  मेरे पिता जी को ह्रदयाघात होने के कारण  अस्पताल में एडमिट करवाना पड़ा।  यथास्थिति से जब उनके घर वालो को सूचित किया तो उन्होंने कहा कि बच्ची समझ कर माफ़ कर दें।   इस के बाद वो बक्सा जिस में हमारे परिवार द्वारा दिए जेवर व उपहार थे, उसे लेकर उनके पिता जी विदा कराकर चले गए।  बाद में पत्नी के पिता जी का फ़ोन आया कि वह अब बिलकुल सही हो गयी है।  हम विदा कराने गए तो वह एक बैग लेकर चलने लगी, मैंने पूछा के तुम्हारा बक्सा कहाँ है तो उस के पिता जी ने कहा कि हमें कल लखनऊ काम से आना है,आपकी गाड़ी में ले जाते नहीं बनेगा, हम कल आयेंगे तो लेते आयेंगे।  शादी के 5 वर्ष बीतने के बाद भी बक्सा वहीं है।  पत्नी के परिवार वाले बहाने बनाते हैं,  पूछने पर अब जान से मार देने  व  दहेज़ के केस में फ़ँसाने की  धमकियाँ देते हैं।  सभी परेशानियों को  देखते हुए  मैं विदा कराकर एक अन्य दूसरी जगह,  दूसरे घर में 10 जनवरी 2010 से पत्नी के साथ रहने लगा हूँ।  यहाँ पर मुझसे  बड़े एक भईया भाभी व उनकी 3 वर्ष की पुत्री भी रहती है।  दूसरे ही दिन से ही न तो वह मेरे लिए खाना ही बनाती है और ना ही अपने कमरे में आने देती है।  मेरे ऊपर थूकती है और जो भी हाथ में आता है वही मार  देती है।  कभी रसोई में बाथरूम कर देती है, ना, कभी आंगन में।  कभी रसोई  में नग्नवस्था में स्नान करती है।  छत के ऊपर टीन पर चढ़ कर चिल्लाने लगती है और उलटी सीधी हरकतें करती है।  मुझ पर भाभियों व माँ से शारीरिक संबंधों का आरोप लगाती है।  इस संदर्भ में उनके परिवार वालों को बुलाकर  लगभग  15-20 बार मीटिंग की गई।   जिसमे उन्होंने उसे समझाने की जगह उल्टा हम ही लोगो को डरया धमकाया कि वो जैसा करती है वैसा  करने दोस अन्यथा सब को  जेल में बंद करवा देंगे।  ससुराल वालों के इस व्यवहार से हम काफी दु:खी  हुए।   गत ३१.१०.२०११ को पत्नी ने कमरा  बंद करके मेरे बक्से में रखे हुए मेरे  लगभग २५- ३० कपडे निकाल कर उन में आग लगा दी।  जब मैंने धुआँ निकलते देखा तो मैंने दरवाजा खोलने की  कोशिश की।  परन्तु अन्दर से बंद होने की वजह से नहीं खोल पाया।   मैंने मोहल्ले वालों व भइया भाभी को  बुलाया जिनकी सहायता से  दरवाजा तोडा गया तो देखा की वह किनारे खड़ी हंस रही है।  जिसके बाद मोहल्ले वालों की ही सहायता से आग पर नियंत्रण पाया गया।  जिसकी सूचना उनके घर वालों को दी तो उनका भाई, मौसा व मौसा का लड़का व अन्य रिश्तेदार आये और पुलिस में सूचना  देने के लिए मना  किया।    उल्टा मुझको मारा पीटा व रिवोल्वर दिखाकर जान से मार देने की धमकियाँ  दी।  उक्त घटना से हमारा परिवार व मोहल्ले वाले सभी काफी भयभीत थे।  मेरी पत्नी में कोई परिवर्तन नहीं हुआ बल्कि फ़ोन करके अपने  भाई को बुलवा कर व फ़ोन द्वारा लगातार धमकियाँ देती है।  काफी दुखी होकर अपने भविष्य व मानसिक प्रताड़ना से बचने हेतु मैंने 3 दिसम्बर 2011 को डी.आई.जी, सी.ओ. व ए.सी.ओ. महोदय को प्रार्थना पत्र डाक से प्रेषित किया जिस में सभी तथ्यों के पुष्ट होने पर  हिदायत दी गई।   परन्तु उसका भी कोई प्रभाव नहीं पड़ा।  जिसके बाद  पत्नी के ज्यादा बीमार पड़ने की वजह से मैंने उसे एक सरकारी अस्पताल में दिखाया तो डाक्टर ने बताया कि आपकी पत्नी मानसिक रोग से शादी से पहले से ही पीड़ित है।  जिसकी दवाई कराइ थी परन्तु हम को नहीं बताया।  अपनी पत्नी में कोई भी सुधार न देख कर व धमकियों से परेशान होकर मैंने अगस्त 2012 में विवाह विच्छेद हेतु न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर दिया है।  अब भी पत्नी के परिवार वाले मुझको फ़ोन पर धमकियाँ देते हैं और आकर मारते हैं, मंत्री व पुलिस द्वारा प्रताड़ना दिलवाने  व दहेज़ के केस में बंद करवाने की बात कहते हैं।  उक्त सन्दर्भ में वो अपने काफी सौर्सेज बताते हैं।  वे लोग  काफी क्रिमिनल मानसिकता के व्यक्ति हैं उन के वहाँ बहू के साथ डिवोर्स हो चुका है और उसने (बहू) ने  भी इनके परिवार पर दहेज़ का केस किया था। वे अपने परिवार में ही कई अन्य मुकदमे लड़ चुके हैं और  अपने को बहुत बड़ा मुकदमेबाज बताते हुए कहते हैं कि ऐसे केस में फँसा  दूंगा जिस में जिंदगी भर जेल में सड़ोगे।   मेरे भईया-भाभी के विषय में कोई प्रार्थना पत्र  नहीं गया दिया है परन्तु मोहल्ले वालों के सामने गन्दी गन्दी गलियाँ व धमकियाँ  देती है व पत्नी के  घर वाले आकर अभद्रता करते हैं।  पत्नी  अभी भी मेरे घर पर ही है, मुझे लगातार प्रताड़ित करती है व करवाती है।  ऐसी स्थिति में मुझे क्या करना चाहिए? उचित मार्गदर्शन करें।

समाधान-

प की समस्या पढ़ी।  आप ने बहुत गलतियाँ की हैं।  आप की पत्नी ने विवाह के पहले ही दिन यह स्वीकार किया था कि विवाह उस की इच्छा के बिना हुआ है।  तो वह सही समय था जब आप को कदम उठाना चाहिए था।  यदि बिना विवाह की इच्छा के किसी महिला ने आप से विवाह किया था और वह आप को उसे छोड़ देने को कह रही थी तो तुरन्त उस का बयान कुछ गवाहों के बीच दर्ज करवाना चाहिए था।  पुलिस को भी सूचना देना चाहिए था कि उस के परिजनों ने उस का विवाह आप के साथ उस की इच्छा के बिना कर के गलती की है।  जबरन पुत्री का विवाह किसी के साथ करना पहला अपराध था जिसे आप ने माफ कर दिया।  यदि आप की पत्नी आप के साथ आरंभ से ही नहीं रहना चाहती थी तो आप ने भी उसे उस के माता-पिता के कहने से ही सही अपने पास रखा है।  यह भी एक गलती थी जो आप ने की।  इस के पीछे आप की यह मंशा रही हो सकती है कि विवाह मुश्किल से होता है और जब हो गया है तो उसे बनाए रखा जाए।  लेकिन यही आप के लिए मुसीबत की जड़ बना हुआ है।

जैसे जैसे आप की पत्नी की उग्रता बढ़ती गई वैसे वैसे आप ने उस के मायके वालों से शिकायत की।  लेकिन आप भारतीय समाज को तो जानते हैं न?  यहाँ बेटी को विवाह के बाद पराया समझा जाता है और उस के भी पहले बोझ।  कोई भी अपनी बेटी का विवाह होने के बाद उत्पन्न हुई परिस्थितियों में उस पराई चीज को जो बोझ है वापस अपने घर में प्रवेश क्यों कर देगा? यही कारण है कि आप के ससुराल वाले चाहते हैं कि जैसे भी हो वह आप के साथ रहे, उस बीमार मुसीबत को वे अपने घर वापस क्यों लाएँ?  जैसे ही उन्हें अवसर मिला उन्हों ने आप की पत्नी का स्त्री-धन भी अपने पास रख लिया।  वे सोचते हैं कि अब आप के पास इस बात का कोई सबूत नहीं कि आप की पत्नी अपना स्त्री-धन मायके रख आई है।  भविष्य में यदि कोई विवाद हो तो स्त्री-धन की मांग कर के आप पर दबाव बनाया जा सके।

स मामले में आप की पत्नी और उस के मायके वाले लगातार आप का सहयोग करने के  स्थान पर आप को धमकाने और आप के साथ मारपीट करने के अपराधिक कृत्य कर रहे हैं।  होना तो यह चाहिए था कि जिस दिन पहली बार उन्हों ने अपराधिक कृत्य किया उस की तुरन्त पुलिस को सूचना दे कर कार्यवाही की जाती।  एक अपराधिक कृत्य को छुपा कर हम हमेशा अपराधी को बचा कर उस का हौसला बढ़ाने का काम करते हैं।  यही आप ने किया।  हो सकता है आप उन के द्वारा मुकदमों में फँसाए जाने से डर गए हों या फिर उन्हों ने जो रसूख आप को बता रखे हों उन से आप भय खाते हों। लेकिन आप को अंत में अदालत तो जाना पड़ा ही।  यदि आप पहले ही अदालत चले जाते और सही समय पर सही कार्यवाही करते तो आप को शायद यह दिन देखने को नहीं मिलते।  आप ने तलाक के लिए मुकदमा किया है।  आप के पास तलाक के पर्याप्त आधार उपलब्ध हैं।  आप के वकील ने आप के आवेदन में उन्हें अवश्य ही समाविष्ट किया होगा।  यदि आप पर्याप्त साक्ष्य प्रस्तुत कर सके तो आप को तलाक मिल जाएगा।

लेकिन अब भी देर नहीं हुई है।  पुरानी कहावत है ‘देर आयद दुरुस्त आयद’। आप को चाहिए कि आप अब अपने ससुराल वालों से न डरें।  यह सही है कि वे भी आप के विरुद्ध कार्यवाही कर सकते हैं।  लेकिन कार्यवाही से डरने की जरूरत नहीं है। आरंभ में परेशानी जरूर होती है।  मुकदमा लड़ना पड़ता है पर अंत में सच ही जीतता है।  आप के पास तो मुहल्ले के लोगों की बहुत सारी सच्ची साक्ष्य है।  यदि अब आप के ससुराल वाले कोई धमकी देते हैं या मारपीट करते हैं तो तुरंत पुलिस को सूचना दीजिए।  पुलिस कार्यवाही न करे तो अदालत में परिवाद प्रस्तुत कीजिए।  आप के ससुराल वालों के कितने ही रसूख हों वे अदालत की कार्यवाही को नहीं रोक सकते और न ही आप के पक्ष की सच्ची साक्ष्य को समाप्त कर सकते हैं।  आप को हिम्मत रखनी होगी और कार्यवाहियाँ करनी होंगी।  जो भी परिस्थितियाँ हैं उन में आप अपनी पत्नी के साथ हमेशा नहीं रह सकते।

धिकांश, बल्कि कहिए कि लगभग सभी पुरुष इस बात से डरते हैं कि उन के विरुद्ध 498 ए और 406 आईपीसी का मुकदमा कर दिया जाएगा।  उन्हें और उन के रिश्तेदारों को गिरफ्तार कर लिया जाएगा।  लेकिन यह अर्ध सत्य है।  रिश्तेदारों के विरुद्ध आसानी से कार्यवाही नहीं होती।  यदि कोई मिथ्या प्रथम सूचना रिपोर्ट आप के विरुद्ध दर्ज भी कराई जाती है तो आप  धारा 482 दंड प्रक्रिया संहिता में उच्च न्यायालय को आवेदन कर के उसे निरस्त करवा सकते हैं।  इस बारे में अनेक न्यायिक निर्णय आ चुके हैं।  इसलिए सब से पहले अपने विरुद्ध होने वाली कार्यवाहियों का भय त्यागिए और उचित कानूनी कार्यवाहियाँ कीजिए।  बिना कुछ किए तो आप इस समस्या से बाहर निकल नहीं सकते।  इस मामले में आप तलाक लेने गए हैं और एक बार विवाह के पश्चात पति ही सब से नजदीकी रिश्तेदार है, इस कारण से तलाक लेने के उपरान्त भी जब तक आप की पत्नी अपने पैरों पर खड़ी नहीं हो जाती है या उस का दूसरा विवाह नहीं हो जाता है आप को उस के भरण पोषण के लिए न्यायालय द्वारा निर्धारित राशि अदा करनी पड़ सकती है। तलाक के उपरान्त आप की पत्नी या तो उस के मायके वालों के साथ रह सकती है या फिर अलग अकेले रह सकती है।  लेकिन आप दूसरा विवाह कर सकते हैं।


Warning: require_once(/home/teesaw4g/public_html/wp-content/themes/techozoic-fluid/footer.php): failed to open stream: Permission denied in /home/teesaw4g/public_html/wp-includes/template.php on line 688

Fatal error: require_once(): Failed opening required '/home/teesaw4g/public_html/wp-content/themes/techozoic-fluid/footer.php' (include_path='.:/opt/alt/php56/usr/share/pear:/opt/alt/php56/usr/share/php') in /home/teesaw4g/public_html/wp-includes/template.php on line 688