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घरेलू हिंसा और अमानवीय क्रूरता से पीड़ित स्त्री को मदद करें और मुक्त कराएँ।

समस्या-

सत्यम ने जबलपुर, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मेरी एक फ्रेंड है, उसका हस्बैंड उसको मारता पीटता है, मेंटली टॉर्चर करता है, बिना बात के ही लड़ता रहता है। आज तो उसने हद ही कर दी, सुबह से बिना बात के लड़ने लगा और बोलता है कि मेरे घर में सिगड़ी नहीं चलना चाहिए। वाइफ बोलती है, सिगड़ी ना जलाओ तो मर जाऊं क्या ठंड में। तो हस्बैंड बोलता है कि मर जा, अब यदि सिगड़ी जलाई तो वही सिगड़ी तेरे ऊपर डाल दूंगा जलती हुई। उस लड़की की लाइफ को पूरी तरह बर्बाद कर दिया है। घर से निकलने नहीं देता। किसी रिलेटिव पहचान वालों के यहां जाने नहीं देता। कहता है कि मैं जिस से बोलूंगा उससे मिलेगी, उससे बात करेगी, नहीं तो किसी से नहीं करेगी। बिना बात के लड़ता रहता है। लड़की को डिवोर्स भी नहीं देता है, बोलता है कि मैं तुझे छोड़ने नहीं दूंगा। सबसे ज्यादा शक करता। उसको कहीं आना जाना नहीं देता और मारने के लिए हाथ उठाता है। एक दो बार मारा भी। लड़के की फिजिकल रिलेशन किसी और के साथ है शायद। वह दूसरी लड़के को घर में लाना चाहता है। लड़की बोलती है कि तेरे को देख के साथ रहना है, जिसको लाना है ले आ। बस मुझे शांति से रहने दे। इस पर लड़का बोलता कि मैं ना तुझे जीने दूंगा, ना मरने दूंगा। लड़की करे तो क्या करे? लड़की के पास कोई सबूत नहीं है कि उसका हस्बैंड कहीं और रिलेशन में है। लड़की का साथ देने वाला कोई नहीं है कि वह अपने हस्बैंड के खिलाफ एफ आई आर दर्ज करा सके। लड़की तो अपने हस्बैंड से बात करना पसंद नहीं करती, तो क्या करें? कोई रास्ता बताइए।

समाधान-

लड़की के साथ घरेलू हिंसा हो रही है। भंयकर अमानवीयता और क्रूरता का व्यवहार किया जा रहा है। मारपीट भी हुई है। यह सब विवाह विच्छेद के लिए पर्याप्त है। इस के अलावा धारा 498ए आपीसी में संज्ञेय अपराध भी है, जिस की रिपोर्ट पुलिस को की जा सकती है। यह रिपोर्ट कोई भी परिजन या मित्र भी कर सकता है।

न्यायालय में किसी भी मामले में निर्णय होने में हमारे यहाँ समय लगता है। इस का मुख्य कारण हमारे मुल्क के पास जरूरत की चौथाई अदालतें भी नहीं होना है। अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 140 अदालतें हैं जब कि भारत में मात्र 12 इस तरह वहाँ के अनुपात में हमारी अदालतों की संख्या 8 प्रतिशत है। ऐसी स्थिति में सभी तरह के विक्टिम पुलिस या न्यायालय के पास जाने के बजाए यातनाएँ भुगतते रहते हैं। इसी कारण अनेक प्रकार के अपराध पलते रहते हैं। हर रिपोर्ट कराने आने वाले को हतोत्साहित करती है कि रिपोर्ट कराने के बजाए भुगतते रहो, क्यों कि उसे भी अपने रिकार्ड में अपराध कम दिखाने होते हैं।

जहाँ तक स्त्रियों का मामला है वे तब तक पुलिस के पास जाने में झिझकती हैं जब तक कि उन्हें यह पक्का विश्वास न हो जाए कि उन के पास जीवन जीने और सुरक्षा के पर्याप्त विकल्प हैं। जब कभी कोई परिचित इस तरह की रिपोर्ट करा भी दे तो स्त्रियाँ पुलिस के या अपने पति व ससुराल वालों के दबाव के कारण टूट जाती हैं और कह देती हैं कि वह कोई कार्यवाही नहीं चाहती। वैसी स्थिति में वह परिचित बहुत बुरी स्थिति में फँस जाता है। अक्सर लड़की के मायके वाले भी उस का साथ नहीं देते, क्यों कि हमारा तो विचार ही यह है कि लड़कियाँ परायी होती हैं। इस विचार के अनुसार लड़कियाँ समाज में सब के लिए पराई होती हैं, वे कभी किसी की अपनी नहीं होतीं।

इस मामले में यदि आप मन, वचन कर्म से चाहते हैं कि लड़की उन यातनाओं से मुक्त हो अच्छा जीवन जिए तो आप को उसे विश्वास दिलाना होगा कि उस के पास सुरक्षित जीवन  जीने के न्यूनतम वैकल्पिक साधन हैं। आप को भी प्रयास करना होगा कि वह किसी तरह अपने पैरों पर खड़ी हो सके। तभी वह यह लड़ाई लड़ सकती है। यदि आप आश्वस्त हैं कि लड़की को न्यूनतम वैकल्पिक जीवन साधन उपलब्ध होने का विश्वास दिला सकते हैं तो आप पुलिस को रिपोर्ट करें, पुलिस कार्यवाही न करे तो एस.पी. को मिलें। यदि फिर भी काम न चले तो मजिस्ट्रेट को शिकायत दें। लड़की को उस के पति की कारा से मुक्ति दिलाएँ।

लड़की के मुक्त हो जाने पर उस की ओर से विवाह विच्छेद के लिए धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में आवेदन, धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत भरण पोषण के लिए परिवार न्यायलय में आवेदन प्रस्तुत कराएँ। घरेलू हिंसा अधिनियम में भरण पोषण, वैकल्पिक आवास तथा लड़की के आसपास न फटकने के लिए निषेधात्मक आदेश प्राप्त किए जा सकते हैं। इस से लड़की को जो मदद आप अभी उपलब्ध करा रहे हैं उस की जरूरत कम हो जाएगी।  आप लड़की को कोई नियोजन दिला कर उसे अपने पैरों पर खड़े होने में मदद करें। उसे नियोजन मिल जाने पर वह स्वावलंबी हो जाएगी। जब उस का विवाह विच्छेद हो जाए तो वह निर्णय कर सकती है कि उसे एकल स्त्री की तरह जीना है अथवा एक अच्छा जीवन साथी तलाश कर उस के साथ जीवन व्यतीत करना है।

वैवाहिक हिंसा की तुरन्त शिकायत करें, घरेलू हिंसा व भरण पोषण राशि के लिए मुकदमे करें।

sexual-assault1समस्या-

सुमन चौरसिया ने आदर्श नगर, सुल्तानपुर, उत्तरर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 17.05.2013 को हुई थी। दिनांक 12.09.2014 को मेरे पति व घर के सभी लोगों ने दहेज के कारण शारिरिक और मानसिक रूपसे मारपीट कर के और तलाक लेने के लिए मुकदमा कर दिया। मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के पति व उस के रिश्तेदारों ने आप के साथ दहेज के कारण मारपीट की है। आप को तुरन्त उसी समय पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए थी। उन सब के द्वारा ऐसा करना धारा 498ए आईपीसी के अन्तर्गत अपराध है। यदि अब तक पुलिस में रिपोर्ट दर्ज न कराई हो तो आप अब करवा दें।

प ने अभी तक यह नहीं बताया कि क्या आप अब भी ससुराल में रह रही हैं या अपने मायके या कहीं और रह रही हैं। आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन प्रस्तुत कर के भरण पोषण और निवास की व्यवस्था करने की प्रार्थना करनी चाहिए इस के साथ आप धारा 125 दं.प्र.संहिता में भी भरण पोषण के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्तुत कर सकती हैं।

मेरे विचार में जब पति ने तलाक का मुकदमा कर दिया है तो अब इस विवाह में कुछ भी शेष नहीं बचा है जिस से गृहस्थी दुबारा बन सके। आप को तलाक के प्रस्ताव को अपनी शर्तें पर स्वीकार कर लेना चाहिए। इस के लिए आप प्रस्ताव रख सकती हैं कि आप को आप का स्त्री-धन अर्थात आप को मायके, ससुराल और मित्रों से मिले सभी उपहार लौटाए जाएँ या उन की कीमत का भुगतान किया जाए। एक मुश्त भरण पोषण राशि दी जाए तो आप सहमति से विवाह विच्छेद के लिए तैयार हैं। ऐसे मामलों में जितनी जल्दी विवाह विच्छेद हो जाए उतनी जल्दी दोनों अपने अपने जीवन के भविष्य के लिए योजना बना सकते हैं। अन्य मुकदमों में तो निर्णय होने में बरसों लग जाते हैं। यदि आप स्त्रीधन की मांग करती हैं और वह नहीं लौटाया जाता है तो आप धारा 498ए के साथ साथ धारा 406 आईपीसी में भी मुकदमा दर्ज करवा सकती हैं।

प के विरुद्ध जो विवाह विच्छेद का मुकदमा किया गया है उस में भी आप धारा 24 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत मुकदमा चलने के दौरान आप के भरण पोषण, मुकदमे का तथा पेशी पर आने जाने का खर्चा दिलाने की प्रार्थना कर सकती हैं। जब तक आप का यह आवेदन स्वीकार न होगा और आप को यह राशि न मिलने लगेगी तब तक विवाह विच्छेद का मुकदमा भी आगे न बढ़ेगा।

बहिन क्रूरता और घरेलू हिंसा की शिकार है, दोनों अधिनियमों में कार्यवाही कराएँ…

domestic-violenceसमस्या-

नरेश कुमार ने जिला-कुरुक्षेत्र (हरियाणा) से समस्या भेजी है कि-

मेरी छोटी बहन  की  शादी 2009 में हुई थी जो की आज तक मेरी बहन के कोई भी संतान नहीं है, जिस के कारण उसके सास -ससुर मेरी बहन को तंग करते रहते हैं।  सब से बड़ी बात तो यह है कि मेरी बहन के पति भी मेरी बहन की न सुनकर अपनी मातापिता की सुनते हैं और मेरी बहन को परेशान करते हैं और अपशब्दों का भी अत्यधिक प्रयोग किया जाता है।  कृपया मुझे उपाय बताएँ कि हम किस प्रकार क़ानूनी रूप से इस समस्या का हल कर सकते हैं।

समाधान-

प की बहिन के साथ ससुराल में उस के पति और उस के रिश्तेदारों द्वारा जो व्यवहार किया जा रहा है वह घरेलू हिंसा है। वह धारा 498ए आईपीसी के अन्तर्गत परिभाषित क्रूरता भी है। इस तरह आप की बहिन के पति और उस के नातेदार लगातार ऊक्त धारा के अन्तर्गत दंडनीय अपराध कर रहे हैं।

प की बहिन चाहे तो महिलाओं का घरेलू हिंसा से रक्षण अधिनियम के अन्तर्गत आवेदन सीधे मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत कर सकती है। इस अधिनियम में आप की बहिन अपने ससुराल वालों को हिंसा न करने के लिए वचनबद्ध करवा सकती है। आदेश न मानने पर उन्हें दंडित किया जा सकता है। वह उसी घर में अलग निवास मांग सकती है या अलग निवास मांग सकती है। भरण पोषण के लिए खर्चा मांग सकती है।

प की बहिन धारा 498ए के अन्तर्गत पुलिस को रिपोर्ट दे सकती है या मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे पुलिस जाँच के लिए भिजवा सकती है।

न दोनों अधिनियमों के अन्तर्गत कार्यवाही करने के लिए आप को स्थानीय वकील से संपर्क करना चाहिए और उस के निर्देशो के अनुसार कार्यवाही करनी चाहिए। स्थानीय वकील इस मामले में आप की सहायता कर सकते हैं।

बेटी की कस्टड़ी के लिए घरेलू हिंसा अधिनियम में भी आवेदन किया जा सकता है।

Muslim-Girlसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से पुनः समस्या भेजी है कि-

मुझे लड़की की कस्टड़ी कितने दिनों में मिल सकती है। मैं क्या कर सकती हूँ? मैं उन की दूसरी पत्नी हूँ, पहली ने विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर ली थी। मैं ने भरण पोषण का मुकदमा किया था। उन्हों ने मुझे अपने साथ रखने को कहा तो मैं ने केस वापस ले लिया। लेकिन उन्होने बच्चा छीन कर मुझे फिर निकाल दिया। अब 498ए का मुकदमा चल रहा है अभी तारीख नहीं पड़ी है। मुझे अपनी बेटी चाहिए। बहुत छोटी है वो। मेरा समाधान करें।

समाधान-

कंचन जी, आप की समस्या को देखते हुए हम ने तुरन्त आप को समाधान दिया था। आप ने पूरा विवरण दिया होता तो हम तभी आप का समाधान उसी तरह देते। हम यहाँ समस्याओं का समाधान प्रस्तुत करते हैं। नियमित वकालत नहीं करते। फिर भी आप की समस्या को देखते हुए समाधान बता रहे हैं। कृपया आगे कोई कार्यवाही किए बिना कोई प्रश्न हम से न करें। करें तो इसी पोस्ट पर टिप्पणी के रूप में करें आप को यहीं उत्तर दिया जा सके।

प को कस्टड़ी जल्दी मिल सकती है। क्यों कि छोटी उम्र की बच्ची को उस की माता से अलग नहीं किया जा सकता। आप को तुरन्त घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन देना चाहिए और अपने व बच्ची के खर्चे के साथ बच्ची की कस्टडी की राहत मांगनी चाहिए। उस में मजिस्ट्रेट धारा 21 के अन्तर्गत तुरन्त कस्टड़ी के लिए आदेश कर सकता है। बस आप को एक अच्छा स्थानीय वकील करना होगा।

498ए के मामले में आप शिकायतकर्ता हैं, मुकदमा पुलिस ने चलाया है और सरकारी वकील उस की पैरवी करेगा। जब उस में साक्ष्य ली जाएगी तब आप को केवल बयान के लिए समन आएगा। उस के पहले आप को कोई सूचना प्राप्त नहीं होगी।

प चाहें तो परिवार न्यायालय में धारा-9 या धारा-10 हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत दाम्पत्य अधिकारों की पुनर्स्थापना या न्यायिक पृथक्करण की डिक्री के लिए आवेदन कर सकती हैं। उस के साथ ही बच्ची की कस्टड़ी प्राप्त करने के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। लेकिन यह बताना कठिन है कि बच्ची की कस्टड़ी कितने दिन में मिल सकती है।

आप को बेटी की कस्टडी मिल सकती है।

born after faild tubectomyसमस्या-

कंचन ने गांधीधाम, गुजरात से समस्या भेजी है कि-

मैं ने लव मैरिज की है और मेरा पति मुझे मारता है, मेरी 18 माह की बेटी है जो उस ने मेरे से छीन ली है और मुझे घऱ से बाहर निकाल दिया है। मैं ने 498ए का केस किया था लेकिन उस में उन लोगों ने जमानत ले ली। मेरे से नोटेरी करवाई है कि लड़की पर मेरा कुछ भी हक नहीं होगा। क्या लड़की मैं नहीं ले सकती? कृपया समाधान करें।

समाधान-

ति से विवाद होने पर सब से पहले यह समझ लेना जरूरी है कि आप के पास सपोर्ट क्या है? यदि आप आत्मनिर्भर हैं, अर्थात आप स्वयं अपना खर्च उठा सकती हैं और बेटी की देखभाल कर सकती हैं तो सब से बेहतर है। यदि नहीं है तो सब से पहले आप को यह सोचना चाहिए कि आप का अकेले जीवन गुजारने का साधन क्या बनेगा और मुकदमा लड़ने के लिए आप का सपोर्ट क्या होगा।

धारा 498ए में जमानत तो हो ही जाती है। मुकदमा चलेगा और उस का साबित होना इस बात पर निर्भर करेगा कि आप खुद न्यायालय के समक्ष क्या बयान करती हैं। आप को महिलाओं के प्रति घरेलू हिंसा अधिनियम के अन्तर्गत कार्यवाही कर के सुरक्षा, निवास की सुविधा, बच्चे की कस्टडी और अपने और बच्चे के लिए भरण पोषण का खर्च मांगना चाहिए। दूसरी ओर पारिवारिक न्यायालय में आवेदन दे कर न्यायिक पृथक्करण अथवा विवाह विच्छेद के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए साथ में बच्चे की कस्टडी के लिए भी आवेदन करना चाहिए। आप को बच्चे की कस्टडी मिल सकती है। विशेष रूप से तब जब कि वह बालिका है। इस बात से कोई फर्क नहीं पड़ता कि आप के पति ने आप से कुछ लिखवा कर नोटेरी करवा लिया है। वह सब कुछ दबाव में भी हो सकता है जैसा कि प्रतीत होता है।

प जान लें विवाह किसी भी रीति से हो कानून के समक्ष वह विवाह होता है और उस के दायित्व और कर्तव्य समान होते हैं। हमारा समाज पुरुष प्रधान समाज है और किसी भी तरह से स्त्री को अधीन बनाने के रास्ते तलाशता रहता है। आप बच्चे के साथ प्रेम के कारण अपने पति के साथ बनी रहेंगी और जीवन भर यातनाएँ सहन करती रहेंगी। इसी कारण आप से बच्चे को छीन लिया गया है। आप यदि आत्मनिर्भर नहीं हैं तो उस तरफ कदम रखिए। एक स्त्री का सम्मान जनक स्थान समाज में इसी बात पर निर्भर करता है कि वह आत्मनिर्भर है या नहीं।

घरेलू हिंसा मामले में संरक्षा अधिकारी के कर्तव्य …

sexual-assault1समस्या-

राहुल ने कानपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

जिला प्रोबेशन ऑफीसर के यहाँ घरेलु हिंसा के अन्तर्गत दिया गया प्रार्थना पत्र तथा पति पत्नी से पूछताछ में पूछे गए सवाल के जवाब को जो वह नोट करता है उसे क्या कहते हैं? तथा उन जवाबों क्या महत्व है? क्या प्रोबेशन अधिकारी के यहाँ से अदालत जाने से पहले सेक्शन 9 दाखिल कर देने से 498-ए तथा अन्य में धराओं में राहत मिल सकती है। जिला प्रोबेशन अधिकारी द्वारा भेदभाव की शिकायत किस से की जा सकती है? क्या एक महीने में एक डेट में ही प्रोबेशन अधिकारी न्यायालय को स्थानांतरित कर सकता है।

समाधान-

हिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम में किसी प्रोबेशन अधिकारी का उल्लेख नहीं है। इस अधिनियम में प्रोटेक्शन / संरक्षा अधिकारियों की नियुक्ति का प्रावधान है। ऐसे संरक्षा अधिकारी का कार्य किसी भी महिला के साथ घरेलू हिंसा के मामले की रिपोर्ट बना कर मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत करना तथा उस की प्रतियाँ उस थाना क्षेत्र के भारसाधक अधिकारी को व क्षेत्र के सेवा प्रदाताओं को देना है। संरक्षा अधिकारी  घरेलू हिंसा से पीड़ित महिला की ओर से आवेदन भी मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। संरक्षा अधिकारी द्वारा जो जवाब पूछे जाते हैं उन्हें उस व्यक्ति के बयान के रूप में घरेलू हिंसा की घटना की रिपोर्ट के साथ संलग्न किया जाता है। इन बयानों और घटना रिपोर्ट के आधार पर न्यायालय प्रथम दृष्टया कोई राहत हिंसा की शिकार महिला को प्रदान कर सकता है।

संरक्षा  अधिकारी का कार्य हि्ंसा से पीड़ित महिला को विधिक सेवा प्राधिकरण से मिलने वाली सहायता उपलब्ध कराना,  पीडित महिला को संरक्षण गृह उपलब्ध कराना , आवश्यक होने पर पीड़िता की चिकित्सकीय जाँच करवाना, मौद्रिक अनुतोष की अनुपालना करवाना तथा घरेलू हिंसा के मामले में न्यायालय की मदद करना है।

धारा-9 का आवेदन प्रस्तुत करने का तात्पर्य मात्र इतना है कि उस से यह स्पष्ट होगा कि आप तो स्वयं ही पत्नी को रखने को तैयार है। इस से अधिक कुछ नहीं। प्रत्येक मामले का निर्णय उस मामले में साक्ष्य द्वारा प्रमाणित तथ्यों पर निर्भर करेगा।

प का अन्तिम प्रश्न समझ से बाहर है। आप किस चीज के स्थानान्तरण की बात कर रहे हैं यह लिखना शायद भूल गए। लेकिन संरक्षा अधिकारी कभी भी न्यायालय को आवेदन या घटना रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है।

क्रूरता के आधार पर आप की बहिन अपने पति के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है।

widow daughterसमस्या-

मथुरा, उत्तर प्रदेशसे शिखर आकाश ने पूछा है-
मेरी बहन काविवाह को लखनऊ के एक संयुक्त परिवार में 14 साल पहले हुआ। उसेअपनी ससुराल मे मानसिक प्रताड़ना दी जाती रही है, जिसे मेरी बहन पिछ्ले 14 सालोंसे झेलती आ रही है। उस के साथ घर के पुरुष और महिलाओं द्वारा अभद्रव्यवहार,भाषा का प्रयोग किया जाता रहा है। एक पुत्र 12 साल का है जो शारीरिक रूप से कमज़ोर है। अपनी माँ पर हो रहे इस दुर्व्यवहार से सहमा रहता है और उसकाविकास रुक गया है। पतिसुनते नहीं हैं और अपने भाई का साथ देते हैं। पति के भाईपेशे से वकील हैं और सारा परिवार इसी बात का दम्भ भरता है। मेरी बहन संगीतविशेषरज्ञहै और उसे घर से बाहर आने जाने भी नहीं दिया जाता है। उस का जीवन औरकेरियर बर्बाद हो रहाहै। क्या बहन न्यायिक पृथक्करण/ विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकती है औरअपने नाबालिग पुत्र को अपने साथ रख सकती है?

समाधान-

प की समस्या में यह स्पष्ट नहीं है कि आप की बहन और उस के पुत्र के साथ किस तरह का शारीरिक मानसिक दुर्व्यवहार किया जा रहा है। लेकिन जो किया जा रहा है वह क्रूरता है। इस क्रूरता के आधार पर आप की बहन न्यायिक पृथक्करण की डिक्री प्राप्त कर सकती है। यदि वह चाहे तो विवाह विच्छेद की डिक्री भी प्राप्त कर सकती है। वह नाबालिग पुत्र को अपने साथ भी रख सकती है। इस के साथ साथ स्वयं अपने लिए व अपने पुत्र के लिए भरण पोषण का खर्च भी प्राप्त कर सकती है।

स के लिए उसे स्वयं अपने पुत्र सहित परिवार से अलग रहना होगा या लखनऊ छोड़ कर मथुरा आ कर रहना होगा। एक बार दोनों अलग रहने लगें तो फिर न्यायिक पृथक्करण/ विवाह विच्छेद, घरेलू हिंसा व भरण पोषण के लिए कार्यवाही कर सकती हैं। यदि वह मथुरा आ कर रहने लगे तो ये सभी कार्यवाहियाँ मथुरा में संस्थित की जा सकती हैं।

पत्नी के सहवास से इन्कार करने के तथ्य से घरेलू हिंसा में पति को कोई लाभ नहीं होगा।

divorceसमस्या-

सचिन ने मुम्बई, महाराष्ट्र से पूछा है-

रेलू हिंसा के मुकदमा पत्नी ने किया है। वह पति के साथ उस के ही घर में निवास करती है और सहवास से इन्कार करती है। सहवास को 8 माह हो गए हैं, हमारे केरल टूर पर भी उस ने सहवास से इन्कार किया है। क्या घरेलू हिंसा प्रकरण में अन्तरिम राहत पर इस का कोई असर होगा?

 

समाधान-

दि पत्नी ने सहवास से लगातार इतने समय से इन्कार किया है तो यह एक प्रकार की क्रूरता है जो आप को उस से विवाह विच्छेद के तथा न्यायिक पृथक्करण के लिए एक वैधानिक कारण हो सकता है। लेकिन घरेलू हिंसा के प्रकरण में वह प्रथम दृष्टया यह साबित करती है कि उस के साथ घरेलू हिंसा हुई है तो आप को अन्तरिम राहत के रूप में जो वह चाहती है देना पड़ सकता है।

त्नी ने किन आधारों पर आप के विरुद्ध घरेलू हिंसा का प्रकरण संस्थित किया है इस पर आप बिलकुल चुप हैं। केवल इतना तथ्य बता देने से कि पत्नी सहवास से इन्कार करती है आप को कुछ भी हासिल नहीं हो सकता है। हो सकता है उस की घरेलू हिंसा की शिकायत सही हो और उस के पास सहवास से इन्कार करने के वैध कारण भी हों।

बहिन को आत्मनिर्भर होने में मदद करें ….

समस्या-

सीमा ने झाँसी, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरी छोटी बहन की शाधी 5 साल पहले हुई थी। उस के 4 साल की लड़की है। जीजा जी को उन के पापा के स्थान पर रेलवे में नौकरी मिली है। मेरी बहन को बहुत मारते हैं। अभी दो माह पहले बहुत मारा, वो घर आ गई। अब उस की ननद, सास उन के जीजाजी कहते हैं कि वो घर से भाग गई है उन के जीजाजी पुलिस में हैं जो आये दिन धमकाते रहते हैं। इस से मेरा पूरा घर परेशान है। कोई सही रास्ता बताएँ जिस से मेरी बहन के साथ न्याय हो।

समाधान-

प अपनी बहन के साथ न्याय चाहती हैं तो सब से पहले इस बात की तैयारी करें कि आप को उन्हें अपने पति के घर नहीं जाने देना है और ऐसी कोशिशें करनी हैं जिस से वे अपने पैरों पर खड़ी हो जाएँ। कोर्ट कचहरी कागजी न्याय देती हैं। उस से जीवन में शायद ही कुछ हासिल हो। यदि आप की बहन अपने पैरों पर खड़ी हो कर आत्मनिर्भर हो जाएगी उस की तो तीन चौथाई समस्याएँ समाप्त हो जाएंगी।

प की बहन के ससुराल वाले सही कहते हैं कि आप की बहिन भाग आई है। यदि उस के साथ मारपीट होगी, अमानवीय व्यवहार होगा तो उस के पास भाग कर आने के सिवा क्या मार्ग है। आप पुलिस को सीधे कहिए कि वह भाग कर न आती तो उस की जान भी ली जा सकती थी। आप अपनी बहन से 498-ए में तथा स्त्री धन न देने के लिए धारा 406 आईपीसी में पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवाइये। पुलिस कार्यवाही न करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कराइए। साथ ही सीधे विवाह विच्छेद का आवेदन धारा 13 हिन्दू विवाह अधिनियम में क्रूरता के आधार पर प्रस्तुत कराइए व धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता तथा घरेलू हिंसा अधिनियम की धारा 12 में भरण पोषण के खर्च के लिए आवेदन कराइए। इसी से मार्ग निकलेगा। इस के लिए आप के परिवार को बहिन के साथ खड़ा होना होगा और इस लड़ाई में उस का साथ देना होगा।

प के बहनोई का जीजा पुलिस में है तो उस के एसपी, आईजी और डीआईजी को उस की शिकायत कीजिए कि वह अपने साले को अपराध में सहायता पहुंचाता है। शिकायत सही कर दी तो जीजाजी चुप हो लेंगे।

हिंसा तथा घर से निकाल दिए जाने पर पत्नी घरेलू हिंसा अधिनियम में आवेदन करे।

Headache_paintingसमस्या-

यूनुस अंसारी ने सारंगपुरा, जिला राजगढ़ मध्यप्रदेश से पूछा है-

 

क्षिप्राबाईके पति ने दहेज़ की मांग कर घर से निकल दिया जिस पर से ४९८ क मुक़दमा चल रहाहै। क्षिप्राबाई के एक लड़का 7 साल का है शिप्राबाई पति के साथ जाना चाहती हैवो नहीं ले जा रहा है, अब शिप्राबाई को क्या करना चाहिए।

 

समाधान-

 

न्यायालय पति के विरुद्ध यह आदेश पारित कर सकता है कि पति पत्नी को ले जा कर अपने पास रखे। यदि बेटा भी पत्नी के साथ रहता है तो दोनों के भरणपोषण की पर्याप्त व्यवस्था करे। इन में से यदि भरण पोषण की व्यवस्था पति नहीं करता है तो न्यायालय भरण पोषण की राशि वसूल कर के पत्नी को दिलवा सकता है। लेकिन पत्नी को अपने साथ रखने के लिए पति को बाध्य नहीं कर सकता।

 

क्षिप्राबाई को चाहिए कि वह पति के विरुद्ध महिलाओँ का घरेलू हिंसा से संरक्षण अधिनियम की धारा 12 में मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष आवेदन प्रस्तुत करे। जिस में धारा 18, 19, 20, 21 व धारा 22 की राहत प्राप्त करने की प्रार्थना करे। इस आवेदन पर न्यायालय घरेलू हिंसा से संरक्षण का आदेश, भरण पोषण की राशि अदा करने का आदेश, पति के घर में या पड़ौस में पत्नी के लिए निवास उपलब्ध कराने का आदेश, बच्चे के संरक्षण का आदेश तथा हर्जाना राशि पत्नी को अदा करने का आदेश पारित कर सकता है। आदेश का पालन भी इसी अधिनियम के अंतर्गत कराया जा सकता है और पति द्वारा किसी आदेश का उल्लंघन करने पर उसे दण्डित भी कराया जा सकता है।

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