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न्यायालयों की संख्या जरूरत की चौथाई से कम होने से मुकदमों के निर्णय में देरी

justiceसमस्या-
यगदत्त वर्मा ने चित्तौड़गढ़, राजस्थान से पूछा है-

मैं मध्यप्रदेश का निवासी हूँ तथा वर्तमान में मैं राजस्थान में प्राइवेट जॉब कर रहा हूं हमारा कोर्ट केस चल रहा है। मेरे पिताजी ने आज से लगभग 45-47 वर्ष पूर्व नगरपालिका से अपनी नौकरी लगने के पश्चात रहवासी जमीन खरीदी थी दादाजी उस समय जीवित थे पिताजी, दादाजी, दादीजी तथा पिताजी के तीन बहनें व एक भार्इ था जो उस समय नाबालिग थे मेरे पिताजी की आमदनी जमीन के मूल्य से लगभग तीन गुना थी। दादाजी घर के मुखिया थे अत: पिताजी जो भी काम करते थे उनकी सलाह तथा आदेश के अनुसार ही कार्य करते थे अत: वह जमीन मेरे पिताजी ने अपने नाम से खरीदी थी और उसका रूपया कीमत अपने वेतन की बचत से जमा करवाया था तथा सभी प्रकार के टेक्स पिताजी ही भरते हैं और कोर्इ नहीं भरता। दादाजी की मृत्यु के पश्चात पिताजी ने उनके छोटे भार्इ तथा तीनों बहनों की शादी करी, मकान भी अपनी बचत से वेतनभत्तों, जी.पी.एफ. से अग्रिम राशि लेकर तथा रिश्तेदारों से मदद लेकर धीरे-धीरे टुकड़ों में मकान बनवाया तथा छुटपन से छोटे भार्इ (मेरे चाचा) को अपने साथ रखा। चाचा की शादी के कुछ समय पश्चात उसको उसी मकान में अलग रहने की इजाजत दी । मकान में प्रेमवश रहने दिया क्योंकि मेरे के चाचा पास रहने के लिये मकान नहीं था तथा काम धन्धा भी ठीक नहीं था। परन्तु जब मेरे चाचा ने (पिताजी के भार्इ) अपना मकान बना लिया तो पिताजी ने अपने छोटे भार्इ (चाचा) को अपने मकान में जाने के लिये कहा तो पहले तो जाने के लिये तैयार हो गया। परन्तु बाद में मना कर दिया और कहने लगा की ये बेनामी सम्पति है तथा मेरे पिताजी (दादाजी ने) हम दोनों भार्इयों (पिताजी व चाचा) के लिये खरीदी है तथा कहता है दादाजी ने परिवार के सामने मौखिक रूप से जमीन का आधा-आधा हिस्सा कर दिया था। जबकि ऐसा कुछ भी नहीं था। हो सकता है दादीजी से जीवित अवस्था में कोर्इ कोर्ट स्टाम्प पर अंगूठा लगवा लिया हो।, अत: मेरे चाचा आधी जमीन का मालिक खुद को बताता है और कहता है कि मैं नाबालिग था। इसलिये उस समय जमीन बड़े भार्इ के नाते दादाजी ने मेरे पिताजी के नाम खरीदी थी। जबकि दादाजी की कोर्इ आर्थिक सहायता नहीं थी और दादाजी उस समय आर्थिक रूप से सम्पन्न नहीं थे। दादाजी की आर्थिक स्थिति खराब होने के कारण पिताजी को जल्दी नौकरी करनी पड़ी। अभी फिलहाल आधे प्लाट पर मेरे चाचा का ही कब्जा है मेरे चाचा बोलते है की जिस भाग में मैं रहता हूं उसे मैनें ही बनाया है। जबकि उन्होंने कुछ भी पैसा नहीं लगाया है। मेरे पिताजी के पास जमीन के सभी कागज उपलब्ध है तथा मेरे पिताजी के पास निर्माण सम्बन्धी कागजात नहीं है। पिताजी अक्सर शहर से बाहर रहते थे और मकान किसी भी ठेकेदार से और ना ही एक मुश्त बनवाया। जितनी भी बचत होती थी मेरे पिताजी मकान में ही लगाते हैं। कोर्ट ने मकान खाली करने का प्रकरण चल रहा है मेरे चाचा तथा उसका परिवार आधे हिस्से पर कब्जा जमाये हुऐ है। परन्तु मकान का आधा हिस्सा नहीं खाली करते हैं। मेरे पिताजी ने चाचा की समय-समय पर आर्थिक सहायता भी करी परन्तु वह सब मानने को तैयार नहीं है। कोर्ट में वह केस को लम्बा खींचने का प्रयास करता रहता है। अब कोर्ट जिन प्रश्नों पर विचार कर रहा है वह नीचे दिये जा रहे है।  इस सम्बंध में यह भी उल्लेख है कि चाचा ने अभी तक अपने प्रतिवाद के समर्थन में कोर्इ दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किये हैं।
1.क्या विवादित भूखण्ड अपने पिताजी की अनुमति से वादी ने स्वंय प्रीमियम जमा कर अपने पक्ष में रजिस्ट्री करवार्इ थी?
2.क्या भूखण्ड पर एक मात्र वादी ने सम्पूर्ण मकान निर्माण करवाया है यदि हां तो इसलिये उक्त मकान वादी के एक मात्र स्वामित्व का है क्या वादी ने वादग्रस्त मकान में बिना किसी किराये से प्रेम स्नेहवश निवास हेतु प्रदान किया था?
3.क्या वादी के विरूद्ध आदेशात्मक निशेधाज्ञा के माध्यम से विवादित भूखण्ड के हिस्से को रिक्त आधिपत्य प्राप्त करने का अधिकारी है?
4.क्या प्रतिवादी से वादग्रस्त भूखण्ड का आधिपत्य प्राप्त करने तक अन्तरिम लाभ प्राप्त करने का अधिकारी है?

समाधान-

भूखंड व मकान आप के पिता जी के नाम से है। सारे कागजात उन के नाम से हैं। इस कारण यह प्राथमिक रूप से प्रमाणित है कि मकान आप के पिता जी का है। आप के पिता ने स्नेहवश भाई को रहने दिया। इसे हम लायसेंस कह सकते हैं। इस लायसेंस को रद्द कर के आप के पिता मकान का कब्जा प्राप्त कर सकते हैं। आप के चाचा ने अभी तक कोई दस्तावेज प्रस्तुत नहीं किए हैं। इस से स्पष्ट है कि आप के चाचा  का मामला कमजोर है। जितने विवाद्यक न्यायालय ने निर्मित किए हैं वे भी सही हैं। मुझे लगता है कि आप के पिता जी इन्हें साबित कर लेंगे और मुकदमे का निर्णय आप के पिता जी के हक में ही होगा।

प के चाचा का केस कमजोर है इस कारण से वह मुकदमे को लंबा करना चाहता है। भारत में न्यायालयों में मुकदमों को लम्बा करना अत्यन्त आसान है। अधीनस्थ न्यायालयों में एक अदालत जितना काम रोज कर सकती है उस से 8-10 गुना काम रोज कार्यसूची में लगाया जाता है। खुद अदालत कम से कम 60 प्रतिशत मुकदमों में खुद ही आगे की तारीख देना चाहती है। इस कारण आप के चाचा के पक्ष की ओर से किसी भी बहाने से तारीखें आगे खिसकाने का प्रयास होता रहता होगा।

न्यायालयों में मुकदमे लम्बे होने का सब से बड़ा कारण हमारे देश में जरूरत के एक चौथाई से भी कम न्यायालय हैं। देश में न्यायालयों की संख्या बढ़ाने की तुरन्त जरूरत है। यह काम राज्य सरकारों का है। लेकिन दुर्भाग्य यह है कि हमारे राजनेता इस तरफ बिलकुल नहीं सोचते। आज तक केवल आम आदमी पार्टी ने दिल्ली के हाल में हुए आम चुनावों में अदालतों की संख्या बढ़ाने का वादा किया था। बाकी किसी पार्टी ने अदालतों की संख्या बढ़ाने का वायदा करने का साहस नहीं दिखाया। उस का मुख्य कारण है कि जनता स्वयं भी इस मामले में बिलकल सजग नहीं है। देश के चुनाव नजदीक हैं जनता को हर उम्मीदवार से पूछना चाहिए कि वह और उस की पार्टी अदालतों की संख्या बढ़ाने के मामले में क्या सोचती है और उस की घोषणाएँ क्या हैं। इसी तरीके से इस मामले में जागरूकता लाई जा सकती है।

बिना न्यायालय की डिक्री के कब्जा नहीं हटाया जा सकता

समस्या-

बाँसवाड़ा, राजस्थान से सकीना रतलामी ने पूछा है –

मेरे पापा का 1976 से एक प्लाट पर मकान बना हुआ है जिस में बिजली का कनेक्न भी मेरे पापा के नाम से लगा है। मगर अभी मार्च 2012 में मेरे पापा ने जमीन के मालिक से एक एग्रीमेंट कर लिया था जिस के अनुसार हमें उसे आठ लाख रुपया देना था। पर हम समय से वह राशि अदा नहीं कर सके। अब वह एग्रीमेंट के आधार पर पुलिस में रिपोर्ट लिखवा रहे हैं। क्या हमें वह मकान खाली करना पड़ेगा? पापा को क्या करना चाहिए?

समाधान-

eviction of houseदि आप के पापा ने मकान खुद बनाया है और उस पर 1976 से कब्जा है बिजली कनेक्शन भी इतना ही पुराना है तो कब्जे के आधार पर उक्त मकान उन से खाली नहीं कराया जा सकता है। लेकिन यह स्पष्ट नहीं है कि आप के पापा ने भू-स्वामी से किस तरह का एग्रीमेंट किया है और उस में क्या लिखा है? फिर भी बिना कानूनी कार्यवाही के मकान खाली नहीं कराया जा सकता। यह एक दीवानी मामला है और पुलिस इस मामले में हस्तक्षेप नहीं कर सकती।

प के पापा चाहें तो मकान से बेदखली के विरुद्ध न्यायालय से निषेधाज्ञा प्राप्त करने हेतु दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं, जिस में न्यायालय यह आदेश दे सकता है कि आप के पापा से मकान न्यायालय के बेदखली के आदेश या डिक्री के बिना खाली न कराया जाए। इस मामले में आप के पापा को किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह कर के कार्यवाही करनी चाहिए।

अवयस्क की अभिरक्षा के लिए उस स्थानीय क्षेत्र के न्यायालय को क्षेत्राधिकार है, जहाँ अवयस्क निवास करता है।

समस्या-

सीतापुर, उत्तर प्रदेश से आकाश ने पूछा है –

मेरी पत्नी लखनऊ में मेरे बेटी के साथ रहती है। मैं सीतापुर में रहता हूँ। मैं एक बार लखनऊ में अपनी बेटी से मिलने गया तो मेरी पत्नी ने मुझे मारपीट कर झूठे मुकदमे में फँसा दिया। मुझे लखनऊ में जान का खतरा है। मैं ने सीतापुर में संरक्षक एवं प्रतिपाल्य अधिनियम की धारा 25 में बच्चे की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए मुकदमा किया है। पत्नी के वकील ने अदालत में कहा है कि मुकदमा सीतापुर न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है, यह लखनऊ की अदालत के क्षेत्राधिकार में है। क्या मैं इस मुकदमे को सीतापुर में लड़ सकता हूँ? पत्नी मुकदमे को लखनऊ ले जाना चाहती है। कोई ऐसा केस पहले हुआ हो जिस में बच्चे के पिता के यहाँ मुकदमा चला हो तो बताएँ। उचित सलाह दें।

समाधान –

widow daughterकिसी भी बालक की अभिरक्षा प्राप्त करने के लिए आवेदन पर सुनवाई का अधिकार किस न्यायालय को हो यह इस बात से निर्धारित नहीं होता कि आवेदक कहाँ रहता है। न्यायालय का क्षेत्राधिकार इस बात से निर्धारित होता है कि बालक कहाँ रहता है या रह रहा है। जब आप स्वयम् ही कह रहे हैं कि बेटी पत्नी के साथ लखनऊ में निवास करती है। तो इस तरह सीतापुर के न्यायालय को उक्त मामले में क्षेत्राधिकार नहीं है। इस आधार पर आप का मुकदमा सीतापुर के न्यायालय के क्षेत्राधिकार का नहीं है। आप की पत्नी के वकील ने सही आपत्ति उठाई है। इस आपत्ति के आधार पर न्यायालय यह निर्णय देगा कि मामला उस के क्षेत्राधिकार का नहीं है और वह उसे नहीं सुन सकता। इस स्थिति में आप चाहें तो मुकदमा वापस ले कर पुनः लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। या क्षेत्राधिकार के आधार पर निरस्त होने के उपरान्त लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं।

प की मुख्य परेशानी ये है कि लखनऊ में आप को जान का खतरा है। ये जान का खतरा तो सीतापुर में भी हो सकता है। आप उस खतरे के बारे में पुलिस, प्रशासन और न्यायालय से अलग से राहत प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन इस आधार पर उक्त मुकदमे का क्षेत्राधिकार नहीं बदल सकता। आप को उक्त आवेदन सीतापुर न्यायालय से वापस ले कर लखनऊ के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए। बाद में आप उसी न्यायालय से जान के खतरे की बात कर सकते हैं या फिर उच्च न्यायालय के समक्ष उक्त मुकदमे को लखनऊ से अन्यत्र जहाँ आप को खतरा न हो स्थानान्तरित करने हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।

नियोजक ने वेतन नहीं दिया, मुझे क्या करना चाहिए …?

समस्या-

अहोरे, जिला जालौर, राजस्थान से प्रवीण कुमार ने पूछा है-

मैं ने बजाज एलियांज लाइफ इंश्योरेंस कम्पनी में 26 जुलाई 2012 से 28 अगस्त 2012 तक काम किया है। मुझे अभी तक वेतन नहीं दिया गया है। पूछने पर हर बार एक ही उत्तर मिलता है क आप के वेतन के बारे में हमारी प्रक्रिया चल रही है और बहुत जल्द ही आप को वेतन मिल जाएगा। लेकिन अभी तक वेतन नहीं मिला है। कृपया बताएँ मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के क्षेत्र के संयुक्त श्रम आयुक्त का कार्यालय जोधपुर में स्थित है आप उन्हें एक शिकायत पंजीकृत डाक से भेज दें। आप की शिकायत पर कार्यवाही अवश्य होगी।  इस शिकायत की एक प्रति आप राजस्थान सरकार के मुख्य मंत्री को साधारण डाक से अवश्य भेज दें।

दि आप का वेतन रुपए 10,000/- प्रतिमाह या उस से कम है तो आप न्यायालय प्राधिकारी वेतन भुगतान अधिनियम के यहाँ वेतन का समय से भुगतान न करने की शिकायत के साथ वेतन दिलाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। यह एक निर्धारित फार्म पर एक रुपए की कोर्ट फीस टिकट के साथ प्रस्तुत करना होता है, आवेदन की एक प्रति कंपनी को भेजने के लिए और संलग्न करनी होगी। कानून के अनुसार सूचना भेजने का खर्चा खुद सरकार को भुगतना चाहिए।  पर राजस्थान सरकार इतनी गरीब है कि वह इस की व्यवस्था नहीं करती।  इसलिए हो सकता है कि कंपनी को सूचना भेजने के लिए एक रजिस्टर्ड डाक का लिफाफा भी देना पड़े। आप ये लिफाफा अवश्य दे दीजिएगा। अन्यथा न्यायालय का क्लर्क उस पर नोट लगा देगा कि न्यायालय में डाक व्यय का बजट समाप्त हो जाने से नोटिस नहीं भेज जा सका। आखिर जल्दी कार्यवाही की जरूरत तो आप को है सरकार को नहीं।

देरी कर के भुगतान न किए गए वेतन अथवा अवैधानिक रूप से काटे गए वेतन के लिए निम्न प्रपत्र में आवेदन प्रस्तुत किया जा सकता है –

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हिन्दु विवाह विच्छेद न्यायालय के बाहर संभव नहीं

समस्या-

मेरी शादी को तीन माह हुए हैं।  मैं एक मध्यवर्गीय परिवार से हूँ लेकिन मेरी पत्नी एक धनी परिवार से आई है। हम  दोनों में आप सी समझ नहीं बन पा रही है। हम लोग अपना विवाह विच्छेद करना चाहते हैं। लेकिन हम यह भी चाहते हैं कि हमारा तलाक बिना अदालत जाए हो जाए। क्यों कि अदालत में तलाक में कई साल लग जाएंगे।  मेरी पत्नी भी तलाक चाहती है क्यों कि विवाह के पहले वह किसी से प्यार करती है और उसी से विवाह करना चाहती है। उस के अनुसार यह शादी उस की मर्जी के खिलाफ हुई है।  क्या कोई तरीका है कि हमारा तलाक बिना अदालत हो जाए और वह वैध भी हो?

-अनूप केसरवानी, इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश

समाधान-

भारत में निवास करने वाले सभी मुसलमानों, ईसाइयों, पारसियों, यहूदियों,  वे जो कि यह सिद्ध कर सकें कि वे  हिन्दू विधि से शासित नहीं होते तथा अनुसूचित जनजाति के व्यक्तियों को छोड़ कर सभी पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। आप के विवरण के अनुसार आप पर भी हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। इस अधिनियम में ऐसी कोई व्यवस्था नहीं है जिस से न्यायालय के बाहर किसी तरह विवाह विच्छेद किया जा सके। इस तरह आप का और आप की पत्नी के बीच विवाह विच्छेद केवल न्यायालय की डिक्री से ही संभव है।

प के विवाह को केवल तीन माह हुए हैं। शायद ही दुनिया में कोई पति पत्नी ऐसे मिलें जिन के बीच इतने कम समय में आपसी समझदारी विकसित हुई हो। आम तौर पर समझदारी बनने में कुछ वर्ष लग जाते हैं। इस कारण दोनों ही पक्षों को लगातार आपसी समझदारी विकसित करने का प्रयत्न करना चाहिए। स्त्री पुरुष के बीच विवाह कोई गुड्डे गुड़िया का खेल नहीं है जिसे जब चाहो तब कर लिया जाए और जब चाहो तब तोड़ दिया जाए। अभी जितना समय आप लोगों ने एक साथ गुजारा है वह तो एक दूसरे को पहचानने के लिए भी पर्याप्त नहीं है। आप की पत्नी सोचती हैं कि जिस व्यक्ति से वह विवाह करना चाहती थीं वह तलाक के बाद उन से विवाह कर लेगा। हो सकता है अब वह विवाह से इनकार कर दे। फिर उन के पास क्या मार्ग शेष रहेगा? मेरे विचार में आप दोनों को अपने रिश्ते को समझना चाहिए और उसे मजबूत बनाने का प्रयत्न करना चाहिए।

दि आप तलाक लेना चाहेँ तो वर्तमान में एक तरफा तलाक का कोई आधार आप लोगों के पास नहीं है। यदि दोनों सहमत हों भी तो भी विवाह होने के एक वर्ष की अवधि तक तलाक की अर्जी न्यायालय स्वीकार नहीं करेगा। यदि एक वर्ष प्रतीक्षा करने के बाद आप लोग अर्जी लगाएँ तो भी कम से कम आठ माह और लग जाएंगे तलाक होने में। इस तरह आप के पास लगभग डेढ़ वर्ष का समय अभी साथ रहने के लिए है। यदि इस बीच आप दोनों कोशिश करें और ऐसी स्थिति लाएँ कि तलाक की आवश्यकता नहीं रहे। तो आप लोग इस निर्णय को टाल सकते हैं और अपना जीवन सुखमय बना सकते हैं। इस बात की कोई गारंटी नहीं है कि तलाक के बाद आप दोनों अपने जीवन को सुखी बना सकेंगे। हो सकता है बाद भी ऐसी ही परेशानियाँ आप दोनो को देखनी पड़े। इस से तो अच्छा है कि वर्तमान परेशानी को हल किया जाए।

क्या बिना वकील के मुकदमा किया जा सकता है?

क्या बिना वकील के मुकदमा किया जा सकता है?

-अनिरुद्ध सिंह, बांदा, उत्तर प्रदेश

स प्रश्न का उत्तर ‘हाँ’ भी हो सकता है और ‘ना’ भी। वस्तुतः कानून इस बात की इजाजत देता है कि कोई भी व्यक्ति बिना किसी वकील को नियुक्त किए न्यायालय के समक्ष अपना मुकदमा प्रस्तुत कर सकता है और स्वयं ही उस की पैरवी भी कर सकता है। न्यायालय किसी भी व्यक्ति को उसका मुकदमा स्वयं प्रस्तुत करने और उस में पैरवी  करने की अनुमति देता है। लेकिन यह केवल कानून की किताब तक सीमित है।

किसी व्यक्ति को मुकदमा प्रस्तुत करने के लिए उसे उन सब कानूनों का ज्ञान होना आवश्यक है जिन का उपयोग उस मुकदमे को प्रस्तुत करने और उस की पैरवी करने के लिए होने वाला है। उदाहरण के रूप में आपने किसी को रुपया दिया है या किसी से आप को रुपया लेना है और इस के लिए वह आप को एक वचन पत्र (promissory note) लिख कर देता है लेकिन वचन पत्र के अनुसार आप को रुपया नहीं देता है। वैसी स्थिति में आप वचन पत्र के आधार पर रुपया वसूली का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को सब से पहले वाद पत्र लिखना आना चाहिए। आप को पता होना चाहिए कि वाद पत्र की रचना कैसे की जाती है, उस में क्या क्या तथ्य किस तरह और कहाँ लिखे जाने चाहिए, आदि आदि। फिर आप को यह पता होना चाहिए कि उस पर कितनी न्याय शुल्क अदा करनी होगी। कौन से प्रपत्र प्रतिवादी को समन करने के लिए भेजे जाने हैं। उन्हें कैसे भरना है? इस तरह के अनेक प्रश्नों से आप को जूझना होगा। यह वाद दीवानी प्रक्रिया के किन किन उपबंधों के अधीन प्रस्तुत किया जाना है? फिर उस मुकदमे की प्रकिया क्या होगी? हर कदम पर आप के सामने इतने सवाल होंगे कि किसी तरह आप ने वाद पत्र तैयार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर भी दिया तो भी एक दो पेशियों के उपरान्त आप को समझ आ जाएगा कि एक अच्छे वकील की मदद के बिना मुकदमा नहीं लड़ा जा सकता है।

म तौर पर परिवार न्यायालयों में वकील का प्रवेश वर्जित है और सभी मुकदमे स्वयं पक्षकारों द्वारा प्रस्तुत किये जाते है और पक्षकारों द्वारा ही प्रतिवाद किया जा सकता है। लेकिन कोई भी मुकदमा इन न्यायालयों में ऐसा प्रस्तुत नहीं होता है जिस में वकील की सहायता प्राप्त नहीं की जाती हो। बल्कि वकील की अनुपस्थिति के कारण पक्षकारों को बहुत हानियाँ उठानी पड़ती हैं। यहाँ तक कि न्यायालय स्वयं ही यह मानता है कि कोई मुकदमा वकील के बिना चल ही नहीं सकता और परिवार न्यायालयों के मामले में स्वयं परिवार न्यायालय ही यह सलाह देता है कि पक्षकार वकील की सलाह और सहायता प्राप्त करे। मैं ने एक महिला का भरण पोषण का मुकदमा हिन्दू दत्तक एवं भरण पोषण अधिनियम की धारा-18 के अन्तर्गत तैयार करवाया और महिला को परिवार  न्यायालय में प्रस्तुत करने भेजा। घंटे भर बाद महिला वाद पत्र वापस ले कर आई और कहने लगी कि अदालत ने कहा है कि वकील से यह लिखवा कर लाओ कि यह मुकदमा किस कानून की किस धारा में प्रस्तुत किया गया है। मुझे कानून बनाने वालों और अदालत पर बड़ा क्रोध आया कि उन्हों ने वकील के प्रवेश को परिवार न्यायालय में क्यो निषिद्द किया है, और निषिद्ध किया है तो न्यायालय स्वयं पक्षकार की मदद क्यों नहीं करता है?  मैं न्यायालय के न्यायाधीश से मिला और उन्हें कहा कि जब वकील का इस न्यायालय में निषेध किया है तो वे पक्षकारों की स्वयं मदद क्यों नहीं करते?  तो न्यायाधीश का कहना था कि आप भी जानते हैं और हम भी कि वकील के बिना कोई अदालत नहीं चल सकती। लेकिन कानून से मजबूर हैं कि आप की उपस्थिति नहीं लिख सकते। वास्तविकता तो यह है कि वकील के बिना अदालत एक कदम नहीं चल सकती। पक्षकार अदालत की भाषा नहीं समझ सकता और अदालत पक्षकार की।

सलिए यदि कोई यह सोचता है कि वकील के बिना मुकदमा लड़ा जा सकता है तो गलत सोचता है। यदि इस सोच के अंतर्गत वह मुकदमा कर भी दे तो भी उसे किसी न किसी स्तर पर जा कर वकील की मदद लेने के लिए बाध्य होना ही पड़ता है।

वसीक अहमद का मुकदमा कानपुर की अदालत ने वापस क्यों लौटाया?

सीक अहमद चाहते थे कि वे विदेश जाएँ, उन्हें विदेश में कोई नियोजन प्राप्त हो जाए। उन्हों ने मुम्बई के एक ऐजेंट से संपर्क किया। ऐजेंट ने उन से आवश्यक दस्तावेज मंगाए। कुछ दिन बाद उस ने वसीक अहमद को वीजा की फोटो प्रति भेजी और उन से एक लाख रुपए भेजने को कहा। वसीक अहमद ने एक लाख रुपया ऐजेंट को भेज दिया। उस के बाद ऐजेंट ने कोई संपर्क नहीं रखा, यहाँ तक कि उन का पासपोर्ट तक उन्हें नहीं लौटाया। वसीक अहमद ने उन के साथ हुई इस धोखाधड़ी के लिए कानपुर की अदालत में एक अपराधिक परिवाद प्रस्तुत किया। लेकिन अदालत ने उन्हें उन का परिवाद इस टिप्पणी के साथ लौटा दिया कि वे इस परिवाद को मुम्बई की अदालत में पेश करें। वसीक अहमद चाहते हैं कि उन का परिवाद कानपुर में पेश हो। प्रश्न यह है कि उन का परिवाद कानपुर की अदालत ने लौटा क्यों दिया? और मुम्बई की अदालत में पेश करने को क्यों कहा?

अदालतयूँ तो भारत के हर राज्य के हर जिले और कुछ अन्य नगरों में अदालतें हैं और इन अदालतों में मुकदमे पेश किए जाते हैं। लेकिन ऐसा नहीं है कि किसी भी अदालत में कोई भी मुकदमा पेश कर दिया जाए। हर मुकदमे के लिए कानून द्वारा यह निश्चित किया गया है कि उसे किस अदालत में पेश किया जाए। इस तरह यह कानून से निर्धारित होता है कि कोई मुकदमा विशेष किस अदालत में चलाया जाएगा। वसीक अहमद का मुकदमा ठगी और धोखाधड़ी के बारे में था। दोनों ही कृत्य अपराध हैं इस लिए अपराधी को दंडित करने के लिए अपराधिक मुकदमा चलाया जाना था। अपराधिक मुकदमे के लिए यह आवश्यक है कि या तो पुलिस को रिपोर्ट की जाए और पुलिस यदि यह समझती है कि यह ऐसा मुकदमा है जिस में वह कार्यवाही करने को सक्षम है और कार्यवाही करने के लिए पर्याप्त कारण हैं तो वह प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर के अन्वेषण आरंभ कर देती है।  अन्वेषण की समाप्ति पर यदि अपराध होना पाया जाता है और अपराधी का पता लग जाता है तो अपराधी के विरुद्ध आरोप पत्र मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करती है। प्रत्येक पुलिस थाना के लिए एक मजिस्ट्रेट की अदालत निश्चित है जिस में वह गिरफ्तार किए गए अपराधियों को प्रस्तुत करती है और जिस में वह अपराधियों के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत करती है। प्रत्येक मजिस्ट्रेट की अदालत को कुछ थाना क्षेत्रों के लिए स्थानीय क्षेत्राधिकार प्राप्त है। यदि पुलिस किसी मामले में रिपोर्ट दर्ज कर अन्वेषण नहीं करती है तो परिवादी सीधे स्थानीय अधिकारिता वाले न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। वसीक अहमद का मुकदमा किस थाना क्षेत्र से संबंधित था और मजिस्ट्रेट की किस अदालत को उस पर स्थानीय अधिकारिता प्राप्त थी यह जानने के लिए हमें दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय-13 पढ़ना होगा जो जाँचों और विचारणों में दंड न्यायालयों की अधिकारिता के बारे में हैं। इसी अध्याय के उपबंधों से यह तय होता है कि किसी अपराधिक मामले में कौन सा न्यायालय जाँच और विचारण करने में सक्षम है।

दंड प्रक्रिया संहिता के अध्याय-13 का आरंभ धारा 177 से होता है। इस धारा में यह उपबंध किया गया है कि प्रत्येक अपराध की जाँच और विचारण मामूली तौर पर ऐसे न्यायालय द्वारा किया जाएगा जिस की स्थानीय अधिकारिता के अन्दर वह अपराध किया गया है। इस के उपरान्त धारा-178 में यह उपबंधित है हे कि जहाँ यह अनिश्चित हो कि कई स्थानीय क्षेत्रों में से किस में अपराध किया था, जहाँ अपराध चालू रहने वाला है और एक से अधिक स्थानीय क्षेत्रों में किया जाना चालू रहता है, जहाँ वह अपराध अंशतः एक स्थानीय क्षेत्र में और अंशतः दूसरे स्थानीय क्षेत्र में किया गया हो तथा जहाँ वह अनेक स्थानीय क्षेत्रो में किये गए कार्यों से बनता है वहाँ उस की जाँच या विचारण  ऐसे स्थानीय क्षेत्रों पर अधिकारिता रखने वाले किसी भी न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। धारा 179 में यह उपबंधित है कि जब कोई कार्य किसी की गई बात और किसी निकले हुए परिणाम के कारण अपराध है तो उस की जाँच या विचारण दोनों में से किसी क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायालय द्वारा किया जा सकता है। इस के उपरान्त इस अध्याय में धारा-189 तक न्यायालय के क्षेत्राधिकार के संबंध में उपबंध करती है। लेकिन यहाँ वसीक अहमद के मामले के लिए उन्हें पढ़ने की कोई आवश्यकता नहीं है।

ब हम वापस वसीक अहमद के मामले की और लौट चलें। वसीक अहमद ने जिस ऐजेंट से संपर्क किया वह मुम्बई में रहता है। वह कभी कानपुर या उत्तर प्रदेश नहीं आया। जब भी वसीक अहमद ने संपर्क किया उस से मुम्बई में ही फोन या डाक या इंटरनेट के माध्यम से संपर्क किया। उस ऐजेंट ने कोई भी कार्य कानपुर में नहीं किया। यहाँ तक कि वसीक अहमद द्वारा भेजा गया एक लाख रुपया भी उस ने मुम्बई में ही प्रा्प्त किया। इस तरह कानपुर के किसी भी मजिस्ट्रेट के न्यायालय की स्थानीय अधिकारिता के क्षेत्र में ऐजेंट ने ऐसा कोई काम नहीं किया जो उस के द्वारा किए गए अपराध से जुड़ा होता। इसी कारण से कानपुर के किसी न्यायालय को उस के मामले पर क्षेत्राधिकार नहीं था।

दंड प्रक्रिया संहिता की धारा 201 में यह उपबंधित है कि जब कोई परिवाद ऐसे मजिस्ट्रेट के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है जो कि उस अपराध का संज्ञान करने केलिए सक्षम नहीं है तो वब परिवाद लिखित होने की स्थिति में परिवादी को परिवाद इस तरह का पृष्ठांकन कर लौटा देगा। परिवाद मौखिक होने की स्थिति में परिवादी को उचित न्यायालय में जाने का निर्देश देगा।

सी स्थिति के अनुरूप वसीक अहमद को कानपुर के न्यायालय ने उन का परिवाद उस पर पृष्ठांकन कर कि वे अपना परिवाद मुम्बई के न्यायालय में प्रस्तुत करें वापस लौटा दिया गया।

उत्तराधिकार प्रमाण पत्र कितने दिन में बनेगा?

 एक पाठक आशीष ने पूछा है 

त्तराधिकार प्रमाण पत्र बनाने में कितना समय लगता है?

 उत्तर –
आशीष जी,

प ने बहुत मासूम सवाल पूछा है। उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बनाने का कार्य जिला न्यायाधीश का है। जिला न्यायाधीश को इस के लिए पूरी प्रक्रिया का अनुपालन करना होता है। प्रक्रिया इस प्रकार है कि आप को आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। उस की जाँच के लिए तिथि निश्चित हो जाएगी। अदालत का पेशकार उस में अपनी रिपोर्ट देगा। यदि सब कुछ सही पाया गया तो अदालत आवेदन को दर्ज कर के नोटिस जारी करने का आदेश देगी। अन्यथा आवेदन की कमियों की पूर्ति के लिए तिथि निश्चित कर देगी कमी पूर्ति के बाद ही आवेदन दर्ज हो कर नोटिस जारी होगा। आप ने अपने आवेदन में जिन व्यक्तियों को पक्षकार बनाया होगा उन्हें नोटिस प्राप्त हो जाने पर अदालत एक सामान्य नोटिस समाचार पत्र में प्रकाशित कराने को कहेगी। सामान्य नोटिस अखबार में प्रकाशित हो जाने पर यदि किसी पक्ष द्वारा कोई आपत्ति नहीं की जाती है तो अदालत इस तथ्य की साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर आप को देगी कि आप संबंधित संपत्ति के उत्तराधिकारी हैं। यदि किसी पक्ष द्वारा आपत्ति प्रस्तुत की गई है तो उस पक्ष को भी साक्ष्य प्रस्तुत करने का अवसर दिया जाएगा। इस के बाद सभी पक्षों के तर्क सुन कर न्यायालय यह निर्णय करेगा कि आप को उत्तराधिकार प्रमाण पत्र जारी किया जाए अथवा नहीं।

निर्णय हो जाने पर आप को निश्चित न्याय शुल्क के न्याय शुल्क के स्टाम्प प्रमाण पत्र के लिए प्रस्तुत करने होंगे। उन स्टाम्पों पर ही उत्तराधिकार प्रमाण पत्र टंकित होगा और जिला न्यायाधीश के हस्ताक्षरों से जारी हो कर आप को प्राप्त होगा। यदि सब कुछ सामान्य रहा तो इस मामले में कम से कम दस पेशियाँ तो हो ही जाएँगी। यदि आपत्तियाँ प्रस्तुत हुई तो इस की दुगनी और तिगुनी पेशियाँ भी हो सकती हैं। दो पेशियों के बीच कितना समय लगेगा यह इस बात पर निर्भर करेगा कि अदालत में सभी प्रकार के कितने मुकदमे लंबित हैं। यदि अदालत के पास अधिक काम होगा तो दो पेशी में तीन चार माह का अन्तराल हो सकता है और काम कम हुआ तो भी कम से कम एक माह का समय तो होगा ही। इस तरह उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त होने में एक वर्ष के लगभग समय कम से कम लगेगा। मुझे एक उत्तराधिकार प्रमाण पत्र आज ही बन कर मिला है जिस में पक्षकारों के बीच गंभीर मतभेद थे। यह आवेदन 1999 में प्रस्तुत किया गया था और इस में निर्णय 4 अगस्त 2011 को हो सका है इस तरह इस मामले में तेरह वर्ष बाद उत्तराधिकार प्रमाण पत्र बन सका है। उस में भी यह आशंका है कि विपक्षी उच्च न्यायालय के समक्ष अपील प्रस्तुत करने का मन बना रहा है।

भारत में न्यायालयों की संख्या आवश्यकता की 20 प्रतिशत से भी कम है। इस कारण सभी प्रकार के मुकदमों में समय अधिक लगता है। लेकिन उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करने का कोई अन्य उपाय नहीं है। इस कारण से आप को तुरंत आवेदन प्रस्तुत कर देना चाहिए। जिन राशियों के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त करना है वे उस के बिना तो आप को मिलने से रही। इस लिये कितना भी समय लगे और कोई चारा भी तो नहीं है।

क्या वकीलों की पोशाकें न्याय प्रणाली और समाज के बीच अवरोध हैं?

न्यायाधीशों और वकीलों ने काले कोट वाली पोशाक  इंग्लेंड में पहली बार 1685 ईस्वी में किंग जॉर्ज द्वितीय की मृत्यु पर शोक संकेत के लिए अपनाई थी। तब यह विश्वास किया जाता था कि काला गाउन और विग जजों और न्यायाधीशों को गुमनामी की पहचान देती है। कुछ भी  हो काला कोट वकीलों और न्यायाधीशों की पोशाक में ऐसा सम्मिलित हुआ कि  ब्रिटिश साम्राज्य के साथ यह सारी दुनिया में पहुँच गया। न्याय करने का दायित्व और अधिकार सामंती समाज में राजा का होता था। लेकिन राज्य के विस्तार के साथ यह संभव नहीं रह गया था कि राजा ही सब स्तरों पर न्याय करेगा। इस के लिए राजा को बहुत से न्यायाधिकारी नियुक्त करने होते थे। हालांकि अंतिम अपील राजा को  ही की जा सकती थी। इस तरह एक न्यायाधिकारी राजा के प्रतिनिधि के रूप में ही न्याय करता था। जिस तरह राजा अपने दरबार में विशिष्ठ पोशाक में होता था और दरबार में उपस्थित होने वाले दरबारी भी केवल विशिष्ठ पोशाक में ही दरबार में उपस्थित हो सकते थे। इस तरह राजा और दरबारियों की पोशाक राज्य की शक्ति का प्रतीक थी। राजा के प्रतिनिधि के रूप में न्यायाधीश की पोशाक भी इसी तरह से शक्ति का प्रतीक थी। वकालत के पेशे का आरंभ वकील न्यायार्थियों के पैरोकार नहीं हुआ करते थे, बल्कि वे न्यायाधीश को न्याय करने में सक्षम बनाने के लिए उस के सलाहकार हुआ करते थे। कालांतर में कुछ लोगों को न्यायार्थियों का पक्ष न्यायाधीश के समक्ष रखने की अनुमति  मिलने लगी। केवल वे ही व्यक्ति जो न्यायाधीश या राज्य की ओर से अधिकृत थे किसी पक्षकार की पैरवी कर सकते थे। आरंभ में न्यायाधीशों के सलाहकारों को ही इस तरह का अधिकार प्राप्त हुआ। इस तरह काला कोट वकीलों की भी पोशाक बन गई। 
लेकिन वे सामंती राज्यों के अथवा साम्राज्य के न्यायालय थे।  वहाँ न्यायाधीशों और वकीलों की पोशाकें शक्ति का प्रतीक थीं। ये पोशाकें  आम जनता को राज्य की शक्ति का लगातार अहसास कराती थीं। लेकिन अब  तो यह जनतंत्र का युग है। उन की पोशाकों को शक्ति का प्रतीक होना आवश्यक नहीं है उसे तो जनता के बीच न्याय का प्रतीक होना चाहिए। लेकिन फिर भी सामंती और साम्राज्यवादी शक्ति का प्रतीक ये पोशाकें न्यायालयों की शोभा बढ़ा रही हैं। निश्चित रूप से आज इस पोशाक को कोई भी इस रूप में न तो व्याख्यायित करना चाहता है और न ही करना चाहेगा। लेकिन उस के लिए कुछ नए तर्क सामने आने लगे हैं। अब यह कहा जाता है कि ये पोशाकें आप शक्ति का प्रतीक नहीं बल्कि वकीलों के बीच अनुशासन पैदा करती हैं और उन्हें न्याय के लिए लड़ने को प्रेरित करती हैं। यह भी कहा जाता है कि यह पोशाक उन्हें अन्य प्रोफेशन वाले लोगों से अलग पहचान देती है। यह भी कहा जाता है कि काला रंग न्याय का प्रतीक है जब कि सफेद रंग के बैंड्स शुद्धता और निर्लिप्तता का अहसास कराते हैं। 
न सब तर्कों के होते हुए भी भारत के वकील काले कोट में असुविधा महसूस करते हैं। वस्तुतः भारत के गर्म वातावरण में काला कोट पहन कर वकील स्वयं अपने शरीर के साथ क्रूरता का व्यवहार करते हुए उस का शोषण करते हैं। बहुत से वकीलों से पूछने पर पता लगा कि वे यह महसूस करते हैं कि काला कोट उन के लिए पहचान बन गया है। भीड़ भरे न्यायालय परिसरों में उन की पहचान केवल काले कोट से ही हो प

न्यायाधीश और वकील काला कोट क्यों पहनते हैं?

भारत में कहीं भी आप किसी अदालत में जाएंगे। आप को काले कोटों की बहुतायत दिखाई देगी। चाहे भीषण गर्मी क्यों न पड़ रही हो। चेहरे से पसीने की बूंदें झर-झर झर रही हों। कोट के नीचे कमीज बनियान तर हो चुके हों लेकिन वकील कोट में ही दिखाई देंगे। यही नहीं, अंदर कमीज का भी गले का बटन बंद होगा और ऊपर से बैंड्स या टाई और बंदी दिखाई देगी। कहीं ऐसा न हो कि गले के रास्ते कहीं से हवा घुस जाए। आप यदि सर्वोच्च न्यायालय या किसी हाईकोर्ट में पहुँच जाएंगे तो वहाँ कोट के ऊपर एक गाउन और डाला हुआ मिलेगा।  वकील नहीं सारे न्यायाधीश भी यही वर्दी पहने नजर आएंगे। आप के मन में यह प्रश्न भी उठेगा कि क्या वकीलों और न्यायाधीशों को गर्मी नहीं लगती?  मुझ से तो कई लोग पूछ भी लेते हैं कि क्या आप को गर्मी नहीं लगती? मैं सहज रूप से उन्हें कह भी देता हूँ कि नहीं लगती। सिर्फ सुबह जब पहनते हैं तब लगती है, फिर कुछ देर में अंदर की बनियान, कमीज सब पसीने से भीग जाते हैं, तब जरा भी हवा अंदर प्रवेश करती है तो सब ठण्डे भी हो जाते हैं। 

लेकिन मेरा यह उत्तर सहज मिथ्या से अधिक कुछ नहीं। मुझे गर्मी लगती है, कई बार तो लगातार पसीने के कारण त्वचा पर खुजली होने लगती है। जब एक से दूसरी अदालत जाने के लिए धूप में हो कर गुजरना होता है तो काला रंग उष्मा का अच्छा ग्राहक होने के कारण कोट से तेजी से गर्मी अंदर प्रवेश करती है और पसीना गर्म हो उठता है। तब ऐसा लगता है जैसे खोलते हुए पानी में घुस गए हों। तब तुरंत ही पंखे के नीचे शरण लेनी होती है। पाँच मिनट हवा लगने के बाद ही कुछ राहत मिलती है।  एक दो बरसात हो जाएँ तो हालत और बुरी होती है। तब बाहर भी ऊमस होती है और पसीना सूखना बंद हो जाता है। लगता है जैसे दिन भर खौलते पानी में बैठे रहे। उसी में दिन भर काम भी करना होता है। बरसात होते ही बिजली आने-जाने लगती है और पंखे का सहारा भी छिन जाता है। कभी कभी तो यह सोचने लगता हूँ कि मैं ने क्या सोच कर वकालत के प्रोफेशन का चुनाव  किया था।

र्वोच्च न्यायालय और उच्च न्यायालय में यह परेशानी कम है। वहाँ सभी न्यायालय वातानुकूलित हैं। न्यायाधीशों को वहाँ कोट पहनने में कोई परेशानी नहीं होती। जितनी देर वकील अंदर न्यायालय कक्ष में रहते हैं उन्हें भी परेशानी नहीं होती। परेशानी होती है तो जिला न्यायालय और उस से नीचे के न्यायालयों के वकीलों को। अब आप को समझ आ रहा होगा कि भारत में दीवानी न्यायालय गर्मी के मौसम में क्यों  बंद कर दिए जाते हैं और क्यों राजस्थान जैसे सब से गर्म प्रदेश में ढाई माह के लिए न्यायालयों का समय सुबह सात से साढ़े बारह का क्यों कर दिया जाता है? लेकिन वकीलों को इस से भी राहत नहीं मिलती उन के काम केवल दीवानी अदालतों में ही नहीं होते उन्हें फौजदारी, राजस्व और दूसरी अदालतों में भी जाना होता है। इन में से राजस्थान में राजस्व न्यायालय और अनेक न्यायाधिकरण 10 से 5 बजे तक काम करते हैं। परिणामतः वकीलों को लगभग दिन भर अदालतों में रहना होता है।

प सोच रहे

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