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मानहानि का मुकदमा कहाँ होगा और उसमें कितनी सजा दिलाई जा सकती है।

समस्या-

रमाकांत तिवारी ने ग्राम व पोस्ट- सुरहुरपुर, मुहम्मदाबाद गोहना, जिला- मऊ उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे मित्र रोशन के दादाजी चार भाई थे। उसके दूसरे नंबर वाले दादाजी का लड़का (रोशन का चाचा), रोशन को बार- बार, जब भी झगडा होता है या किसी अन्य अवसर पर कई बार पंचायत में बोल चुका है कि तुम अपने बाप के लड़के नहीं हो, तुम मेरे लड़के हो। वह अपनी और रोशन की माताजी का फोटो दिखाता है कि देखो ये फोटो है जो कि तुम्हारी मां ने मेरे साथ खिचवाईं थी। वो फोटो बिल्कुल सामान्य है। उसे देख के ऐसा कुछ भी नहीं लगता है। वो केवल रोशन को गांव वालो के सामने अपमानित करता है।
इस बारे में कुछ कानूनी मशविरा दें जिसकी मदद से वो शर्मिंदा होने से बच सके। क्या उस पे मानहानि का मुकदमा किया जा सकतेा है? रोशन के पास सबूत के तौर पर एक वीडियो है, जिसमें रोशन का चाचा बोल रहा है कि तुम मेरे बेटे हो, अपने बाप के नहीं। अगर मानहानि का मुकदमा होता है तो उसे कितने साल तक की सजा दिलाई जा सकती है और यह मुकदमा कहाँ दायर किया जा सकता है?

समाधान-

प के मित्र रोशन का चाचा इस तरह की हरकत करते हुए न केवल रोशन को अपमानित करता है अपितु वह रोशन की माताजी को भी अपमानित करता है। जो वीडियो रोशन के पास है उसे किस प्रकार किस ने रिकार्ड किया था और उस की प्रतिलिपियाँ कितनी, कैसे और किसने बनाई इस बात को वीडियो रिकार्ड करने वाले व्यक्ति और उस की प्रतिलिपियाँ बनाने वाले व्यक्ति की मौखिक साक्ष्य से प्रमाणित करना पड़ेगा। इस के अतिरिक्त खुद रोशन का व उन व्यक्तियों के बयान कराने पड़ेंगे जिन के सामने ऐसा कहा गया है। जितनी बार के बारे में रोशन ऐसा कहना साबित करना चाहता है उतनी बार के संबंध में उपस्थित व्यक्तियों की गवाही से साबित करना पड़ेगा कि ऐसा कहा गया है और इस से रोशन की बदनामी हुई है और समाज में उस की प्रतिष्ठा कम हुई है।

मानहानि के लिए दो तरह के मुकदमे किए जा सकते हैं। एक मुकदमा तो दीवानी अदालत में मानहानि के लिए हर्जाने का किया जा सकता है जिस में हर्जाने की राशि मांगी जा सकती है। दूसरी तरह का मुकदमा अपराधिक न्यायालय में परिवाद के माध्यम से धारा 500 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत संस्थित किया जा सकता है। अपराधिक मुकदमे में अधिकतम दो वर्ष तक के कारावास और जुर्माने का दंड दिया जा सकता है।

दूसरी तरह के धारा 500 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत अपराधिक मुकदमे के लिए रोशन को वकील की मदद लेनी होगी। इस के लिए उसे पहले किसी अच्छे वकील से मिलना चाहिए और रोशन को एक नोटिस दिलाना चाहिए कि वह सार्वजनिक रूप से अपने किए की माफी मांगे और रोशन को हर्जाना अदा करे। नोटिस की अवधि निकल जाने पर परिवाद संस्थित किया जा सकता है। यह परिवाद जिस पुलिस थाना क्षेत्र में रोशन निवास करता है उस थाना क्षेत्र पर अधिकारिता रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में संस्थित करना होगा। परिवाद प्रस्तुत होने पर मजिस्ट्रेट रोशन और एक दो गवाहों के बयान ले कर उसे लगता है कि मामला चलने योग्य है तो उस पर संज्ञान ले कर रोशन के चाचा के नाम न्यायालय के समक्ष उपस्थित होने के लिए समन जारी करेगा। इस के बाद मुकदमा वैसे ही चलेगा जैसे सभी फौजदारी मुकदमे चलते हैं। रोशन इस मुकदमे के साथ साथ चाहे तो हर्जाने के लिए दीवानी वाद भी संस्थित कर सकता है।

खरीददार को सावधान रहना चाहिए।

Defamationसमस्या-

संजय ने पाली, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने 1985 में पाली शहर में कृष्णा नगर कॉलोनी में एक कृषि भूमि का भूखण्ड 30 बाई 40 यानि 1200 वर्ग फुट का खरीदा। 2010 तक मैं और परिवार सदस्य उक्त भूखण्ड पर कभी कभार आते जाते रहते थे। जुलाई 2010 में उक्त भूखण्ड के क्षेत्र के पार्षद ने हमारे प्लाट पर अतिक्रमण करने का प्रयास किया हमे जानकारी मिलते ही मोके पर पहुंच कर इसका विरोध किया। तब पार्षद ने बताया की आपके प्लाट की रजिस्ट्री में खसरा न 376 है और में खसरे न 377 में निर्माण करवा रहा हु। राजस्व एजेंसी में मेरे पिताजी के खरीदशुदा भूखण्ड का खसरा 377 में होना पाया। मेरे पिताजी ने एक प्रोपर्टी दलाल से खरीदा था। वह प्रॉपर्टी दलाल हमारे भूखण्ड के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री में उसकी गवाह है। उक्त भूखण्ड के बेचानकर्ताओ को हम नही जानते। हमने दलाल के खिलाफ धोखा धडी की शिकायत दर्ज़ करवाई। पुलिस ने धारा 420 और 120 बी में जाँच शुरू की तो दलाल हाईकोर्ट जोधपुर जाकर ऍफ़ आई आर को निरस्त करवा लाय और दलाल ने मेरे व मेरे पिताजी के विरुद्ध न्यायालय में 2 लाख का मानहानि का वाद करवा लिया। इस तरह हमारा प्लाट भी गया और न्यायालय के चक्कर काट रहे हैं। ऐसी स्थिति हमें क्या करना चाहिये?

समाधान

स में गफलत में रहने की गलती तो आप की ही है। एग्रीकल्चर लैंड के प्लाट्स में इस तरह की धोखाधड़ी होना आम बात हो गयी है। दलाल की भूमिका सिर्फ दो लोगों में सौदा कराने मात्र की होती है। यहाँ तक कि दलाली का कोई दस्तावेजी सबूत तक वे नहीं छोड़ते। यदि उस की गवाही रजिस्ट्री पर है तो वह तो केवल इस बात की है कि क्रेता ने विक्रेता को माल बेचा है और वह इस बात को तस्दीक करता है। इस से उस का कोई अपराधिक दायित्व नहीं बनता है। रजिस्ट्री के आधार पर बेचानकर्ता का ही दोष है। वैसे भी कानून का सिद्धान्त है कि खरीददार को सावधान रहना चाहिए। यदि माल में कोई खोट निकलता है तो नुकसान उसी का होता है। भुगतना उसे ही होता है। न्यायालय न्याय प्राप्ति में आप की मदद तो करता है पर वह क्षतियों की पूर्ति पूरी तरह नहीं कर पाता।  आप सावधान न रहे वर्ना यह हादसा न होता। प्लाट के नुकसान के बाद भी आप को चाहिए था कि मुकदमा केवल विक्रेता व उस के मुख्तार के विरुद्ध करना चाहिए था। इन के नाम दस्तावेजों में होते हैं। वैसी स्थिति में दलाल केवल गवाह की स्थिति में होता और हो सकता है आप का ही पक्ष लेता।

ब आप को चाहिए कि आप विक्रेता और उस के मुख्तार के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज कराएँ, पुलिस अब इस में हाथ न डालेगी। इस कारण आप को किसी मजबूत व सिद्ध वकील के माध्यम से न्यायालय में अपराधिक परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस के अतिरिक्त विक्रेता के विरुद्ध प्लाट की कीमत और इस सौदे से हुए नुकसान की वसूली का दीवानी वाद भी करना चाहिए। वह सब कैसे होंगे यह सब दस्तावेजों के अध्ययन से निर्धारित होगा।

मानहानि का मुकदमा आप को ध्यान से लड़ना होगा। तब उस मुकदमे में आप के विरुद्ध कुछ नहीं हो सकेगा। आप के साथ धोखाधडी हुई है और आप ने एक रिपोर्ट पुलिस में कराई है वह मिथ्या नहीं है। यह पुलिस की ड्यूटी थी कि वह वास्तविक अपराधी को तलाश कर के उस के विरुद्ध कार्यवाही करती। और केवल प्रथम सूचना रिपोर्ट करने से कुछ नहीं होता है। इस मुकदमे से डरने की आवश्यकता नहीं है पर पैरवी अच्छे वकील से कराएंगे तो बच सकेंगे।

कोई झूठे मुकदमे में फँसा दें तो क्या करें?

rp_courtroom11.jpgसमस्या-

जितेन्द्र ने नई दिल्ली से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं देहली में रहता हूँ और पढ़ाई करता हूँ। मेरा गांव मध्य प्रदेश के सीहोर जिले में है। मार्च 31 को गांव में मेरे छोटे भाई का झगड़ा हुआ। उसने FIR करवाया तो सामने वाली पार्टी ने भी क्रॉस FIR में मेरा नाम भी लिखवा दिया। मैंने पुलिस थाने में सूचना भी दी कि मैं मौजूद ही नहीं हूँ, फिर मेरा नाम कैसे दर्ज किया जा सकता है। परन्तु नाम को लिखकर उन्होंने पिताजी से झूठी जमानत भी करवा ली और मेरा नाम कोर्ट में दे दिया। वहाँ कुछ व्यक्ति ने झूठी गवाही भी दे दी कि मैं था। अब कोर्ट से भी मैं ने जमानत ली! आगे मुझे कैसे क्या स्टेप लेना चाहिए क्योंकि इस घटना की जानकारी मैंने SP कार्यालय मे भी दी थी, मेल भी किया था। इसी बीच मेरा एग्जाम था जिसका मेरा लास्ट अटेम्प्ट था। अब इस घटना के कारण मेरा उस में सिलेक्शन नहीं हो पाया! मैं यह चाहता हूँ क्या इसको आधार बनाकर मैं पुलिस और उन गवाहों के ऊपर मानहानि का केस लगाऊँ। क्या मैं ऐसा सकता हूँ, यदि कर सकता हूँ तो कैसे? और नहीं तो फिर ऐसे तो कोई भी कभी भी किसी को कही भी झूटी रिपोर्ट में फसाँ सकता है क्या?

समाधान

ब से पहले तो आप के विरुद्ध जो फौजदारी मुकदमा चल रहा है उस में किसी अच्छे वकील से पैरवी करानी चाहिए। जिस से आप उस प्रकरण में निर्दोष साबित हों। यह बहुत आवश्यक है। आप की इस शिकायत में कुछ दम नहीं नजर आता है कि इस एफआईआर के कारण आप का सलेक्शन नौकरी के लिए नहीं हो पाया आप ने बताया भी नहीं कि आप के विरुद्ध मुकदमा किन धाराओँ में है।

दि आप को उस मुकदमे में निर्दोष पाया जाता है तो उस के निर्णय की प्रमाणित प्रति प्राप्त कीजिए। जब वह प्रमाणित प्रति मिल जाए तब आप रिपोर्ट कराने वाले के विरुद्ध मानहानि का अपराधिक मुकदमा कर सकते हैं। इस के अलावा आप दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए क्षतिपूर्ति का दीवानी वाद भी कर सकते हैं जिस में आप आप को हुई क्षतियों के अतिरिक्त मानहानि के लिए भी हर्जाना मांग सकते हैं। इस सम्बन्ध में पूर्व में भी तीसरा खंबा पर बहुत लिखा गया है। आप ऊपर दायीं और दिए गए गहरे नीले रंग के सर्च बाक्स की मदद से मानहानि और दुर्भावना पूर्ण अभियोजन से संबंधित लेख पढ़ सकते हैं।

दुर्भावनापूर्ण अभियोजन व मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी वाद व अपराधिक अभियोजन दोनों किए जा सकते हैं।

rp_law-suit.jpgसमस्या-

सुनील कुमार ने भोपाल, मध्यप्रदेश समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई और उसकी पत्नी के बीच सम्बन्ध अच्छे नहीं होने की वजह से मेरे भाई ने उसे तलाक का नोटिस दिया और 2002 में न्यायालय में वाद दायर कर दिया। |उस के बाद मेरे भाई की पत्नी ने हमारे पूरे परिवार के खिलाफ दहेज़ प्रताड़ना और मारपीट का झूठा मुकदमा न्यायालय में दायर कर दिया, इसी दौरान उस ने अपने पीहर पक्ष के लोगो के साथ मिलकर हमें कई बार पुलिस की प्रताड़ना भी दी ताकि मेरा भाई तलाक की अर्जी वापस ले ले। लेकिन मेरे भाई ने ऐसा नहीं किया; और अब 2015 में दहेज़ के झूठे मामले में स्थानीय न्यायालय का फैसला आ गया जिस में पूरे परिवार को बरी कर दिया गया और माननीय न्यायालय ने उसे झूठा मुकदमा करार दिया। अब मैं आपसे सलाह लेना चाहता हूँ कि क्या मैं अपने भाई की पत्नी और उसके पीहर पक्ष वालों के खिलाफ मानहानि का दावा कर सकता हूँ। क्योंकि पूरे सात वर्ष तक हम पूरे परिवार वाले लगातार परेशान रहे, दावे की क्या प्रक्रिया होगी, क्योंकि मेरे भाई की पत्नी ने सारा झूठा मुकदमा और पुलिस प्रताड़ना अपने पीहर वालो की मदद और मिलीभगत से किया था?

समाधान-

ब यह प्रमाणित हो गया है कि मुकदमा झूठा था तो आप अब दो काम कर सकते हैं। एक तो आप और वे सभी लोग जिन्हें इस मुकदमे में अभियुक्त बनाया गया था, दुर्भावना पूर्ण अभियोजन तथा मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति का दावा कर सकते हैं। इस के लिए आप को न्यायालय में साबित करना होगा कि 1. आप को मिथ्या रूप से अभियोजित किया गया था, 2. उक्त अभियोजन का समापन होने पर आप को दोष मुक्त कर दिया गया है, 3. अभियोजन बिना किसी उचित और उपयुक्त कारण के किया गया था, 4. अभियोजन करने में दुर्भावना सम्मिलित थी और 5. आप को उक्त अभियोजन से आर्थिक तथा सम्मान की हानि हुई है। आप को उक्त मुकदमे की प्रथम सूचना रिपोर्ट, आरोप पत्र तथा निर्णय की प्रमाणित प्रतियों की आवश्यकता होगी इन की दो दो प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर लें। जितनी राशि की क्षतिपूर्ति के लिए आप दावा प्रस्तुत करेंगे उस पर आप को न्यायालय शुल्क नियम के अनुसार देनी होगी। प्रक्रिया दीवानी होगी और वैसे ही चलेगी जैसे क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद की होती है।

स के अतिरिक्त आप उक्त दस्तावेजों के साथ साथ मिथ्या अभियोजन व मानहानि के लिए भारतीय दंड संहिता की धारा 211 व 500 में परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। इस पर प्रसंज्ञान लेने और अपराधिक मुकदमे की तरह प्रक्रिया पूर्ण हो कर न्यायालय निर्णय प्रदान करेगा। इस में मिथ्या अभियोजन करने वाले दो वर्ष तक के कारावास और अर्थदंड की सजा हो सकती है। आप को इन दोनों ही कार्यवाहियाँ करने के लिए किसी स्थानीय वकील की सेवाएँ प्राप्त करना होगा।

मिथ्या शिकायत का नतीजा आने के बाद कार्यवाही करें …

Service of summonsसमस्या-

सुशील कुमार शर्मा ने अवन्तिका, रोहिणी, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी पुत्री रात को साढ़े आठ बजे के करीब बाजार से सामान खरीद कर अपने फ्लैट पर जा रही थी। रास्ते में मेरी पुत्री की सास और देवर (जो कि अलग रहते हैं) ने उसे घेर लिया और मारपीट की तथा बदतमीजी की। 100 नंबर पर फोन किया, पुलिस आई और थाने में जाकर एफआईआर दर्ज हो गई। उसमें धारा 354 के साथ-साथ और भी धाराएं लगीं। चूंकि मेरी पुत्री के ससुराल वाले पैसे वाले हैं सो उन्होंने पुलिस और अन्य लोगों को प्रभावित कर अपनी गिरफ्तारी तीन महीने तक रुकवाए रखी। जब मैंने और मेरी पुत्री ने काफी लिखा-पढ़ी की तब जाकर गिरफ्तारी के लिए पुलिस पुत्री की ससुराल में गई। चूंकि पुलिस पहले से ही प्रभावित थी सो ससुराल वाले पहले ही फरार हो गए और आई (जांच अधिकारी) से मिलकर अदालत से जमानत करवा ली। जमानत तक तो बात ठीक थी। ससुराल वालों ने जमानत करवाने के साथ-साथ जज साहब के सामने एक अर्जी दी जिसमें ससुराल वालों ने दरख्वास्त की है कि पुलिस उनकी (ससुराल वालों की) भी एफआईआर दर्ज करे। अर्जी में उन्होंने बहुत सारे झूठे आरोप लगाए हैं तथा उसमें मेरी पुत्री के साथ-साथ मेरा नाम भी घसीटा गया है। अर्जी में पांच झूठे गवाह भी खड़े कर दिए गए हैं। उसमें आरोप लगाया गया है कि मैं भी उस वक्त घटनास्थल पर था जबकि मेरे पास पुख्ता एवं अकाट्य सबूत हैं कि मैं वहां नहीं था। अब प्रश्न यह है कि क्या मैं उस अर्जी के विरुद्ध मानहानि एवं झूठा मुकदमा करने का मुकदमा डाल सकता हूं या नहीं।

समाधान-

प की पुत्री के ससुराल वाले अपना बचाव करने में लगे हैं। अपनी खुद की शिकायत से एक बात तो उन्हों ने स्वीकार कर ली है कि घटना हुई है और वे खुद घटना में उपस्थित थे। इस तरह उन्हों ने अपने बचाव का एक तर्क तो खो दिया है। अभी उन्हों ने अदालत को शिकायत की है। अदालत उस शिकायत की प्रारंभिक जाँच कर के यह तय करेगा कि इस शिकायत को अन्वेषण के लिए पुलिस को भेजा जाए या स्वयं ही जाँच की जाए। यदि पुलिस को भेजा जाता है तो पुलिस उस की जाँच कर के शिकायत सही पाने पर आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है। अन्यथा स्थिति में न्यायालय खुद जाँच कर के शिकायत पर प्रसंज्ञान ले सकता है या लेने से इन्कार कर सकता है। यदि न्यायालय प्रसंज्ञान लेता है तो आप उस आदेश को सेशन न्यायालय में निगरानी कर चुनौती दे सकते हैं।

ब तक उक्त मामले में पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करती या प्रसंज्ञान नहीं लिया जाता तब तक आप की कोई भूमिका नहीं है। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती है तो आप पुलिस के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं।

ब तक उक्त शिकायत अपनी अंतिम परिणति पर नहीं पहुँच जाती है तब तक आप द्वारा मानहानि का मुकदमा करना ठीक नहीं है। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि शिकायत मिथ्या थी और आप की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने और अपना मिथ्या बचाव करने के लिए की गई थी। तब आप मानहानि और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए अपराधिक और दीवानी दोनों प्रकार के मुकदमे उन के विरुद्ध कर सकते हैं।

आत्महत्या एक मूर्खतापूर्ण विचार है।

Havel handcuffसमस्या-

दयानन्द तिवारी ने सितारगंज, उत्तराखण्ड से पूछा है-

मैं एक प्राइवेट कंपनी में नौकरी करता हूँ। उस कंपनी के फैक्ट्री मैनेजर ने मेरे ऊपर रिश्वत लेने का झूठा आरोप लगाया है जिस से पूरी कंपनी में मेरी इज्जत खराब हुई है। मेरे आत्मसम्मान को बहुत ठेस पहुँची है। मेरे सात वर्ष के कार्यकाल में पहली बार किसी ने इतना बुरा आरोप लगाया है जिस से मैं बहुत आहत हूँ। कई बार आत्महत्या करने का विचार मन में आता है। कृपया मुझे सलाह दें। मुझे मानहानि का मुकदमा करना है।

 

समाधान-

त्महत्या करना किसी समस्या का समाधान नहीं हो सकता। उस से तो जान चली जाएगी। मृत्यु से व्यक्ति की जान तो चली जाती है लेकिन उस का मान सम्मान या अपमान पीछे छूट जाता है। लोग तो यही समझेंगे कि उस व्यक्ति पर आरोप सही था इस कारण उस ने ग्लानि से आत्महत्या कर ली। इस से आप पर लगाए गए लांछन से तो आप को मुक्ति मिलने से रही। इस कारण आत्महत्या का विचार पूरी तरह मूर्खता पूर्ण विचार है। इसे तुरन्त त्याग दें।

प पर आरोप मौखिक रूप से लगाए हैं तो सब से पहले तो आप को गवाह जुटाने होंगे जो ये कह सकें कि उन के सामने आरोप लगाया गया है। क्यों कि मानहानि के लिए आप जो भी कार्यवाही करेंगे उस में अदालत के सामने आप को साबित करना पड़ेगा कि मैनेजर ने कुछ लोगों के सामने आप पर आरोप लगाया जिस से आप के सम्मान को हानि हुई और आप बदनाम हुए। कंपनी मैं आप को गवाह आसानी से नहीं मिलेंगे। क्यों कि सब वहाँ कर्मचारी होते हैं और अक्सर इस बात से भयभीत रहते हैं कि यदि उन्हों ने मैनेजर के विरुद्ध गवाही दी तो वह उन से बदला लेगा और उन की नौकरी भी खतरे में पड़ जाएगी। यदि आप को ठोस गवाह मिल जाएँ जो अदालत में अपना बयान न बदलें तो आप किसी वकील से मिल कर न्यायालय में मानहानि का परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं।

दि आरोप लिखित लगाया है, अर्थात आप को कोई कारण बताओ नोटिस दिया गया हो या आरोप पत्र दिया गया हो तो फिर आप के विरुद्ध कंपनी में भी अनुशासनिक कार्यवाही होगी जिस में घरेलू जाँच होगी जिस में कंपनी को प्रमाणित करना होगा कि आप पर लगाया गया आरोप सही है। आप को वहाँ बचाव का अवसर प्राप्त होगा। यदि आप पर आरोप लिखित पत्र (कारण बताओ नोटिस या आरोप पत्र) के माध्यम से लगाया गया हो तो उस के आधार पर तुरन्त न्यायालय में परिवाद कर सकते हैं।

मान हानि के लिए कानूनी कार्यवाही करने की अवधि सीमा।

समस्या-

बागपत,  उत्तर प्रदेश से बीजेन्द्र कुमार ने पूछा है –

मेरे गाँव की ही एक औरत ने मेरे बड़े भाई पर बलात्कार का झूठा केस लगा दिया था।   इस केस में पुलिस भाई को थाने ले गयी। केस को झूठा पा कर गाँव के बहुत से व्यक्तियों ने थाने में जाकर झूठे केस की बात बताई तब जाकर केस का निपटारा हुआ। अगर गाँव के लोगो का साथ न मिलता तो मेरे भाई को बलात्कार के केस में सजा हो गए होती।  यह घटना दिनांक 26.04.2009 की है। मेरे भाई बहुत ही सज्जन व्यक्ति हैं। तब से लेकर अब तक वे इस केस से बेइज्जती महसूस करते हैं और परेशान रहते हैं। क्या हम उस औरत के खिलाफ हम कुछ कर सकते है?

समाधान –

Defamationस औरत ने मिथ्या आरोप लगा कर पुलिस में रिपोर्ट कराई और आप के भाई को मिथ्या आरोप में अभियोजित कराने की कोशिश कर के उन की मानहानि की है। इस तरह मानहानि करना भारतीय दंड संहिता की धारा 499 के अंतर्गत अपराध है और यह अपराध धारा 500 के अंतर्गत दो वर्ष के साधारण कारावास और जुर्माने या दोनों से दंडनीय है। लेकिन इस अपराध के अंतर्गत अपराध घटित होने से तीन वर्ष की अवधि में परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत करना जरूरी है। आप के भाई के इस मामले में तीन वर्ष की अवधि 26.04.2012 को समाप्त हो चुकी है। इस कारण से इस मामले में परिवाद प्रस्तुत किया जाएगा तो वह निर्धारित अवधि में प्रस्तुत नहीं किए जाने के कारण निरस्त कर दिया जाएगा।

स तरह के मामलों में सम्मान की क्षति के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी वाद भी प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन उस के लिए वाद प्रस्तुत करने की अवधि वाद कारण उत्पन्न होने के एक वर्ष तक की ही है। इस कारण दीवानी वाद भी आप के भाई प्रस्तुत नहीं कर सकते। इतना समय व्यतीत हो जाने के कारण आप के भाई उस औरत के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही नहीं कर सकते। उन्हें मान लेना चाहिए कि समय निकलने के साथ ही उस औरत को उस के अपराध के लिए आप के भाई ने क्षमा कर दिया है।

लोक कल्याण के लिए सत्य लांछन मानहानि नहीं है।

समस्या-

मांडला, मध्यप्रदेश से बसन्त ने पूछा है-

दो साल पहले मैं आईआईटीजी की कोचिंग कर रहा था।  मैं आर्य समाज को मानता हूँ, और बहुत धार्मिक हूँ।  मैं फ़ेसबुक पर धार्मिक संदेश भेजता था।  तभी एक सन्यासी मुझे सन्यास लेने का संकेत करने लगा।  उसकी तरफ से अति होने लगी तो मुझे उनसे पूछना ही पड़ा वैराग्य के बारे में।  उन दिनों मैं कठोर योग साधना कर रहा था।  अतः मैने उन से कहा कि मैने वैराग्य का अनुभव किया है।  लेकिन उसने खंडन कर दिया और दूसरा वैराग्य बताया।  मैंने उनका वैराग्य उत्पन्न किया।  जिसके फलस्वरूप मुझे स्चीज़ोफ्रेनिया नामक मानसिक बीमारी हो गई।  उन्हों ने मेरा अपमान किया और मुझे ब्लॉक कर दिया।  मैंने उस सन्यासी का पर्दाफाश याहू ग्रुप्स में कर दिया और लिखा कि वह लोगों को मानसिक रोगी बनाता है।  मैं जानना चाहता हूँ कि क्या सत्य मानहानि के मुक़दमे में रक्षक है?  मैं ने जो भी बोला वो सत्य बोला।  यदि वो मानहानि का केस करता है तो क्या होगा?

समाधान-

defamationप को चिंता करने की जरूरत नहीं है। वह स्वामी आप के विरुद्ध मानहानि का कोई मुकदमा नहीं करने वाला है।

दि किसी भी मानसिक या शारीरिक क्रिया से मनुष्य के मस्तिष्क पर बुरा प्रभाव पड़ता है तो वह सीजोफ्रेनिया का कारण बन सकता है। आप अपनी चिकित्सा करवाइए यह कोई लाइलाज बीमारी नहीं है।

हाँ तक मानहानि का प्रश्न है। किसी भी सत्य से कभी कोई मानहानि नहीं होती है। भारतीय दंड संहिता में मानहानि को अध्याय 21 में धारा 499 में परिभाषित किया गया है इस धारा के बाद मानहानि के अपवाद दिए गए जिन का प्रथम अपवाद ही यही है कि किसी ऐसी बात का लांछन लगाना, जो किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में सत्य हो, मानहानि नहीं है, यदि यह लोक कल्याण के लिए हो कि वह लांछन लगाया जाए या प्रकाशित किया जाए। वह लोक कल्याण के लिए है या नहीं यह तथ्य का प्रश्न है।

भारतीय दंड संहिता की धारा 499 व धारा 500 निम्न प्रकार हैं –

मानहानि के विय में

499. मानहानि–जो कोई या तो बोले गए या पढ़े जाने के लिए आशयित शब्दों द्वारा या संकेतों द्वारा, या दृष्य रूपणों द्वारा किसी व्यक्ति के बारे में कोई लांछन इस आशय से लगाता या प्रकाशित करता है कि ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि की जाए या यह जानते हुए या विश्वास करने का कारण रखते हुए लगाता या प्रकाशित करता है ऐसे लांछन से ऐसे व्यक्ति की ख्याति की अपहानि होगी, एतस्मिनपश्चात् अपवादित दशाओं के सिवाय उसके बारे में कहा जाता है कि वह उस व्यक्ति की मानहानि करता है।

स्पष्टीकरण 1–किसी मॄत व्यक्ति को कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आ सकेगा यदि वह लांछन उस व्यक्ति की ख्याति की, यदि वह जीवित होता, अपहानि करता, और उसके परिवार या अन्य निकट सम्बन्धियों की भावनाओं को उपहत करने के लिए आशयित हो।

स्पष्टीकरण 2–किसी कम्पनी या संगम या व्यक्तियों के समूह के सम्बन्ध में उसकी वैसी हैसियत में कोई लांछन लगाना मानहानि की कोटि में आ सकेगा।

स्पष्टीकरण 3–अनुकल्प के रूप में, या व्यंगोक्ति के रूप में अभिव्यक्त लांछन मानहानि की कोटि में आ सकेगा।

स्पष्टीकरण 4–कोई लांछन किसी व्यक्ति की ख्याति की अपहानि करने वाला नहीं कहा जाता जब तक कि वह लांछन दूसरों की दृष्टि में प्रत्यक्षतः या अप्रत्यक्षतः उस व्यक्ति के सदाचारिक या बौद्धिक स्वरूप को हेय न करे या उस व्यक्ति की जाति के या उसकी आजीविका के सम्बन्ध में उसके शील को हेय न करे या उस व्यक्ति की साख को नीचे न गिराए या यह विश्वास न कराए कि उस व्यक्ति का शरीर घॄणोत्पादक दशा में है या ऐसी दशा में है जो साधारण रूप से निकॄष्ट समझी जाती है।

दृष्टांत

(क) यह विश्वास कराने के आशय से कि ने की घड़ी अवश्य चुराई है, कहता है, “एक ईमानदार व्यक्ति है, उसने की घड़ी कभी नहीं चुराई है”। जब तक कि यह अपवादों में से किसी के अन्तर्गत न आता हो यह मानहानि है।

(ख) से पूछा है कि की घड़ी किसने चुराई है। यह विश्वास कराने के आशय से कि ने की घड़ी चुराई है, की ओर संकेत करता है जब तक कि यह अपवादों में से किसी के अन्तर्गत न आता हो, यह मानहानि है।

(ग) यह विश्वास कराने के आशय से कि ने की घड़ी चुराई है, का एक चित्र खींचता है जिसमें वह की घड़ी लेकर भाग रहा है। जब तक कि यह अपवादों में से किसी के अन्तर्गत न आता हो यह मानहानि है।

पहला अपवादसत्य बात का लांछन जिसका लगाया जाना या प्रकाशित किया जाना लोक कल्याण के लिए अपेक्षित है–किसी ऐसी बात का लांछन लगाना, जो किसी व्यक्ति के सम्बन्ध में सत्य हो, मानहानि नहीं है, यदि यह लोक कल्याण के लिए हो कि वह लांछन लगाया जाए या प्रकाशित किया जाए। वह लोक कल्याण के लिए है या नहीं यह तथ्य का प्रश्न है।

दूसरा अपवादलोक सेवकों का लोकाचरण–उसके लोक कॄत्यों के निर्वहन में लोक सेवक के आचरण के विषय में या उसके शील के विषय में, जहां तक उसका शील उस आचरण से प्रकट होता हो, न कि उससे आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

तीसरा अपवादकिसी लोक प्रश्न के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति का आचरण–किसी लोक प्रश्न के सम्बन्ध में किसी व्यक्ति के आचरण के विषय में, और उसके शील के विषय में, जहां तक कि उसका शील उस आचरण से प्रकट होता हो, न कि उससे आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

दृष्टांत

किसी लोक प्रश्न पर सरकार को अर्जी देने में, किसी लोक प्रश्न के लिए सभा बुलाने के अपेक्षण पर हस्ताक्षर करने में, ऐसी सभा का सभापतित्व करने में या उसमें हाजिर होने में, किसी ऐसी समिति का गठन करने में या उसमें सम्मिलित होने में, जो लोक समर्थन आमंत्रित करती है, किसी ऐसे पद के किसी विशिष्ट अभ्यर्थी के लिए मत देने में या उसके पक्ष में प्रचार करने में, जिसके कर्तव्यों के दक्षतापूर्ण निर्वहन से लोक हितबद्ध है, आचरण के विषय में द्वारा कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

चौथा अपवादन्यायालयों की कार्यवाहियों की रिपोर्टों का प्रकाशन— किसी न्यायालय की कार्यवाहियों की या किन्हीं ऐसी कार्यवाहियों के परिणाम की सारतः सही रिपोर्ट को प्रकाशित करना मानहानि नहीं है।

स्पष्टीकरण–कोई जस्टिस आफ पीस या अन्य आफिसर, जो किसी न्यायालय में विचारण से पूर्व की प्रारम्भिक जांच खुले न्यायालय में कर रहा हो, उपरोक्त धारा के अर्थ के अन्तर्गत न्यायालय है।

पांचवां अपवाद–न्यायालय में विनिश्चित मामले के गुणागुण या साक्षियों तथा सम्पॄक्त अन्य व्यक्तियों का आचरण–किसी ऐसे मामले के गुणागुण के विषय में चाहे वह सिविल हो या दाण्डिक, जो किसी न्यायालय द्वारा विनिश्चित हो चुका हो या किसी ऐसे मामले के पक्षकार, साक्षी या अभिकर्ता के रूप में किसी व्यक्ति के आचरण के विषय में या ऐसे व्यक्ति के शील के विषय में, जहां तक कि उसका शील उस आचरण से प्रकट होता हो, न कि उसके आगे, कोई राय, चाहे वह कुछ भी हो, सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

दृष्टांत

(क) कहता है “ मैं समझता हूं कि उस विचारण में का साक्ष्य ऐसा परस्पर विरोधी है कि वह अवश्य ही मूर्ख या बेईमान होना चाहिए ”। यदि ऐसा सद्भावपूर्वक कहता है तो वह इस अपवाद के अन्तर्गत आ जाता है, क्योंकि जो राय वह के शील के सम्बन्ध में अभिव्यक्त करता है, वह ऐसी है जैसी कि साक्षी के रूप में के आचरण से, न कि उसके आगे, प्रकट होती है।

(ख) किन्तु यदि कहता है “जो कुछ ने उस विचारण में दृढ़तापूर्वक कहा है, मैं उस पर विश्वास नहीं करता क्योंकि मैं जानता हूं कि वह सत्यवादिता से रहित व्यक्ति है,” तो इस अपवाद के अन्तर्गत नहीं आता है, क्योंकि वह राय जो वह के शील के सम्बन्ध में अभिव्यक्त करता है, ऐसी राय है, जो साक्षी के रूप में के आचरण पर आधारित नहीं है।

छठा अपवादलोककॄति के गुणागुण–किसी ऐसी कॄति के गुणागुण के विषय में, जिसको उसके कर्ता ने लोक के निर्णय के लिए रखा हो, या उसके कर्ता के शील के विषय में, जहां तक कि उसका शील ऐसी कॄति में प्रकट होता हो, न कि उसके आगे, कोई राय सद्भावपूर्वक अभिव्यक्त करना मानहानि नहीं है।

स्पष्टीकरण–कोई कॄति लोक के निर्णय के लिए अभिव्यक्त रूप से या कर्ता की ओर से किए गए ऐसे कार्यों द्वारा, जिनसे लोक के निर्णय के लिए ऐसा रखा जाना विवक्षित हो, रखी जा सकती है।

दृष्टांत

(क) जो व्यक्ति पुस्तक प्रकाशित करता है वह उस पुस्तक को लोक के निर्णय के लिए रखता है।

(ख) वह व्यक्ति, जो लोक के समक्ष भाषण देता है, उस भाषण को लोक के निर्णय के लिए रखता है।

(ग) वह अभिनेता या गायक, जो किसी लोक रंगमंच पर आता है, अपने अभिनय या गायन को लोक के निर्णय के लिए रखता है।

(घ) , द्वारा प्रकाशित एक पुस्तक के संबंध में कहता है “की पुस्तक मूर्खतापूर्ण है, अवश्य कोई दुर्बल पुरुष होना चाहिए। की पुस्तक अशिष्टतापूर्ण है, अवश्य ही अपवित्र विचारों का व्यक्ति होना चाहिए”। यदि ऐसा सद्भावपूर्वक कहता है, तो वह इस अपवाद के अन्तर्गत आता है, क्योंकि वह राय जो वह, के विषय में अभिव्यक्त करता है, के शील से वहीं तक, न कि उससे आगे सम्बन्ध रखती है जहां तक कि का शील उसकी पुस्तक से प्रकट होता है।

(ङ) किन्तु यदि कहता है “मुझे इस बात का आश्चर्य नहीं है कि की पुस्तक मूर्खतापूर्ण तथा अशिष्टतापूर्ण है क्योंकि वह एक दुर्बल और लम्पट व्यक्ति है”। इस अपवाद के अन्तर्गत नहीं आता क्योंकि वह राय, जो कि वह के शील के विषय में अभिव्यक्त करता है, ऐसी राय है जो की पुस्तक पर आधारित नहीं है।

सातवां अपवादकिसी अन्य व्यक्ति के ऊपर विधिपूर्ण प्राधिकार रखने वाले व्यक्ति द्वारा सद्भावपूर्वक की गई परिनिन्दा–किसी ऐसे व्यक्ति द्वारा, जो किसी अन्य व्यक्ति के ऊपर कोई ऐसा प्राधिकार रखता हो, जो या तो विधि द्वारा प्रदत्त हो या उस व्यक्ति के साथ की गई किसी विधिपूर्ण संविदा से उद्भूत हो, ऐसे विषयों में, जिनसे कि ऐसा विधिपूर्ण प्राधिकार सम्बन्धित हो, उस अन्य व्यक्ति के आचरण की सद््भावपूर्वक की गई कोई परिनिन्दा मानहानि नहीं है।

किसी साक्षी के आचरण की या न्यायालय के किसी आफिसर के आचरण की सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला कोई न्यायाधीश, उन व्यक्तियों की, जो उसके आदेशों के अधीन है, सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला कोई विभागाध्यक्ष, अन्य शिशुओं की उपस्थिति में किसी शिशु की सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला पिता या माता, अन्य विद्यार्थियों की उपस्थिति में किसी विद्यार्थी की सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला शिक्षक, जिसे विद्यार्थी के माता-पिता के प्राधिकार प्राप्त हैं, सेवा में शिथिलता के लिए सेवक की सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला स्वामी, अपने बैंक के रोकड़िए की, ऐसे रोकङिए के रूप में ऐसे रोकङिए के आचरण के लिए, सद्भावपूर्वक परिनिन्दा करने वाला कोई बैंककार इस अपवाद के अन्तर्गत आते हैं।

आठवां अपवाद–प्राधिकॄत व्यक्ति के समक्ष सद्भावपूर्वक अभियोग लगाना–किसी व्यक्ति के विरुद्ध कोई अभियोग ऐसे व्यक्तियों में से किसी व्यक्ति के समक्ष सद््भावपूर्वक लगाना, जो उस व्यक्ति के ऊपर अभियोग की विषयवस्तु के सम्बन्ध में विधिपूर्ण प्राधिकार रखते हों, मानहानि नहीं है।

दृष्टांत

यदि एक मजिस्ट्रेट के समक्ष पर सद्भावपूर्वक अभियोग लगाता है, यदि एक सेवक के आचरण के सम्बन्ध में के मालिक से सद््भावपूर्वक शिकायत करता है ; यदि एक शिशु के सम्बन्ध में के पिता से सद्भावपूर्वक शिकायत करता है ; तो इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

नौवां अपवाद–अपने या अन्य के हितों की संरक्षा के लिए किसी व्यक्ति द्वारा सद्भावपूर्वक लगाया गया लांछन–किसी अन्य के शील पर लांछन लगाना मानहानि नहीं है, परन्तु यह तब जब कि उसे लगाने वाले व्यक्ति के या किसी अन्य व्यक्ति के हित की संरक्षा के लिए, या लोक कल्याण के लिए, वह लांछन सद््भावपूर्वक लगाया गया हो।

दृष्टांत

(क) एक दुकानदार है। वह से, जो उसके कारबार का प्रबन्ध करता है, कहता है, “को कुछ मत बेचना जब तक कि वह तुम्हें नकद धन न दे दे, क्योंकि उसकी ईमानदारी के बारे में मेंरी राय अच्छी नहीं है”। यदि उसने पर यह लांछन अपने हितों की संरक्षा के लिए सद्भावपूर्वक लगाया है, तो इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

(ख) , एक मजिस्ट्रेट अपने वरिष्ठ आफिसर को रिपोर्ट देते हुए, के शील पर लांछन लगाता है। यहां, यदि वह लांछन सद्भावपूर्वक और लोक कल्याण के लिए लगाया गया है, तो इस अपवाद के अन्तर्गत आता है।

दसवां अपवाद–सावधानी, जो उस व्यक्ति की भलाई के लिए, जिसे कि वह दी गई है या लोक कल्याण के लिए आशयित है–एक व्यक्ति को दूसरे व्यक्ति के विरुद्ध सद्भावपूर्वक सावधान करना मानहानि नहीं है, परन्तु यह तब जब कि ऐसी सावधानी उस व्यक्ति की भलाई के लिए, जिसे वह दी गई हो, या किसी ऐसे व्यक्ति की भलाई के लिए, जिससे वह व्यक्ति हितबद्ध हो, या लोक कल्याण के लिए आशयित हो।

500. मानहानि के लिए दण्ड–जो कोई किसी अन्य व्यक्ति की मानहानि करेगा, वह सादा कारावास से, जिसकी अवधि दो वर्ष तक की हो सकेगी, या जुर्माने से, या दोनों से, दण्डित किया जाएगा।

पत्नी और ससुर ने विवाह विच्छेद का मन बना लिया है तो सहमति से विवाह विच्छेद हेतु आवेदन कर दें।

समस्या-

गुजरात से शिशिर ने पूछा है –
मेरी शादी 13 एप्रिल 2012 को हुई, जुलाई में मेरी पत्नी अपने मायके चली गयी। और अब वापस नहीं आना चाहती।  मैंने उसे कई बार फोन किया तो बोलती है कि मैं आपकी माँ के साथ नही रहूंगी। मैं ने उसे हाँ कह दिया, फिर भी वो आने को तैयार नहीं है।  मैने उसे वापिस बात की तो बोलती है की मैं ने दूसरा तलाश कर लिया है।  ( हो सकता है कि उस ने ऐसा गुस्से में कहा हो) अभी उसके घर वाले मुझ पर विवाह विच्छेद के लिए दबाव डाल  रहे हैं।  इसी बीच मैं ने उसे दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन का नोटिस दे दिया है।  वे लोग मुकदमा करने की धमकी दे रहे हैं।  मुझे क्या करना चाहिए?  उसके पिताजी ने पूरे गावों मैं घूम कर मुझे बदनाम कर दिया कि लड़का ना मर्द है उस में दम नहीं है।  जबकि ऐसा नहीं है।  मैं यह  जानना चाहता हूँ कि क्या मैं उन लोगों पर इसके लिए मानहानि का केस कर सकता हूँ?

समाधान-

alimonyप का अनुमान है कि पत्नी ने गुस्से में कह दिया होगा कि मैं ने दूसरा तलाश कर लिया है।  इस से यह मैं भी यह अनुमान कर सकता हूँ कि आप दोनों के बीच कुछ तो ऐसा हुआ है जिस से आप की पत्नी गुस्सा है। इतना कि उस ने पिता को बताया कि अब वह आप के साथ नहीं रहेगी।  जिस की प्रतिक्रिया में उन्हों ने आप पर तलाक के लिए दबाव डालना आरंभ कर दिया और आप को बदनाम भी किया। आप की पत्नी और उस के पिता की ये गतिविधियाँ ऐसी हैं जिन से लगता है कि वे इस रिश्ते को बना कर रखना नहीं चाहते।

प ने दाम्पत्य अधिकारों के प्रत्यास्थापन के लिए नोटिस दिया है। आप की पत्नी ने उस का कोई उत्तर नहीं दिया है तो आप दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए मुकदमा भी कर सकते हैं।  आप का विवाह 13 अप्रेल 2012 को ही हुआ है इस कारण से विवाह विच्छेद के लिए आवेदन अभी 12 अप्रेल 2013 तक नहीं किया जा सकता है। मेरी राय में आप को दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना के लिए मुकदमा कर देना चाहिए और अपनी पत्नी व उन के पिता को बता देना चाहिए कि आप ये मुकदमा इस लिए कर रहे हैं क्यों कि विवाह विच्छेद का मुकदमा करना विवाह की तिथि से एक वर्ष तक संभव नहीं है। यह भी बता दें कि आप की मंशा तो यह है कि पत्नी आप के साथ आ कर रहे।

दाम्पत्य अधिकारों की प्रत्यास्थापना की डिक्री प्राप्त कर लेने के उपरान्त भी यदि आप की पत्नी आप के साथ आ कर नहीं रहती है तो उसे जबरन इस के लिए मनाया नहीं जा सकता।  वह नहीं आती है तो आप को इसी आधार पर विवाह विच्छेद करने का अधिकार प्राप्त हो जाएगा। मुझे नहीं लगता कि आप की पत्नी और उस के पिता विवाह विच्छेद के लिए मन बना चुके हैं।  वे फर्जी मुकदमे करें और आप परेशान हों इस से अच्छा है आप आपसी सहमति से विवाह विच्छेद करने की अर्जी दे दें।

दि आप के ससुर ने आप की बदनामी की है और उस से आप की प्रतिष्ठा को ठेस पहुँची है और आप के पास इस के सबूत हैं तो आप मानहानि के लिए फौजदारी मुकदमा आप की पत्नी और उन के पिता के विरुद्ध कर सकते हैं। मानहानि के लिए क्षतिपूर्ति हेतु दीवानी मुकदमा भी किया जा सकता है।  पर मुझे नहीं लगता कि उस से कुछ हासिल हो सकता है।

सहमति से विवाह विच्छेद ही सही उपाय है, उस के लिए प्रयत्न करें।

समस्या-

बरवाला, जिला-हिसार हरियाणा से हेमन्त ने पूछा है –

मेरी शादी २२-०४-२००४ को राजस्थान के पिलानी में हुई थी।  मेरी पत्नी घर आते ही मेरे परिवार से ईर्ष्या करने लगी। परिवार में माता पिता भाई बहन हम चार सदस्य हैँ। सबसे पहले वो मेरी बहन को परेशान करने लगी।  हमने बहन की शादी २२-०२-२००८ को पंजाब में कर दी।  उसके बाद वह मेरी माँ से चिढ़ने लगी। क्योंकि मेरी माँ शुरू से ही मानसिक बीमार है।  मैंने पत्नी को उससे अलग रखने की कोशिश की।  हमारा घर बड़ा है। उस में  दो पोर्शन हैं।  एक में हम और एक में मम्मी पापा रहने लगे।  परन्तु मेरी पत्नी को अब मेरे पापा से चिढ़ पैदा हो गई।  उसने घर में बहुत झगडा पहले भी किया था। जिससे वो रुष्ट होकर मायके चली गई थी।  इस दौरान पंचायत भी हुई थी।  इसके बाद भी वह मायके चली गयी थी।  मैं उसको किसी तरह मना के ले आया था।  परन्तु वो अब फिर से चली गई है।  उसका कहना है कि आप कहीं दूसरी जगह रह लो।  परन्तु मैं चाहता हूँ की माँ बाप के और परिवार के बीच रहूँ।  वो मुझे अलग रखकर मेरे बूढ़े माँ बाप से दूर रखना चाहती है।  जबकि मेरी माँ मानसिक बीमार है।  जब मेरी शादी हुई थी तो वह बीए पास थी और मैं १०+२ था।  हम ने उसको यहाँ एमए भी करवाई। इसके बाद हम उसे पढ़ाना नहीं चाहते थे।  हम चाहते थे कि वो घर को संभाल ले क्योंकि घर को संभालने वाला कोई नहीं था।  लेकिन वो इतनी जिद्दी थी कि हमारी मर्जी के बिना वह अपने मायके वालों से कहकर बीएड भी कर के मानी। लेकिन फिर भी वो घर में झगडा करती थी और अपने मायके चली जाती थी। अंत में हमने परेशान होकर पहले धारा 9 हिन्दू विवाह अधिनियम का नोटिस दिया। लेकिन उन्होंने नोटिस का जवाब नोटिस से दिया कि मेरी पत्नी को मेरी मम्मी से प्रोब्लम है और मुझे अलग घर में रखे तो ही मैं रहूंगी।  फिर मैंने जिला संरक्षण अधिकारी को चिट्ठी लिखी।  अधिकारी ने मेरे ससुराल वालों को कई बार बुलाया परन्तु वो नहीं आये। ४ महीने तक मैंने प्रोटेक्शन ऑफिस के धक्के खाए और अंत में मैंने तलाक का केस १८-०८-२०१२ को डाल दिया।  केस की पहली तारीख ११-१०-२०१२ को वो लोग नहीं आये।  उन्होंने कोर्ट का कागज लेने से मना कर दिया था।  जज साहब ने राजस्थान पत्रिका में नोटिस निकलवाने को कहा और आगे तारीख रख दी। वहाँ से मेरे ससुराल वालों ने १६-११-२०१२ को मुझ पर दहेज का केस कार दिया।  उन्होंने धारा ४९८ ए , ४०६ और ३२३ लगायी है।  उसने ५ लोगों के नाम लिखवाए हैं। जिसमे मेरा, मेरे पापा का, चाचा का, चाचा के लड़के का, जो कि हमारे से ५ किलोमीटर दूर गांव में रहते है और मेरी बहन का जो पंजाब में रहती है नाम है। हमें तफ्तीश के लिए पिलानी थाना में बुलाया गया था। जहाँ हम गए थे और लोगों को भी साथ में ले कर गए थे। जिन्होंने अपने बयान पुलिस को दे दिए थे।  अब आप मुझे बताइए की इसमें आगे क्या हो सकता है।  मेरी बहन के ससुराल वाले कह रहे हैं कि हम उन लोगों पर मानहानि का केस करेंगे।  क्या ये संभव है। मेरी पत्नी ने मुझ पर झूठा केस किया है तो मैं उसके विपरीत कुछ कर सकता हूँ?

समाधान-

ब भी कभी ऐसा लगता है कि पत्नी के प्रति पति या उस के संबंधियों द्वारा शारीरिक या मानसिक क्रूरता का व्यवहार किया गया है तो धारा 498 ए का अपराध होता है।  लेकिन यदि पत्नी पति के या उस के संबंधियों के साथ क्रूरतापूर्ण व्यवहार करे तो कोई अपराध नहीं होता। वह एक दुष्कृत्य जरूर होता है जो दंडनीय नहीं है लेकिन ऐसा तथ्य है जिस के आधार पर विवाह विच्छेद हो सकता है। लगभग सभी भारतीय पति पुरुष प्रधानता की मानसिकता से ग्रस्त हैं। ऐसे में वे ऐसा व्यवहार कर बैठते हैं जो क्रूरतापूर्ण परिभाषित होता है। यदि पत्नी अड़ ही जाए तो 498-ए का मुकदमा बनता है और साबित भी हो जाता है।

विवाह के समय आप की पत्नी स्नातक थी, आप ने उसे स्नातकोत्तर होने दिया और फिर उस ने आप से छुपा कर अपने मायके जा कर बी.एड. कर लिया। जिस का स्पष्ट निहितार्थ है कि वह आरंभ से ही नौकरी कर के अपने पैरों पर खड़ा होना चाहती थी। एक ऐसा जीवन चाहती थी जो आप के व आप के परिवार के साथ रहते संभव नहीं। वह नहीं चाहती कि वह आप की मानसिक रूप से रुग्ण माँ की सेवा करे। उस ने आप को अपने परिवार से अलग करना चाहा जो आप नहीं चाहते।  आप चाहते हैं कि वह नौकरी न करे और आप के घर को संभाले। दोनों अपनी अपनी बात पर अड़े हैं।  आप अपने माता-पिता को देखते हैं जो आप की जिम्मेदारी है। संभवतः वह अपने और अपने बच्चों के भविष्य को देखती है। यही आप के मध्य विवाद का विषय है।

प दोनों के मध्य समझौते की एक ही राह है कि दोनों में से कोई अपनी बात से हट जाए। वह अपनी राह पर इतना अधिक बढ़ चुकी है कि वहाँ से लौटना कठिन प्रतीत होता है।  लगता है आप को ही पत्नी की बात माननी होगी अन्यथा कोई समझौता संभव नहीं है।  विवाह विच्छेद निश्चित लगता है।  ऐसी स्थिति में समझदारी यही है कि पत्नी और उस के परिवार वालों से बात की जाए कि वह किन शर्तों पर समझौता करने को तैयार है। यदि वे मान जाते हैं तो समझौता कर मुकदमों को समाप्त कीजिए और दोनों अपनी अपनी राह पर चलिए। यदि विवाह विच्छेद होता है तो आप को स्त्री-धन और स्थाई पुनर्भरण की राशि पत्नी को देनी होगी। उस का प्रस्ताव रखिए समझौता संपन्न हो सकता है। यही एक मात्र राह आप के मामले में दिखाई पड़ती है।

प की बहिन के ससुराल वाले मानहानि के मुकदमे के लिए कह रहे हैं। मुझे नहीं लगता कि मानहानि का मुकदमा करने से कोई लाभ होगा। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट में उन का नाम है और पुलिस उन के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत नहीं करती है तो वे मानहानि का मुकदमा कर सकते

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