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उच्च न्यायालय के निर्णय की अनुपालना के लिए उच्च न्यायालय में ही आवेदन करें।

lawसमस्या-
डॉ. महावीर सिंह ने झुन्झुनु, राजस्थान से पूछा है-

युर्वेद विभाग राजस्थान में साक्षात्कार के माध्यम से जून 2009 में 378 आयुर्वेद चिकित्साधिकारी पद पर नियुक्ति /पदस्थापन हुआ। यह भर्तियाँ राजस्थान ग्रामीण आयुर्वेद होमोपथी यूनानी एवं प्राकृतिक सेवा अधिनियम-2008 के अंतर्गत कि गई थीं।  दो वर्ष का प्रोबेशन पीरियड पूरा होने से तीन माह पहले राजस्थान हाईकोर्ट के एक निर्णय द्वारा भर्ती को अवैध घोषित कर दुबारा मेरिट बनाने का आदेश दिया तथा दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरे होने तक कोर्ट ने इन चिकित्सकों को ग्रामीण चिकित्सा का हवाला देकर कार्य करते रहने का निर्देश दिया। आदेश के मुख्य बिंदु थे कि 1. सरकार द्वारा सर्विस रिकॉर्ड पेश नहीं कर सकने से कोर्ट ने माना कि चयन समिति ने रिकॉर्ड बनाया ही नहीं, 2.  दुबारा चयन प्रक्रिया पूरे होने तक इनको डिस्टर्ब नहीं किया जाये! आज तक सरकार दुबारा भर्ती प्रक्रिया पूरी नहीं कर सकी है। मार्गदर्शन देने का श्रम करें। यहाँ यह बात उल्लेखनीय है कि राजस्थान सरकार में दो वर्ष के प्रोबेशन पीरियड में प्रोबेशन ट्रेनी के रूप में फिक्स-रिमुनरेशन 16800/- पर रखा जाता है, हमें आज तक यही मिल रहा है।

समाधान-

प की नियुक्ति को उच्च न्यायालय द्वारा अवैध घोषित किया जा चुका है। हो सकता है राजस्थान सरकार ने उस निर्णय को आगे चुनौती दी हो, जानकारी करें। आवश्यक सेवाएँ होने के कारण नई चयन प्रक्रिया पुनः पूर्ण हो जाने तक के लिए आप को सेवा में यथावत बनाए रखने का आदेश दिया गया है। निश्चित रूप से आप को वही निश्चित वेतन तब तक मिलेगा जब तक कि आप को पुनः चयन प्रक्रिया के द्वारा चयन किया जा कर पिछली तिथि से नियुक्ति नहीं दे दी जाती है।

दि सरकार इस काम में देरी कर रही है तो यह उस का दोष है और न्यायालय के निर्णय की अवमानना भी है। इस के लिए आप न्यायालय के समक्ष अवमानना याचिका भी प्रस्तुत कर सकते हैं और एक नई रिट भी प्रस्तुत कर सकते हैं। इस के लिए आप को उच्च न्यायालय के वकील से संपर्क कर के उन्हें पूर्व निर्णय व संबंधित आदेश व आवश्यक दस्तावेज दिखा कर राय करना चाहिए और उन की सलाह के अनुसार कार्यवाही करना चाहिए।

आरोप पत्र दाखिल होने पर भी उच्च न्यायालय प्रथम सूचना रिपोर्ट को रद्द कर सकता है।

समस्या-

नासिक, महाराष्ट्र से मनीष अग्रवाल पूछते हैं –

मैं ने कुछ लोगों के विरुद्ध प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कराई थी। पुलिस ने उस मामले में अन्वेषण के उपरान्त आरोप पत्र न्यायालय में प्रस्तुत कर दिया है। लेकिन अभियुक्तों ने उच्च न्यायालय में प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त करने के लिए आवेदन किया है जिस में महाराष्ट्र सरकार और मुझे उत्तरवादी बनाया गया है और उपस्थित होने तथा अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए सूचना भेजी है। क्या आरोप पत्र प्रस्तुत होने के उपरान्त भी उच्च न्यायालय प्रथम सूचना रिपोर्ट को निरस्त कर सकता है? उच्च न्यायालय में मुझे अपना पक्ष प्रस्तुत करने के लिए कोई वकील करना होगा या मैं स्वयं अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता हूँ?

समाधान-

Havel handcuffह सही है कि आरोप पत्र दाखिल हो जाने के बाद भी प्रथम सूचना रिपोर्ट को उच्च न्यायालय द्वारा निरस्त किया जा सकता है। आप इस मामले में सर्वोच्च न्यायालय द्वारा G.V. Rao vs L.H.V.Prasad & Ors  के मामले में 6 मार्च 2000 को दिया गया निर्णय पढ़ सकते हैं।

किसी भी मामले में कोई भी व्यक्ति अपना पक्ष स्वयं न्यायालय के समक्ष रख सकता है। लेकिन न्यायालयों में अनेक विधिक बिन्दुओं पर भी विचार किया जाता है। वैसी स्थिति में पक्षकार का ज्ञान न होने अथवा सीमित होने पर परेशानी अनुभव हो सकती है और वह यह समझ सकता है कि उस के साथ न्याय नहीं हुआ है इस कारण से स्वयं न्यायालय भी पक्षकारों को सलाह देते हैं कि संभव हो तो वे किसी वकील द्वारा अपना पक्ष रखें। यदि उन की स्थिति किसी वकील की सहायता प्राप्त करने की नहीं हो तो न्यायालय स्वयं भी उन के लिए किसी न्याय मित्र को नियुक्त कर सकता है।  इस कारण से सक्षम होने पर वकील अवश्य करना चाहिए। लेकिन यदि पक्षकार स्वयं ही अपना पक्ष रखता है तो न्यायालय भी इस बात को ध्यान में रखता है कि उस पक्षकार को किसी वकील की सहायता प्राप्त नहीं है और वैसी स्थिति में सामान्यतः वह पक्षकार के पक्ष पर अधिक ध्यान देता है।

उच्च न्यायालय में याचिका का उत्तर तथा स्थगन आगे न बढ़ाने के लिए आवेदन प्रस्तुत करें

समस्या-

सहारनपुर, उत्तर प्रदेश से मनोज कुमार शर्मा ने पूछा है –

मेरी पत्नी ने अपने पिता के विरूद्ध धारा 406 भारतीय दंड संहिता के तहत परिवाद दायर किया।  पत्नी और गवाहों के बयान हो गये।  तलबी हेतु समन भेजा गया तो परिवादी ने जिला जज के यहां तलबी पर रोक हेतु अपील की जो कि खारिज हो गयी।  उसने हाइकोर्ट में अपील की जिसे कोर्ट ने स्वीकार कर स्टे कर दिया।  चार हफतों के लिये जिस में हमें काउंटर दाखिल करना है।  पर ज्यादातर वकीलों का कहना है कि अब ये केस पैंडिग हो गया है, अब कुछ नहीं होगा।  मैं जानना चाहता हूं कि जब न्याय पुलिस से नहीं मिला तो कोर्ट में गये।  अब उस से ऊँची कोर्ट ने स्टे दे दिया।  आखिर क्यों  उसे जमानत करके अपना पक्ष रखने को अदालत ने नही कहा?  हम इसमें त्वरित रोक करने के लिये क्या कर सकते हैं?  क्या हम हाईकोर्ट में पुन र्विचार या नयी अपील कर सकते हैं या फिर सुप्रीम कोर्ट में जाना होगा?

समाधान-

प की पत्नी ने सही राह अपनाई है। पुलिस से न्याय न मिलने पर वे न्यायालय गईं।  न्यायालय ने परिवाद पर साक्ष्य ले कर मामले को दर्ज कर लिया और समन जारी कर दिए।

मन मिलने पर अभियुक्त ने मजिस्ट्रेट के न्यायालय के आदेश के विरुद्ध सत्र न्यायालय को निगरानी याचिका प्रस्तुत की और वह निरस्त हो गई।  अब सत्र न्यायालय के इस आदेश के विरुद्ध उच्च न्यायालय को याचिका प्रस्तुत की गई है।  अब इस याचिका की सुनवाई के लिए आप की पत्नी को नोटिस भेजा गया है।  चार सप्ताह का स्थगन इस लिए दिया गया है कि उस सुनवाई तक अभियुक्त के विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो।

च्च न्यायालय चाहता तो स्थाई रूप से स्थगन आदेश पारित कर सकता था।  लेकिन उस ने ऐसा करने के पहले आप की पत्नी को जवाब प्रस्तुत करने और सुनवाई का अवसर प्रदान किया है।  यह सब सामान्य बात है।  इस स्थगन के लिए आप को सर्वोच्च न्यायालय जाने और अलग से कोई आवेदन करने की आवश्यकता नहीं है।  आप की पत्नी को चाहिए कि वह तुरंत उच्च न्यायालय में जवाब प्रस्तुत करवाए और साथ ही स्थगन को निरस्त करने/आगे न बढ़ाने का आवेदन भी प्रस्तुत करे। आप को अपने वकील को कहना चाहिए कि वह स्थगन के आवेदन तथा आप के स्थगन निरस्त करने/ आगे न बढ़ाने देने के आवेदन पर तुरंत बहस करे अपनी ओर से कोई पेशी न ले। मेरी राय है कि यदि अभियुक्त के आवेदन में कोई तात्विक बात या विधिक बिन्दु न हुआ तो उच्च न्यायालय इसी सुनवाई में उस के आवेदन को निरस्त कर देगा।

पत्नी को मायके से लाने के लिए बंदीप्रत्यक्षीकण सही नहीं

उत्तर प्रदेश से पंकज ने पूछा है –

प्रेम विवाह करने के बाद यदि माता-पिता लड़की को उस के पति के पास न भेजें तो उस स्थिति में लड़का उच्च न्यायालय में बंदी प्रत्यक्षीकरण की रिट प्रस्तुत करना चाहता है। बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका कैसे काम करती है? पेशी के दौरान क्या क्या बयान लिए जाते हैं? यदि लड़के ने रिट प्रस्तुत की है तो क्या पेशी के दौरान केवल लड़की से बयान लिए जाते हैं, लड़के से कुछ नहीं पूछा जाता है? क्या न्यायाधीश विवाह बचाने के लिए लड़का लड़की को  नहीं समझाते? या केवल लड़की के बयान ले कर लड़की जहाँ जाना चाहती है उस तरफ भेज देते हैं? अगर लड़की माता-पिता के दबाव में गलत आरोप लगाती है तो क्या न्यायाधीश उन आरोपों को केवल लड़की के कहने पर मान लेते हैं? क्या लड़के की सुनवाई नहीं होती? अगर लड़के के पास 1. रजिस्ट्रार का विवाह प्रमाण पत्र 2. उच्च न्यायालय का प्रोटेक्शन आदेश 3. चित्र 4. फोन की रिकार्डिंग आदि हों तो लड़का किस तरह के आरोप में फँस सकता है?

उत्तर-

ब से पहले आप को जानना चाहिए कि कानूनी रूप से प्रेम विवाह नाम की कोई विवाह श्रेणी नहीं होती है। विवाह या तो परंपरागत रूप से किसी व्यक्तिगत विधि के अनुरूप होते हैं। जैसे हिन्दू, मुस्लिम, ईसाई, यहूदी विवाह आदि।  इन के अतिरिक्त विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह संपन्न हो सकता है। आप के नाम से पता लगता है कि आप पर हिन्दू विधि लागू होगी। इस कारण से आप हिन्दू विधि के अंतर्गत अथवा विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह कर सकते हैं। हिन्दू विधि के अंतर्गत विवाह परंपरागत रूप से दोनों पक्षों के परिवारों की सहमति से उन की उपस्थिति में संपन्न हो सकता है और आर्य समाज पद्धति से संपन्न विवाह को भी हिन्दू विधि से संपन्न विवाह ही समझा जाता है लेकिन इस में दोनों परिवारों के सदस्यों का होना आवश्यक नहीं है। आज कल कई राज्यों में विवाह का पंजीकरण अनिवार्य कर दिया गया है। इस कारण किसी भी पद्धति से संपन्न विवाह का पंजीयन कराया जाना भी आवश्यक हो गया है। आप ने रजिस्ट्रार के विवाह प्रमाण पत्र का उल्लेख किया है जिस से लगता है कि आप ने आर्य समाज पद्धति से हिन्दू विवाह किया है अथवा विशेष विवाह अधिनियम के अंतर्गत विवाह संपन्न किया है।

प के दिए गए विवरण से पता लगता है कि आप के विवाह की जानकारी वधु पक्ष को नहीं है। यदि जानकारी हो भी गई है तो वधु पक्ष उस विवाह के विरुद्ध है और आप की पत्नी को आप के पास भेजना नहीं चाहता। आप अपनी पत्नी को अपने पास लाने के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत करना चाहते हैं। लेकिन इस याचिका को लेकर आप के मन में अनेक प्रकार के संदेह भी उपज रहे हैं। इस के लिए आवश्यक है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका क्या है यह आप समझ लें।

दि किसी व्यक्ति को उस की इच्छा के विरुद्ध किसी के द्वारा निरुद्ध किया गया है तो यह एक प्रकार से उस व्यक्ति की स्वतंत्रता का हनन है और उस व्यक्ति का कोई संबंधी या मित्र बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। ऐसी याचिका पर उच्च न्यायालय जिस क्षेत्र में उस व्यक्ति को निरुद्ध किया गया हो उस क्षेत्र के पुलिस अधिकारी को निर्देश दिया जाता है कि वह इस तथ्य की जानकारी करे कि जिस व्यक्ति के लिए बंदी प्रत्यक्षीकरण याचिका प्रस्तुत की गई है वह निरुद्ध है और यदि वह निरुद्ध है तो उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करे। इस पर पुलिस अधिकारी निरुद्ध व्यक्ति को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करता है अथवा साक्ष्य सहित यह रिपोर्ट प्रस्तुत करता है कि जिस व्यक्ति के लिए याचिका प्रस्तुत की गई है वह निरुद्ध नहीं है और स्वेच्छा से कथित स्थान पर निवास कर रहा है।

प के मामले में दोनों ही परिणाम सामने आ सकते हैं। पुलिस आप की पत्नी को न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है अथवा इस तथ्य की रिपोर्ट प्रस्तुत कर सकता है कि वह स्वेच्छा से अपने माता-पिता के साथ निवास कर रही है। यदि आप की पत्नी न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत की जाती है तो उस न्यायालय उस से सिर्फ इतना पूछ सकता है कि वह अपने माता-पिता के साथ स्वेच्छा से निवास कर रही है या उसे उस की इच्छा के विपरीत रोका गया है। यदि पत्नी यह कहती है कि वह अपनी इच्छा से अपने माता-पिता के साथ निवास कर रही है और आगे भी करना चाहती है तो न्यायालय उसे उस की इच्छानुसार निवास करने की स्वतंत्रता प्रदान कर देगा। यदि पुलिस रिपोर्ट प्रस्तुत करती है तो न्यायालय रिपोर्ट की सत्यता की जाँच करेगा और यदि यह पाएगा कि आप की पत्नी स्वेच्छा से अपने माता-पिता के साथ निवास कर रही है तो वह आप की याचिका को निरस्त कर देगा।

दि आप रजिस्ट्रार का विवाह प्रमाण पत्र, उच्च न्यायालय का प्रोटेक्शन आदेश, चित्र तथा फोन की रिकार्डिंग  न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करते हैं तो इस से यह तो साबित हो जाएगा कि वह आप की पत्नी है, आप का विवाह वैध है। लेकिन फिर भी पत्नी के यह चाहने पर कि वह माता-पिता के साथ रहना चाहती है उसे स्वतंत्र कर दिया जाएगा। कोई भी न्यायालय आप की पत्नी को आप के साथ रहने के लिए बाध्य नहीं कर सकती। केवल पत्नी के यह चाहने पर कि वह पति के साथ रहना चाहती है। उसे उस के पति के साथ भेजा जा सकता है।

प का विवाह यदि वैध है तो यह भी सच है कि आप की पत्नी दूसरा विवाह नहीं कर सकती। आप की पत्नी के माता-पिता भी उस का दूसरा विवाह नहीं करवा सकते हैं। यदि वे ऐसा कोई प्रयत्न करते हैं तो उन्हें न्यायालय के आदेश से ऐसा करने से आप रुकवा सकते हैं। आप के पास पत्नी को अपने पास लाने का सब से सही उपाय यह है कि आप हि्न्दू विवाह अधिनियम की धारा-9 के अंतर्गत वैवाहिक संबंधों की पुनर्स्थापना के लिए आवेदन प्रस्तुत करें। वहाँ से आप की पत्नी को सूचना भेजी जाएगी। पत्नी का जवाब आने पर न्यायालय आप दोनों के बीच सुलह कराने का प्रयत्न करेगा। यदि वहाँ आप दोनों के मध्य सुलह हो जाती है तो ठीक है अन्यथा आप उसी आवेदन को विवाह आवेदन में परिवर्तित कर विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं इस तरह से दोनों के मध्य विवाह विच्छेद हो जाएगा और दोनों विवाह से स्वतंत्र हो कर स्वेच्छा से अपने आगे का जीवन व्यतीत कर सकते हैं।

नागपुर में उच्च न्यायालय की स्थापना : भारत में विधि का इतिहास-86

भारत शासन अधिनियम की धारा 229 (1) में उच्च न्यायालय स्थापित करने की शक्ति प्रदान की गई थी। इस शक्ति का प्रयोग करते हुए मध्य प्रान्त के लिए नागपुर में उच्च न्यायलय स्थापित करने हेतु 2 जनवरी 1936 को लेटर्स पेटेंट जारी किया गया। नागपुर उच्च न्यायालय के गठन, अधिकारिता, शक्तियाँ आदि इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समान ही निरुपित की गई। 
ब्रिटिश भारत में स्थापित होने वाला यह अंतिम उच्च न्यायालय था। बाद में नागपुर को महाराष्ट्र राज्य में सम्मिलित कर लिया गया और वह मध्य प्रान्त से पृथक हो गया। उस स्थिति में मध्य प्रान्त के लिए  जबलपुर में पृथक से उच्च न्यायालय स्थापित किया गया जिस की दो पीठें इंदौर औऱ ग्वालियर में गठित की गईं।

भारत शासन अधिनियम 1935 और विधि व्यवस्था -2 : भारत में विधि का इतिहास-85

भारत शासन अधिनियम 1935 में उच्च न्यायालयों को पूर्व में प्राप्त अधिकारिता को ही अनुमोदित किया गया था। उन्हें 1915 के अधिनियम के अंतर्गत देशज प्रथाओं और रूढ़ियों से शासित राजस्व मामलों के विचारण का अधिकार नहीं था, लेकिन उन्हें इन मामलों पर अपीली अधिकारिता प्राप्त थी और वे राजस्व के मामलों में हुए निर्णयों की अपील सुन सकते थे।
उच्च न्यायालयों को इस अधिनियम से अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण की शक्ति प्रदान की गई थी। वे अधीनस्थ न्यायालयों को विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकते थे और उन के लिए प्रक्रिया संबंधी नियम बना सकते थे, प्रभावी होने के पूर्व जिन का अनुमोदन राज्य सरकार से होना आवश्यक था। इस अधिनियम में यह स्पष्ट नहीं था कि वह अधीनस्थ न्यायालयों के मुकदमों का स्थानांतरण कर सकता था या नहीं। लेकिन वह अधीनस्थ न्यायालय को किसी भी मामले को अपने सामने प्रस्तुत करने का आदेश दे सकता था और उसे निर्णीत कर सकते था।
उच्च न्यायालय द्वारा 50000 रुपए से अधिक मूल्य के मामलों में संघीय न्यायालय में अपील की जा सकती थी। इस संबंध में उच्चन्यायालय को यह विचार करने का अधिकार दिया गया था कि उस मामले में कोई ऐसा प्रश्न अंतर्वलित है या नहीं जो अपील के योग्य है। अपील के योग्य प्रश्न पाए जाने पर वह अपील किए जाने के लिए प्रमाण पत्र जारी कर सकता था। यदि इस तरह का प्रमाणपत्र जारी न किया जाता था तो पक्षकार संघ न्यायालय से विशेष अनुमति प्राप्त कर अपील कर सकता था।
इस अधिनियम में उच्च न्यायालयों की अर्थव्यवस्था का दायित्व राज्य सरकारों को अवश्य दिया गया था लेकिन ऐसी व्यवस्था थी कि वे न्यायालयों को किसी प्रकार भी प्रभावित कर सकें। इस तरह यह अधिनियम न्यायालयों के प्रसार और स्वतंत्र न्यायपालिका  के विकास की दिशा में महत्वपूर्ण कदम था। जिस की नींव पर स्वतंत्र भारत की न्यायपालिका खड़ी हो सकी।

भारत शासन अधिनियम 1935 और विधि व्यवस्था : भारत में विधि का इतिहास-84

गस्त 1935 में ब्रिटिश संसद ने भारत शासन अधिनियम 1935 पारित किया। इस अधिनियम ने 1919 के अधिनियम का स्थान लिया। इस अधिनियम के उपबंधों से भारत में विधान मंडल, कार्यपालिका और न्यायपालिका के कार्यों को विनियमित करने का उल्लेखनीय प्रयत्न किया गया था। न्याय और विधि के क्षेत्र में इस अधिनियम द्वारा उच्च न्यायालयों की रचना, गठन, अधिकारिता और शक्तियों क नए सिरे से निर्धारण किया गया।
स अधिनियम से उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालयों के रूप में मान्यता प्रदान की गई। इस के द्वारा ब्रिटिश सम्राट को उच्च न्यायालयों के लिए मुख्य न्यायाधीश सहित यथोचित संख्या में न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार प्रदान किया गया। साथ ही सम्राट को न्यायाधीशों को पदच्युत करने की शक्ति भी प्रदान की गई थी। इस अधिनियम के अंतर्गत गवर्नर जनरल को किसी भी उच्च न्यायालय के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार भी दिया गया था। उच्च न्यायालय के न्यायाधीश 60 वर्ष की आयु तक अपने पद पर बने रह सकते थे। नई व्यवस्था में न्यायपालिका को कार्यपालिका के नियंत्रण से मुक्त कर दिया गया था। पहले की व्यवस्था में न्यायाधीश ब्रिटिश सम्राट की इच्छा पर्यंत अपने पद पर बने रह सकते थे, जब  कि इस अधिनियम के द्वारा उन का कार्यकाल निश्चित कर दिया गया था। न्यायाधीशों पर किसी भी प्रकार का दबाव प्रभावी नहीं हो सकता था और वे स्वतंत्र रूप से न्याय प्रदान कर सकते थे। न्यायाधीशों को हटाने के मामले में प्रिवी कौंसिल ब्रिटिश सम्राट को निर्दिष्ट कर सकती थी। 
न्यायाधीशों की योग्यता भी नए सिरे से विनिर्दिष्ट की गई थी। इस के लिए दस वर्ष तक के अनुभवी बैरिस्टर, भारतीय सिविल सेवा में 10 वर्ष की सेवा पूर्ण कर लेने वाले अधिकारी जिस ने न्यूनतम दो वर्ष जिला न्यायाधीश के रूप में कार्य किया हो, 10 वर्ष से अधिक की अवधि तक लघुवाद न्यायालय में  सहायक न्यायाधीश अथवा न्यायाधीश के कार्य का अनुभव रखने वाले या ऐसे व्यक्ति जो 10 वर्ष तक उच्च न्यायालय में प्लीडर के रूप में कार्य कर चुके हैं उच्च न्यायालय के न्यायाधीश होने के लिए अर्हता रखते थे। 
न्यायाधीशों की नियुक्ति के समय ब्रिटिश सम्राट को उन के वेतन, भत्ते और पेंशन आदि लाभों को निर्धारित करने का प्राधिकार दिया गया था। यह स्पष्ट किया गया था कि इस व्यवस्था में न्यायाधीश की नियुक्ति के उपरांत कोई परिवर्तन नहीं किया जाएगा। इस तरह न्यायाधीशों को सेवा सुरक्षा प्रदान की गई थी जो स्वतंत्र न्यायपालिका के विकास के लिए महत्वपूर्ण सिद्ध हुई थी।

पटना और लाहौर में उच्च न्यायालयों की स्थापना : भारत में विधि का इतिहास-83

पटना उच्च न्यायालय
पटना उच्च न्यायालय
बिहार और उड़ीसा कलकत्ता प्रेसीडेंसी के ही भाग थे। 1912 में बिहार और उड़ीसा को बंगाल से अलग कर एक अलग प्रांत बनाया गया। तभी यह निश्चित हो गया था कि इस प्रांत के लिए अलग उच्च न्यायालय होना आवश्यक है। 22 मार्च 1912 को पटना में उच्च न्यायालय की स्थापना के लिए घोषणा पत्र जारी कर दिया गया। 1 दिसंबर 1913 को पटना हाईकोर्ट की इमारत के निर्माण के लिए शिलान्यास हुआ। 1916 में इस इमारत का निर्माण पूर्ण हो जाने पर 3 फरवरी 1916 को उच्च न्यायालय की स्थापना कर दी गई। पटना उच्च न्यायालय में वास्तविक रूप से कार्य 1 मार्च 1916 को ही आरंभ हुआ। पटना उच्च न्यायालय को इलाहाबाद उच्च न्यायालय के समान ही अधिकारिता प्रदान की गई थी। उड़ीसा को बिहार प्रांत से 1936 में पृथक कर दिया गया। हालांकि उड़ीसा उच्च न्यायलय की स्थापना भारत स्वतंत्र हो जाने के उपरांत 1948 में ही हो सकी। तब तक पटना उच्च न्यायालय की अधिकारिता उड़ीसा पर भी बनी रही। 
लाहौर उच्च न्यायालय
लाहौर हाईकोर्ट
पंजाब में महाराजा रणजीत सिंह ने सदर अदालत की स्थापना की थी। जैसे ही अंग्रेजों ने पंजाब पर अधिकार किया, पूर्व की परंपरा के अनुसार वहाँ चीफ कोर्ट के नाम से सदर अदालत को चालू रखा इसे ही बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन कहा जाता था। 1853 में बोर्ड ऑफ एडमिनिस्ट्रेशन  को चीफ कमिश्नर की कोर्ट में बदल दिया गया। इस न्यायालय में  एक एडमिनिस्ट्रेशन कमिश्नर और  एक जुडिशियल कमिश्नर हुआ करता था। 1919 में लेटर्स पेटेंट के अंतर्गत लाहौर में उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। जिस के लिए न्यायाधीशों की नियुक्ति ब्रिटिश सम्राट द्वारा की गई थी। 21 मार्च 1919 को स्थापित किए गए लाहौर उच्च न्यायालय की अधिकारिता में पंजाब और दिल्ली के क्षेत्र सम्मिलित थे। लाहौर उच्च न्यायालय को भी इलाहाबाद उच्च न्यायालय की तरह ही शक्तियाँ प्रदान की गई थीं। स्वतंत्रता के साथ ही देश का विभाजन हो जाने से लाहौर उच्च न्यायालय पाकिस्तान में चला गया। तब पंजाब के लिए पृथक उच्च न्यायालय की स्थापना की गई। 1966 में संघ राज्य दिल्ली के लिए उच्च न्यायालय की पृथक स्थापना तक पंजाब उच्च न्यायालय की अधिकारिता दिल्ली के क्षेत्र पर भी बनी रही।

इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना और अधिनियम में संशोधन : भारत में विधि का इतिहास-82

न् 1861 के अधिनियम की धारा 16 के अंतर्गत ब्रिटिश क्राउन ने 17 मार्च 1886 को एक लेटर्स पेटेंट जारी कर उत्तर पश्चिमी प्रांतों के लिए आगरा में एक उच्च न्यायालय स्थापित करने का उपबंध किया गया था। 1875 में यह उच्च न्यायालय इलाहाबाद अंतरित कर दिया गया। इस तरह इलाहाबाद उच्च न्यायालय की स्थापना हुई। इस उच्च न्यायालय को भी प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों की भांति ही दीवानी और दांडिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। लेकिन उसे उन की तरह नौकाधिकरण विषयक और दीवाला विषयक अधिकारिता प्रदान नहीं की गई। प्रेसीडेंसी नगरों के उच्च न्यायालयों को प्रेसीडेंसी नगरों के लिए आरंभिक अधिकारिता प्रदान की गई थी। जब कि इलाहाबाद उच्च न्यायालय को कोई आरंभिक दीवानी और दांडिक अधिकारिता नहीं दी थी। 
सपरिषद गवर्नर जनरल को उच्च न्यायालयों की अधिकारिता परिवर्तन का अधिकार
च्च न्यायालय अधिनियम, 1865 के उपबंधों के अधीन सपरिषद गवर्नर जनरल को 1861 के अधिनियम के अंतर्गत स्थापित उच्च न्यायालयों की अधिकारिता में उपयुक्त परिवर्तन करने का अधिकार दिया गया। लेकिन उक्त शक्ति का उपयोग ब्रिटिश क्राउन द्वारा अनुमोदन के पश्चात ही किया जा सकता था।
उच्च न्यायालय में न्यायाधीशों की संख्या में वृद्धि
भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम 1911 के द्वारा 1861 के अधिनियम में आवश्यक संशोधन किए गए। इन के द्वारा मुख्य न्यायाधीश सहित उच्च न्यायालयों में 16 के स्थान पर 20 न्यायाधीश नियुक्त किए जा सकते थे। सपरिषद गवर्नर जनरल उच्च न्यायालय में दो वर्ष के लिए अतिरिक्त न्यायाधीश नियुक्त कर सकता था। इस अधिनियम में स्पष्ट कर दिया गया था कि न्यायाधीशों को वेतन आदि का संदाय भारतीय राजस्व से ही किया जा सकता था। 
भारत शासन अधिनियम 1915
च्च न्यायालयों के पुनर्गठन और ब्रिटिश भारत में अन्य स्थानों पर उच्च न्यायालय स्थापित करने के लिए ब्रिटिश संसद द्वारा भारत शासन अधिनियम-1915 पारित किया गया। इस के द्वारा 1861 और  1911 के अधिनियमों का निरसन कर दिया गया। इस अधिनियम के उपबंधों के अंतर्गत न्यायाधीशों की संख्या की सीमा समाप्त कर दी गई और ब्रिटिश सम्राट को उपयुक्त संख्या में मुख्य न्यायाधीश व अन्य न्यायाधीश नियुक्त करने का प्राधिकार प्रदान किया गया। उच्च न्यायालयों को उन्मुक्त समुद्र पर होने वाले अपराधों और नौकाधिकरण विषयक अधिकारिता सहित अपीली दीवानी और दांडिक अधिकारिता दे दी गई। इस अधिनियम के द्वारा उच्च न्यायालयों को अभिलेख न्यायालय का स्तर प्रदान किया गया और उन्हें न्यायालयों के कामकाज को विनियमित करने के लिए नियम बनाने का प्राधिकार प्रदान किया गया। उच्च न्यायालयों को राजस्व संकलन संबंधी कार्यों के लिए जो स्थानीय प्रथाओं और रूढ़ियों के अनुसार किए गए हों उन पर भी अधिकारिता प्रदान की गई थी। 
स अधिनियम से उच्च न्यायालयों को अधीनस्थ न्यायालयों पर अधीक्षण का अधिकार प्रदान किया गया। वे अधीनस्थ न्यायालयों को उपयुक्त विवरण प्रस्तुत करने का निर्देश दे सकते थे और किसी भी मामले को उचित समझने पर स्वयं के समक्ष अंतरित कर सकते थे। अब उच्च न्यायालय अधीनस्थ न्यायालयों की कार्यवाही और प्रक्रिया के संबंध में आवश्यक नियम, विनियम व प्रपत्र जारी कर सकते थे, लेक

उच्च न्यायालयों की स्थापना के प्रभाव : भारत में विधि का इतिहास-81

प्रेसीडेंसी नगरों में उच्च न्यायालयों की स्थापना भारत में न्यायिक व्यवस्था में एक बड़ा बदलाव था। इस से पूर्व में प्रचलित दोहरी न्यायिक प्रणाली का अंत हो गया था। यह व्यवस्था व्यावहारिक और सरल थी। पूर्ववर्ती सुप्रीमकोर्ट और सदर दीवानी और सदर निजामत अदालतों की अधिकारिता उच्च न्यायालय में निहित हो जाने से उस का कार्यक्षेत्र अत्यंत विस्तृत हो गया था। पहले सुप्रीम कोर्ट में केवल ब्रिटिश व्यक्ति ही न्यायाधीश हो सकते थे, लेकिन 1861 के अधिनियम से भारतीय व्यक्तियों के हाईकोर्ट में न्यायाधीश बनने का मार्ग खुल गया था। इस अधिनियम से स्थानीय विधियों, प्रथाओं और परंपराओं का न्याय करने में समुचित उपयोग का मार्ग भी खुल गया था। 
पूर्व में अधीनस्थ न्यायालयों द्वारा जिस विधि का उपयोग किया जाता था, सुप्रीमकोर्ट में उस से भिन्न विधि का उपयोग किया जाता रहा था। उच्च न्यायालयों की स्थापना से विधि और साम्य के सिद्धांतों का सभी न्यायलयों में एक जैसा उपयोग आरंभ हो चला था। उच्च न्यायालय अपनी अपीली अधिकारिता में अधीनस्थ न्यायालयों में अपनाई जाने वाली विधि और साम्य के सिद्धांतों का ही उपयोग करने लगे थे। इस से विधि और साम्य के सिद्धांतों में एक रूपता दृष्टिगोचर होने लगी थी। इस ने न्यायपालिका की विश्वसनीयता में वृद्धि की थी। हालांकि अधिनियम में न्यायाधीशों को सद्विवेक से काम लेने की हिदायत दी गयी थी लेकिन इसे परिभाषित न करने के कारण कोई भी न्यायाधीश सद्विवेक का उपयोग किसी भी तरह कर सकता था और इस से कुछ कठिनाइय़ाँ बढ़ गई थीं। 
च्च न्यायालयों की स्थापना के उपरांत ही सिविल प्रक्रिया संहिता दंड प्रक्रिया संहिता और भारतीय दंड संहिता के निर्माण को बल मिला और इन के निर्माण से संपूर्ण भारत में दंड व्यवस्था और दीवानी और दांडिक न्याय में प्रक्रिया संबंधी एकरूपता स्थापित हो सकी थी। जिन क्षेत्रों में स्पष्ट विधि संहिताएँ नहीं बनाई गई थीं वहाँ विधि की दुविधा बनी रहती थी। इस तरह 1861 के अधिनियम से भारत में उच्च न्यायालयों की स्थापना विधि और न्याय के क्षेत्र में एक युगांतरकारी घटना हो गई थी। इस व्यवस्था से न्याय प्रशासन के अंतर्विरोधों के समाप्त कर सामंजस्य स्थापित करने का प्रयत्न किया गया था। उच्च न्यायालयों की स्थापना से आंग्ल-भारतीय संहिताओं के सृजन की राह बन गई थी। लेकिन यह सब यूँ ही नहीं हो गया था। इस के पीछे 1857 का आजादी का असफल आँदोलन था जिसे अंग्रेजी सत्ता ने एक विद्रोह के रूप में देखा था। और जब जब भी विद्रोह हुए हैं उस का एक प्रमुख कारण तत्कालीन न्याय व्यवस्था पर से जनता का विश्वास उठना रहा है।
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