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मुकदमों में देरी अदालतों की बहुत कम संख्या के कारण होती है।

समस्या-

संजु देवी ने गांव- ऱानोली, तहसील- खाटुश्यामजी, जिला- सीकर, राजस्थान से पूछा है-,

मैं अपने पिता की सबसे छोटी पुत्री हूँ। मेरे पिता की मौत बचपन में हो चुकी थी। शादी के बाद मैंने पिता की पैतृक संपति में हिस्से का वाद दो साल पहले कर दिया था। लेकिन मेरे भाई ने अभी तक न्यायालय में कोई जवाब नहीं दिया। इस तरह मेरे केस को कमजोर कर दिया गया है? न्यायालय के स्टे के बाद भी मेरी माँ का सम्पूर्ण भूमि से हकत्याग करवा कर अपने नाम पर चढवाने की कोशिश की गई है।  लेकिन मैंने पटवारी को पूरी बात बताकर उस हकत्याग को निरस्त करवाने के लिये एक और वाद दायर किया है, अब मेरी मॉ चल बसी है। क्या मेरे केस का कुछ भविष्य है? स्टे के बाद भी वो लोग मुझे नुकसान पहुँचाने की पूरी कोशिशें कर के मुझे एक तरह से बेदखल करना चाहते हैं। सर मार्गदर्शन देवे।

समाधान-

प की समस्या भारत के तमाम न्यायार्थियों की समस्या है।  हमारे देश में न्यायालयों की बहुत कमी है। संयुक्त राज्य अमेरिका में 10 लाख की आबादी पर 140 से अधिक अदालतें हैं, जब कि भारत में 10 लाख की आबादी पर केवल मात्र 12-13 अदालतें हैं। ऐसी स्थिति में संयुक्त राज्य अमेरिका के मुकाबले में हमारी अदालतों पर 10 गुना से भी अधिक मुकदमों के निपटारे का बोझा है। हमारे यहाँ कम अदालतें होने का एक कारण यह है कि हमारी सरकारें अदालतों की संख्या को बढ़ाने पर कोई रुचि नहीं लेतीं क्यों कि वे समझती हैं कि अदालते बढ़ा देने से उनकी पार्टी को अगले चुनाव में मिलने वाले वोटों में कोई इजाफा नहीं होने वाला है। वे सारे फण्डस को इस तरह उपयोग में लेते हैं जिस से वे अगले चुनाव में वोट प्राप्त करने के लिए इस्तेमाल कर सकें।

दालतें इन मुकदमों को निपटाने के लिए कोशिश भी करती है। अधिक मुकदमे होने और पुराने मुकदमों की भरमार होने के कारण नए मुकदमों में जरा जरा सी बात के लिए पेशी की तारीख बदल दी जाती है। इस वर्ष उच्चतम न्यायालय और उच्च न्यायालय ने सभी अधीनस्थ न्यायालयों को निर्देश दिए हैं कि वे साल के अंत तक 10 वर्ष से अधिक पुराने मुकदमों का निपटारा कर दें। इस के बावजूद बहुत सी अदालतें ऐसी हैं जहाँ 20 वर्षे से अधिक पुराने मुकदमो का निपटारा भी नहीं हो सकेगा।

प के मामले में हो सकता है कि आपके भाइयों ने अदालत के सम्मन लेने में ही देरी की हो। इस कारण कुछ पेशियाँ हो गयी हों वर्ना अब यह नियम है कि प्रतिवादी की तामील होने के 90 दिनों के भीतर उसे अनिवार्य रूप से जवाब दावा पेश करना होगा। यदि 90 दिनों के भीतर जवाब दावा पेश न हुआ हो तो आप अदालत पर दबाव बनाएं कि वह प्रतिवादीगण के जवाब के अवसर को समाप्त करते हुए आगे की कार्यवाही करे।

प सोच रही हैं कि देरी करने से आप का मुकदमा कमजोर हो जाएगा। पर ऐसा नहीं है। बस आप यह ध्यान रखें कि आप का वकील अच्छा हो और पैरवी में किसी तरह की कमजोरी या भूल न हो। यह आप की स्वयं की मुस्तैदी से ही संभव है। नतीजें में देरी हो सकती है लेकिन  नतीजा आप के पक्ष में आएगा।

हाँ तक पूरी न्याय व्यवस्था को गति प्रदान करने की बात है तो उस के लिए जरूरी है कि जनता का दबाव भी राजनेताओँ और राज्य सरकार पर होना चाहिए। अभी अवय्स्क बालिकाओं के प्रति यौन अपराधों के मामले में दबाव था तो सरकारों को इस तरह की नयी अदालतें बड़ी संख्या में खोलनी पड़ीं हैं। इस से उस तरह के अपराधों में साल-छह माह में ही फैसले आने लगेंगे। इसी तरह का दबाव समूची न्याय व्यवस्था को सुधारने के लिए पड़े तो बात बन सकती है, पर वह पूरे देश के स्तर का मसला है।

माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

खेत में जाने के रास्ते के लिए एसडीओ को आवेदन प्रस्तुत करें।

समस्या-

नवरतन सैन ने रानीसर, बीकानेर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरा खेत जो कि मेरे पास के गांव बबलु की कांकड़ में पड़ता है उस खेत का मार्ग किसी व्यक्ति ने रोक दिया है और बोल रहा है कि तुम्हारा मार्ग नहीं है। जब मैंने इस सम्बन्ध में पटवारी से बात की तो वह बोला कि तुम्हारा कागजों में कटान का मार्ग नहीं है! तो अब मैं अपने खेत केसे जाउंगा और मुझे अपने खेत का ( कटान) का मार्ग कैसे मिलेगा?

समाधान-

प के खेत पर जाने का मार्ग आप को कितने वर्षों से प्राप्त था यह आप ने नहीं बताया जिस से यह निर्धारित किया जा सके कि क्या यह आप का सुखाधिकार था। यदि आप को यह मार्ग 20 वर्ष से अधिक से मिला हुआ था तो वह  सुखाधिकार हो सकता है। यदि ऐसा है तो फिर उस आधार पर सिविल न्यायालय में भी वाद किया जा सकता है और आप को उस रास्ते से जाने से रोकने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है।

यदि आप के खेत पर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है और आप को अपने खेत तक जाने के लिए किसी के खेत से गुजरना ही हो तो आप राजस्थान टीनेंसी एक्ट 1955 की धारा 251 ए के अंतर्गत एसडीओ के न्यायालय में सब से कम दूरी वाला रास्ता दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

विधवा और उस की पुत्री को विभाजन कराने का अधिकार है।

समस्या-

सौरव ताया ने रसीना, कैथल, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

20 दिन पहले मेरे भाई की मौत हो गई है और अब से 2 साल पहले मेरे पापा की मौत हो गई थी। मेरे भाई की शादी को 2 साल 6 माह हो गए है। क्या उसकी पत्नी और डेढ़ साल की बेटी का उनकी सम्पत्ति पर अधिकार है? जबकि उनके पास मेरे भाई के नाम सहित कोई भी दस्तावेज नहीं है और मेरे पिता के बाद उनकी सम्पति का बंटवारा नहीं हुआ। उन की संपत्ति अपने आप मेरी मां और हम 3 भाईयों के हिस्से में आ गई थी। भाभी हमारे घर रहना नहीं चाहती और ना ही अपनी बेटी को छोड़ रही है।

समाधान-

प के पिता के देहान्त के उपरान्त पिता की संपत्ति के चार हिस्सेदार हुए आप तीन भाई और माँ। इस संपत्ति में एक हिस्सा आप के मृत भाई का था। जेसै आप के पिता की संपत्ति आप चारों के नाम अपने आप आ गयी थी, उसी तरह आप के भाई के हिस्से की संपत्ति उस की पत्नी और बेटी के नाम आ चुकी हैं।

आप की भाभी आप के साथ नहीं रहना चाहती तो यह उन की मर्जी है उन्हें साथ रहने को बाध्य नहीं किया जा सकता। डेढ़ वर्ष की उन की बेटी उन की जिम्मेदारी है, वह उन के साथ ही रहेगी जब तक वह वयस्क हो कर उस का विवाह नहीं हो जाता।

आप की जिस संपत्ति में ¼ हिस्सा आप की भाभी व भतीजी का है वे उस हिस्से को प्राप्त करने की अधिकारी हैं। आप स्वैच्छा से दें तो ठीक अन्यथा आप की भाभी विभाजन का वाद संस्थित कर के भी अपना हिस्सा अलग प्राप्त कर सकती हैं।

रास्ते खुला रखने के लिए दीवानी न्यायालय में स्थाई व्यादेश का वाद संस्थित करें।

समस्या-

महावीर ने गाँव सुमाड़ी भरदार, पो0 तिलवाड़ा, जिला रूद्रप्रयाग गढ़वाल , उत्तराखंड  समस्या भेजी है कि-

मुख्य रास्ते से मेरे घर जाने का रास्ता मेरे पड़ोसियों के खेत से जाता है।  इन्होंने मेरे पिता जी की मृत्यु के बाद यह रास्ता बन्द कर दिया है, जबकि यह रास्ता पूर्व से ही खेत में कृषि कार्य के लिए निर्धारित होने पर भी मेरे पिता ने 100रू देकर लिया था।  मेरी माँ रास्ता बन्द करने की सूचना SDM कार्यालय में दर्ज कराने पर भी निर्माण न रूकने पर DM के समक्ष उपस्थित होकर प्रार्थना पत्र देने पर भी हमारी गैरमौजूदगी में रास्ता बन्द कर दिया है। जिस रास्ते को हमें उपयोग हेतु बता रहे हैं उस पर बरसात में भयंकर बरसाती पानी बहता है। जिसका वीडियो DM साहब को भी दिखाया दिया है। कृपया रास्ता खुलवाने हेतु जानकारी दें।

समाधान-

पने घर और अपनी संपत्ति पर आने जाने के रास्ते का अधिकार अत्यन्त महत्वपूर्ण अधिकार है। 100 रुपए दे कर रास्ता खरीदने की बात कुछ जम नहीं रही है। वैसे 99 रुपए तक की कोई स्थावर संपत्ति खरीदी जाए तो उस की रजिस्ट्री कराना जरूरी नहीं है। यदि 99 रुपए या  उस से कम का सौदा हुआ हो और उस की लिखत हो तो उसे काम मेें लिया जा सकता ैहै। अन्यथा उस रास्ते का उपयोग करते हुए आप को 20 वर्ष से अधिक तो हो ही गए होंगे तो आप का उस खेत में से गुजरने का अधिकार आप का सुखाधिकार का अधिकार है। इस अधिकार का प्रवर्तन दीवानी न्यायालय द्वारा कराया जा सकता है।

आप तुरन्त दीवानी न्यायालय में राज्य सरकार को तहसीलदार के माध्यम से पक्षकार बनाते हुए विपक्षी पक्षकार के विरुद्ध दीवानी न्यायालय में स्थाई ्व्यादेश का वाद प्रस्तुत करें और साथ में अस्थाई व्यादेश का आवेदन प्रस्तुत कर तुरन्त निर्माण को रुकवाने और आने जाने में बाधा पैदा न करने का आदेश करावें। यदि रास्ता स्थाई रूप से बंद कर दिया गया हो तो फिर घोषणा की प्रार्थना भी साथ ही इसी वाद में करनी होगी।  राज्य सरकार के विरुद्ध कोई भी वाद  60 दिन का नोटिस दे कर ही प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन आवश्यक होने पर बिना नोटिस के वाद पेश करने की अनुमति के लिए आवेदन धारा 80 सीपीसी के साथ वाद तुरन्त प्रस्तुत किया जा सकता है।

अनुकम्पा नियुक्ति अधिकार नहीं, बल्कि अन्य को अधिकार से वंचित करना है।

Compassionate Appointmentसमस्या-

विशाल शर्मा ने सीहोर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी जिला कलेक्ट्रेट कार्यालय सीहोर(म0प्र0) में सहा ग्रेड-2 के पद पर पदस्थ थे उनकी मृत्यु 27/05/2003 को हो गई। उस समय मेरी आयु 16 वर्ष थी तब मैं ने अनुकम्पा नियुक्ति के लिए आवेदन किया था। मेरी आयु 18 वर्ष की न होने के कारण उस समय मेरे आवदेन पर विचार नहीं किया गया। दिसम्बर 2005 में 18 वर्ष की आयु पूर्ण करने के पश्चात मैं ने पुनः आवेदन किया तब मेरा प्रकरण यह कहके टाल दिया कि विभाग में पद खाली नहीं है। सन् 2006 में मेरी बड़ी बहन ने पारिवारिक आवश्यकताओं को देखते हुए संविदा शिक्षक की परीक्षा पास की तथा वह संविदा शिक्षक बन गई। तदुपरांत 1वर्ष पूर्ण होने के बाद मैं पुनः विभाग में गया तो उन्होने मेरे प्रकरण यह कहके बंद कर दिया की आपकी बहन नौकरी में है। इसलिए आपको पात्रता नहीं आती। उसकी 2008 में शादी हो गई, उसके बाद में फिर विभाग में गया शपथ पत्र लेकर लेकिन मेरी बात नहीं सुनी गई । तत्पश्चात मैं ने 2009 में हाईकोर्ट जबलपुर में रिट पिटिशन दायर की । मेरे अधिवक्ता द्वारा विभाग को नोटिस दिया गया लेकिन चार वर्ष पूर्ण होने के बाद भी विभाग की तरफ से कोई जवाब नहीं आया। तब 05/2013 को मैं केस जीता ओर विभाग को 3 माह का समय दिया गया कि इनका निराकरण कर माननीय उच्च न्यायालय को सूचित करें। अथक प्रयासों के बाद 09/2013 को जिला कलेक्ट्रेट सीहोर मे मुझे सहा0 ग्रेड-3 के पद के लिए नियुक्ति आदेश दिया गया। मैं यह जानना चाहता हूँ की विभाग की लापरवाही के कारण मेरे परिवार को उन 8 सालों में जो आर्थिक और मानसिक हानि हुई है क्या माननीय उच्च न्यायालय द्वारा मुझे कुछ राहत मिल सकती है।

समाधान-

नुकम्पा नियुक्ति किसी व्यक्ति का कानूनी अधिकार नहीं है। यह अनुकम्पा है। पूरी तरह नियोजक की अनुकम्पा पर निर्भर है। यह नागरिकों के समानता के मूल अधिकार के विरुद्ध भी है। शासकीय सेवाओं पर देश के सभी नागरिकों का समान अधिकार है। मृतक आश्रितों को नौकरी देने का नियम उस का अपवाद है। एक मृतक आश्रित को नौकरी देना अनेक व्यक्तियों को योग्यतानुसार शासकीय नौकरी प्राप्त करने के अधिकार को वंचित करता है। मृतक आश्रितों को सरकार अन्य आर्थिक सहायता प्रदान करना उचित हो सकता है। लेकिन अनुकम्पा नियुक्ति तो सीधे सीधे समानता के अधिकार से लोगों को वंचित करती है।

स तरह यदि आप को जद्दोजहद के उपरान्त नौकरी मिल गई है तो यही पर्याप्त है। आप ने नौकरी के लिए उच्च न्यायालय में रिट याचिका की थी। आप वहाँ रिट याचिका में आनुषंगिक राहत के रूप में नौकरी के साथ क्षतिपूर्ति की राहत भी मांग सकते थे, या खुद उच्च न्यायालय नौकरी देने की राहत देने के साथ आप को क्षतिपूर्ति की राहत भी प्रदान कर सकता था। लेकिन वह राहत उस रिट याचिका में नहीं दी गई। अब आप वह राहत किसी अन्य कानूनी कार्यवाही के माध्यम से प्राप्त नहीं कर सकते।

दत्तक का पूर्व संपत्तियों पर अधिकार

Mother Holding Child's Handसमस्या-
अखिलेश चौधरी ने जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादाजी के 7 संताने हैं मेरे ताउजी के कोई संतान नहीं हैं उनके पास काफी चल और अचल संपति हैं, जिस में से कुछ तो मेरी ताउजी के नाम से हैं उन्‍होने मेरे छोटे भाई को गोद ले रखा है। किन्‍तु मेरी जानकारी में किसी प्रकार का गोदनामा/ इकरारनामा अथवा वसीयत या गोद लेने का पंजीयन नहीं है।  लोक नजर में वह उनका गोदपुञ है व उसका परिवार उनके साथ रहता है। आप मुझे यह अवगत करावें कि वह ताउजी की संपति के साथ साथ मेरे पिताजी की संपति में भी उत्‍तराधिकार हक रखता है या अथवा दोनों में। इस प्रकार का गोद नियम सम्‍मत होगा या नहीं?  क्‍योंकि मेरी ताईजी कहती हैं कि वह हमारी जमीन में भी हिस्‍सा लेगा अथवा उनके रहमोकरम पर हमारे लिये हिस्‍सा छोडेगा। इस संबंध में मुझे कानूनी राय दें।

समाधान-

त्तक ग्रहण दत्तक के दस्तावेज को पंजीकृत करवा कर भी किया जा सकता है। लेकिन इस दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी नहीं है। लेकिन यह आवश्यक है कि दत्तक ग्रहण के समय दत्तक ग्रहण किए जाने वाले व्यक्ति की आयु 15 वर्ष से अधिक नहीं हो। इस कारण यदि आप के भाई को अभी तक गोद नहीं लिया गया है तो अब गोद लेना संभव नहीं है। यदि दत्तक ग्रहण का दस्तावेज पंजीकृत न हो तो गोद लेने की रस्म रिवाज के अनुसार होना जरूरी है। यदि यह रस्म समारोह नहीं हुआ है और उस की कोई साक्ष्य नहीं है तो उस का गोद लिया जाना प्रमाणित होना कठिन है।

दि किसी व्यक्ति को कानूनी तरीके से गोद नहीं लिया गया है तो वह अपने दत्तक पिता की संपत्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त नहीं कर सकता। उसे संपत्ति प्राप्त होने का केवल वसीयत के द्वारा ही प्राप्त हो सकती है।

प के मामले में आप के भाई को गोद लेना प्रमाणित नही है। हो सकता है उसे गोद पुत्र कहा जाता हो लेकिन केवल उस के नाम वसीयत ही कर रखी हो जो कि पंजीकृत नहीं हो। वसीयत का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है।

गोद जाने वाले व्यक्ति की अपने मूल परिवार में जो भी प्रास्थिति होती है वह समाप्त हो जाती है। अर्थात उस का अपने मूल परिवार से उत्तराधिकार का अधिकार समाप्त हो जाता है। लेकिन यदि वह गोद जाने के पहले ही कोई संपत्ति प्राप्त कर चुका है या किसी संपत्ति में अधिकार प्राप्त कर चुका है तो उस पर उस का अधिकार समाप्त नहीं होता।

प के मामले में आप के भाई का आप के पिता की संपत्ति में अधिकार बना हुआ है क्यों कि उस के गोद जाने का कोई प्रमाण नहीं है। इस कारण वह अपने कथित गोद पिता की संपत्ति को तो प्राप्त करेगा ही वह अपने मूल परिवार की संपत्ति भी उत्तराधिकार में प्राप्त करेगा।

अनुकम्पा नियुक्ति किसी का अधिकार नहीं, पिता की संपत्ति में हर उत्तराधिकारी का अधिकार है।

Compassionate Appointmentसमस्या-
आशीष कुमार ने दुमका, झारखण्ड से पूछा है-

मेरे पिताजी झारखण्ड मे साहकारिता विभाग में लिपिक के पद पर कार्यरत थे। वे कैँसर रोग से पीड़ित थे। उनका देहान्त 20 फरवरी 2012 को हो गया। वे तब तक सरकारी सेवा में कार्यरत थे। हम तीन भाई हैं। सब से बड़ा मैं हूँ और बेरोजगार हूँ, लेकिन मेरी माँ और छोटा भाई मझले भाई को अनुकम्पा के तहत नौकरी दिलाना चाहते हैं और मुझे अपने पिताजी का कोई रुपया पैसा जमीन जायदाद नहीं देना चाह रहे हैं। मुझे नौकरी और जायदाद लेने का उपाय सुझावें और क्या मैं बड़ा बेटा होने के नाते नौकरी पाने का हकदार हूँ या नहीं?

समाधान-

राजकीय सेवा में रहते हुए किसी राज्य कर्मचारी की मृत्यु हो जाने पर उस के किसी आश्रित को अनुकंपा नियुक्ति पाना किसी तरह का अधिकार नहीं है। यह राज्य की अनुकम्पा मात्र है। किसी राज्य कर्मचारी की सेवा में रहते हुए मृत्यु हो जाने पर अचानक उस का परिवार किसी तरह की आमदनी न होने पर निराश्रित न हो जाए, उसे जीने का सहारा बना रहे इस सिद्धान्त के अंतर्गत अनुकम्पा नियुक्ति दी जाती है। प्रत्येक राज्य सरकार के इस के अपने नियम हैं। ऐसी नियुक्ति नियमों के अनुसार और पद रिक्त होने पर ही प्रदान की जा सकती है।

हाँ तक आप के परिवार का प्रश्न है आप की माता जी और आप तीनों भाई आप के पिता के उत्तराधिकारी हैं। कोई भी रोजगार पर नहीं है। ऐसी अवस्था में आप के पिता के आश्रितों में से किसी एक को जिस पर शेष तीन उत्तराधिकारियों में से किसी को आपत्ति न हो उसे ही नौकरी दी जा सकती है। इस कारण आप चारों उत्तराधिकारियों को किसी एक पर सहमत होना पड़ेगा। माँ की सहमति अधिक महत्वपूर्ण है। यदि आप की माता जी और दोनों भाई आप को नौकरी दिलाने के लिए अपना अनापत्ति प्रमाण पत्र दे देते हैं तो आप को अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त हो सकती है, अन्यथा नहीं। केवल बड़ा पुत्र होने मात्र से आप को कोई अधिकार प्राप्त नहीं होता है।

प के पिता की जमीन, जायदाद और नौकरी के कारण मिलने वाले लाभ हैं उन पर आप के पिता के चारों उत्तराधिकारियों का समान अधिकार है। यदि अन्य उत्तराधिकारी उस में आप का हिस्सा नहीं देना चाहते हैं तो आप अचल संपत्ति के लिए बँटवारे का दीवानी वाद न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं तथा नौकरी के कारण आप के पिता के लाभ जो उन के विभाग से मिलने वाले हैं उन्हें प्राप्त करने के लिए आप विभाग को सीधे आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं वे इन लाभों का वितरण रोक देंगे। आप जिला न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर अपने चौथाई हिस्से के लिए उत्तराधिकार प्रमाण पत्र प्राप्त कर सकते हैं। उस प्रमाण पत्र के आधार पर विभाग आप को उन की मृत्यु पर देय लाभों का एक चौथाई हिस्सा आप को अदा कर देगा।

माता-पिता के जीवित रहते उन की संपत्ति पर संतानों को कोई अधिकार नहीं।

DCF 1.0समस्या-
सचिन शर्मा ने दिल्ली  से पूछा है-

मेरी एक मित्र लड़की की एक समस्या है, जिस में आप की मदद चाहिए। उस के पास इंटरनेट न होने के कारण मैं आपको लिख रहा हूँ।  उस का भाई लगातार माता-पिता पर सम्पत्ति अपने नाम करने का दबाव बनाता है। अभी तक माता -पिता की सारी सम्पत्ति उन्हीं के नाम पर है। घर में बस माता-पिता और वो दो बहन -भाई , कुल चार सदस्य हैं।  वह जानना चाहती है कि माता पिता की सम्पति पर एक अविवाहित लड़की का क्या हक़ है? शादी से पहले औऱ बाद में क्या फर्क पड़ता है? क्या सम्पत्ति उसके भाई के नाम हो जाने से कोई फर्क पड़ेगा? कृपया उचित सलाह दे जिससे वो अपना हक़ आसानी से ले पाये।

समाधान-

ब से पहले तो यह जान लें कि संपत्ति दो प्रकार की होती है। स्थावर संपत्ति तथा चल संपत्ति। मकान जमीन आदि स्थावर संपत्तियाँ हैं, जब कि रुपया, जेवर, गाड़ी, बैक बैलेंस आदि चल संपत्तियाँ हैं। चल संबत्तियाँ जिस के कब्जे में हैं उसी के स्वामित्व की हैं। जब कि घर जमीन आदि जिस के नाम पंजीकृत हैं उस के स्वामित्व की हैं। पिता की संपत्ति पिता की है और माता की संपत्ति माता की है।

ब तक माता पिता जीवित हैं, उन की संपत्ति पर किसी का कोई अधिकार नहीं है। पुत्र को वयस्क अर्थात 18 वर्ष का होने तक तथा पुत्री का उस के विवाहित होने तक मात्र भरण पोषण का अधिकार है।

माता या पिता के देहान्त के उपरान्त यदि वे परिवार के या परिवार के बाहर के किसी सदस्य के नाम  वसीयत कर देते हैं तो जो संपत्ति जिस के नाम वसीयत की गई है उस के स्वामित्व की हो जाती है।

यदि माता पिता किसी को भी वसीयत नहीं करते हैं अपनी चल संपत्ति अपने नाम ही छोड़ देते हैं तो उस संपत्ति पर उस के सभी उत्तराधिकारियों का समान अधिकार होता है। उदाहरणार्थ माता के देहान्त पर उन के नाम की संपत्ति पर पति, पुत्र व पुत्री का समान अधिकार होने से प्रत्येक का संपत्ति के तीसरे हिस्से पर अधिकार होगा। यदि पिता की मृत्यु हो जाती है तो उन की संपत्ति पर माता, पुत्र व पुत्री का समान अधिकार होगा इस तरह तीनो एक तिहाई संपत्ति के अधिकारी होंगे।

प के मामले में माता पिता पर पुत्र यह दबाव डाल रहा है कि संपत्ति उस के नाम कर दी जाए। इस का अर्थ यही है कि वह संपत्ति की वसीयत अपने नाम करवाना चाहता है। जिस का असर यह होगा कि उन के देहान्त के उपरान्त संपत्ति पुत्र की हो जाएगी। शेष दोनों उत्तराधिकारियों को कुछ नहीं मिलेगा। वसीयत इस तरह भी की जा सकती है कि माता-पिता में से किसी एक के देहान्त के उपरान्त संपत्ति दोनों में से जो भी जीवित रहेगा उस की रहेगी तथा उस की भी मृत्यु हो जाने के उपरान्त पुत्र या पुत्री की होगी या फिर दोनों को क्या क्या संपत्ति प्राप्त होगी।

स तरह वास्तव में माता-पिता की संपत्ति पर उन की संतानों को माता-पिता के जीवित रहते कोई अधिकार नहीं होता। पुत्री को विवाह तक भरण पोषण का अधिकार होता है। विवाह के बाद वह भी समाप्त हो जाता है। लेकिन माता पिता कोई निर्वसीयती संपत्ति छोड़ जाएँ तो पुत्री का उत्तराधिकार का अधिकार विवाह के बाद भी जीवन पर्यन्त बना रहता है।

जकल पुश्तैनी संपत्तियाँ नाम मात्र की रह गई हैं। यदि कोई पुश्तैनी संपत्ति हो तो 2005 से उस में पुत्री को पुत्र के समान ही प्रदान किया गया है। उस अधिकार को कैसे भी नहीं समाप्त किया जा सकता। क्यों कि वह जन्म के साथ ही प्राप्त हो जाता है।

पैतृक संपत्ति न होने पर संतानों को परिजनों की संपत्ति में कोई अधिकार नहीं

समस्या-

जौनपुर, उत्तर प्रदेश से अलका सिंह ने पूछा है-

मैंने दो साल पांच माह पहले एक पंडित लड़के से शादी की थी।  जिस से परिवार वाले सहमत नहीं थे धीरे धीरे पति के घर के लोग जहाँ हम रहते है वहाँ आने लगे हैं।  लेकिन वो मुझे घर नहीं आने देते हैं और न ही संपत्ति में हक देना चाहते।  इन परिस्थितियों में क्या वहाँ जाने का मेरा हक है? क्या संपत्ति में मेरा या मेरे बच्चों का कोई हक बनेगा?

समाधान-

Shopsप ने स्वयं अपनी इच्छा से और परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह किया है तो नाराजगी तो झेलनी पड़ेगी। आप के पति के घर के लोग आप के पास आने लगे हैं यह अच्छी बात है। परिवार की इच्छा के विरुद्ध विवाह करने पर परिवार की जो नाराजगी है वह आसानी से तो खत्म होगी नहीं पर उन के आने जाने से विरल होगी और धीरे धीरे समाप्त भी होगी। इस में उन लोगों के प्रति आप का व्यवहार भी अच्छी खासी भूमिका अदा करेगा। आप का अपने पति के परिवार में जाने या साथ रहने का कोई कानूनी हक नहीं है। जब तक आप को न लगे कि नाराजगी समाप्त हो गयी है या अत्यन्त कम हो गई है वहाँ न जाएँ तो ही ठीक है। जाएँ तो भी बिना परिवार के किसी बुजुर्ग का बुलावा पाए न जाएँ।

संपत्ति के मामले में भारतीय हिन्दू परिवारों में बहुत भ्रांतियाँ हैं, विशेष रूप से पुश्तैनी/ पैतृक संपत्ति को ले कर।  1956 के पूर्व परंपरागत हिन्दू विधि में इस तरह की संपत्ति का अस्तित्व तब बनता था जब संपत्ति बनाने वाले व्यक्ति का बिना कोई वसीयत किए ही देहान्त हो जाता था। तब जिन वंशजों को संपत्ति मिलती थी उस में उन के वंशजों का भी अधिकार होता था, लेकिन बेटियों और पत्नी का अधिकार जीवनकाल तक सीमित होता था। 17 जून 1956 के पहले जो संपत्तियाँ पैतृक संपत्ति हो चुकी थी केवल वे ही अब पैतृक रह गई हैं। उन में भी एक बार विभाजन हो चुका है तो उन का भी पैतृक संपत्ति जैसा चरित्र समाप्त हो चुका है। अब संपत्तियाँ जिस की हैं जीवनकाल में उसी का उन पर स्वामित्व है। वह या तो उन के संबंध में वसीयत कर सकता है या फिर उस के देहान्त के उपरान्त वह संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार हस्तांतरित हो जाती है। इस कारण आप के पति को जब तक कोई संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त न हो जाए उन का भी किसी संपत्ति में कोई अधिकार नहीं है। आप का या आप की संतानों का तो होने का कोई प्रश्न ही नहीं है। हाँ पत्नी का पति से व अवयस्क संतानों का अपने माता-पिता से भरण पोषण प्राप्त करने का अधिकार अवश्य है।  यदि कोई पुरानी पैतृक संपत्ति अभी आप के पति के परिवार में मौजूद है जिस में आप के पति सहदायिक हैं तो उस में आप की संतानों को जन्म से अधिकार मिल सकता है लेकिन ऐसा संभव प्रतीत नहीं होता कि आप के पति के परिवार में अब भी कोई सहदायिक/ पैतृक/ पुश्तैनी संपत्ति मौजूद हो।

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