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संयुक्त संपत्ति का हिस्सेदार संपत्ति में अपने हिस्से की संपत्ति हस्तान्तरित कर सकता है।

court-logoसमस्या-
यश ने कैथल हरियाणा से पूछा है-

मेरी एक महिला मित्र है उसका 498ए, 406,506 368 आईपीसी का एक मुकदमा कोर्ट में चलरहाहै। उस महिला ने अपने ससुर से कुछ जमीनभी खरीदी थी। उसमहिला के दो बचचेभी हैंजो उस की ससुराल में उसके पति के पास हैं अबउसमहिला का ससुर बाकीसबजमीन बेचनाचाहताहै। क्या वह महिला उसको किसी भीप्रकार से बेचने से रोक सकती है! उस महिला और उसके ससुर तथा कुछ अन्य लोगभी उस जमीन के सांझी खेवट के हिस्सेदार हैं उस महिला का उद्देश्य अपने बच्चोंके भविष्य की सुरक्षा करना है यदि वह खेवट अलग करने का दावा करे तो क्या तब तक जमीन नहीं बिक सकती है जब तक खेवट अलग न हो?

 

समाधान-

भूमि, कृषिभूमि और स्थावर संपत्तियों के स्वामित्व में परिवर्तन होते रहते हैं। किसी की मृत्यु हो जाने पर उस का स्थान उस के वसीयती या फिर उत्तराधिकारी ले लेते हैं। इस तरह सम्पत्ति के स्वामित्व में हिस्सेदारी बदलती रहती है। कोई भी हिस्सेदार अपने हिस्से के स्वामित्व को हस्तान्तरित कर सकता है। जब की वास्तविक उपभोग या सपंत्ति पर कब्जा उस के सभी स्वामियों का नहीं होता। वर्तमान में आप की महिला मित्र ने जिस जमीन को खरीदा है वह भी स्वयं उस के कब्जे में नहीं है। केवल उस के पास जमीन के एक हिस्से का स्वामित्व है। जब वह खुद अपने ससुर से किसी जमीन के हिस्से का स्वामित्व खरीद सकती है तो कोई दूसरा भी खरीद सकता है। यदि उस का ससुर उस के हिस्से की जमीन को छोड़ कर शेष का स्वामित्व विक्रय करता है तो वह सारी जमीन का कब्जा जिस में आप की महिला मित्र का हिस्सा भी सम्मिलित है उस का कब्जा भी क्रेता को दे सकता है। तब जमीन का स्वामित्व तो आप की महिला मित्र का रहेगा लेकिन कब्जा ससुर से किसी और के पास चला जाएगा। फिर आप की मित्र उस क्रेता से कब्जा प्राप्त करने के लिए लड़ती रहे और कब्जेदार क्रेता जब तक कब्जा न छोड़े तब तक उस का उपभोग करता रहे।

प की मित्र को चाहिए कि वह तुरन्त विभाजन का वाद राजस्व न्यायालय में प्रस्तुत करे जिस में वह यह प्रार्थना न्यायालय से करे कि विभाजन कर के उसे उस के हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिलाया जाए। उसे उसी वाद में एक अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन दे कर यह प्रार्थना करे कि उस के हिस्से को न बेचा जाए और जमीन का कब्जा किसी अन्य को हस्तान्तरित नहीं किया जाए।

अचल संपत्ति का हस्तान्तरण बिना पंजीकृत दस्तावेज के अमान्य है।

Joint propertyसमस्या-
वाराणसी, उत्तर प्रदेश से शैवी ने पूछा है-

मेरे दादा ने बड़ी माँ के नाम से जमीन 1907 में खरीदी और मकान पीएफ लोन  ले कर बनवाया।  अब मेरी बड़ी माँ ने अपने पति के मरने के बाद अपने लड़के के साथ मिलकर मुक़दमा कर दिया और कोर्ट के बाहर 100 के स्टाम्प पर सुलह कर के गाँव की जमीन के बदले मकान ले लिया।  ये तीन वर्ष पूर्व की बात है।  तीन वर्ष बाद बड़ी माँ का बेटा हमारे गाँव की जमीन में दावा कर रहा है। अब गाँव की जमीन भी बाँटनी है क्योंकि दादी मर गई।  मतलब गाँव के हिसाब से हम संयुक्त परिवार में है। और परिवार की बड़ी बहू ने यानि मेरी बड़ी माँ ने संयुक्त रूप से बने मकान में किसी को हिस्सा नहीं दिया और मकान सुलहनामे के माध्यम से ले लिया। उनका लड़का कहता है की पीला कर लिखवाया है। हम क्या करें?

समाधान-

खेती की जमीन का बँटवारा राजस्व न्यायालय से हो सकता है। लेकिन खेती की जमीन और मकान सारी संयुक्त संपत्ति का बँटवारा दीवानी न्यायालय कर सकता है। इस कारण यदि बड़ी माँ और उन का लड़का राजस्व न्यायालय में बँटवारे का वाद दायर करता है तो आप पूर्व में सुलह के आधार पर बड़ी माँ को दिए गए मकान व खेती की जमीन को शामिल करते हुए संपूर्ण संयुक्त संपत्ति के बँटवारे का दीवानी वाद दीवानी न्यायालय में कीजिए। दीवानी वाद प्रस्तुत करने के बाद राजस्व न्यायालय में उन के द्वारा खेती के लिए कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा और यदि पहले से प्रस्तुत कर दिया है तो सिविल न्यायालय से उस की सुनवाई रुकवाई जा सकती है।

कोई भी अचल संपत्ति केवल पंजीकृत प्रलेख के माध्यम से ही हस्तान्तरित की जा सकती है। इस कारण सुलहनामे का कोई प्रभाव नहीं है। मकान में सभी हिस्सेदारों का हक बना हुआ है। आप को सफलता मिलेगी। आप के द्वारा किए गए दीवानी वाद में वह सुलहनामा सामने आ सकता है। किन्तु उस में तो यह लिखा है कि खेती की जमीन के बदले दिया गया है इस कारण हो सकता है वह सामने ही नहीं आए। आएगा तो भी लाभ आप को ही होगा। आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे दीवानी मामलों के वकील को सभी दस्तावेज दिखाते हुए सलाह ले कर कार्यवाही करें।

हक-त्याग केवल पंजीकृत हक-त्याग विलेख से ही मान्य . . .

Release Deed
समस्या-
शाजापुर, मध्य प्रदेश से नवीन चंद्र कुम्भकार ने पूछा है –

क्या पैतृक संपत्ति में महिलाएँ अपना हक अन्य उत्तराधिकारियों के पक्ष में तहसीलदार के न्यायालय में केवल बयान के आधार पर त्याग सकती हैं? जब कि मृत्यु  के उपरान्त नामांतरण के लिए वाद वैध उत्तराधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

समाधान-

किसी भी संपत्ति में यदि किसी स्त्री या पुरुष को स्वामित्व का या खातेदारी का अधिकार प्राप्त है तो यह अधिकार त्यागना एक तरह से संपत्ति का हस्तान्तरण है जो केवल हकत्याग विलेख (रिलीज डीड) को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा कर ही त्यागा जा सकता है। इस के अतिरिक्त किसी भी प्रकार से नहीं। संविधान और कानून के समक्ष स्त्रियाँ और पुरुष दोनों समान हैं। अक्सर तहसीलदार ही उस इलाके का उप पंजीयक भी होता है। लेकिन वह किसी के बयान के आधार पर हकत्याग को स्वीकार नहीं कर सकता। उस के लिए अलग से हकत्याग विलेख लिखा जाएगा, निर्धारित स्टाम्प ड्यूटी भी देनी होगी और पंजीकरण शुल्क भी देना होगा और उसे पंजीकृत भी किया जाएगा।

कत्याग विलेख आवश्यक रूप से पंजीकरणीय प्रलेख है। यदि किसी भी कार्यवाही में यह कहा जाता है कि किसी ने किसी के हक में या शेष स्वामियों के हक में हक त्याग कर दिया है तो हकत्याग का पंजीकृत विलेख ही उस का प्रमाण होगा। अपंजीकृत प्रमाण को कोई भी न्यायालय साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। यदि नामांतरण के लिए आवेदन किया गया है तो यह भी एक न्यायिक कार्यवाही है तथा हक त्याग का आधार केवल हकत्याग विलेख ही हो सकता है।

किराए पर देने के पहले संपत्ति पर स्वत्व प्राप्त करने का प्रयत्न करें।

समस्या-

कोरबा, छत्तीसगढ़ से प्रवीण कुमार ने पूछा है-

गाँव के आबादी क्षेत्र में मेरा एक कब्ज़ा किया हुआ मकान है।  जिस पर मेरा कब्जा १० साल से है जिसका बिजली का कनेक्शन मेरे नाम से है व बिल मेरे नाम से आता है।   मेरा एक परिचित उस पर एक संस्था (स्कूल) खोलने के लिए मकान किराये पर मांग रहा है।  पर मुझे संशय बना हुआ है की संस्था खुलने के बाद उक्त मकान पर कब्जा न हो जाये। क्या ऐसा हो सकता है?  इसके लिए मुझे किस तरह का अनुबंध करना होगा।  कृपया उचित मार्गदर्शन बताएँ, जिस से मुझे कुछ आय प्राप्त हो और मकान का कब्जा भी मेरा हो?

समाधान-

Farm & houseकान आप के कब्जे में 10 वर्ष से है। जो कोई भी व्यक्ति उस का स्वामी है वह आगे दो वर्ष तक और आप से कब्जा प्राप्त करने का दावा न्यायालय में स्वत्व के आधार पर संस्थित कर सकता है। लेकिन कब्जा 12 वर्ष से अधिक का हो जाने के बाद वह दावा नहीं कर सकता। आप यदि संपत्ति को किराए पर देते हैं तो उस में एक परेशानी यह है कि यदि किराएदार कब्जा संपत्ति के असली मालिक को दे देने का कोई लिखित दस्तावेज लिख दे और कुछ दिन बाद पुनः उसी से किरायानामा लिखवा ले। भले ही वह वास्तविक रूप से किसी को कब्जा दे या न दे तो एक बार कब्जा स्वत्वाधिकारी के पास चले जाने पर आप कुछ भी नहीं कर पाएंगे। आप के मामले में वास्तविक स्वत्वाधिकारी की क्या स्थिति है यह जानकारी आप ने नहीं दी है।

प के गाँव में यदि नगरपालिका नहीं है तो वहाँ संपत्ति अंतरण अधिनियम के अंतर्गत आप भवन को लीज पर दे सकते हैं। लेकिन यह लीज 11 माह से अधिक की होने पर उसे पंजीकृत कराना जरूरी होगा। अन्यथा प्रत्येक 11 माह बाद एक लीज एग्रीमेंट समाप्त होने पर नया लीज एग्रीमेंट लिखाना होगा। यह मान कर चलें कि किरायानामा/ लीज डीड लिखवा लेने पर किराएदार हमेशा किराएदार ही रहेगा। वह मकान मालिक नहीं हो सकता।

फिर भी हमारी राय है कि आप कब्जा 12 वर्ष का हो जाने तक भवन किराए पर न दें तो अच्छा है। 12 वर्ष से अधिक का कब्जा हो जाने पर प्रयत्न करें कि ग्राम पंचायत से आप को पट्टा मिल जाए जिसे आप अपने नाम पंजीकृत करवा लें। इस तरह स्वत्व प्राप्त हो जाने के बाद ही किसी व्यक्ति को भवन किराए पर दें। वैसे पंचायत 12 वर्ष के पहले भी मकान की जमीन पर कब्जे के आधार पर पट्टा दे सकती है।

भूखंड पुत्रवधुओं को हस्तान्तरित करने के लिए दान पत्र या वसीयत निष्पादित व पंजीकृत कराएँ

समस्या-

बिहार से राजेश कुमार वर्मा ने पूछा है –

मेरी माता जी के नाम नगरीय क्षेत्र में एक आवासीय भूखंड है। माताजी विधवा हैं। मरे दो भाई और और एक विवाहित बहिन है। मेरी बहिन अपने पति के साथ निवास करती है। मैं चाहता हूँ कि उक्त भूखंड मेरी और और मेरे छोटे भाई की पत्नियों के नाम पंजीकृत हो जाए। मेरी माता जी सहमत हैं। प्रक्रिया क्या होगी?

समाधान-

House demolishingकिसी भी हिन्दू स्त्री की संपत्ति उस की निजि संपत्ति होती है वह उसे किसी को भी विक्रय कर सकती है, दान (Gift) कर सकती है और वसीयत कर सकती है। यदि वे ऐसा नहीं करेंगी तो वह संपत्ति उन के देहान्त के उपरान्त उन के उत्तराधिकारियों को, आप की माताजी के मामले में आप और आप के भाईर बहिनों को समान रूप से प्राप्त हो जाएगी। यदि आप की माता जी चाहती हैं कि उन का यह भूखंड उन के जीवनकाल में ही उन की पुत्रवधुओं के नाम हस्तान्तरित हो जाए तो उन्हें इस का दान पत्र  (Gift Deed) निष्पादन करना होगा। इसे उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराना होगा। इस पर लगभग उतना ही खर्च आएगा जितना किसी संपत्ति को खरीदने पर उस का विक्रय पत्र पंजीकृत कराने पर आता है। खर्चे की इस राशि का मूल्यांकन आप अपने क्षेत्र के उप पंजीयक कार्यालय में पता कर सकते हैं। यह खर्च संपत्ति के बाजार मूल्य का 8 से 12 प्रतिशत तक का हो सकता है।

दि आप इस खर्चे से बचना चाहें तो आप की माता जी उक्त भूखंड की वसीयत निष्पादित कर उसे उपपंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा सकती हैं। इस में मात्र एक-दो हजार रुपयों का खर्च आएगा। लेकिन उस स्थिति में दोनों पुत्र वधुएँ आप के माता जी के देहान्त पर ही उक्त भूखंड की स्वामी बन सकेंगी। माता जी के जीवन काल में वह भूखंड उन की संपत्ति बना रहेगा। वसीयत को आप की माता जी अपने जीवन काल में दूसरी वसीयत निष्पादित कर कभी भी परिवर्तित कर सकेंगी। किसी भी व्यक्ति की किसी संपत्ति के संबंध में की गई अंतिम वसीयत ही मान्य होगी। आप की माताजी के दृष्टिकोण से वसीयत निष्पादित कर पंजीकृत करवाना बेहतर है इस से उन में अपने जीवनकाल में आत्मविश्वास बना रहेगा। इस के निष्पादन में कोई विशेष खर्च भी नहीं होगा।

हकत्याग भी एक तरह का संपत्ति हस्तान्तरण है।

समस्या-

बिदासर, राजस्थान से अजयकुमार ने पूछा है-

मैंने एक राजस्व वाद सन् 2005 में श्रीमान् उपखण्ड अधिकारी महोदय, सुजानगढ़ के न्यायालय में घोषणात्मक, चिर निषेधाज्ञा व रिकार्ड दुरूस्ती का अनुतोष प्राप्त करने हेतु संस्थित किया था।  उक्त वाद में मैंने यह घोषणा चाही थी कि प्रतिवादी संख्या एक कहीं अन्यत्र गोद चला गया है  इसलिए उसका अपने नैसर्गिक पिता की वादगत सम्पत्ति में कोई हक-हिस्सा नहीं रहा है।  उक्त वाद में प्रतिवादी संख्या एक मेरा भाई है लेकिन वह बाल्यकाल में ही मेरे नाना के गोद चला गया था।  मेरे पिता के नाम 100 बीघा भूमि राजस्व अभिलेखों में दर्ज थी जो उनकी मृत्यु के पश्चात् उनके उतराधिकारियों मुझ वादी व प्रतिवादी संख्या दो ता तीन के नाम दर्ज होनी चाहिए थी।  लेकिन मेरे बडे़ भाई प्रतिवादी संख्या एक ने अपना नाम भी वादग्रस्त खेत के राजस्व अभिलेखों में मेरे पिता के उतराधिकारी के रूप में दर्ज करवा लिया। जिस समय मेरे द्वारा उक्त वाद संस्थित किया गया था, उस समय मेरे संयुक्त खातेदारी के वादग्रस्त खेत के राजस्व अभिलेखों में मेरा व मेरे दो भाईयों (प्रतिवादी संख्या एक व दो) तथा मेरी दो बहिनों (प्रतिवादिनी संख्या तीन व चार) का नाम अंकित था इसलिए मेरे द्वारा उन्हें प्रतिवादीगण संख्या एक व चार के रूप में पक्षकार बनाया गया था।  उक्त वाद के लम्बित रहने के दौरान ही मेरी बहिन प्रतिवादीनी संख्या तीन ने अपने हिस्से की भूमि के खातेदारी अधिकारों का त्याग मेरे भाई प्रतिवादी संख्या एक के पक्ष में ‘‘हक त्याग विलेख’’ के जरिये कर दिया तथा मेरी दूसरी बहिन प्रतिवादिनी संख्या चार ने अपने हिस्से की भूमि के खातेदारी अधिकारों का त्याग मेरे भाई प्रतिवादी संख्या दो के पक्ष में ‘‘हक त्याग विलेख’’ के जरिये कर दिया।  उक्त हक त्याग विलेखों के आधार पर मेरी उक्त दोनों बहिनों के नाम वादग्रस्त खेत के राजस्व अभिलेखों से हटाकर उनके हिस्से की भूमि मेरे उक्त दोनों भाइयों प्रतिवादी संख्या एक व दो के नाम दर्ज कर दी गई।  वर्तमान में वादगत खेत के राजस्व अभिलेख में 20 बीघा भूमि मेरे नाम तथा 40-40 बीघा भूमि प्रतिवादी संख्या दो व तीन के नाम दर्ज है।  जिस समय उक्त हक परित्याग पत्र निष्पादित किये गये थे उस समय तक उक्त वाद के साथ प्रस्तुत अस्थाई निषेधाज्ञा प्रार्थना पत्र में ‘‘यथास्थिति बनाये रखने का आदेश’’ न्यायालय द्वारा नहीं पारित किया गया था लेकिन उस समय मेरे द्वारा संस्थित उक्त वाद लम्बित था। उक्त हक परित्याग पत्र निष्पादित किये जाने के कुछ समय बाद उक्त वाद के साथ प्रस्तुत अस्थाई निषेधाज्ञा प्रार्थना पत्र मुझ वादी के पक्ष में निर्णित किया गया जिसके विरूद्ध प्रतिवादी संख्या एक ने राजस्व अपील प्राधिकारी, बीकानेर के समक्ष अपील दायर की जिसे आंशिक रूप से मंजूर करते हुए मुझ वादी व प्रतिवादी संख्या एक दोनों को उक्त वाद के अन्तिम निर्णय तक यथास्थिति बनाये रखने हेतु पाबन्द कर दिया गया है।  उक्त विचाराधीन वाद में प्रतिवादीगण संख्या एक व चार के विरूद्ध दो वर्ष पूर्व एकपक्षीय कार्यवाही उनके अनुपस्थित रहने के कारण अमल में लाई जा चुकी है।  उक्त एकपक्षीय कार्यवाही का आदेश होने के बाद मेरे द्वारा एकतरफा साक्ष्य वादी में दो गवाहों के बयान लेखबद्ध करवाये जाकर वादपत्र के समर्थन में प्रस्तुत सभी दस्तावेजों को प्रदर्शित करवाया जा चुका है तथा अब उक्त वाद बहस अन्तिम के प्रक्रम पर चल रहा है।  उक्त प्रकरण के सम्बन्ध में मैं आपसे निम्नलिखित प्रश्नों के सम्बन्ध में सलाह लेना चाहता हूं:-

(1) क्या उक्त प्रकार से दो बहिनें अपने संयुक्त हिस्से का हक परित्याग मुझ एक भाई (वादी) को वंचित रखकर दो भाईयों के पक्ष में कर सकती है?  इस सम्बन्ध में हक परित्याग सम्बन्धित विधि व नियमों का वर्णन करते हुए कानूनी स्थिति स्पष्ट करने की कृपा करें।

(2) क्या वाद के लम्बित रहने के दौरान उक्त दो बहिनों द्वारा अपने दो भाईयों के पक्ष में किया गया हक परित्याग वैध है? अगर यह वैध नहीं है तो क्या मुझ वादी को उक्त हक परित्याग सम्बन्धी तथ्यों को रिकार्ड पर लाने हेतू वादपत्र में संशोधन करवाना आवश्यक है? और क्या बिना संशोधन के उक्त तथ्यों को अन्तिम बहस के दौरान उठाया जाना कानूनी रूप से सही है? और क्या उक्त प्रकार से वाद के लम्बित रहने के दौरान किये गये अन्तरण के परिप्रेक्ष्य में वाद संस्थित करने के समय जो स्थिति वादग्रस्त खेत की थी उसी स्थिति में वादगत खेत को लाने हेतु मुझ वादी द्वारा बहस अन्तिम के प्रक्रम पर धारा 144 सी.पी.सी. के तहत आवेदन किया जा सकता है।  कृपया इस सम्बन्ध में उचित सलाह देने की कृपा करें।

(3) क्या उक्त प्रकार से एकतरफा चल रही वाद की कार्यवाही के दौरान हक परित्याग सम्बन्धी तथ्यों को रिकार्ड पर लाने हेतु वादपत्र में संशोधन करवाना पड़े तो क्या प्रतिवादीगण को उक्त संशोधन प्रार्थना पत्र की सूचना देने हेतु न्यायालय द्वारा तलब किया जायेगा या उसकी सुनवाई एकतरफा रूप से कर ली जावेगी?  कृपया इस सम्बन्ध में उचित सलाह देने की कृपा करें।

(4) क्या वाद संस्थित करने के दौरान यदि कोई आवश्यक पक्षकार, पक्षकार के रूप में संयोजित करने से वंचित रह जावे तो क्या उक्त प्रकार से एकतरफा चल रही वाद की कार्यवाही के दौरान उस आवश्यक पक्षकार को बहस अन्तिम के प्रक्रम पर पक्षकार के रूप में जोड़ा जा सकता है और यदि जोड़ा जा सकता है तो उस वंचित पक्षकार की ओर से आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. का प्रार्थना पत्र पेश करवाना आवश्यक है या मुझ वादी द्वारा उस आवश्यक पक्षकार को पक्षकार के रूप में संयोजित करने के लिए आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. का प्रार्थना पत्र पेश किया जा सकता है या उस वंचित पक्षकार को पक्षकार के रूप में जोड़ने के लिए मुझ वादी द्वारा आदेश 6 नियम 17 सी. पी. सी. के तहत वादपत्र में संसोधन करवाया जा सकता है और क्या उक्त संसोधन प्रार्थना पत्र की सूचना देने हेतू न्यायालय द्वारा उस वंचित पक्षकार को एवं सभी प्रतिवादीगण को तलब किया जायेगा या उसकी सुनवाई एकतरफा रूप से कर ली जावेगी। कृपया इस सम्बन्ध में उचित सलाह देने की कृपा करें।

समाधान-

justiceदि उक्त कृषि भूमि आप के पिता को उत्तराधिकार में 16 जून 1956 के बाद प्राप्त हुई है तो आप का वाद सही है। लेकिन यदि वह आप के पिता को इस के पूर्व उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है तो उस में 16 जून 1956 तक जन्म लिए हुए आप के पिता के सभी पुरुष उत्तराधिकारियों को भी जन्म से सहदायिक अधिकार प्राप्त हुआ है। तब आप के मुकदमे में जटिलताएं उत्पन्न हो सकती है।  चूंकि आप ने इस संबंध में कोई तथ्य नहीं रखे हैं और कोई प्रश्न नहीं पूछा है इस कारण अधिक कुछ कहना उचित नहीं है।

आप का पहला प्रश्न है कि क्या दो बहिनें अपने संयुक्त हिस्से का हक परित्याग मुझ एक भाई (वादी) को वंचित रखकर दो भाईयों के पक्ष में कर सकती है?  

संयुक्त संपत्ति का बँटवारा न होने पर भी उस में सभी संयुक्त स्वामियों का अपने अपने हिस्से पर अधिकार है।  कृषि भूमि में कोई भी हिस्सेदार उस भूमि में अपना हिस्सा विक्रय या अन्यथा हस्तांतरित कर सकता है।  इस का परिणाम यह होता है कि संयुक्त स्वामित्व में हिस्सेदार का स्थान वह व्यक्ति ले लेता है जिसे हिस्सा हस्तांतरित किया गया है। किसी एक हिस्सेदार द्वारा अपना हिस्सा किसी दूसरे हिस्सेदार को हस्तांतरित कर देना भी एक तरह का हस्तांतरण ही है।  इस तरह कोई भी व्यक्ति संयुक्त संपत्ति का बँटवारा कराए बिना अपना हिस्सा किसी दूसरे हिस्सेदार के पक्ष में हकत्याग विलेख द्वारा हस्तांतरित कर सकता है।

ह हक त्याग वाद के लंबित रहने के दौरान भी किया जा सकता है और वैध है। क्यों कि इस पर किसी तरह की कोई रोक नहीं है।  इस हक त्याग को हकत्याग विलेख निष्पादित होने तथा उस के अनुसार नामांतरण हो जाने की जानकारी मिलते ही संशोधन के माध्यम से न्यायालय के रिकार्ड पर लाया जाना चाहिए था। संशोधन का आवेदन अन्तिम बहस होने के पूर्व न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जा सकता है लेकिन ऐसा आवेदन देरी के आधार पर निरस्त भी किया जा सकता है। वैसे आप को संशोधन के लिए आवेदन प्रस्तुत करना चाहिए। लेकिन धारा 144 इस मामले के तथ्यों के आधार पर प्रभावी होना प्रतीत नहीं हो रहा है। क्यों कि यह धारा तभी लागू होगी जब कि किसी डिक्री या आदेश द्वारा कार्यवाही में फेरफार किया गया हो।

कोई भी संशोधन का आवेदन प्रस्तुत होने पर उस की सूचना उस प्रकरण के सभी पक्षकारों को दिया जाना आवश्यक है, उन पक्षकारों को भी जिनके विरुद्ध एकतरफा कार्यवाही किए जाने के आदेश प्रदान किए जा चुके हैं और जो अब प्रकरण में उपस्थित नहीं हो रहे हैं।  इस के लिए आवेदन की प्रति उन्हें नोटिस के साथ प्रेषित की जाएगी और यदि वे उपस्थित होते हैं तो उन्हें सुना जाएगा। वैसे भी जिन प्रतिवादियों के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही का आदेश है वे प्रकरण में किसी भी स्तर पर उपस्थित हो कर आगे होने वाली कार्यवाही में भाग लेने के अधिकारी हैं।

वाद संस्थित करने के दौरान यदि कोई आवश्यक पक्षकार, पक्षकार के रूप में संयोजित करने से वंचित रह जाता है तो उक्त प्रकार से एकतरफा चल रही वाद की कार्यवाही के दौरान उस आवश्यक पक्षकार को बहस अन्तिम के प्रक्रम पर पक्षकार के रूप में जोड़ा जा सकता है।  इस के लिए उस वंचित पक्षकार की ओर से आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. का प्रार्थना पत्र पेश किया जा सकता है। वाद का कोई भी पक्षकार उसे पक्षकार के रूप में संयोजित करने के लिए आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. के अंतर्गत प्रार्थना पत्र पेश कर सकता है।  आप भी उस वंचित पक्षकार को पक्षकार के रूप में जोड़ने के लिए आदेश 6 नियम 17 सी. पी. सी. के तहत वादपत्र में संशोधन हेतु आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं।  लेकिन संशोधन प्रार्थना पत्र की सूचना सभी प्रतिवादीगण को देना आवश्यक है। हाँ आदेश 1 नियम 10 (2) सी. पी. सी. के अंतर्गत प्रार्थना पत्र की सूचना विपक्षी पक्षकारों को देने की आवश्यकता नहीं है उन की अनुपस्थिति में आवेदन की सुनवाई की जा सकती है।

एक व्यक्ति के स्वामित्व की संपत्ति के मामले में पारिवारिक समझौता संभव नहीं।

समस्या-

गाजियाबाद, उत्‍तर प्रदेश से राकेश सूरी ने पूछा है –

कृपया पारिवारिक समझौते (Family Settlement)  के बारे में बतायें और इसका एक ड्राफट/सेम्पल भी बताएँ कि कैसे यह कैसे बनाया जाता है? मैं आपको अपने केस के बारे में बताता हूँ।  मेरे दो बड़े भाई हैं, और मेरे पिता जी की मृत्यु हुये 7 साल से ज्यादा का समय हो चुका है।  मेरी माताजी के जी0डी0ए0 जनता के दो फलेटस् हैं।  वे एक मकान अपने ही बेटों को कम कीमत पर सेल कर रही है और बड़े भाई के नाम रजिस्‍ट्री करवा रही है।  वह ऐसा बड़े बेटे के कहने पर कर रही हैं ताकि उससे जो पैसे मिलेंगे वह उन्हें दूसरे बड़े भाई को देगीं। यह दोनों भाईयों की आपसी सहमति से हो रहा है।  ताकि माता जी के निधन के बाद सपंति विवाद पैदा न हो और मेरी माता जी को भी इसमें कोई परेशानी नहीं है।  लेकिन मेरा यह प्रश्न है कि जो एक मकान बच गया है जिस में मैं और मेरी माता जी रहती हैं।   माता जी और दोनो बडे भाई कहते है जो मकान बच गया है वह तेरा है हम उस मकान मे हम कोई हिस्सा नहीं लेगें।  लेकिन कुछ लोगों से मैं ने बात की तो  वे कह रहे हैं कि आप अभी पारिवारिक समझौता करवा लो।  क्यों कि बाद में भाईयों में मतभेद हो सकते हैं।  जिसके कारण दूसरे बचे हुये मकान पर सपत्ति विवाद पैदा हो सकते हैं।  क्यों कि माता जी बड़े भाई को मकान बेच रही है और उसके पैसे दूसरे बड़े भाई को दे रही है जो कि क्रय-विक्रय होगा।  जिससे यह साबित नहीं किया जा सकता कि सपत्ति को दोनों भाइयों में बाँटा गया हैं। इसलिए आपसे अनुरोध है कि मुझे सही सलाह दें।

समाधान-

Giftगता है कि जो भाई अपने नाम उस मकान को हस्तान्तरित करवाना चाहता है वह उस मकान को खरीदने के लिए गृहऋण भी किसी संस्था से प्राप्त करना चाहता है जिसे वह अपने दूसरे भाई को दे सके। अन्यथा मकान को माता जी एक वसीयत के माध्यम से भी एक बेटे को दे सकती हैं। लेकिन इस तरह मकान उन के जीवनकाल में माताजी के नाम रहेगा और उस पर ऋण प्राप्त नहीं किया जा सकेगा। इस कारण से रजिस्ट्री में होने वाला व्यय बचाने के बजाय खर्च किया जा रहा है।

दोनों मकान आप की माता जी के स्वामित्व के हैं। एक मकान वे बेच देंगी तो बचे हुए मकान पर माताजी के जीवनकाल के उपरान्त तीनों भाइयों का समान अधिकार होगा। इस कारण से आप को लोगों ने जो सलाह दी है वह उचित दी है। लेकिन आप के मामले में पारिवारिक समझौते की कोई स्थिति नहीं है। यह तब संभव होता है जब संबंधित संपत्ति या संपत्तियोँ में समझौते के सभी पक्षकारों का वर्तमान में अधिकार हो। आप की स्थिति में पारिवारिक समझौते को एक तरह का संपत्ति हस्तान्तरण माना जाएगा और उस पर पूरी स्टाम्प ड्यूटी देनी होगी। उस से अच्छा तो ये है कि दूसरे मकान का विक्रय पत्र के स्थान पर उस के दानपत्र की रजिस्ट्री भी आप के नाम साथ के साथ करवा दी जाए। हाँ उस में यह अवश्य लिखा जाए कि जीवन काल में मकान में निवास का अधिकार माता जी को होगा और पूरे जीवनकाल में आप उन की भरण-पोषण और सेवा सुश्रुषा करेंगे।

माताजी एक मकान को जैसे चाहें वैसे एक बेटे को बेच कर दूसरे को उस का विक्रय मूल्य प्राप्त कर दे सकती हैं। लेकिन यदि सभी कह रहे हैं कि दूसरा मकान केवल आप का होगा। तो आप की माता जी उसे आप के नाम वसीयत कर सकती हैं, जिस में शेष दोनों भाइयों के भी हस्ताक्षर करवा लिए जाएँ और वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवा दिया जाए। इस से यह होगा कि मकान पर माताजी के जीवनकाल में उन का स्वामित्व बना रहेगा और उन के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत के कारण आप का हो जाएगा। इस व्यवस्था में एक ही परेशानी है कि माता जी चाहें तो अपने जीवनकाल में इस वसीयत को बदल भी सकती हैं।

स की सम्भावना को समाप्त करने के लिए आप चारों सदस्य मिल कर आप के यहाँ एग्रीमेंट के लिए निर्धारित आवश्यक मूल्य के स्टाम्प पेपर पर एक एमओयू (मेमोरेण्डम ऑफ अण्डरस्टेण्डिंग) हस्ताक्षर करें जिस में यह लिखा जाए कि उन के दो मकान हैं जिसे माता जी ने आधी कीमत पर एक पुत्र को विक्रय कर के उस विक्रय से प्राप्त पैसा दूसरे पुत्र को दे दिया है। दूसरा मकान जिस में वे आप के साथ रहती हैं उस की वसीयत लिख दी है जो उन के जीवनकाल के उपरान्त आप का हो जाएगा। इस एमओयू पर साक्षियों के हस्ताक्षर करवा कर नोटेरी के यहाँ पंजीकृत करवाया जा सकता है। इस प्रकार आप को दान-पत्र के लिए आवश्यक स्टाम्प शुल्क नहीं देना होगा।

अनुसूचित जाति व जनजाति के व्यक्ति की आबादी भूमि कोई भी खरीद सकता है।

एक निवेदन …

पिछले दिनों में पाठकों की बहुत समस्याएँ तीसरा खंबा में एकत्र हो गई हैं और उन सब का समाधान प्रस्तुत करना संभव नहीं हो पा रहा था। इस कारण से हम ने अपनी समस्याएँ भेजने वाले पाठकों से निवेदन किया था कि बहुत सी समस्याएँ ऐसी हैं कि पाठक यदि तीसरा खंबा में प्रकाशित पुराने आलेखों में सर्च कर के अपनी समस्या से मिलती जुलती समस्या को तलाश करें तो उन्हें समाधान यहीं मिल जाएंगे। यदि  पुराने आलेखों में समाधान न मिले तो तीसरा खंबा पर अपनी समस्या रखें, हम उस का समाधान करेंगे।

गुढ़ा गौरजी, जिला झुन्झुनूँ, राजस्थान के श्री विनोद कुमावत तीसरा खंबा के पुराने पाठक हैं। समय समय पर उन्हों ने अपनी समस्याएँ रखी हैं और उन का समाधान भी किया गया है। लेकिन पिछले दिनों उन की तीन-चार समस्याएँ प्राप्त हुई वे कतार में थीं और उन का समाधान शीघ्र प्रस्तुत करना संभव नहीं हो पा रहा था। तीसरा खंबा के उक्त आग्रह को उन्हों ने समझा और तीसरा खंबा के पुराने आलेख पढ़े। कल उन्हों ने सूचना दी है कि मरे द्वारा आज तक किए गए सभी प्रश्नों के उत्तर तीसरा खंबा में ढूंढने पर मिल गए हैं। अतः मेरे द्वारा दिनांक 04.01.2013 तक के किसी प्रश्न का उत्तर देने की आवश्यकता नहीं है।

दि सभी पाठक ऐसा करने लगें तो तीसरा खंबा के लिए अधिक से अधिक लोगों को लाभान्वित करना संभव होगा। आशा है सभी पाठकों का सहयोग हमें प्राप्त होता रहेगा। अब आज की समस्या और उस का समाधान ….

समस्या-

अंजाद, मध्यप्रदेश से सुनील ने पूछा है-

House demolishingभारतीय संविधान के अनुसार कोई ऐसा कानून है जिसके अन्तर्गत आप किसी आदिवासी से कृषि भूमि अथवा नगर पालिका क्षेत्र में स्थिति कनवर्टेड भूमि जो किसी आदिवासी के नाम पर हो नही खरीद सकते?  प्रकरण यह है कि मैं एक प्लाट लेना चाहता हूँ लेकिन वह किसी आदिवासी के नाम पर है। रजिस्ट्रार कार्यालय  द्वारा यह कहा जा रहा है कि कोई सामान्य जाति का व्यक्ति किसी आदिवासी की भूमि नही खरीद सकता।  जहाँ तक मुझे पता है यह नियम केवल कृषि भूमि के लिए ही है।  रहवासी भूमि के लिए नहीं।  क्या  मुझे उपरोक्त प्लाट की रजिस्ट्री के लिए क्या करना चाहिए?

समाधान-

भारत के संविधान में सरकारों का यह कर्तव्य  निर्धारित किया गया है कि वे अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों की संपत्ति की रक्षा के लिए कानून बनाएँ।  इस के लिए सभी राज्य सरकारों ने भू-राजस्व अधिनियमों में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों की भूमि के उन के समुदाय के अतिरिक्त अन्य लोगों को हस्तान्तरित करने पर रोक लगाई गई है। अधिकांश राज्यों में यह प्रतिबंध केवल कृषि भूमि के संबंध में ही है। किस राज्य में अनुसूचित जाति व जनजाति के लोगों की आबादी (नजूल) भूमि के अपने समुदाय के लोगों के अतिरिक्त अन्य लोगों को विक्रय करने पर प्रतिबंधित किया गया है तो उस की जानकारी हमें नहीं है।

हाँ तक मध्य प्रदेश का प्रश्न है। बिलासपुर जो उस समय मध्यप्रदेश में था एक आदिवासी की नजूल भूमि को किसी सामान्य व्यक्ति द्वारा खरीदा गया था। बाद में उस हस्तान्तरण को चुनौती दी गई थी। इस सम्बन्ध में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने दिनांक 02.11.1972 को निर्णय दिया कि आबादी (नजूल) भूमि पर मध्यप्रदेश भूराजस्व कोड की धारा 165 व 170 के अंतर्गत जो प्रतिबंध है वह केवल कृषि भूमि के संबंध में ही है न कि आबादी भूमि के संबंध में। इस तरह अली दास बनाम बोर्ड ऑफ रेवेन्यू मध्यप्रदेश के मामले में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय ने उक्त हस्तान्तरण को उचित माना था। उक्त निर्णय के आधार पर आप उक्त आबादी भूमि क्रय कर सकते हैं।

प चाहें तो उक्त निर्णय की प्रति उप पंजीयक को दिखा कर उसे उक्त हस्तान्तरण विलेख को पंजीकृत करने को कह सकते हैं। यदि वह फिर भी इन्कार करता है तो उप पंजीयक से पूछें कि वह किस नियम के अंतर्गत ऐसे हस्तान्तरण विलेख को पंजीकृत करने से मना करता है।  आप उप पंजीयक से उच्च अधिकारी जिला पंजीयक को आवेदन दे कर निवेदन कर सकते हैं वह उप रजिस्ट्रार को आदेश दे कि वह आप के उक्त नजूल भूमि को खरीदने के विलेख का पंजीयन करे।

गैर मुस्लिम द्वारा निष्पादित दानपत्र (हिबानामा) (Gift Deed) पंजीकृत न होने पर निष्प्रभावी है

समस्या-

म पांच भाई हैं, मैं चौथी संतान हूँ। हमारे सबसे छोटे भाई ने जब पिता जी उसके संरक्षण में रहे तो उसने 90 वर्षीय पिताजी से खुद के नाम से पूरी जमीन का हिबानामा 4-4-2012 को करा लिया। मैं क्या करूँ? मुझे रास्ता दिखाएँ।

-योगेन्द्र शुक्ला, लखनऊ, उत्तर प्रदेश

समाधान-

हिबा मुस्लिम विधि का शब्द है, जिस का अर्थ दान (Gift) है। अक्सर हिन्दू विधि से जो लोग शासित होते हैं वे भी विधिक प्रारूपों में उर्दू के शब्दों का प्रचलन होने से उसे हिबा और दान-पत्र को हिबानामा कहते और लिखते हैं। लेकिन मुस्लिम और हिन्दू विधियों में दोनों का असर भिन्न भिन्न है। मुस्लिम विधि में कोई संपत्ति पैतृक नहीं होती। किसी व्यक्ति की मृत्यु के उपरान्त जो संपत्ति या संपत्ति का भाग किसी व्यक्ति को उत्तराधिकार में प्राप्त होता है वह उस व्यक्ति की व्यक्तिगत संपत्ति होती है और उसे वह किसी भी रूप में हस्तांतरित कर सकता है। दान भी एक हस्तान्तरण है इस कारण मुस्लिम व्यक्तिगत विधि से शासित होने वाला व्यक्ति अपनी संपूर्ण संपत्ति या उस के किसी भाग को किसी अन्य व्यक्ति या संस्था आदि को हिबा कर सकता है। हिबा मौखिक भी हो सकता है और लिखित भी हो सकता है और हिबा करने पर किसी तरह की स्टाम्प ड्यूटी देय नहीं होती और न ही उसे उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करवाने की आवश्यकता है।

स के विपरीत हिन्दू विधि में कोई संपत्ति पैतृक है तो उसे दान नहीं किया जा सकता। यदि कोई गैर मुस्लिम अपनी किसी अचल संपत्ति को दान करता है तो उस के लिए लिखित दस्तावेज दानपत्र (हिबानामा) का निष्पादित किया जाना आवश्यक है और उस का उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत कराया जाना भी आवश्यक है। इस तरह यदि कोई गैर मुस्लिम उस की किसी अचल संपत्ति को दान (हिबा) करता है तो यह दान मौखिक नहीं हो सकता और न ही अपंजीकृत दस्तावेज से संपन्न कराया जा सकता है। इस तरह किसी भी गैर मुस्लिम द्वारा निष्पादित किया गया दानपत्र (Gift Deed) यदि वह पंजीकृत नहीं है तो विधि के समक्ष उस का कोई मूल्य नहीं है।

प के मामले में आप ने पिताजी द्वारा जमीन को हिबा करना और हिबानामा निष्पादित करना बताया है। यदि यह संपत्ति पैतृक है तो उसे दान किया जाना तब तक संभव नहीं है जब तक कि समस्त भागीदारों के बीच उस का बँटवारा नहीं हो जाता है। यदि यह संपत्ति जिसका हिबानामा लिखाया गया है वह आप के पिताजी की व्यक्तिगत संपत्ति है तो भी दान-पत्र का पंजीकृत होना आवश्यक है। यदि दस्तावेज दान-पत्र पंजीकृत नहीं है तो उस का कोई मूल्य नहीं है।  यदि आप के भाई ने कोई हिबानामा लिखाया है और पंजीकृत नहीं है तो आप को परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है। यदि हिबानामा पंजीकृत करवा लिया गया है तो उसे इस आधार पर चुनौती दी जा सकती है कि पिताजी की जमीन पैतृक है और दान नहीं की जा सकती।

वरिष्ठ नागरिकों का भरण पोषण और संरक्षण

समस्या-

मैं जानना चाहती हूँ कि यदि कोई माता या पिता अपनी संपत्ति या पुश्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा किसी एक संतान को दे दे और बाद में वही संतान उन का भरण पोषण न कर के उन्हें परेशान करने लगे तो ऐसे माता-पिता क्या कर  सकते हैं?

– प्रतिभा साहनी, नई दिल्ली

समाधान-

संतानों पर अपने वरिष्ठ नागरिक (60 वर्ष की आयु प्राप्त कर चुके) माता-पिता  का तथा निस्सन्तान वरिष्ठ नागरिकों के ऐसे संबंधियों पर जो उन की संपत्ति पर कब्जा रखते हैं या उस का उपभोग करते हैं, या उन के देहान्त के उपरान्त उन की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने वाले हों ऐसी रीति से भरण-पोषण का दायित्व है जिस से वे अपना सामान्य जीवन जी सकें। इस अधिनियमं के प्रावधानों को प्रभावी बनाने के लिए अभिभावकों और वरिष्ठ नागरिक भरण-पोषण और कल्याण अधिनियम-2007 में विशिष्ठ उपबंध किए गए हैं। इस अधिनियम की शक्तियों के द्वारा प्रत्येक जिले में एक या अधिक भरण पोषण अधिकरण स्थापित किए गए हैं जिन का पीठासीन अधिकारी उपखण्ड अधिकारी या उस से उच्च पद का अधिकारी ही हो सकता है।

स अधिनियम में यह उपबंधित किया गया है कि ऐसे वरिष्ठ नागरिक जो अपना भरण पोषण करने में सक्षम नहीं हैं वे भरण पोषण और संरक्षण प्राप्त करने के लिए जहाँ वे स्वयं निवास करते हैं या जहाँ उन की संतानें निवास करती हैं उस क्षेत्र के भरण पोषण अधिकरण के समक्ष स्वयं या किसी पंजीकृत संस्था के माध्यम से आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं। सूचना प्राप्त होने पर अधिकरण स्वयं भी कार्यवाही कर सकता है। यह अधिकरण संक्षिप्त सुनवाई के उपरान्त आवेदन का निपटारा करते हुए संतानों और निस्संतान वरिष्ठ नागरिकों के संबंधियों के विरुद्ध वरिष्ठ नागरिकों को प्रतिमाह भरण पोषण की निश्चित राशि जो दस हजार रुपए प्रतिमाह तक की हो सकती है अदा करने का आदेश दे सकता है। आदेश की पालना न करने पर दायित्वाधीन व्यक्ति पर जुर्माना किया जा सकता है और एक माह तक के कारावास से दंडित भी किया जा सकता है।

स अधिनियम में यह भी यह भी उपबंधित किया गया है कि इस अधिनियम के लागू होने के उपरान्त यदि कोई नागरिक अपनी संपत्ति को इस शर्त के अंतर्गत कि संपत्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति संपत्ति अन्तरित करने वाले व्यक्ति को जीवन के लिए आवश्यक सुख सुविधाएँ और भौतिक साधन उपलब्ध कराएगा। यदि संपत्ति प्राप्त करने वाला व्यक्ति संपत्ति अंतरित करने वाले व्यक्ति को उक्त  आवश्यक सुख सुविधाएँ और भौतिक साधन प्रदान करने से मना करता है या प्रदान नहीं करता है तो उक्त अधिकरण संपत्ति के अंतरण को धोखाधड़ी से प्राप्त किया गया मानते हुए उसे निरस्त कर सकता है।

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