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जमीन पर आप का कब्जा मालिकाना है, आप मकान तुड़ा कर नया बनाने में बाधा पैदा करने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

समस्या-

अर्पण कुमार जैन ने सिद्धेकेला, जिला बोलानगीर, उड़ीसा से पूछा है-

रीब पचास साल पहले मेरे पापा ने एक जमीन खरीदी थी, पेपर में हाथ से लिखवा क़े। पर उस जमीन मेरे पापा के चाचा के लड़के ने अपने नाम पर करवा लिया।  पर उस जमीन पर हम ही इस्तेमाल करते हैं। अभी हम घर तोड़ के नया घर बना रहे हैं। तो हो नाम भी नहीं करने दे रहे और जमीन के भी एक हिस्सा मांग रहे है।

समाधान-

प की समस्या बहुत अधिक स्पष्ट नहीं है। बस यह समझ आ रहा है कि आप के पिता ने किसी से एक जमीन खरीदी जिस का एग्रीमेंट किसी कागज पर हाथ से लिखा गया। उस जमीन पर मकान बना कर आप का परिवार निवास करता है। आप के पिता के चाचा के लड़के ने उस जमीन को अपने नाम करा लिया है। यह स्पष्ट नहीं किया है कि उस ने अपने नाम कैसे कराया है? किस रिकार्ड में वह जमीन पिता के चाचा के लड़के के नाम हुई है। जिस के कारण वह नया घर बनाने में अड़चन पैदा कर रहा है और जमीन का एक हिस्सा मांग रहा है।

आप के पिता ने एक हाथ से लिखे एग्रीमेंट के अंतर्गत जमीन खरीदी और उस का कब्जा ले लिया और मकान बना कर उस पर निवास कर रहे हैं।  किसी भी स्थायी संपत्ति जिस में मकान जमीन वगैरा शामिल हैं  उस का मूल्य 100 रुपए या उस से अधिक है तो उस संपत्ति के विक्रय का पंजीकरण होना आवश्यक है। आपने जो विवरण दिया है उस से लगता है कि आप के पिता ने उस का पंजीयन नहीं कराया था।

संपत्ति अंतरण अधिनियम (Transfer of Property Act) की धारा 53 ए में यह प्रावधान है कि किसी संविदा के अंतर्गत विक्रय की गयी संपत्ति का कब्जा यदि क्रेता को दे दिया गया है तो यह संविदा का आंशिक पालन है और ऐसा आंशिक पालन हो जाने के उपरान्त यदि पंजीयन न भी हो तो उस संपत्ति का कब्जा क्रेता से वापस नहीं लिया जा सकता है। हम इस तरह की समस्या का उत्तर पहले भी एक समस्या (संपत्ति अंतरण की किसी लिखत के अनुसार कब्जा दे दिए जाने पर किसी तरह वापस नहीं लिया जा सकता।) में दे चुके हैं।

आप के मामले में भी यही स्थिति है। इस तरह आप के या आप के पिता के पास जो संपत्ति है उस का कब्जा आप से या आप के पिता से कोई नहीं ले सकता। पिता के चाचा का लड़का यदि मकान को तुड़ा कर बनाने में बाधा उत्पन्न कर रहा है तो आप के पिता या आप उस समय जमीन खरीद की कागज पर लिखत के आधार दीवानी न्यायालय में वाद संस्थित के कह सकते हैं कि जमीन आप के पिता ने इस लिखत से खऱीदी थी और उस पर मकान बना कर आप 50 वर्ष से निवास कर रहे हैं। इस तरह आप उस जमीन पर बहैसियत स्वामी काबिज हैं। इस मकान को तुड़ा कर दूसरा बनाना चाहते हैं ओर प्रतिवादी ( पिता के चाचा का लड़का) इस में बाधा बनता है और जमीन में हिस्सा मांगता है। उसे आप की जमीन पर दखल से रोका जाए और आदेश दिया जाए कि वह आप के मकान को तुड़ा कर नया बनाने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न न करे। इसी वाद में आप इस तरह के दखल के विरुद्ध अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त कर सकते है। बेहतर है कि आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे दीवानी मुकदमे लड़ने वाले वकील से मिलें और उस से परामर्श कर के यह वाद संस्थित करें। अस्थई निषेधाज्ञा प्राप्त होने के बाद आप जमीन पर बना मकान तोड़ कर नया बना सकते हैं।

बिना पंजीकरण के किसी भी अचल संपत्ति या उस के भाग का हस्तान्तरण संभव नहीं है।

समस्या-

अभिषेक शर्मा ने  भागलपुर बिहार से पूछा है-

मेरा पुश्तैनी मकान है जिस पर मेरे पिताजी ने अपनी मर्जी से स्टाम्प पेपर पर हस्ताक्षर करवाया कि तुम अपनी मर्जी से अपना हिस्सा दे रहे हो,पर मेरी मर्जी नहीं थी। मुझ से टॉर्चर कर के कुछ पैसे दे कर हस्ताक्षर करवाए। क्या अब मैं अपना हिस्सा ले सकता हूँ क्या? हस्ताक्षर मेरे और दो गवाहों के हैं। कृपया बताएँ कि मुझे क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के पिता ने आप का अपना हिस्सा उन के हक में छोड़ने के लिए आप से कोई दस्तावेज लिखाया है। इस तरह उन्हों ने आप का हिस्सा अपने नाम हस्तान्तरित करने का प्रयत्न किया है। 100 रुपए से अधिक मूल्य की किसी भी अचल संपत्ति या उस के हिस्से का हस्तान्तरण बिना उप पंजीयक के यहाँ पंजीकृत दस्तावेजके बिना होना असंभव है।

आप के पिता को यही करना था तो या तो अपने नाम रिलीज डीड आप से निष्पादित करवा कर उस का पंजीकरण करवाना था। चूँकि आप को उन्हों ने कुछ पैसे भी दिए हैं तो यह एक प्रकार से भूमि का विक्रय भी है जिस का भी पंजीकरण होना जरूरी था। पंजीकरण के लिए यह आवश्यक था कि आप को उपपंजीयक के समक्ष ले जाया जाए और वहाँ के रजिस्टरों पर तथा दस्तावेज की दूसरी प्रति पर भी आप के हस्ताक्षर कराए जाएँ।

यदि इस तरह का कोई हस्तान्तरण दस्तावेज पंजीकृत नहीं हुआ है तो पिता द्वारा इस तरह का दस्तावेज लिखा लेने से कोई फर्क नहीं पड़ता है। आप पुश्तैनी संपत्ति में अपना हिस्सा प्राप्त करना चाहते हैं तो तुरन्त बंटवारे तथा अपना हिस्सा अलग कर उस का पृथक कब्जा देने के लिए वाद सक्षम न्यायालय में संस्थित करें, तथा उक्त संपत्ति या उस के किसी भी हिस्से को बेचने या किसी भी प्रकार से खुर्द-बुर्द करने पर रोक लगवाएँ।

जीतेजी संपत्ति हस्तान्तरण दान पत्र या विक्रय पत्र के आधार पर ही किया जा सकता है।

समस्या-

मेरे दादाजी की 6 हेक्टेयर जमीन है,और हम उनके जीते जी ही जमीन का नामांतरण कराना चाहते है,पिताजी के नाम पर,या डायरेक्ट मेरे नाम पर। मेरी 2 बुआजी है, तो क्या कर सकते हैं हम? ,और नामांतरण शुल्क तथा वसीयत के बारे में बताएँ।

-अनिल गुर्जर, ग्राम पोखरनी, तहसील टिमरनी, जिला हरदा, मध्यप्रदेश

समाधान-

प का प्रश्न बिना पूर्ण विवरण के है। आपने यह नहीं बताया कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है या फिर पुश्तैनी है। यदि पुश्तैनी है तो उस में आप के दादाजी का नाम होते हुए भी आप के पिताजी और दोनों बुआएँ भी जन्म से भागीदार हो सकती हैंं। वैसी स्थिति में दादाजी केवल अपने हिस्से की जमीन को ही हस्तान्तरित कर सकते हैं आपके पिता और बुआओँ के हिस्से की जमीन को हस्तान्तरित नहीं कर सकते।

हम यदि यह मान लें कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है तो उन के जीवनकाल में उक्त भूमि आप के पिता या आप के नाम केवल हस्तान्तरण से ही संभव है। वह विक्रय पत्र या दानपत्र के पंजीकरण से ही संभव है। इस में भूमि के बाजार मूल्य का 7-10 प्रतिशत खर्चा आ सकता है। इस संबंध में आप को अपने उप पंजीयक के कार्यालाय से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। एक बार दान पत्र या विक्रय पत्र का पंजीयन हो जाने पर आप उस के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं।

अत्यधिक कम खर्च मे ंउक्त भूमि को आप के या आप के पिताजी के नाम हस्तांतरित कराने का तरीका यह है कि आप के दादाजी जिस के नाम भी उक्त भूमि को हस्तांतरित कराना चाहते हैं उस के नाम वसीयत कर दें और उस वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करा लिया जाए। आप के दादाजी के जीवनकाल के बाद आप उस वसीयत के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं। लेकिन दादाजी आपनी वसीयत को अपने जीवनकाल में कभी भी निरस्त कर सकते हैं या बदल सकते हैं।

संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदार अपना हिस्सा विक्रय कर सकता है।

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ज़मीला खातून निवासी बाराबंकी, हाल सीतापुर मैंने सन १९९५ में एक ६०० स्क्वायर फुट का घर ख़रीदा था। उस बैनामे पर मेरा नाम व मेरी ५ पुत्रियों के नाम भी अंकित हैं। अब मैं अपना मकान बेचना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बड़ी पुत्री उसमे टांग मार रही है और उससे मेरा विवाद चल रहा है। तो कृपा करके उसके बेचने का हल बताएँ कि किस प्रकार मैं उसे बेच सकती हूँ? क्या उसमें मैं कोई केस करूँ या पुलिस से शिकायत करूँ? अभी मकान में ताला पड़ा है। मेरी ५ नंबर की पुत्री जिससे मेरा विवाद चल रहा है वो भी अब उस मकान में नहीं रहती है परन्तु जबरन पूरा मकान हथियाना चाह रही है।

समाधान-

प का मकान एक संयुक्त संपत्ति है। इस के छह हिस्सेदार हैं। इस कारण कोई भी हिस्सेदार पूरा मकान नहीं बेच सकते। पूरा मकान सभी छह हिस्सेदार मिल कर ही बेच सकते हैं। हाँ आप पाँच हिस्सेदार अर्थात आप और आप की चार बेटियाँ मिल कर मकान के पाँच हिस्से बेच सकते हैं और मकान का कब्जा आप के पास हो तो खरीददार को हस्तान्तरित कर सकते हैं। लेकिन इस के बाद आपत्ति करने वाली पुत्री का छठा हिस्सा उस मकान में उसी का बना रहेगा। चाहे तो खरीददार प्रयत्न कर के आप की बेटी से छठा हिस्सा भी बाद में खरीद सकता है। या आप की आपत्ति करने वाली बेटी विभाजन का वाद कर सकती है। मकान छोटा होने से उस के भौतिक विभाजन की संभावना नहीं होने से स्थिति यही होगी कि बेटी को कहा जाएगा कि जो भी बाजार मूल्य है उस का छठा हिस्सा ले कर अपना हिस्सा छोड़ दे।

दूसरा रास्ता है कि आप बंटवारे का वाद प्रस्तुत करें और विभाजन करवाएँ विभाजन की कार्यवाही में भी वही होगा जो पहले हम बता चुके हैं। जब आप बेटी का हिस्सा खरीद लें तब आप पूरा मकान बेच सकती हैं।

लीज की संपत्ति का पुत्र के नाम हस्तान्तरण कैसे हो?

समस्या-

अमित भारद्वाज ने गणेश चौक, बारघाट रोड, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी दादी की एक दुकान इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय  रोगी कल्याण समिति के काम्प्लेक्स के अंतर्गत है । दुकान 2000 सन में रोगी कल्याण समिति से क्रय की गई थी। किरायेदारी पर रोगी कल्याण समिति 500 रुपये किराया हर माह किरायेदारी के रूप में सभी दुकानदार से लेती है। दादी अब यह चाहती है की दुकान पापा जी के नाम से हस्तान्तरित हो जाये । समिति केअध्यक्ष कलेक्टर महोदय होते हैं और सचिव जिला अस्पताल के सर्जन होते है। दादी ने रोगी कल्याण समिति को आवेदन भी दे दिया है, जन सुनवाई में कलेक्टर ने यह बताया था कि यदि दादी दुकान पापा के नाम करना चाहती है और अन्य पुत्रों को कोई आपत्ति नहीं है तो वह कोर्ट जाने में स्वतंत्र है। लेकिन आवेदन देने के बाद समिति के बाबू काम नहीं कर रहे हैं बोलते है कि कोर्ट जाओ। इस पर हम ने उन से कहा कि दादी अभी जीवित है और जीवित अवस्था में दुकान जिसे चाहे उसे दे सकती है। दादी और पिताजी को क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के द्वारा प्रेषित तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि दुकान का स्वामित्व रोगी कल्याण समिति का है और दुकान आप की दादी के नाम लीज पर है। लीज पर दी गयी संपत्ति को हस्तान्तरित करने के लिए मूल स्वामी की अनुमति की आवश्यकता है। दादी के नाम जो लीज डीड है उस की शर्तों पर निर्भर करता है कि दादी दुकान कैसे अपने किसी पुत्र या अन्य व्यक्ति के नाम हस्तान्तरित कर सकती है। सब से पहला काम तो यह किया जा सकता है कि दादी एक वसीयत कर के दुकान को आप के पिता के नाम वसीयत कर दे और इस वसीयत को उप पंजीयक के कार्यालय में वसीयत करा दिया जाए। इस से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि दादी के देहान्त के तुरंत बाद यह दुकान आप के पिता जी के स्वामित्व में स्वतः ही आ जाएगी। तब आप के पिताजी वसीयत की प्रमाणित प्रति रोगी कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत कर लीज का नामान्तरण उनके नाम करने का आवेदन कर सकते हैं।

विकल्प में आप यह भी कर सकते हैं कि आप उप पंजीयक कार्यालय में लीज डीड को दिखा कर यह पूछ सकते हैंं कि क्या दादी इस लीज को विक्रय या दानपत्र के माध्यम से आप के पिता जी को हस्तान्तरित कर सकती है। यदि उन्हें कोई आपत्ति न हो तो दान पत्र लिख कर उसे पंजीकृत करवा कर दादी उस दुकान को आप के पिताजी के नाम कर सकती है। पंजीकृत दानपत्र के आधार पर लीज आपके पिताजी के नाम नामांतरित करने के लिए रोगी कल्याण समिति को आवेदन किया जा सकता है। वसीयत और दान पत्र दोनों के आधार पर लीज का नामान्तरण न किए जाने पर न्यायालय के समक्ष व्यादेश जारी करने के लिए समिति के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया  जा सकता है।

दिया हुआ दान स्वीकार कर लिए जाने के बाद वापस नहीं हो सकता।

Giftसमस्या-

शकुन्तला ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

पिताजी ने सन् 2010 में मकान खरीदा, इसी मकान को पिताजी ने दानपत्र निष्पादित कर पंजीकृत करवा कर बड़ी बेटी को हस्तान्तरित कर दिया। क्या पिता की छोटी बेटी इस मकान में हिस्सा पा सकती है? क्या पिता इस दान को वापस लेने का अधिकार रखते हैं। क्या पिता के देहान्त के बाद छोटी बेटी इस मकान में हिस्सा प्राप्त कर सकती है। अब बड़ी बेटी के पिता इस मकान की कीमत बड़ी बेटी से मांग रहे हैं। बड़ी बेटी भी पिता को मकान की कीमत देना चाहती है। यह राशि दी जाए तो क्या कैसे दी जाए? क्या दस्तावेज लिखवाया जाए?

समाधान-

दि किसी व्यक्ति ने दानपत्र निष्पादित कर उसे पंजीकृत करवा कर कोई अचल संपत्ति किसी को दान कर दी हो, जिसे दान की हो उस ने उस दान को स्वीकार कर लिया हो तथा अचल संपत्ति का कब्जा भी प्राप्त कर लिया हो तो ऐसा दान निरस्त किया जाना संभव नहीं है।

दि बड़ी बेटी ने पिता के दान पत्र को स्वीकार कर उस संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लिया है तो यह दानपत्र निरस्त नहीं किया जा सकता। छोटी बेटी पिता के जीवनकाल में या उन के जीवन के उपरान्त भी इस दान पत्र को निरस्त नहीं करवा सकती है और न ही उस मकान में कोई हिस्सा प्राप्त करना चाहती है। कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किए हुए दान को दान लेने वाले द्वारा स्वीकार करने के बाद वापस नहीं ले सकता है।

दि पिता दान किए हुए मकान का मूल्य अब मांग रहे हैं तो यह कानून के विरुद्ध है वह अब ऐसा नहीं कर सकते। लेकिन यदि पुत्री अपने पिता को धन देना चाहती है तो वह धन किसी अन्य रूप में ही देना होगा। इस धन का हस्तान्तरण किस विलेक के माध्यम से देना चाहिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। कोई अच्छा वकील बड़ी बेटी और पिता से बात कर के निष्पादित दानपत्र का अध्ययन और परिस्थितियों का मूल्यांकन कर के तथा दोनों पक्षों की शंकाओं और कानून को ध्यान में रखते हुए तय कर सकता है कि इस धनराशि के हस्तान्तरण के लिए किस तरह का विलेख लिखना चाहिए।

बेहतर है कि माँ संपत्ति को आप के नाम गिफ्ट डीड कर हस्तान्तरित कर दे।

समस्या-

संजय ने पाली, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई संजय की शादी सन् 2002 में हुई थी, वह दो चार महीने के बाद ही हमारे घर से अलग हो गया। मैं ने मेरे माँ मधु के नाम से बैंक से लोन लेकर शहर पाली जिला पाली (राजस्थान) में प्रॉपर्टी सन् 2000 में खरीदी। उस बैंक लोन की समस्त राशि मेरे द्वारा जमा करवाई गई। अभी भी मैं मेरी माँ के साथ में ही रहता हु। तो क्या मेरा भाई संजय मेरी माँ की मृत्यु के बाद इस प्रॉपर्टी का हिस्सेदार रहेगा? अभी मेरी माँ जीवित है। यदि मेरा भाई संजय हिस्सेदार रहता है तो उसे हिस्सेदारी से अलग करने के लिए मुझे मेरी माँ से इस प्रॉपर्टी सम्बन्ध में क्या क्या दस्तावेज तैयार करवाने चाहिए? जिस से इस मेरी माँ मधु के नाम से बैंक लोन से मेरे द्वारा खरीदी सम्पति का पूरा स्वामित्व मेरा ही रहे, बाद में किसी भी तरह का विवाद न हो।

समाधान

प ने उक्त संपत्ति माँ के नाम से खरीदी, ऋण भी चुका दिया गया। वैसी स्थिति में अब उक्त संपत्ति पर किसी तरह का कोई भार भी नहीं है और वह भार मुक्त है। वैसी स्थिति में उक्त संपत्ति माँ की मानी जाएगी और माता जी की मृत्यु के उपरान्त वह उत्तराधिकार में चली जाएगी। जिस में माँ के सभी उत्तराधिकारी बराबर के हिस्सेदार होंगे। निश्चित रूप से आप का भाई भी होगा और वह बंटवारा करने और हिस्सा देने का वाद संस्थित कर सकता है।

दि आप की माँ उक्त संपत्ति को आप के नाम वसीयत कर उसे पंजीकृत करवा देती हैं और फिर अपने जीवन काल में उस वसीयत को परिवर्तित या रद्द नहीं करती हैं तो वसीयत के अनुसार उक्त संपत्ति आप की हो जाएगी। लेकिन यदि माँ उक्त वसीयत को रद्द करती है या उसे परिवर्तित करती है तो उन की अन्तिम वसीयत ही सही मानी जाएगी।

दि आप वसीयत के बदले जाने की इस आशंका से बचना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि उक्त संपत्ति को आप की माँ आप को गिफ्ट डीड से हस्तान्तरित कर सकती हैं। इस से आप माताजी के जीवन काल में ही उक्त संपत्ति के स्वामी हो जाएंगे।

पिता से पुत्र और चाचा से भतीजे के नाम हस्तान्तरण पर स्टाम्प शुल्क देय होगी।

ऊसरसमस्या-

मुकेश वर्मा ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी और चाचा जी का आपसी बंटवारा हो चुका है। चूंकि हमारी सम्पत्ति दो गांवों (कठिया एवं डिघारी) में है एवं बंटवारे में पिता जी एवं चाचा को दोनों गावों से बराबर-बराबर (कठिया में 11-11 एवं डिघारी में 10-10 एकड़) हिस्सा प्राप्त है। खाता विभाजन होने के पश्चात् दोनों अपने अपने हिस्से पर कृषि कार्य कर रहे है। मेरे पिता जी और चाचा जी आपसी सहमति से हिस्से में प्राप्त सम्पत्ति का अदला-बदली करना चाहते हैं। अर्थात मेरे पिता जी डिघारी में प्राप्त 10 एकड़ जमीन चाचा जी के नाम कर ग्राम कठिया की 10 एकड़ जमीन लेना चाह रहे है। खेती-बाड़ी का कार्य अब अपने हाथ में लेना चाहता हूं, और चाचा जी से बदले में प्राप्त 10 एकड़ जमीन को पिता जी के नाम पर न करके सीधे अपने नाम पर करवाना चाहता हूं तथा जो जमीन ग्राम कठिया में मेरे पिता जी के नाम पर है उसे अपने बड़े भाई के नाम पर करवाना चाहता हूं। चूंकि दोनों गांव का पटवारी अलग अलग है एवं अभी तक मैं ने पटवारी से मुलाकात कर कोई सलाह-मशविरा नहीं किया है। अदला-बदली एवं नामांतरण की प्रक्रिया क्या है? इसके किस-किस प्रकार की चार्जेस लगते है? क्या चाचा जी के हिस्से की जमीन को अपने नाम पर करवाने पर मुझे अलग से रजिस्ट्री करवाना पड़ेगा? ऐसी कोई प्रक्रिया बताये जिससे कम खर्च में (या बिना कोई खर्च के) चाचा जी की जमीन अपने नाम पर करवा सकूं। इस पर मेरे पिता जी, मेरे बड़े भाई एवं चाचा जी पूरी तरह से सहमत है।

समाधान-

कृषि भूमि से संबंधित कानून,नियम व प्रक्रिया प्रत्येक राज्य के लिए भिन्न भिन्न है। इस कारण इस मामले में आप को स्थानीय वकील से मशविरा करना चाहिए।

म आप को सिर्फ इतनी राय दे सकते हैं कि विभाजन के बाद पिताजी और चाचाजी आपस में भूमि की अदला बदली करना चाहते हैं तो वे इस के लिए एक्सचेंज डीड निष्पादित कर सकते हैं। जिस में स्टाम्प ड्यूटी कम लगेगी। लेकिन यदि आप के चाचाजी और पिताजी की जमीन आप अपने और बड़े भाई के नाम कराना चाहते हैं तो यह गिफ्ट या विक्रय होगा और इस पर पूरी स्टाम्प ड्यूटी देनी पड़ेगी।

बेहतर होगा कि पहले एक्सचेंज डीड निष्पादित करवा ली जाए। जमीन पिताजी के नाम आ जाए। फिर आप अपने पिता जी से वसीयत करवा लें जिस से जमीन उन के जीतेजी उन के नाम रहे और उन के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत के हिसाब से दोनों भाइयों को उन के हिस्से की भूमि मिल जाए।

कोई भी हिन्दू केवल अपनी स्वअर्जित व संयुक्त संपत्ति में अपने हिस्से को हस्तान्तरित कर सकता है।

ऊसरसमस्या-

शिरीष अग्रवाल ने गोदारी, महासमुन्द, छत्तीसगढ़ से पूछा है- 

कुछ दिनों से पिताजी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है, वे मुझसे काफी नाराज हैं।  मुझे सबक सिखाने के लिए वे कृषि भूमि, घर, ट्रेक्टर, कृषि उपकरण, खदान की जमीन में से ज्यादातर हिस्सा मेरे प्रिय अनुज को देना चाहते हैं। पिताजी ने उक्त पैतृक कृषि भूमि अपने भाइयों से खरीदी थी जिसका केवल मौखिक बँटवारानामा सादे कागज पर हुआ है। वर्तमान में कुल 18 एकड़ कृषिभूमि में से 3 मेरे, 3 मेरी पत्नी, 6 अनुज के तथा 6 पिताजी के नाम से खाते (ऋण पुस्तिका) पर चढ़ी है। क्या भूमि मेरे खाते पर चढ़ी होने के बाद भी पिताजी मुझसे जमीन वापस लेकर अनुज भाई को दे सकते हैं। मैं किस प्रकार से इस विवाद से बच सकता हूँ? कृपया उचित मार्गदर्शन देने की कृपा करें।


समाधान-

प के पिता द्वारा कृषि भूमि को उन के भाइयों से खरीदने की बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। देखना यह है कि पिताजी के भाइयों से आप के पिता के नाम किस दस्तावेज के माध्यम से भूमि का हस्तान्तरण हुआ है। हो सकता है वह रिलीज डीड के माध्यम से हुआ हो या किसी अन्य रीति से। जिस रीति से हस्तान्तरण हुआ है वह कृषि भूमि के स्वामित्व को प्रभावित करेगी। जिस 18 एकड़ भूमि की आप बात कर रहे हैं वह पहले से ही विभिन्न व्यक्तियोें के खाते चढ़ी हुई है। उन में से केवल 6 एकड़ भूमि आप के पिता के खाते की है वे उसे आप के भाई को या किसी अन्य व्यक्ति को हस्तान्तरित कर सकते हैं, अन्य भू्मि को नहीं। आप के व आप की पत्नी के खाते जो 3-3 एकड़ भूमि है उसे वे् हस्तान्तरित नहीं कर सकते।

 कोई भी हिन्दू अपनी स्वअर्जित अथवा सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में अपना हिस्सा हस्तान्तरित कर सकता है या उस के संबंध में वसीयत कर सकता है। लेकिन किसी दूसरे के खाते की संपत्ति को हस्तान्तरित नहीं कर सकता और न ही उस की वसीयत कर सकता है। यदि आप के पिता किसी तरह से आप के व आप की पत्नी के खाते की भूमि में दखल करें और उस का हस्तान्तरण करना चाहेँ तो आप उस के हस्तान्तरण पर रोक के लिए दीवानी न्यायालय में निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। यदि अन्य संपत्तियों का निर्माण पुश्तैनी संपत्ति की आय से हुआ है तो आप अन्य संपत्तियों को भी संयुक्त कृषि भूमि की आय से बनी हुई बताते हुए उस के हस्तान्तरण पर भी निषेधाज्ञा के लिए प्रयास कर सकते हैंं।

कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति को किसी को भी हस्तान्तरित कर सकता है।

lawसमस्या-

निर्मल मालवीय ने राजगढ़, मध्य प्रदेश से पूछा है-

गर कोई पिता अपने दो लडको में से किसी एक के नाम से अपनी संपत्ति करना चाहता है तो यह सम्भव है या नहीं?

समाधान-

बिलकुल संभव है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वयं की संपत्ति को किसी को भी वसीयत कर सकता है, उसे विक्रय, दान आदि प्रकार से हस्तान्तरित कर सकता है। पिता भी एक व्यक्ति है वह भी यह सब कर सकता है। यहाँ तक कि कोई पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति में उस का हिस्सा भी वह इसी प्रकार से वसीयत, विक्रय, दान आदि कर सकता है।

केवल जो संपत्ति पुश्तैनी /सहदायिक है उस में अपने पुत्रों, पुत्रियों के हिस्से को किसी अन्य को हस्तान्तरित नहीं कर सकता न ही वसीयत कर सकता है। कोई व्यक्ति यदि अपनी किसी संपत्ति को अपने जीवन काल में स्थानान्तरित नहीं करता है या उस की वसीयत नहीं करता है तो ही उस के उत्तराधिकारियों का उस संपत्ति में उस की मृत्यु के बाद अधिकार बनता है उस से पहले नहीं।


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