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गवाह की समन और वारंट से तलबी

समस्या-

निधि जैन ने उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं किसी व्यक्ति की गवाही कोर्ट में करवाना चाहता हूँ। मुझे विश्वास है कि वह व्यक्ति मेरे पक्ष में बयान देगा, लेकिन पारिवारिक विवाद की वजह से मेरे कहने पर वह व्यक्ति मेरा गवाह नहीं बनेगा। मैं आप से यह जानना चाहता हूँ कि क्या किसी केस में कोर्ट से समन जा सकता है कि वह व्यक्ति गवाही अथवा अपने बयान देवे? अगर ऐसा कोई प्रावधान है तो इसके लिए क्या किया जा सकता है?

समाधान-

किसी भी व्यक्ति की गवाही अदालत में कराये जाने के लिए उस का नाम गवाह की सूची में होना चाहिए। यदि है तो आप अदालत से निवेदन कर सकते हैं कि उस गवाह को समन भेज कर अदालत में गवाही देने के लिए बुलाया जाए। अदालत उसे समन जारी कर के गवाही के लिए बुलाएगी। समन तामील हो जाने पर भी गवाह न्यायालय के समक्ष उपस्थित नहीं होता है तो ऐसे गवाह को जमानती वारंट से और जमानती वारंट से भी अदालत में न आने पर गिरफ्तारी वारंट से उसे बुलाया जा सकता है। इस संबंध में दंड प्रक्रिया संहिता तथा दीवानी प्रक्रिया संहिता दोनों में उपबंध हैं।

यदि किसी वजह से गवाह सूची पेश न हो या सूची में गवाह का नाम न हो तो न्यायालय को आवेदन दे कर गवाह का नाम सूची में बढ़ाया जा सकता है।

अभियुक्त द्वारा अपने खिलाफ गवाही देने से रोकने के लिए धमकी देना गंभीर अपराध है।

समस्या-

सुनील ने दौसा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


गर कोई किसी को अपने खिलाफ किसी अपराध की गवाही देने के लिए रोकता है और धमकी देता है तो क्या उसके विरुद्ध कार्यवाही की जा सकती है?


समाधान-

किसी को अपने खिलाफ किसी अपराध की गवाही देने से रोकना और इस के लिए धमकी देना भारतीय दंड संहिता की धारा 201 के अन्तर्गत एक गंभीर अपराध है और इस के लिए दंड भी अधिक है। जैसे जैसे गवाही से संबंधित अपराध की गंभीरता बढ़ती है वैसे ही दंड भी बढता जाता है।

आप को तुरन्त सम्बधित पुलिस थाना में रिपोर्ट लिखानी चाहिए। यदि पुलिस रिपोर्ट पर कार्यवाही करने में कोताही करे तो अगले ही दिन एसपी से मिल कर उसे कार्यवाही करने के लिए कहना चाहिए। यदि एस पी भी इस मामले में कोताही करता है तो आप न्यायालय को तुरन्त प्रतिवाद प्रस्तुत करें। न्यायालय तुरन्त कार्यवाही करेगा।

संज्ञेय अपराधों के मामलों की सुनवाई में परिवादी व प्रभावित व्यक्ति की साक्षी के अतिरिक्त कोई भूमिका नहीं

समस्या-

बागपत, उत्तर प्रदेश से बीजेन्द्र कुमार ने पूछा है –

मेरे गाँव की ही एक औरत ओर उसके पति ने दिनांक 03-04-2009  को मेरी भाभी से लड़ाई झगड़ा करके मेरी भाभी के कान का एक कुंडल नोच लिया और भाभी के साथ उन दोनों ने मर पीट भी की। घटना के समय हम दोनों भाई घर पर नहीं थे और लगभग 250-300 कि. मी की दूर काम के लिए गए थे।  घर में भाभी अकेली थी, अकेली जानकर उन दोनों ने ये वारदात की।  मेरी भाभी के कान से कुंडल नोचने के बाद उस औरत ने सोने का वो कुंडल भी अपने पास ही रख लिया। मेरी भाभी का कान फट गया जिससे खून गिरने लगा।  इसी हालत में भाभी ने थाने जाकर FIR लिखवाई इसके बाद थानेदार ने सरकारी अस्पताल में कान का मेडिकल करवाया, बाद में पुलिस उस औरत और उसके पति को थाने ले आयी। इनके खिलाफ IPC की धारा 323, 504, 506  के तहत मुकदमा दाखिल हुआ और कोर्ट में आरोप पत्र प्रस्तुत हो गया। इसके बाद उस केस की हमें कोई खबर नहीं है। हम इस केस को दोबारा से नया करना चाहते है ताकि पीड़िता को न्याय मिल सके।

समाधान-

police station receptionब भी कभी पुलिस को किसी अपराध के बारे में सूचना मिलती है तब यदि वह अपराध दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत संज्ञेय होता है तो पुलिस उस पर अन्वेषण करती है और न्यायायलय के समक्ष आरोप पत्र प्रस्तुत करती है। इन मामलों में न्यायालय के समक्ष पुलिस और राज्य सरकार अभियोजक होती है शिकायतकर्ता, अपराध से प्रभावित व्यक्ति और साक्षीगण का बस इतना संबंध होता है कि उन्हें न्यायालय में जा कर गवाही देनी होती है। आप के मामले में जो तीन धाराओं में आप ने अपराध बताए हैं उन में से पहले दो असंज्ञेय हैं जिन में पुलिस कार्यवाही नहीं कर सकती। उन के लिए शिकायतकर्ता को स्वयं न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना होता है। तीसरा धारा 506 के अंतर्गत किए गए अपराध में यदि गंभीर चोट पहुँचाने या मृत्यु कारित करने की धमकी दी गई हो तभी वह संज्ञेय अपराध है।

प को पुलिस थाना जा कर प्रथम सूचना रिपोर्ट की तिथि और क्रमांक के आधार पर पूछना चाहिए कि क्या पुलिस ने उस प्रकरण में आरोप पत्र प्रस्तुत किया है और यदि किया है तो मुकदमा कहाँ किस न्यायालय में चल रहा है, उस की क्या स्थिति है तथा उस में न्यायालय ने सुनवाई के लिए क्या तिथि निश्चित की हुई है? यदि पुलिस ने आरोप पत्र प्रस्तुत किया है और वह उसे प्रस्तुत करने की तिथि और न्यायालय बता दे तो आप सीधे न्यायालय में जा कर भी पता कर सकते हैं कि मुकदमे की स्थिति क्या है। इस मुकदमे में आप की कोई भूमिका नहीं है। जब भी न्यायालय में मुकदमा गवाही की स्थिति में आएगा तब आप को गवाही देने के लिए समन न्यायालय से पुलिस के माध्यम से भेजा जाएगा तब आप जा कर गवाही दे सकते हैं। फिर भी आप इस मामले में रुचि लेना चाहते हैं तो जिस नगर में आप का उक्त मुकदमा चल रहा है वहाँ के किसी वकील से जा कर मिलिए उसे प्रथम सूचना रिपोर्ट का क्रमांक और दर्ज होने की तिथि बताएँ। वे मुकदमे का पता कर के आप की तरफ से अपना वकालतनामा प्रस्तुत कर देंगे और लोक अभियोजक (सरकारी वकील) के साथ साथ उस मुकदमे में आप का पक्ष लोक अभियोजक व न्यायालय की अनुमति से रख सकेंगे।

वसीयत फर्जी होने की संभावना होने पर वंचित उत्तराधिकारी विभाजन का वाद करें।

समस्या-

बुरहानपुर, मध्यप्रदेश से नीतेश दलाल ने पूछा है-

मेरे नानाजी का देहान्त हो गया है।  मेरे चारों मामा कहते हैं कि नाना अपनी पूरी संपत्ति उन के नाम वसीयत कर गए है।  मेरी माँ और मौसी नाना जी की दो लड़कियाँ हैं। उन के नाम पर कुछ भी नहीं छोड़ा है। जो वसीयत लिखी है  वह पंजीकृत नहीं है, और उन के गवाह भी मर चुके हैं।  वसीयत बनावटी भी हो सकती है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प ने यह नहीं बताया कि क्या आप की माता जीवित हैं?  आप का तो अभी अपनी माता के जीवित रहते हुए कोई अधिकार नहीं बनता है।

से मामलों में जहाँ वसीयत के दोनों गवाह जीवित न हों और वसीयत कर्ता के जीवन काल में उस ने वसीयत के बारे में किसी को न बताया हो वसीयत के फर्जी कूट रचित होने की संभावनाएँ अत्यन्त प्रबल होती हैं। यदि आप की माता जी और मौसी यह समझती हैं कि वसीयत आप के नाना जी ने नहीं लिखी है अपितु फर्जी बनाई गई है तो वे कार्यवाही कर सकती हैं।

प की माता जी और मौसी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आप के नाना द्वारा कोई वसीयत नहीं करने पर मामाओं के समान उक्त संपत्ति के हिस्से की हकदार होंगी।  आप की माता जी और मौसी को उक्त संपत्ति के विभाजन के लिए दीवानी वाद जिला न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना चाहिए।   आप की माँ और मौसी द्वारा प्रस्तुत विभाजन के वाद में उस वसीयत का कोई उल्लेख न किया जाए।  तब आप के मामा अवश्य ही वाद के जवाब में उस कथित वसीयत का उल्लेख करते हुए यह अभिवचन करेंगे कि उन के पिता ने उन की समस्त संपत्ति की उन चारों के नाम वसीयत कर दी थी। यह अभिकथन मामाओं की ओर से होने के कारण उन पर उस वसीयत को साबित करने का भार होगा। लेकिन वसीयत को सही साबित करना गवाहों की गैर मौजूदगी में उन के लिए आसान नहीं होगा।  यदि आप के मामा वसीयत को साबित नहीं कर पाए तो इस वाद के निर्णय पर पारित डिक्री से आप की माँ और माता जी को उन के पिता की संपत्ति में मामाओं के बराबर का हिस्सा प्राप्त हो सकता है।

केवल सूचना देने वाले के विरुद्ध ही धारा 182 भा.दं.सं. का मामला दर्ज किया जा सकता है

समस्या-

मेरे गांव के एक व्यक्ति ने एक होमगार्ड महिला के खिलाफ जिसके यहां वो पूर्व में काम किया करता था,   हरिजन उत्पीड़न अधिनियम के तहत मारपीट की रिपोर्ट लिखायी थी। पुलिस ने इस मामले में अंतिम रिपोर्ट लगा दी है तथा अपनी रिपोर्ट में मेरे कुछ विरोधियों के इशारे पर उक्त होमगार्ड महिला के कहने पर मेरे खिलाफ 182 की रिपोर्ट भेज दी है।  जबकि उक्त व्यक्ति तथा उस मामले से मेरा कोई लेना देना नहीं है।  हां, उपरोक्त महिला से हमारा विवाद है जो कि न्यायालय में प्रक्रियाधीन है।  क्या पुलिस मेरे खिलाफ कोई कार्यवाही कर सकती है? तथा क्या मैं इस मामले में पुलिस के विरुद्ध न्यायालय में कार्यवाही सकता हूँ?

-भूरिया, गोण्डा, उत्तर प्रदेश

समाधान-

भारतीय दंड संहिता की धारा 182 निम्न प्रकार है-

182. इस आशय से मिथ्या इत्तला देना कि लोक सेवक अपनी विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग दूसरे व्यक्ति को क्षति कारित करने लिए करे- जो कोई भी लोक सेवक को कोई ऐसी इत्तला, जिस के मिथ्या होने का उसे ज्ञान या विश्वास है, इस आशय से देगा कि वह उस लोक सेवक को प्रेरित करे या यह संभाव्य जानते हुए कि वह उस को तदद्वारा प्रेरित करेगा कि वह लोक सेवक –

(क) कोई ऐसी बात करे या करने का लोप करे जिसे वह लोक सेवक, यदि उसे उस सम्बन्ध में, जिस के बारे में ऐसी इत्तला दी गई है, तथ्यो की सही स्थित का पता होता तो न करता या करने का लोप न करता, अथवा…

(ख) ऐसे लोक सेवक की विधिपूर्ण शक्ति का उपयोग करते जिस उपयोग से किसी व्यक्ति को क्षति या क्षोभ हो,

वह दोनो में से किसी भाँति के कारावास से, जिस की अवधि छह मास तक की हो सकेगी. या जुर्माने से जो एक हजारा रुपए तक का हो सकेगा, या दोनों से दण्डित किया जाएगा।

धारा 182 भा.दं.संहिता के उक्त पाठ से स्पष्ट है कि इस धारा का उपयोग केवल उस व्यक्ति के विरुद्ध किया जा सकता है जिस ने पुलिस को साशय कोई इत्तला दी हो। आप द्वारा वर्णित मामले में किसी अन्य व्यक्ति ने पुलिस को इत्तला दे कर रिपोर्ट दर्ज करवाई है।  इस मामले में आप की भूमिका केवल इतनी हो सकती है कि पुलिस ने अन्वेषण किया हो और आप का बयान धारा 161 भा.दंड.संहिता के अंतर्गत लिया हो. यदि पुलिस ने ऐसा किया है तो भी पुलिस आप के विरुद्ध धारा 182 में किसी अपराध की कार्यवाही करने हेतु न्यायालय से आवेदन नहीं कर सकती। इस कारण से आप को निश्चिंत रहना चाहिए।

स मामले में जब तक पुलिस आप के विरुद्ध कोई कार्यवाही न करे आप पुलिस के विरुद्ध न्यायालय में कोई कार्यवाही नहीं कर सकते। लेकिन यदि पुलिस आप के विरुद्ध कोई कार्यवाही करती है तो आप न्यायालय में कार्यवाही कर सकते हैं।  इस के अतिरिक्त वह व्यक्ति जिस ने होमगार्ड महिला के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करवाई है वह पुलिस द्वारा प्रस्तुत अंतिम रिपोर्ट को चुनौती दे सकती है और न्यायालय में अपने साक्षियों के बयान करवा कर मामले में न्यायालय से प्रसंज्ञान लेने का आग्रह कर सकती है।

अपराधिक मुकदमे में गवाह उपस्थित न होने पर क्या होगा ?

समस्या-

क लड़की से मेरी केवल बातचीत होती थी।  17 जनवरी 2010 को मेरी अनुपस्थिति में वह अचानक मेरे घर पर आई और कहा कि मैं ने उस के साथ शादी की है।  मेरी पत्नी में और उस के बीच झगड़ा हुआ और आपस में मारपीट हो गई। उस लड़की ने थाने में जा कर मामला दर्ज कराया तो पुलिस ने 498-ए का मुकदमा बना दिया जिस में घर के सभी लोगों का नाम लिखा दिया।  किसी तरह उस से समझौता किया तो उस आधार पर हमारी गिरफ्तारी पूर्व जमानत हुई।  पुलिस ने मेरे और मेरी पत्नी के विरुद्ध आरोप पत्र प्रस्तुत किया लेकिन घऱ के अन्य लोगों के विरुद्ध कोई आरोप सिद्ध नहीं पाना लिखा।  हमारे वकील ने आरोप विरचित होने के समय आरोप मुक्ति के लिए बहस की।  लेकिन न्यायालय ने कहा कि समझौते के आधार पर जमानत हुई है इस कारण से आरोप मुक्ति नहीं हो सकती।  अब गवाही के लिए उस लड़की का समन निकला है।  उस ने मेरे घर का पता दे रखा था इस कारण से वह मेरे घर पर आया।  हम ने मना कर दिया कि वह यहाँ नहीं रहती है और न कभी यहाँ रही है।  बाकी सभी गवाह मेरे मोहल्ले के हैं जो सच बोलेंगे।  वह लड़की गवाही देने नहीं आ रही है।  तो ऐसे में क्या हमारी जमानत खारिज हो जाएगी? इस मामले में न्यायालय का क्या निर्णय होना चाहिए?

-महाबली, सासाराम, बिहार

समाधान-

प ने अपने मुकदमे में वकील किया हुआ है।  आप को अपने मुकदमे के बारे में जो भी शंकाएँ हों  उन के बारे में अपने वकील से जानकारी करना चाहिए।  वे अधिक बेहतर तरीके से बता सकते हैं क्यों कि उन्हें मामले की पूरी जानकारी होती है।

प के विरुद्ध न्यायालय में आरोप पत्र राज्य सरकार के लिए पुलिस द्वारा प्रस्तुत किया गया है।  उस मामले को साबित करने का दायित्व राज्य सरकार का है।  आप पर लगाए गए आरोप को बिना किसी युक्तियुक्त संदेह के साबित करना अभियोजन पक्ष की जिम्मेदारी है।  यदि अभियोजन पक्ष किसी भी कारण से आप पर आरोप साबित नहीं कर पाता है तो आप निर्दोष करार दिए जाएंगे और मुकदमा समाप्त हो जाएगा।  उस लड़की को गवाही के लिए प्रस्तुत करना भी पुलिस की जिम्मेदारी है आप की नहीं।  यदि पुलिस उस लड़की को गवाही में नहीं ला पाती है तो गवाही के अभाव में कोई भी बात आप के विरुद्ध साबित नहीं की जा सकती।  आप बेफिक्र रहें।  आप की जमानत केवल जमानत की शर्तों का उल्लंघन करने पर रद्द की जा सकती है।  यदि आप प्रत्येक पेशी पर अदालत में उपस्थित होते रहें तो आप की जमानत भी खारिज नहीं की जा सकती है।  इतना हो सकता है कि मुकदमे में सुनवाई में देरी हो जाए।

स मामले में आरोप 498-ए भा.दंड संहिता का है जिस में प्राथमिक रूप से यह साबित किया जाना आवश्यक है कि परिवादी आप की पत्नी है।   यह साबित करने के लिए क्या सबूत पुलिस प्रस्तुत करेगी यह तथ्य मेरे सामने नहीं है।  मैं यह समझ नहीं पा रहा हूँ कि जो विवाह हुआ ही नहीं उसे पुलिस ने साबित कैसे मान लिया।  इस के लिए भी पुलिस ने कुछ गवाह अवश्य नकली बनाए होंगे।  यदि उस लड़की के साथ आप का विवाह ही साबित नहीं होगा तो इस मामले में आप को दोषी साबित किया जान संभव नहीं है।  जो तथ्य आप ने मेरे सामने रखे हैं उन के आधार पर मुकदमा झूठा सिद्ध होगा और न्यायालय को चाहिए कि वह उस लड़की के विरुद्ध धारा 182 भा. दंड संहिता में मुकदमा चलाए कि उस ने मिथ्या रिपोर्ट कर के पुलिस को आप को क्षति पहुँचाने के लिए गुमराह किया।  इस मुकदमे में उस लड़की को दंडित किया जा सकता है।

अपराधियों को दंडित कराने के लिए प्रमाण कहाँ प्रस्तुत किए जाएँ?

कल सुमित राय की एक जिज्ञासा का उत्तर दिया गया था उन की  अगली जिज्ञासा  है – – – 
त्रकार कहाँ प्रमाण प्रस्तुत करे, जिससे दोषियों को दण्डित कराया जा सके ? और ….
उत्तर – – – 
सुमित जी,
त्रकार भी एक साधारण नागरिक ही है। उसे संविधान या अन्य किसी विधि से कोई विशेषाधिकार प्राप्त नहीं हुए हैं। इस तरह उस के दायित्व और अधिकार भी वही हैं जो कि अन्य नागरिकों के हैं। हम पिछले आलेख में बता चुके हैं कि संज्ञेय अपराध की प्रथम सूचना रिपोर्ट कोई भी व्यक्ति दर्ज करवा सकता है।
जैसे ही प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती है वैसे ही पुलिस थाने का भार साधक अधिकारी स्वयं या अपने किसी अधीनस्थ अधिकारी को उस मामले को अन्वेषण हेतु सौंप देता है। यदि आप के पास प्रमाण हैं तो आप अन्वेषण अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि 24 घंटों में अन्वेषण पूरा हो जाता है तो उस की रिपोर्ट अन्वेषण अधिकारी संबंधित न्यायालय को प्रस्तुत करता है अन्यथा प्रथम सूचना रिपोर्ट की मूल प्रति 24 घंटों के भीतर न्यायालय को प्रस्तुत करता है।
न्वेषण पूरा होने पर उस की अंतिम रिपोर्ट न्यायालय को प्रस्तुत की जाती है। यदि अपराध साबित पाया जाता है तो यह रिपोर्ट अपराधी के विरुद्ध आरोप पत्र के रूप में होती है। यदि पुलिस आरोप पत्र प्रस्तुत न करे और अंतिम रिपोर्ट में यह कथन करे कि आरोप साबित नहीं पाया गया तो न्यायालय प्रथम सूचना रिपोर्ट लिखाने वाले व्यक्ति को इस की सूचना देती है और वह व्यक्ति न्यायालय के समक्ष अपना पक्ष प्रस्तुत कर सकता है, वहाँ सबूतों और साक्षियों को प्रस्तुत कर सकता है, जिन पर विचार कर के न्यायालय अभियुक्तों के विरुद्ध प्रसंज्ञान ले कर अभियोजन चला सकता है। इस तरह यह स्पष्ट है कि कोई भी व्यक्ति जिन में पत्रकार भी सम्मिलित हैं अपराध के सबूत किस तरह पुलिस के अन्वेषण अधिकारी और न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।  
दि पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज न करे तो कोई भी व्यक्ति न्यायालय के समक्ष अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकता है जिसे न्यायालय पुलिस थाने को मामला दर्ज करने के लिए भेज सकता है और पुलिस उस में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज कर आगे कार्यवाही कर सकती है। न्यायालय यह भी कर सकता है कि परिवाद प्रस्तुत करने वाले व्यक्ति का बयान ले और अन्य सबूत व गवाह प्रस्तुत करने के लिए कहे। इस तरह के बयान दर्ज हो जाने के उपरांत न्यायालय उसी समय प्रसंज्ञान ले कर मुकदमा दर्ज कर सकता है और अभियुक्तों के विरुद्ध समन या जमानती या गैर जमानती गिरफ्तारी वारंट जारी कर सकता है। यह भी हो सकता है कि मुकदमा दर्ज न कर के न्यायालय आगे और अन्वेषण के लिए मामले को पुलिस को प्र

स्वयं अपराध की साक्ष्य देने की हिम्मत जुटाएँ

रेखा ने दो प्रश्न एक साथ तीसरा खंबा को प्रेषित किए हैं –

1. मेरी सहेली स्कूल में अध्यापिका है, उस ने वहाँ के प्राचार्य को जो कि खुद शादीशुदा है एक अध्यापिका के साथ अश्लील हरकत करते हुए देखा और एक बार स्कूल की छत पर रखे गमले से मिस्त्री द्वारा मिट्टी निकालने के समय ब्लू फिल्म की सीड़ी मिली। मेरी सहेली ने स्कूल छोड़ दिया। लेकिन क्या हम उस प्राचार्य के विरुद्ध कोई कानूनी कार्यवाही कर सकते हैं? 
2. शेखर ने मीना के साथ शादीशुदा होते हुए भी 12 वर्ष तक शादी का झाँसा दे कर अवैध सम्बन्ध बनाए रखे। शेखर की पत्नी की मृत्यु हो गई। उस ने मीना को धोखा देते हुए दूसरी लड़की से विवाह कर लिया मीना के पास इन बातों का कोई सबूत नहीं है और न ही कोई गवाह है। यदि मीना कोई कानूनी कार्यवाही करना चाहे तो क्या वह कर सकती है? 

उत्तर –

रेखा जी,

किसी भी दुष्कृत्य या अपराध के लिए कार्यवाही पुलिस के समक्ष अथवा अदालत के समक्ष ही की जा सकती है। निश्चित रूप से सभी दुष्कृत्य करने
वाले लोग और अपराधी जब अपराध करते हैं तो उस के सबूत और गवाह अवश्य छोड़ते हैं। ऐसा नहीं है कि आप जिन घटनाओं की बात कर रही हैं उन के सबूत और गवाह उपलब्ध नहीं हों। पहले प्रकरण में एक गवाह तो आप की सहेली स्वयं है और दूसरे प्रकरण में मीना स्वयं एक महत्वपूर्ण गवाह है। यह दूसरी बात है कि दोनों ही मामलों में गवाह स्वयं को छुपाए रखना चाहता है क्यों कि उसे बदनामी का भय रहता है।

सामाजिक रूप से बदनामी होने या प्रताड़ित किए जाने का भय ही वह चीज है जिस के कारण इस तरह के दुष्कृत्य और अपराध पर्दे के पीछे बरसों चलते रहते हैं, आसपास वालों को उन की खबर भी रहती है, लेकिन उन के विरुद्ध कोई बोलना नहीं चाहता है। यही हमारी सामाजिक पृष्टभूमि है जो दुष्कर्मियों और अपराधियों को बचाए रखती है। इस सामाजिक पृष्ठभूमि को बदलने की जरूरत है। वह धीरे-धीरे बदल भी रही है। आज इस तरह के मामले पहले की अपेक्षा अधिक सामने आ रहे हैं, उन की शिकायत भी होती है, अन्वेषण भी और कुछ में दोषी को दंड भी मिलता है।
न्याय अंधा होता है, वह हमेशा सबूतों और गवाहों के आधार पर किसी को दोषी सिद्ध पाए जाने पर ही दंड देता है। इस कारण से यदि आप को या किसी भी अन्य व्यक्ति को कार्यवाही चाहिए तो उसे सब से पहले तो खुद साहसी होना होगा, सबूत एकत्र करने होंगे और खुद साक्षी बनना होगा। यदि इतना साहस है तो अन्य सबूत और साक्षी भी अवश्य ही मिल जाएंगे। लेकिन यह भी सही है कि बिना सबूत और गवाहों के किसी को दोषी ठहरा कर दंडित नहीं किया जा सकता है। जहाँ तक पहले मामले की बात है तो उस स्कूल के प्रबंधन को अवश्य ही वहाँ चल रही अवांछित गतिविधियों की सूचना दी जानी चाहिए, जिस से यदि प्रबंधन चाहे तो अपने अधीन चलने वाले स्कूल से ऐसी गतिविधियों का लोप कर सके।

साक्षी का दायित्व है कि सच बयान करे

पाठक गुलशन पूछते हैं …

विक्रय के अनुबंध (एग्रीमेण्ट) में साक्षी का क्या दायित्व है।  विक्रेता ने कपट (फ्रॉड) कर के क्रेता के नाम और अनुबंध की शर्तों को बदल दिया। सफेदा (white flude) लगा कर नाम बदल दिया। अगर गवाह नए क्रेता और अनुबंध की शर्तों से इन्कार कर दे और कहे कि नए अनुबंध में उस की गवाही को न माना जाए तो क्या अनुबंध निरस्त हो सकता है?  मैं उस अनुबंध में गवाह हूँ।
उत्तर …
गुलशन जी,
किसी भी दस्तावेज पर किसी गवाह के हस्ताक्षर इस लिए कराए जाते हैं कि उस दस्तावेज के किसी न्यायिक कार्यवाही में विवादित हो जाने पर वह गवाही दे सके कि उस की उपस्थिति में दस्तावेज को निष्पादित किया गया था। उस का यह कर्तव्य भी है कि वह न्यायालय को अथवा सक्षम प्राधिकारी के समक्ष बुलाए जाने पर सत्य तथ्यों को प्रकट करे और दस्तावेज के निष्पादन की अवस्था न्यायालय या प्राधिकरण को बताए। 
प के द्वारा प्रदर्शित मामले में आप ने जिस स्थिति में उस दस्तावेज पर हस्ताक्षर किए हैं वही आप को बयान करना चाहिए। यदि आप के हस्ताक्षर होने के बाद एकतरफा तरीके से दस्तावेज में कपट पूर्वक कोई परिवर्तन किया गया है तो वह भी आप को अदालत के समक्ष बयान करना चाहिए। यही एक साक्षी का कर्तव्य है। यहाँ यदि आप कहेंगे कि दस्तावेज के निष्पादन के बाद दस्तावेज को अपने पास रखने वाले व्यक्ति ने उस में एकतरफा परिवर्तन किए हैं तो निश्चित रूप से अनुबंध का वर्तमान परिवर्तित स्वरूप निरस्त हो जाएगा।

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