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भाई आप से मकान छीन नहीं सकेंगे।

समस्या-

अंगद ने बेगूंसराय, बिहार से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता ने सन 1969 एक जमीन मेरे बडे भाई के नाम से खरीदा, उस समय मेरे बड़े भाई की उम्र 19 या 20 साल थी मेरी उम्र 15 साल थी। सन 1995 ई. में हम दोनो भाई ने उस जमीन पर एक सयुंक्त घर बनाया। जिस में दो अलग अलग पलैट हैं। दोनो भाई ने अपना अपना पलैट अपने अपने पैसा से बनाया। जिस में हम दोनो भाई आज भी रह रहे हैं। जिस समय मैं ने उस जमीन पर घर बनाना आरंभ किया उस समय तक मुझे पता नहीं था कि वह जमीन मेरे भाई के नाम है और मेरे बडें भाई ने भी मुझे नहीं बताया था। मुझे लगता था की वह जमीन मेरे पिता के नाम हैं। इसका पता मुझे अब चला कि वह जमीन मेरे भाई के नाम है। अब मेरे बडा भाई मुझे कहता है कि मेरी जमीन व घर खाली करो। मेरे माता व पिता का देहांत हो चुका हैं। बहुत मेंहनत से मैंने अपना घर बनाया है मैं भूतपूर्व फौजी हूँ। बताएं कि मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

मीन आप के पिताजी ने खरीदी थी लेकिन भाई के नाम है इस कारण प्राथमिक रूप से उस भूमि का स्वामी आप के भाई हैं। जब तक आप यह साबित नहीं कर देते कि यह जमीन पिताजी ने भाई के नाम से खरीदी जरूर थी लेकिन पूरे परिवार के लाभ के लिए खऱीदी थी।

आप उस जमीन पर मकान बना चुके हैं। आप ने अपने पैसे से बनाया है तो आप यह साबित कर सकते हैं कि इस मकान को आप ने अपने धन से खुद बनाया है।

आप को इस मकान को बना कर उस में रहते हुए 22 वर्ष हो चुके हैं। आप के भाई यदि अदालत में यह दावा करें कि आप से उस मकान का कब्जा दिलाया जाए तो यह दावा लिमिटेशन के आधार पर ही खारिज हो जाएगा क्यों कि कब्जे का दावा केवल 12 वर्ष की अवधि में किया जा सकता है। मकान में बिजली और नल के कनेक्शन भी आप के नाम से होंगे। वोटर कार्ड आदि में भी पिछले 22 वर्ष से आप के नाम अंकित होंगे। आप 22 वर्ष का पजेशन उक्त संपत्ति पर अच्छे से साबित कर सकते हैं। इस तरह आप का कब्जा मकान पर प्रतिकूल कब्जा है।

आप के भाई आप को मकान खाली करने को कहें तो उन्हें कहें कि मकान तो मेरा है और मैं खाली नहीं कर रहा हूँ और यदि वे समझते हैं कि यह मकान उन का है तो वे अदालत में दावा कर दें अदालत फैसला कर देगी। जब अदालत में दावा पेश हो तो दावे की प्रतिलिपि आप को मिल जाए तब आप किसी अच्छे दीवानी मामलों के वकील से सलाह ले कर मुकदमे में अपनी प्रतिरक्षा करें। आप के भाई आप से उस मकान को किसी स्थिति में नहीं छीन सकते।

प्रतिकूल कब्जा प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है।

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश तिवारी ने सोरों बदरिया, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारे गाँव से दो किलो मीटर की दुरी पर ४ बीघा जमीन को हमारे पूर्वज 40साल से करते आ रहे थे।  उनकी मोत के बाद अब हम कर रहे हेै।  उस जमीन में २६ लोगों के नाम हैं, सब ने वह जमीन छोड़ रखी है।  अब एक आदमी आता है  वह जमीन छोड़ने के लिए कहता है।  उस आदमी के बाप का नाम उस जमीन में है, बाप जिन्दा है।  हम जानना चाहते हैं कि क़ानूनी तरीके से उस जमीन पर हमारा कुछ हक बनता है कि नहीं, जब कि 40 साल से कोई जमीन पर अपना हक जताने नहीं आया। हम किस कोर्ट में कोन सी धारा में अपना मुकद्दमा डाल सकते हैं। हमें उचित सलाह दें।


समाधान-

जिस जमीन पर आप और आप के पूर्वज 40 वर्ष से खेती करते आ रहे हैं और इन 40 वर्षों में किसी ने आप के खेती करने पर कोई आपत्ति नहीं की इस तरह आप का उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) है। लेकिन प्रतिकूल कब्जे का यह सिद्धान्त केवल प्रतिरक्षा के लिए। यह हथियार हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षा के लिए है। जिस का सीधा अर्थ ये है कि यदि कोई आप को उस जमीन से हटाने  के लिए वाद संस्थित करे या कोई भी कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप को अदालत जा कर किसी तरह का आवेदन देने, वाद प्रस्तुत करने या कोई और कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। आप तो जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

यदि कोई आप को धमकी देता है कि वह जबरन कब्जा छीन लेगा तो यह अपराधिक कार्यवाही है। आप को उस के विरुद्ध पुलिस में रपट दर्ज करानी चाहिए और पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर अपराधिक परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।  आप दीवानी /राजस्व न्यायालय में  इस तरह की निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वाद संस्थित कर सकते हैं कि आप 40 वर्षों से अधिक से भूमि पर काबिज काश्त हैं, आप का कब्जा अवैध तरीके से नहीं हटाया जा सकता है, यदि किसी का अधिकार है तो वह न्यायालय से आदेश या डिक्री प्राप्त किए आप को न हटाए।

आप से अब मकान का कब्जा कोई छीन नहीं सकता।

rp_property1.jpgसमस्या-

शब्बीर खान ने रीठी, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे पूर्वजों ने 25 वर्ष पहले कच्चा लेख लिखवा कर भूमि खरीदी और मकान बना कर रहने लगे। जिस से भूमि खरीदी थी वह अब अपना हक बता कर कब्जा खाली कराना चाहता है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

ह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चा लेख जो लिखा गया है उस में क्या लिखा है। यदि उस में जमीन बेचने का लिखा है और बेचने की रकम प्राप्त कर कब्जा देने की बात लिखी है तो वह एक एग्रीमेंट है। जिस के अनुसार धन दे कर तथा विक्रेता ने कब्जा दे कर आंशिक रूप से एग्रीमेंट का पालन कर दिया है। यदि ऐसा है तो आप से उक्त प्लाट का कब्जा कोई भी नहीं छीन सकता। आप चुपचाप रहें और विक्रेता को कब्जा वापस प्राप्त करने के लिए कानूनी कार्यवाही करने दें। वैसे भी आप का कब्जा 25 वर्ष का है इस तरह आप का प्रतिकूल कब्जा भी उक्त संपत्ति पर है।

यदि विक्रेता किसी प्रकार से आप को तंग करे तो आप पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि आप को ऐसी आशंका हो कि विक्रेता जबरन आप को बेदखल कर सकता है तो आप जबरन बेदखली के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित कर अस्थाई निषेधाज्ञा व स्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस संबंध में आप को किसी स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करनी चाहिए। स्थानीय वकील दीवानी मुकदमों के मामले में जानकार और अनुभवी हो तो बेहतर होगा।

 

कब्जे के दावे के लिए अवधि समाप्त हो जाने पर सफलता की संभावना नहीं के समान है।

Farm & houseसमस्या-

इन्दरकुमार, ने हैदराबाद, तैलंगाना से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

म दो भाई बहन हैं पिताजी रिटायर्ड फौजी थे। उन की हत्या 1981 में हो गई थी। माँ ने 1985 में रिमेरीज कर ली है। हमारे चाचा, ताऊ, बुआ कोई नहीं है। पिताजी की हत्या के समय मेरी ऊमर 5 वर्ष और बहिन 2 वर्ष की थी। पक्का मकान पट्टा था व आधा बीधा जमीन 1971 में खरीदी गयी थी। केवल स्टाम्प पेपर पर और 55 पेनतरा जमीन थी वो जमीन मैं ने और मेरी माँ ने मेरे बालिग होने के बाद 45 बीधा बेच दी, मकान नहीं बेचा था। उसका पट्टा हमारे पास है। मकान दादाजी ने बनवाया था। पिताजी की हत्या के 4 दिन बाद से लेकर आज तक हम उस गाव में 1 रात भी नहीं गये। अभी मैं उस गाँव में गया था 2 साल पहले। हमें मालुम हुआ कि 15 बीधा जमीन व घर-मकान हमारा है। लेकिन जिन्होनें हमारी जमीन खरीदी थी। उन के पास ही मकान और वो 15 बीघा जमीन है। वो दबंग है। मुझे अभी पापाजी की अस्थिया भी विसर्जित करनी हैं। बहिन का नाम जमीन में कहीं पर भी दर्ज नहीं है। हम ने जो जमीन बेच दी उस के लिए बहिन हमारे ऊपर वाद दायर कर सकती है क्या? उस को वो जमीन मिलेगी क्या? हमें वो मकान व आधा बीधा जमीन वापस मिल सकती है? क्या हमारी माँ की पेशंन मिल सकती है? जो 15 बीघा जमीन हमारी होगी तो कैसे होगी। सुझाव दें क्या मैं अभी पापाजी की अस्थियां विसर्जित कर सकता हूँ?

समाधान-

प के पिताजी की हत्या 1981 में हो गई। तब आप 5 वर्ष के थे तथा बहिन 2 वर्ष की थी। अर्थात आप 1994 में तथा बहिन 1997 में बालिग हो गए। आप को बालिग हुए 20 वर्ष हो चुके हैं तथा आप की बहिन को भी 17 वर्ष बालिग हुए हो चुके हैं। बालिग होने के बाद आप ने व आप की माँ ने कब जमीन बेची है यह आप ने नहीं बताया है। यदि आप ने अपनी जमीन बालिग होने के 3-4 वर्ष बाद भी बेची हो तो भी उस बात को 15 वर्ष से अधिक हो चुका है। तभी से आप का घर व 15 बीघा जमीन आप से जमीन खरीदने वाले दबंग के पास है।

ब आप को मकान व जमीन जो आप के नाम है उसे वापस लेने के लिए उसी दबंग के विरुद्ध कब्जा प्राप्त करने का वाद प्रस्तुत करना होगा। जब कि कब्जे के वाद के लिए अधिकतम समय सीमा 12 वर्ष है। यदि आप कोई वाद न्यायालय में प्रस्तुत करेंगे तो वह समय सीमा में प्रस्तुत न किए जाने के कारण निरस्त हो सकता है। जिस के विरुद्ध आप वाद प्रस्तुत करें वह अपनी प्रतिरक्षा में यह कह सकता है कि वह घर व जमीन उस के पास तभी से कब्जे में है जब से आप ने उसे शेष जमीन विक्रय की थी। इस तरह उस जमीन पर उस का प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। इस तरह आप के द्वारा कोई भी कानूनी कार्यवाही सफल हो सकेगी इस में संदेह है। फिर भी चूंकि जमीन आप के नाम है और मकान का पट्टा भी है वैसी स्थिति में आप वाद दाखिल कर सकते हैं। लेकिन इस के लिए तमाम दस्तावेज किसी अच्छे वकील को दिखा कर उस से राय कर लें। जब तक सफलता की संभावना नहीं हो यह सब करना समय और धन का अपव्यय होगा।

दि जमीन व मकान आप के कब्जे में होते तो बहिन आप के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती थी। लेकिन दोनों ही तीसरे पक्षकार के पास हैं तो बहिन की भी वही स्थिति होगी जो आप की है।

प के पिताजी की अस्थियाँ कहाँ रखी हैं यह आपने नहीं बताया। यदि आप उन अस्थियों को प्राप्त कर सकते हैं तो उन्हें विसर्जित करने में कोई बाधा नहीं है।

प गाँव में रहते नहीं है। वह जमीन व मकान आप के काम का नहीं। आप उसे प्राप्त कर के भी बेचेंगे ही। अच्छा तो यह है कि जमीन व मकान जिस के कब्जे में है उस से सीधे बात करें कि जमीन व मकान आप के काम के नहीं हैं आप को उन्हें बेचना ही पड़ेगा। यदि वही खरीद ले तो ठीक है। उस व्यक्ति के पास उन दोनों का कब्जा तो है लेकिन वह उन का स्वामी तभी बन सकेगा जब कि वह उन्हें आप से खरीद ले। आप उसी से बात कर के उसी से सौदा कर लें तो आप को जमीन व मकान की आधी पौनी कीमत मिल सकती है। यह आप के लिए लाभ का सौदा होगा। यह कर के देख सकते हैं।

प्रतिकूल आधिपत्य बचाव का सिद्धान्त है।

समस्या-

कीर्ति सिंह मगरौरा, ने ग्वालियर मध्यप्रदेश से पूछा है-

प्रतिकूल आधिपत्य Adverse possession के मामले में क्या दस्तावेज आवश्यक हैं?मेरेपास एक प्रॉपर्टी है जिस में पिछले 50 वर्षों से विद्यालय संचालित है।वास्तविक रूप से जो मकान मालिक थे उनकी मृत्यु हो चुकी है और उनकी कोईसंतान या नजदीकी रिश्तेदार नहीं है। 1998 तक हमने किराया दिया उसके बादसे उनकी मृत्यु उपरांत किराया बंद हो गया। नगर पालिका दस्तावेजों में हमटैक्स पेयर हैँ, टैक्स आदि जिम्मेदारी हम पूरी कर रहे हैँ।कृपया बताइये किहम किस तरह मकान मालिक की पूर्ण हैसियत हासिल कर सकते हैँ?

समाधान-

प्रतिकूल आधिपत्य Adverse possession का सिद्धान्त बचाव का सिद्धान्त है। यदि आप का किसी स्थाई संपत्ति पर आधिपत्य है तो वह आधिपत्य वैधानिक रीति से अर्थात कानूनी कार्यवाही के बिना हटाया नहीं जा सकता। उदाहरण के रूप में जिस संपत्ति पर आप का आधिपत्य है उसे किसी न्यायालय की डिक्री या आदेश से ही हटाया जा सकता है। इस के लिए उस के आधिपत्य का दावा करने वाले व्यक्ति को न्यायालय की शरण लेनी होगी।

किसी भी स्थावर संपत्ति का आधिपत्य प्राप्त करने के दो ही वैधानिक तरीके हैं। यदि संपत्ति पर किसी का आधिपत्य जबरन छीन लिया गया हो तो छीने जाने से पहले जिस व्यक्ति का आधिपत्य था वह इस आधिपत्य छीने जाने से 60 दिनों की अवधि में धारा 145 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत परिवाद प्रस्तुत कर सकता है तब न्यायालय सुनवाई कर के जिस का भी आधिपत्य पहले साबित हो जाता है उसे दिला देता है।

दूसरा मार्ग यह है कि आधिपत्य का दावा करने वाला व्यक्ति आधिपत्य प्राप्त करने का दावा करे। इस तरह का दावा प्रतिकूल आधिपत्य होने के 12 वर्ष की अवधि के उपरान्त नहीं किया जा सकता। यदि कोई दावा भी करेगा तो वह अवधि अधिनियम के अनुरूप न होने से निरस्त कर दिया जाएगा।

स का सीधा अर्थ यह है कि प्रतिकूल आधिपत्य होने के आधार पर आप खुद कोई दावा नहीं कर सकते।

प के मामले में आप 1998 तक तो किराएदार रहे हैं तब आप का आधिपत्य एक किराएदार की हैसियत से था। लेकिन उस के बाद से आप का प्रतिकूल आधिपत्य हो गया। आप के इस प्रतिकूल आधिपत्य को 16 वर्ष हो चुके हैं। इस कारण कोई व्यक्ति तो इस संपत्ति का कब्जा प्राप्त नहीं कर सकता।

लेकिन यदि किसी संपत्ति का कोई दावेदार नहीं होता तो वह संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -29 के अन्तर्गत सरकार में निहीत हो जाती है। आप के मामले में यह संपत्ति कानून के प्रभाव से सरकार में निहीत हो चुकी है और सरकार यदि अपनी संपत्ति पर आधिपत्य चाहती है तो वह प्रतिकूल आधिपत्य होने से 30 वर्षो के अन्तर्गत आप के विरुद्ध दावा कर सकती है।

ज की तिथि में उक्त संपत्ति का स्वामित्व राज्य सरकार का है और वह 1998 से तीस वर्षों की अवधि पूर्ण होने तक अर्थात 2028 तक उक्त संपत्ति का आधिपत्य प्राप्त करने का दावा कर सकती है। इस कारण आप के लिए उपाय यही है कि आप 2028 तक प्रतीक्षा करें। उस के बाद कोई कार्यवाही करें। एक अन्य उपया यह है कि राज्य सरकार इस तरह की संपत्तियों को कब्जेदारों को पट्टे पर देने के लिए योजनाएँ निकालती है। जब भी राज्य सरकार की इस तरह की कोई योजना आए आप योजना के अनुसार आवेदन कर के अपने या अपनी संस्था के नाम से उक्त संपत्ति का पट्टा राज्य सरकार से हासिल कर लें।

विपरीत कब्जे के आधार पर आप बचाव कर सकते हैं।

lawसमस्या –
रुद्रपुर, उत्तराखण्ड से मानस जायसवाल ने पूछा है –

मेरे दादा के भाई ने अपने प्लाट जो की उनको सरकार से पट्टे पर मिला था के एक हिस्से में मेरे दादा को घर बना के दिया और बाकी हिस्से में खुद रहते थे।  हमें वहाँ रहते हुए 40 साल का समय हो गया है। गृहकर दादा के भाई के नाम से आता रहा है। प्लाट का पट्टा भी उन्ही के नाम से है। पट्टा 1956 में 99 वर्ष  के लिए सरकार ने दिया था, जो की 33 साल की 3 किश्तों में था।  दादा के भाई के स्वर्गवास के बाद 2011 में उनकी पत्नी ने उस घर को सरकार की फ्री-होल्ड नीति अनुसार फ्री-होल्ड कराने का आवेदन किया है।  मुझे डर है कि कहीं फ्री-होल्ड करने के बाद वह मुझे घर से निकलने का आदेश न दे दे।  मेरे नाम सिर्फ बिजली और पानी का बिल आता है, वह भी मेरे हिस्से का।  नगर पालिका में एक बार मेरे पिता जी ने अपने नाम से गृहकर लगवाया था जो कि मेरे दादा के भाई के द्वारा आपत्ति करने पर कट गया था।  अभी पूरा गृहकर दादा के भाई की पत्नी के नाम से आता है। मैंने उनके द्वारा किये गए फ्री-होल्ड के आवेदन पर अपनी आपत्ति डीएम को लिखित रूप में दर्ज करा दी है एवं स्वयं भी अपनी माताजी के नाम से फ्री-होल्ड के लिए आवेदन कर दिया है।  मार्गदर्शन करें कि मैं क्या करूँ? क्या मुझे कोर्ट में उनके फ्री-होल्ड के विरुद्ध स्टे के लिए आवेदन करना चाहिए? अगर वे मुझे मकान खाली करने का नोटिस देते हैं और कोर्ट जाते हैं तो उस स्थिति में क्या होगा?

समाधान-

भूखंड आप के दादा के भाई के नाम पट्टे पर है। दादा के भाई ने उसी प्लाट पर आप को मकान बना कर दिया है जिस में 40 वर्ष से आप रह रहे हैं। इन चालीस वर्षों में आप के रहने पर किसी तरह की कोई आपत्ति किसी ने नहीं की है और आप के हिस्से के नल बिजली के कनेक्शन आप के नाम से हैं तथा बिलों का भुगतान आप करते हैं। इस तरह आप का उक्त संपत्ति पर विपरीत कब्जा (adverse possession) हो चुका है। वे आप से कब्जा पुनः प्राप्त नहीं कर सकते। यदि वे कब्जा प्राप्त करने के लिए कोई कानूनी कार्यवाही करते हैं तो विपरीत कब्जे के आधार पर खारिज हो सकती है।

प ने पूरे भूखंड को उन के नाम फ्री-होल्ड पर करने की आपत्ति सही ही की है। यदि किसी भी तरह से पट्टेदार से भूमि का कब्जा किसी अन्य को हस्तांतरित हो गया है तो फिर पट्टेदार को पूरे भूखंड का फ्री-होल्ड स्वामी नहीं बनाया जा सकता। इस तरह आप ने अपने कब्जे के भूखंड के हिस्से को आप की माता जी के नाम करने का आवेदन भी ठीक ही किया है। इस के लिए आप को न्यायालय जाने की आवश्यकता नहीं है। पहले डीएम को अपना निर्णय देने दो। यदि आप का फ्री-होल्ड करने का आवेदन निरस्त होता है या आप के दादा की पत्नी का आवेदन पूरे भूखंड के लिए स्वीकार किया जाता है तो उन आदेशों को सक्षम न्यायालय में चुनौती दी जा सकती है और तब उपयुक्त अस्थाई निषेधाज्ञा के लिए आवेदन कर के स्थगन तथा अस्थाई निषेधाज्ञा भी प्राप्त की जा सकती है। बस आप अपने हिस्से के मकान पर कब्जा बनाए रखें।

स्थाई संपत्ति पर विपरीत कब्जा हो जाने की तिथि से 12 वर्ष पूर्ण होने तक ही कब्जे का वाद किया जा सकता है

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समस्या-
मौरावां, जिला उन्नाव, उत्तर प्रदेश से मुदित गोयल ने पूछा है –

मेरे पैतृक घर के पीछे 8फीट चौडा एवम 25 फीट लम्बा एक रास्ता है जिसको कि मेरे बाबाजी ने यहाँ के जमींदार से 1966 में खरीदा था।  उस रास्ते के बिल्कुल आगे के 10 फीट की जगह पर एक दबंग टाईप के व्यक्ति ने करीब 11 साल से कब्जा किया हुआ है। वो वहाँ से कब्जा नहीं हटाना चाहता है एवम् मारपीट को तैयार हो जाता है। मेरे पास सिर्फ बाबा के नाम की वो रसीद है जो उन्हें जमींदार ने रास्ता खरीदने पर 1966 में दी थीl उचित सलाह दें।

समाधान –

कोई भी भूमि स्थावर संपत्ति होती है। कोई भी स्थावर संपत्ति यदि उस का मूल्य 100 रुपए या उस से अधिक का हो तो उसे केवल पंजीकृत विलेख के माध्यम से ही स्थानान्तरित किया जा सकता है। यदि उस रास्ते की खरीद कीमत 100 रुपया या अधिक हुई तो यह रसीद रास्ते के हस्तान्तरण का सबूत नहीं बन सकती। यदि रास्ते की कीमत 100 रुपए से कम की थी तो उसे संपत्ति के हस्तान्तरण के सबूत के बतौर न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है।

बंग पड़ौसी को उक्त रास्ते की भूमि पर कब्जा किए यदि 12 वर्ष नहीं हुए हैं तो आप का कब्जा समाप्त होने और उस का कब्जा होने की तिथि से 12 वर्ष पूर्ण होने के पूर्व आप कब्जे के लिए दीवानी वाद  दीवानी न्यायालय में दर्ज करावें। अन्यथा उस व्यक्ति का कब्जा हुए 12 वर्ष पूर्ण हो जाने पर उस व्यक्ति से कब्जा किसी भी भाँति वापस प्राप्त करना असंभव हो जाएगा। मियाद अधिनियम के अन्तर्गत कब्जा वापसी के लिए दीवानी दावा कब्जा प्राप्त करने की तिथि से 12 वर्ष की अवधि तक ही प्रस्तुत किया जा सकता है।

जमीन अपने नाम कराने के लिए घोषणा का वाद प्रस्तुत करें।

समस्या-

मथुरा, उत्तर प्रदेश से सोनू कुमार ने पूछा है –

मारे पास ½ बीघा जमीन है जो मेरे बाबा ने ली थी और जिस से जमीन ली थी उस की मृत्यु हो चुकी है। जमीन हमारे कब्जे में है। जिस से ली थी उस का पुत्र हमारे संपर्क के बाहर है। हमें उस का ठौर ठिकाना भी पता नहीं है। बाबा ने जिस समय जमीन ली थी उस का कोई सबूत भी हमारे पास नहीं है। अब हम उस जमीन को अपने नाम पर कैसे कराएँ?

agricultural-landसमाधान-

प के बाबा द्वारा खऱीदी गई उक्त भूमि कृषि भूमि है। कृषि भूमि पर कृषक का अधिकार एक किरायेदार की भाँति होता है और उसे सरकार को प्रतिवर्ष लगान के रूप में किराया देना होता है। राज्य सरकार इस भूमि की स्वामी होती है। आप के पास स्वामित्व के दस्तावेज नहीं हैं लेकिन भूमि आप के कब्जे में है।

प अपने कब्जे के आधार पर उक्त भूमि पर खातेदार कृषक होने के अधिकार की घोषणा का दावा कर सकते हैं। इस दावे में आप को लंबी अवधि से भूमि पर अपना कब्जा साबित करना होगा। सभी राज्यों के कृषि कानूनों में अंतर है। उत्तर प्रदेश में जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी है। आप को अपने न्याय क्षेत्र में राजस्व मामलों की प्रेक्टिस करने वाले किसी वरिष्ठ वकील से मिल कर सलाह करनी चाहिए। वे आप को उपयुक्त सलाह भी देंगे और राजस्व रिकार्ड में आप का अधिकार दिलाने हेतु आप की ओर से न्यायालय में कार्यवाही संस्थित कर सकेंगे।

12 वर्ष के उपरान्त प्रतिकूल कब्जा हो जाने से मूल स्वामी कब्जे का वाद नहीं कर सकता।

समस्या-

बाँसवाड़ा, राजस्थान से सक़ीना ने पूछा है-

म 1978 से एक मकान में रहते हैं जो पहले खाली प्लाट था।  1976 में मेरे पापा ने उस में मकान बनाया था। उस मकान में बिजली कनेक्शन मेरे पापा के नाम से है। एक व्यक्ति स्वयं को उस जमीन का मालिक बता कर उसे खाली करने को कहता है या फिर उस की कीमत 14 लाख रुपये मांग रहा है।  प्लाट का क्षेत्रफल 50X40 वर्गफुट है। हमें क्या करना चाहिए?

समाधान-

प के पापा उक्त भूखंड पर 1976 से मकान बना कर निवास कर रहे हैं। आपके पापा और उस व्यक्ति के मध्य किसी तरह का किराया नामा भी नहीं है और कोई किराया भी अदा नहीं करते हैं।  इस तरह आप के पिताजी का उक्त भूखंड पर 12 वर्ष से अधिक सय से कब्जा है. अब मूल स्वामी उस भूखंड पर कब्जे का वाद प्रस्तुत नहीं कर सकता। अप के पापा का उक्त भूखंड पर 36 वर्ष से कब्जा है जो अब प्रतिकूल कब्जा Adverse Possession  हो चुका है।  आप के पापा का यह कब्जा प्लाट का स्वामी नहीं हटा सकता।

प के पापा को कोई भी कानूनी कार्यवाही उस व्यक्ति के विरुद्ध नहीं करनी चाहिए और इस बात की प्रतीक्षा करनी चाहिए कि वह व्यक्ति स्वयं आप के पापा के विरुद्ध भुखंड के कब्जे के लिए कार्यवाही करे।  तब उस कार्यवाही में आप के पापा प्रतिकूल कब्जे के आधार पर अपनी प्रतिरक्षा कर सकते हैं।

स के अतिरिक्त आप के पापा को चाहिए कि उक्त भूखंड पर अपने 30 वर्षों से  अधिक 36 वर्षों के कब्जे के आधार पर नगरपालिका/नगरविकास न्यास से अपने नाम पट्टा हासिल करने की कार्यवाही कर पट्टा हासिल करें।

बड़े भाई के नाम से खरीदा गया मकान खुद के नाम से कैसे होगा?

समस्या-

इन्दौर, मध्यप्रदेश से सुश्री रेखा ने पूछा है-

मेरी माताजी द्वारा एक मकान वर्ष 1970 में इन्दौर में लिया गया था। चूंकि उस समय संपत्ति घर के बडों के नाम से ली जाती थी।  इसलिए मेरे पापा द्वारा उक्त मकान अपने बडे भाई के नाम से रजिस्टर कराया गया था।  बडे पापा जबलपुर में रहते हैं, वहीं उनकी नौकरी भी पूरी हुई है।  घर खरीदने के सारे धन की व्यवस्था मेरे पापा द्वारा ही की गई थी।  वह मकान खरीदने के बाद से ही हमारे कब्जे में है।  इस मकान के बारे में मेरे बडे पापा को कोई ज्ञान नहीं है।  मैं यह जानना चाहती हूँ कि क्या बड़े पापा की जानकारी में लाए बिना, कब्जे के आधार पर/ जल एवं विद्युत कनेक्शन के अपने नाम होने / नगर पालिका में जमा कराये जा रहे संपत्ति कर की रसीदों के आधार पर मकान को अपने नाम कराया जा सकता है अथवा नहीं।  क्या कोर्ट के द्वारा उक्त मकान को हासिल किया जा सकता है?

समाधान-

प का यह तर्क बेमानी है कि 1970 में संपत्ति बड़ों के नाम से खरीदी जाती थी।  केवल संयुक्त परिवार होने पर ही संपत्ति परिवार के मुखिया के नाम से खरीदी जा सकती थी।  संपत्ति भी परिवार की संयुक्त संपत्ति होती थी।  आप का यह तर्क यदि तथ्यों के आधार पर साबित भी कर दिया जाए तो भी संपत्ति संयुक्त परिवार की मानी जाएगी। ऐसे संयुक्त परिवार में आप के दादा के सभी पुरुष वंशज और उन के परिवार सम्मिलित हो जाएंगे।  मकान फिर भी आप की माता जी को प्राप्त नहीं हो सकेगा।

प ने यह नहीं बताया कि आप के पिताजी मौजूद हैं अथवा नहीं।  क्यों कि इस मामले में यह तथ्य बहुत महत्व रखता है।  आप ने यह नहीं बताया कि आप की माता जी क्यों चाहती हैं कि मकान अब उन के नाम हो जाए?  मकान पर उन का अबाधित कब्जा वर्ष 1970 से चला आ रहा है।  उस में रह रही हैं।  मकान के टैक्स की रसीदें उन के नाम से हैं और नल-बिजली के कनेक्शन भी उन्हीं के नाम से हैं तो 1970 से उन का कब्जा तो है ही।  बात का कोई भी दस्तावेजी साक्ष्य उपलब्ध नहीं है कि कब्जा आप के पिता जी और माता जी के पास कैसे आया? ऐसी स्थिति में आप की माता जी को क्या आवश्यकता है कि वे इसे अपने नाम कराना चाहती हैं?  वे उस का उपभोग करती रहें।  यदि कभी आप के पिता के बड़े भाई या उन के उत्तराधिकारी आपत्ति करें और कोई कानूनी कार्यवाही करें तो यह तर्क रखा जा सकता है कि यह मकान वास्तव में आप के माता पिता ने अपनी स्वयं की आय से अपने लिए बड़े भाई के नाम से खरीदा था।   इस तथ्य से बड़े भाई भी परिचित थे और उन्हों ने इसीलिए आप के कब्जे में आज तक कोई दखल नहीं किया।  वैसे भी बयालीस वर्ष से आप की माताजी के कब्जे में होने से इस पर आप की माता जी का प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) हो चुका है।   तर्कों के आधार पर कोई भी आप की माता जी का कब्जा उन से नहीं ले सकता।

हाँ, यदि आप की माता जी चाहें और आप के पिता के बड़े भाई मान जाएँ तो उन से आप की माता जी के नाम वसीयत लिखवा सकती हैं जिस में उन की यह स्वीकारोक्ति हो कि उक्त मकान आप के पिता ने ही अपनी स्वयं की आय से खरीदा था आप के पिता का ही था और अब आप के पिता के उत्तराधिकारियों का ही है।  केवल बड़े भाई को सम्मान प्रदान करने मात्र के लिए उन के नाम से खरीदा गया था। इसी कारण से अब वे उस मकान की वसीयत आप की माता जी के नाम कर रहे हैं।  इस के अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं है।  फिर भी आप को समस्त दस्तावेज दिखा कर किसी अच्छे और विश्वसनीय स्थानीय वकील से इस मामले में विधिक राय प्राप्त कर लेनी चाहिए।

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