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पर्यवेक्षक (Supervisor) कब कर्मकार है?

समस्या-

भिलाई, छत्तीसगढ़ से नरेन्द्र कुमार लोधी ने पूछा है-

द्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 में 2010 में हुए संशोधन के फलस्वरूप 10,000/- या 15,000/- रुपए से अधिक वेतन प्राप्त करने वाले सुपरवाइजर कर्मकार माने जाएंगे?

समाधान-

THE_INDUSTRIAL_DISPUTES_ACTद्योगिक विवाद अधिनियम,1947 में कर्मकार की जो परिभाषा दी हुई है उस पर आप को ध्यान देना चाहिए।  वहाँ यह परिभाषा वर्तमान में इस प्रकार है-

(s) “Workman” means any person (including an apprentice) employed in any industry to do any manual, unskilled, skilled, technical, operational, clerical or supervisory work for hire or reward, whether the terms of employment be express or implied, and for the purposes of any proceeding under this Act in relation to an industrial dispute, includes any such person who has been dismissed, discharged or retrenched in connection with, or as a consequence of, that dispute, or whose dismissal, discharge or retrenchment has led to that dispute, but does not include any such person-

 (i) Who is subject to the Air Force Act, 1950 (45of l950),or the Army Act, 1950 (46 of 1950), or the Navy Act, 1957 (62 of 1957); or

 (ii) Who is employed in the police service or as an officer or other employee of a prison; or

 (iii) Who is employed mainly in a managerial or administrative capacity; or

 (iv) Who, being employed in a supervisory capacity, draws wages exceeding ten thousand rupees per mensem or exercises, either by the nature of the duties attached to the office or by reason of the powers vested in him, functions mainly of a managerial nature.

श्रमिक’ या कर्मकार’ का अर्थ है किसी भी उद्योग में वेतन या इनाम के लिए शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, या पर्यवेक्षीय कार्य करने हेतु नियोजित कोई व्यक्ति (जिस में एक प्रशिक्षु भी सम्मिलित है), जिस के नियोजन की शर्तें व्यक्त या निहित हों सकती हैं, और इस अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के संबंध में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं और उस औद्योगिक  विवाद के कारण सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी कर दिया गया है या उसे सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी किए जाने से उत्पन्न हुआ है, लेकिन उस में निम्न लिखित सम्मिलित नहीं है-

 (i)  जो वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45oवाँ, या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46वाँ), या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का62वां) के अधीन है, या

(ii) जो पुलिस सेवा में या जेल के एक कर्मचारी या अधिकारी के रूप में कार्यरत है, या

(iii) जो मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय या प्रशासनिक क्षमता में कार्यरत है, या

(iv) जो पर्यवेक्षीय क्षमता में नियोजित है और दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक मजदूरी प्राप्त करता है, या कार्यालय से जुड़ी कर्तव्यों की प्रकृति द्वारा या उस में निहित शक्तियों के कारण, मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय प्रकृति के कार्य के लिए नियोजित है।

क्त परिभाषा के अनुसार यदि कोई व्यक्ति पर्यवेक्षीय (Supervisory) क्षमता में कार्यरत है और उस का वेतन दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक है तो उसे कर्मकार नहीं माना जाएगा। पर्यवेक्षकों के लिए वेतन की 10000/- रुपए की यह सीमा संशोधन अधिनियम 2010 के द्वारा ही स्थापित की गई है, इस से पूर्व यह सीमा केवल मात्र 1600/- रुपए ही थी। यह सीमा इस से अधिक (15000/- रुपए) कभी नहीं की गई।

लेकिन उद्योगों में जो पर्यवेक्षक पद पर नियुक्त लोग हैं उन्हें केवल पर्यवेक्षीय कार्य ही नहीं करने पड़ते अपितु उन्हें अन्य अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, कार्य भी करने पड़ते हैं। कभी कभी तो होता यह है कि कर्मचारी का पर्यवेक्षीय कार्य केवल नाम मात्र का होता है, उसे अधिकाँश अन्य कार्य ही करने पड़ते हैं लेकिन उस का पदनाम पर्यवेक्षक होता है। वैसी स्थिति में पदनाम का कोई विशेष प्रभाव यह निर्धारित करने में नहीं है कि कर्मचारी पर्यवेक्षक है या नहीं। सर्वोच्च न्यायालय ने यह निर्धारित किया है कि यदि इस तरह का विवाद हो कि कोई कर्मचारी कर्मकार है या नहीं तो यह देखा जाएगा कि वह जो कार्य उद्योग में कर रहा था उन का अधिकांश कार्य किस तरह का है। यदि पर्यवेक्षीय कार्य की मात्रा अत्यन्त कम है और कर्मचारी दूसरे कार्य अधिक कर रहा है तो फिर उस कर्मचारी को कर्मकार ही माना जाएगा चाहे उस का वेतन 10000/- रुपए से अधिक क्यों न हो।

स संबंध में आप को तीसरा खंबा पर उपलब्ध औद्योगिक विवाद अधिनियम से संबंधित सभी आलेखों को यहाँ चटका लगा कर पढ़ना चाहिए।

संविदा के अवसान से कर्मकार की सेवा समाप्ति, जो छँटनी नहीं है

छँटनी की परिभाषा में हम ने पाया था कि नियोजक द्वारा किसी भी कर्मकार की सेवा समाप्ति चाहे वह किसी भी कारण से क्यों न की गई हो छँटनी है।  किसी भी कर्मकार को छँटनी किए जाने के लिए नियोजक को क्या क्या करना आज्ञात्मक है यह औद्योगिक विवाद अधिनियम के  अध्याय 5-क तथा अध्याय 5-ख में निर्देशित किया गया है।  लेकिन धारा 2 (ओओ) में छँटनी के अपवाद प्रदर्शित किये गये हैं। इन में से तीन की हम पहले चर्चा कर चुके हैं। चौथा अपवाद उपधारा 2 (ओओ) (बीबी)  निम्न प्रकार है —

    [(bb) Termination of the service of the workman as a result of the non-renewal of the contract of employment between the employer and the workman concerned on its expiry or of such contract being terminated under a stipulation in that behalf contained therein;

अर्थात् –

(खख) किसी कर्मकार की सेवा संविदा का अवसान हो जाने पर नियोजक और कर्मकार के मध्य सेवा संविदा का नवीनीकरण न होने के फलस्वरुप या संविदा में अंकित किसी शर्त के अतर्गत सेवा संविदा की समाप्ति से हुई  सेवा समाप्ति;

    इस अपवाद के दो भाग हैं,

1. जब सेवा संविदा में संविदा की अवधि निश्चित कर दी गई हो तो उस अवधि के समाप्त हो जाने से सेवा संविदा का अवसान हो जाने पर सेवा संविदा का नवीनीकरण न किया गया हो तब होने वाली कर्मकार की सेवा समाप्ति; तथा

2. सेवा संविदा में अंकित किसी शर्त के कारण सेवा संविदा का अवसान हो जाने से हुई सेवा समाप्ति, को भी छँटनी की परिभाषा के बाहर रखा गया है।

मूल अधिनियम में यह अपवाद नहीं था। इसे 1984 में औद्योगिक विवाद अधिनियम में हुए 49वे संशोधन के माध्यम से जोड़ा गया। इस संशोधन ने संपूर्ण औद्योगिक नियोजन के स्वरूप को ही बदल डाला। अब नया नियोजन देने के समय नियोजक अक्सर यह शर्त रखने लगे कि उस की नियुक्ति एक निश्चित अवधि के लिए की जा रही है।  यदि उस अवधि के उपरान्त नियोजक कर्मकार की सेवा संविदा का नवीनीकरण नहीं करता है तो कर्मकार की सेवा समाप्त हो जाती है जिसे छँटनी नहीं माना और नियोजक को किसी तरह की आज्ञापक प्रक्रिया को अपनाने की आवश्यकता समाप्त हो गई। इस प्रावधान का सर्वाधिक लाभ स्वयं सरकारों ने उठाया।  वे निश्चित अवधि के लिए ही सेवा संविदा करने लगे और एक नए प्रकार का कर्मकार अस्तित्व आ गया जिसे आज कल संविदाकर्मी कहा जाता है।

सी तरह नियुक्ति पत्र, प्रमाणित या संस्थान पर प्रभावी मॉडल स्थाई आदेशों या सेवा नियमों में किसी शर्त के होने पर उस शर्त के अनुसार संविदा का अवसान हो जाने से होने वाली सेवा समाप्ति को भी छँटनी की परिभाषा के बाहर कर दिया गया और इस तरह की सेवा समाप्ति के लिेए भी छँटनी के लिए निर्धारित आज्ञापक प्रक्रिया के अपनाने की आवश्यकता नहीं रही।

कर्मकार की स्वेच्छिक सेवानिवृत्ति क्या है?

तीसरा खंबा की पोस्ट औद्योगिक कर्मकार को नौकरी से हटाये जाने के तरीके में हमने औद्योगिक विवाद अधिनियम की धारा 2 (ओओ) में परिभाषित “छँटनी” शब्द का उल्लेख करते हुए स्पष्ट किया था कि किस किस तरह की सेवा समाप्ति को छँटनी नहीं माना जा सकता है।  छँटनी की परिभाषा में स्पष्ट कहा गया है कि नियोजक द्वारा कर्मकार की किसी भी कारण से की गई सेवा समाप्ति छँटनी है यदि वह धारा 2 -(ओओ)  में वर्णित अपवादों में नहीं आती है।  कर्मकार की स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति उस का पहला अपवाद है।

हाँ स्वैच्छिक शब्द का प्रयोग किया गया है, जिस से स्पष्ट है कि यहाँ स्वयं कर्मकार की इच्छा से हुई सेवा समाप्ति का उल्लेख किया जा रहा है। कोई व्यक्ति किसी नियोजक के यहाँ नियोजन प्राप्त कर लेता है उस का यह अर्थ नहीं है कि वह सदैव उस के यहाँ नियोजन में रहेगा। वह जब चाहे स्वैच्छा से अपनी सेवा त्याग सकता है। लेकिन इस संबंध में स्थाई आदेशों तथा नियुक्ति पत्र में एक शर्त सदैव रहती है कि यदि कर्मकार स्वैच्छा से सेवा त्याग करना चाहता है तो उसे एक माह या अधिक समय पूर्व इस की सूचना नियोजक को देनी होगी। अनेक नियुक्ति पत्रों में यह भी शर्त होती है कि यदि कर्मकार इस तरह का नोटिस नहीं देता है तो उसे नोटिस की निश्चित अवधि के वेतन के बराबर राशि नियोजक को अदा करनी होगी। जिसे नियोजक कर्मकार को देय परिलाभों में से भी काट सकता है।

दि कोई कर्मकार त्याग पत्र देता है और उस में यह शर्त अंकित करता है कि वह निश्चित अवधि के उपरान्त सेवा त्याग देगा यदि उसे उस तिथि को उस के बकाया परिलाभ और ग्रेच्युटी दे दी जाए। यदि नियोजक उक्त त्याग पत्र का कोई उत्तर नहीं देता है या जिन परिलाभों को देने का उल्लेख उस ने अपने त्याग पत्र में किया है उन्हें या उन में से किसी को देने से मना कर देता है जिस के कारण कर्मकार निश्चित तिथि को नौकरी छोड़ने से मना करता है। बाद में नियोजक यह कहता है कि उस का त्याग पत्र स्वीकार कर लिया गया है तो इसे स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं कहा जा सकता। इस तरह की सेवा समाप्ति नियोजक द्वारा की गई छँटनी ही कही जाएगी।  इसे कामगार चुनौती दे सकता है।

दि कोई कर्मकार एक लंबे समय तक अनुपस्थित रहता है  तो नियोजक यह मान कर कि कर्मकार स्वैच्छा से नौकरी छोड़ गया है उस का नाम मस्टर रोल से हटा सकता है। यदि कोई कर्मकार उस की इच्छा के विपरीत किसी कारण से अपने कर्तव्य पर अनुपस्थित रहता है और उस का नाम मस्टर रोल से नियोजक द्वारा हटा दिया जाने के बाद वह कर्तव्य पर उपस्थित होता है तो नियोजक को उसे सेवा पर लेना चाहिए। क्यों कि वह कभी भी नौकरी छोड़ना नहीं चाहता था। लेकिन यदि नियोजक उसे कर्तव्य पर वापस नहीं लेता है तो यह नियोजक द्वारा की गई छँटनी मानी जाएगी जो कि अवैध होगी।

स्तुतः स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति पूर्णतः कर्मकार द्वारा किया गया कृत्य है। यदि इस तरह की सेवा समाप्ति में किसी भी तरह से कर्मकार की इच्छा का लोप होता है तो वह स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं होगी। दबाव दे कर लिया गए त्याग पत्र से सेवा समाप्ति स्वैच्छिक सेवा निवृत्ति नहीं है।

औद्योगिक कर्मकार को नौकरी से हटाये जाने के तरीके

समस्या-

किसी स्थाई या स्थाई श्रमिक को उस का नियोजक (कंपनी) किस क़ानून का उपयोग करके नौकरी से निकाल सकता है,  या किस अपराध में उसे सेवाच्युति का दंड दे सकता है? मुझे इस से सम्बन्धितप्रमुख श्रमिक कानूनों की जानकारी दें जिस से मैं यह जान सकूँ कि श्रमिकों के हित में क्या क़ानूनी प्रावधान हैं?

-हीरा लाल यादव, इंदौर, मध्य प्रदेश

समाधान-

हाँ भी किसी उद्योग में श्रमिक नियोजित किए जाते हैं वहाँ औद्योगिक विवाद अधिनियम, 1947 प्रभावी होता है जो श्रमिक और नियोजक के संबंधों को शासित करता है। कोई भी व्यक्ति जो श्रम विवादों में रुचि रखता है और श्रमिकों के हित में काम करना चाहता है उसे सब से पहले इस अधिनियम का गंभीरता से अध्ययन करना चाहिए। इस अधिनियम में बारह अध्याय और पाँच अनुसूचियाँ हैं।  इन में से अध्याय 5-ए तथा 5-बी श्रमिकों का नियोजन समाप्त करने के विषय में हैं। इस के अतिरिक्त अध्याय 1 की धारा 2 (ओओ) का अध्ययन करना आवश्यक है जिस में छँटनी शब्द को परिभाषित किया गया है। हम सब से पहले इसी छँटनी शब्द की परिभाषा पर विचार करते हैं।

छँटनी की परिभाषा अधिनियम में निम्न प्रकार दी गई है-

[(oo) “Retrenchment” means the termination by the employer of the service of a workman for any reason whatsoever, otherwise than as a punishment inflicted by way of disciplinary action but does not include-

 (a) Voluntary retirement of the workman; or

 (b) Retirement of the workman on reaching the age of Superannuation if the contract of employment between the employer and the workman concerned contains a stipulation in that behalf; or

 [(bb) Termination of the service of the workman as a result of the non-renewal of the contract of employment between the employer and the workman concerned on its expiry or of such contract being terminated under a stipulation in that behalf contained therein; or]

 (c) Termination of the service of a workman on the ground of continued ill-health;

इस परिभाषा में कहा गया है कि-

(ओओ) ‘छँटनी’ का अर्थ नियोजक द्वारा एक कर्मकार की किसी भी कारण से की गई सेवा समाप्ति है, लेकिन उस में अनुशासनिक कार्यवाही के माध्यम से दंड स्वरूप दी गई सेवा समाप्ति सम्मिलित नहीं है और उस के सिवा निम्न चीजें भी सम्मिलित नहीं हैं-

(क)  कर्मकार द्वारा स्वेच्छा से प्राप्त की गई सेवा निवृत्ति; .या

(ख) यदि कर्मकार और नियोजक के मध्य हुई सेवा संविदा में उपबंध हो तो एक निश्चित उम्र पूर्ण कर लेने के कारण हुई सेवा निवृत्ति; या

(खख) किसी सेवा संविदा की अवधि समाप्त होने पर संविदा के नवीनीकरण न होने या संविदा में अंकित किसी कारण से हुई कर्मचारी की सेवा समाप्ति; या

(ग) लगातार बीमार रहने के कारण की गयी कर्मकार की सेवा समाप्ति। 

स तरह एक अकेले यह परिभाषा बताती है कि किसी उद्योग में नियोजित श्रमिक की सेवाएँ समाप्त करने या नौकरी से निकाले जाने के कितने तरीके हो सकते हैं? ये निम्न प्रकार हैं-

1. यदि कोई कर्मकार स्वयं ही स्वेच्छा से नौकरी छोड़ सकता है अर्थात त्याग-पत्र दे कर अपनी सेवाएँ समाप्त कर सकता है। यह भी हो सकता है कि कोई कर्मकार बिना सूचना दिए नौकरी पर न आए, या फिर अवकाश पर जाए और एक लंबे समय तक नौकरी पर न लौटे, तब भी कुछ परिस्थितियों में यह समझा जा सकता है कि कर्मकार स्वैच्छा से नौकरी छोड़ कर चला गया है। ऐसी सेवा समाप्ति छँटनी नहीं होगी।

2. अक्सर सेवा संविदा में या औद्योगिक संस्थान के स्थाई आदेशों या प्रारूप स्थाईआदेशों में सेवा निवृत्ति की आयु के बारे में उपबंध होता है। इस उपबंध के द्वारा निश्चित की गई आयु प्राप्त कर लेने पर उसे सेवा निवृत्त कर दिया जाता है। ऐसी सेवानिवृत्ति भी छँटनी के बाहर है।

3. प्रत्येक कर्मकार को सेवा आरंभ किए जाने के समय, उसे पद पर स्थाई किए जाने के समय या पदोन्नति होने पर नियुक्ति पत्र दिए जाते हैं। अनेक उद्योगों में ऐसे नियुक्तिपत्र कर्मकार को दिए ही नहीं जाते लेकिन उन पर हस्ताक्षर करवा कर नियोजक अपने पास रख लेते हैं। ये नियुक्ति पत्र अक्सर अंग्रेजी में होते हैं। कर्मकार को पता ही नहीं होता है कि उस से किसी नियुक्तिपत्र पर हस्ताक्षर करवाए गए हैं। कर्मकार द्वारा हस्ताक्षर युक्त यह नियुक्ति पत्र जो नियोजक के पास होता है वास्तव में सेवा संविदा है। यदि इस संविदा में लिखा हैा कि यह नियुक्ति किसी निश्चित तिथि तक के लिए है या निश्चित अवधि के लिए है या फिर उस में लिखा है कि किसी घटना के घटित होने पर सेवा समाप्त हो जाएगी। वैसी स्थिति में उस निश्चित तिथि या अवधि या घटना के घटित हो जाने पर की गई सेवा समाप्ति भी कर्मकार की सेवा समाप्ति का एक तरीका है। आज कल नियोजक इसी का सर्वाधिक उपयोग कर रहे हैं। वे नियोजन देने के समय ही नियुक्ति पत्र में इस तरह की शर्तों पर कर्मकार के हस्ताक्षर ले लेते हैं और कर्मकार को पता भी नहीं होता कि उस की नियुक्ति किसी निश्चित तिथि या अवधि तक के लिए है या फिर किसी खास घटना के घटित होने पर समाप्त हो जाएगी। उसे तो पता भी तभी लगता है जब उस की सेवा समाप्त कर दी जाती है। इस तरह की सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं है।

4. यदि कोई कर्मकार नियोजन में रहते हुए, सेवा संविदा का उलंघन करने का, स्थाई आदेशों या प्रारूप स्थाई आदेशों या सेवा नियमों में उल्लखित कोई दुराचरण करता है तो उसे आरोप पत्र दे कर, नैसर्गिक न्याय सिद्धान्तों के अनुरूप घरेलू जाँच कर के, जाँच में आरोप सिद्ध हो जाने पर उसे दंडित कर सकता है। यदि यह दंड सेवा च्युति या सेवा समाप्ति का दंड है तो ऐसी सेवाच्युति या सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं होगी।

5. यदि कोई कर्मकार लगातार  लंबें समय तक बीमार रहे और उस कारण से वह लंबे समय के लिए कर्तव्य पर उपस्थित नहीं हो सके। यदि उपस्थित हो जाए तो भी कर्तव्य करने में असमर्थ रहे तो उसे इस लंबी बीमारी के आधार पर सेवा से पृथक किया जा सकता है। ऐसी सेवा समाप्ति भी छँटनी नहीं होगी।

6. यदि उक्त पाँचों तरह से कर्मकार की सेवा समाप्त न कर के किसी अन्य कारण से उस की सेवा समाप्ति की गई है तो वह छंटनी होगी।

स तरह किसी भी औद्योगिक संस्थान में किसी कर्मकार की सेवा समाप्ति के यही छह तरीके हैं। इन में से प्रत्येक रीति के बारे में विस्तार से व्याख्या की जा सकती है। लेकिन वह फिर कभी।

औद्योगिक विवाद अधिनियम में कामगार की परिभाषा

पिछली पोस्ट औद्योगिक नियोजक एवं श्रमिक/कर्मकार में हमने नियोजक और कर्मकार की परिभाषाएँ जानी थीं। इन में कर्मकार की परिभाषा कुछ व्यापक और विस्तृत है। इस परिभाषा को सर्वोच्च न्यायालय और विभिन्न उच्च न्यायालयों ने बार बार परिभाषित किया है। इस परिभाषा को हम तीन भागों में विभाजित कर सकते हैं। पहला भाग कर्मकार को उस व्यक्ति के रूप में परिभाषित करता है जो किसी उद्योग में शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालकीय, लिपिकीय या पर्यवेक्षीय कार्यों के लिए वेतन या ईनाम के  नियोजित है। इस भाग में यह परिभाषित किया गया है कि कर्मकार का अर्थ क्या है? दूसरे भाग में कुछ अन्य चीजों को भी सम्मिलित किया गया है जो पहले भाग में सम्मिलित नहीं था। ‘जिन की सेवाच्युति, सेवामुक्ति और छंटनी के कारण कोई औद्योगिक विवाद उत्पन्न हुआ है वे उस औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के लिए कामगार होंगे। इस भाग से कामगार शब्द में कुछ लोग और शामिल किए गये हैं। तीसरा भाग विशेष रूप से कुछ लोगों को इस परिभाषा से बाहर कर देता है। जिस का अर्थ है कि यदि वह पहले दो भागों के आधार पर कामगार माना जाए तब भी वह इस भाग के कारण कामगार नहीं माना जाएगा।

रिभाषा का प्रथम भाग में यह संकल्पना प्रस्तुत की गई है कि एक व्यक्ति को कामगार होने के लिए किसी के द्वारा नियोजित होना चाहिए। अर्थात उस व्यक्ति और किसी औद्योगिक नियोजक के मध्य नियोजन की संविदा होनी चाहिए। यदि दोनों के मध्य कोई नियोजन संविदा नहीं है या नियोजक और नियोजिति का संबंध नहीं है तो कामगार की परिभाषा की भूमिका आरंभ नहीं हो सकती। एक बार यह संबंध स्थापित होना सिद्ध हो जाए तो वह कितने समय का था, आकस्मिक अस्थाई या स्थाई प्रकृति का था, पूर्णकालिक था या अंशकालिक था यह सब गौण हो जाता है। कोई भी व्यक्ति जो उद्योग में नियोजित है वह कामगार हो सकता है उस की प्रास्थिति गौण हो जाती है।

परिभाषा के प्रथम भाग में प्रशिक्षु (एप्रेंटिस) को विशेष रूप से सम्मिलित किया गया है। जिस का अर्थ है कि यदि किसी व्यक्ति को केवल कोई काम सीखने की संविदा पर भी नियोजित किया गया है तो वह कामगार होगा। लेकिन प्रशिक्षु अधिनियम के प्रावधानों की समीक्षा करने के बाद यह निर्धारित किया गया कि इस अधिनियम अंतर्गत के अंतर्गत यदि कोई व्यक्ति उद्योग में प्रशिक्षण प्राप्त करने के लिए आता है तो वह कामगार नहीं होगा। लेकिन अन्य व्यक्ति जो प्रशिक्षु अधिनियम के अंतर्गत उ्दयोग में नहीं आए हैं लेकिन जिन्हें किसी प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत काम सीखने के लिए नियोजित किया गया है वे व्यक्ति कामगार माने जाएंगे। इस उपबंध का एक विशिष्ठ कारण यह भी रहा कि बहुत से उद्योग प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत कई वर्षों तक लोगों से नाम मात्र की मजदूरी पर काम कराते रहते हैं और फिर उन्हें नौकरी से हटा कर नए लोगों को प्रशिक्षु संविदा के अंतर्गत काम पर रख लेते हैं। इस तरह गरीब मजबूर बेरोजगारों का शोषण चलता रहता है। इसी को रोकने के उपाय के अंतर्गत प्रशिक्षु शब्द को कामगार की परिभाषा में सम्मिलित किया गया।

रिभाषा के प्रथम भाग में कहा गया कि नियोजित व्यक्ति किसी उद्योग में नियोजित होना चाहिए। यदि जिस संस्थान में उसे नियोजित किया गया है वह उद्योग नहीं है तो उस व्यक्ति को कर्मकार नहीं माना जा सकता। एक और बात है कि नियोजित व्यक्ति को किसी ईनाम या वेतन के लिए नियोजित होना चाहिए। यदि किसी व्यक्ति के काम के बदले में कोई प्रतिफल निश्चित न किया गया हो कोई संविदा ही अस्तित्व में नहीं होगी। संविदा न होने की स्थिति में किसी व्यक्ति को कर्मकार नहीं कहा जा सकता। ईनाम शब्द का उल्लेख यहाँ विशेष रूप से किया गया है जिस का अर्थ है कि हमेशा काम के लिए वेतन ही प्रतिफल नहीं हो सकता। किसी व्यक्ति को उस के काम के परिमाण के आधार पर अर्थात किए गए काम के आधार पर प्रतिफल दिया जाना भी तय किया जा सकता है और यहाँ तक कि कमीशन के आधार पर भी मजदूरी चुकाई जा सकती है।

कामगार की परिभाषा के प्रथम भाग की महत्वपूर्ण शर्त यह है कि दो व्यक्तियों के मध्य नियोजन की संविदा होनी चाहिए। पुराने जमाने में इसे मालिक-मजदूर संबंध कहा जाता था, पर इस औद्योगिक युग में इसे नियोजन संविदा कहा जाना उचित ही है।अगले शनिवार को हम देखेंगे इस संविदा को पहचानने के तरीके क्या हैं?

औद्योगिक नियोजक और श्रमिक/कर्मकार

म संक्षेप में औद्योगिक विवाद अधिनियम और उस में परिभाषित ‘उद्योग’ शब्द के बारे में बात कर चुके हैं। हम यह जानने की और आगे बढ़ें कि औद्योगिक विवाद क्या हैं इस से पहले हमें ‘नियोजक’ और ‘श्रमिक’ शब्दों के बारे में जानना आवश्यक है। नियोजक को इस अधिनियम में निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

(g) “Employer” means-

 (i) In relation to any industry carried on by or under the authority of any department of the Central Government or a State Government, the authority prescribed in this behalf, or where no authority is prescribed, the head of the department;

 (ii) In relation to an industry carried on by or on behalf of a local authority, the chief executive officer of that authority;

नियोजक का अर्थ-

(i) केन्द्रीय अथवा राज्य सरकार द्वारा अथवा उन के किसी विभाग की प्राधिकारिता के अंतर्गत संचालित उद्योग के लिए इस संबंध में विहित प्राधिकारी और जहाँ कोई प्राधिकारी विहित नहीं किया गया हो वहाँ उस विभाग का प्रधान;

(ii) स्थानीय प्राधिकरण द्वारा और उन के लिए संचालित किसी उद्योग के संबंध में उस स्थानीय प्राधिकरण का मुख्य कार्यकारी अधिकारी है।

 इस प्रकार हम देखते हैं कि नियोजक शब्द की परिभाषा निदर्शी है न कि संपूर्ण। यहाँ केन्द्र व राज्य सरकारों और स्थानीय प्राधिकारणों द्वारा या उन के लिए संचालित उद्योगों  के लिए तो नियोजक को परिभाषित किया गया है लेकिन अन्य उद्योगों के लिए नहीं। इस का सामान्य अर्थ यही है कि अन्य उद्योगों के लिए नियोजक का निर्धारण करने के लिए हमें नियोजक शब्द के शब्दकोषीय अर्थ को ही मानना होगा। जिस के अनुसार किसी व्यक्ति के लिए नियोजक वही होगा जो उसे नियोजन में नियुक्त करता है, वेतन आदि का भुगतान करता है। जैसे किसी एकल स्वामित्व वाले उद्योग के लिए नियोजक उस उद्योग का स्वामी होगा। यदि उद्योग भागीदारी फर्म द्वारा संचालित किया जा रहा है तो उस के भागीदार नियोजक होंगे और उद्योग किसी जोइंट स्टॉक कंपनी द्वारा संचालित किया जा रहा है तो उस का निदेशक मंडल उस के कर्मचारियों का नियोजक होगा।

इस अधिनियम में ‘श्रमिक’ अथवा ‘कर्मकार’ शब्द को निम्न प्रकार परिभाषित किया गया है-

(s) “Workman” means any person (including an apprentice) employed in any industry to do any manual, unskilled, skilled, technical, operational, clerical or supervisory work for hire or reward, whether the terms of employment be express or implied, and for the purposes of any proceeding under this Act in relation to an industrial dispute, includes any such person who has been dismissed, discharged or retrenched in connection with, or as a consequence of, that dispute, or whose dismissal, discharge or retrenchment has led to that dispute, but does not include any such person-

 (i) Who is subject to the Air Force Act, 1950 (45of l950),or the Army Act, 1950 (46 of 1950), or the Navy Act, 1957 (62 of 1957); or

 (ii) Who is employed in the police service or as an officer or other employee of a prison; or

 (iii) Who is employed mainly in a managerial or administrative capacity; or

 (iv) Who, being employed in a supervisory capacity, draws wages exceeding ten thousand rupees per mensem or exercises, either by the nature of the duties attached to the office or by reason of the powers vested in him, functions mainly of a managerial nature.

‘श्रमिक’ या ‘कर्मकार’ का अर्थ है किसी भी उद्योग में वेतन या इनाम के लिए शारीरिक, अकुशल, कुशल, तकनीकी, परिचालन, लिपिकीय, या पर्यवेक्षीय कार्य करने हेतु नियोजित कोई व्यक्ति (जिस में एक प्रशिक्षु भी सम्मिलित है), जिस के नियोजन की शर्तें व्यक्त या निहित हों सकती हैं, और इस अधिनियम के अंतर्गत औद्योगिक विवाद से संबंधित किसी भी कार्यवाही के संबंध में वे सभी व्यक्ति सम्मिलित हैं और उस औद्योगिक  विवाद के कारण सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी कर दिया गया है या उसे सेवामुक्त, सेवाच्युत या छंटनी किए जाने से उत्पन्न हुआ है, लेकिन उस में निम्न लिखित सम्मिलित नहीं है-

 (i)  जो वायु सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 45oवाँ, या सेना अधिनियम, 1950 (1950 का 46वाँ), या नौसेना अधिनियम, 1957 (1957 का62वां) के अधीन है, या

(ii) जो पुलिस सेवा में या जेल के एक कर्मचारी या अधिकारी के रूप में कार्यरत है, या

(iii) जो मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय या प्रशासनिक क्षमता में कार्यरत है, या

(iv) जो पर्यवेक्षीय क्षमता में नियोजित है और दस हजार रुपए प्रतिमाह से अधिक मजदूरी प्राप्त करता है, या कार्यालय से जुड़ी कर्तव्यों की प्रकृति द्वारा या उस में निहित शक्तियों के कारण, मुख्य रूप से एक प्रबंधकीय प्रकृति के कार्य के लिए नियोजित है।

 

र्मकार की परिभाषा में आप यहाँ देख सकते हैं कि यह निदर्शी होने के स्थान पर संपूर्ण है। लेकिन इस तरह की परिभाषा अक्सर ही पक्षकारों के बीच विवाद उत्पन्न करती है जिस की व्याख्या न्यायालयों द्वारा की जाती है। किसी भी औद्योगिक विवाद में अक्सर ही यह आपत्ति नियोजक द्वारा उठाई जाती है कि उस औद्योगिक विवाद से संबंधित व्यक्ति अधिनियम में परिभाषित कर्मकार नहीं है। ऐसी आपत्ति का निराकरण साक्ष्य और उक्त परिभाषा की व्याख्या के आधार पर ही किया जा सकता है। परिभाषा की व्याख्या सदैव ही एक विधिक विवाद-बिंदु होता है और जिस के लिए रिट याचिका आसानी से अनुमत हो जाती है। इसी आधार को ले कर अक्सर नियोजक किसी भी औद्योगिक विवाद को सर्वोच्च न्यायालय तक ले जाते हैं और समय निकालते हैं। एक साधारण कर्मकार में इतनी क्षमता नहीं होती है कि वह सर्वोच्च न्यायालय तक मुकदमे को लड़ सके। वह अपनी लड़ाई को बीच में छोड़ देता है। न्याय से वंचित होने पर उस में संपूर्ण व्यवस्था के प्रति रोष और वितृष्णा उत्पन्न होती है जो जीवन भर उस के साथ तो रहती ही है। उस का परिवार भी यह धारणा बना लेता है कि इस व्यवस्था में कमजोर लोगों के लिए कोई न्याय नहीं है।

अगले शनिवार हम ‘कर्मकार’ शब्द की की गई व्याख्याओं की चर्चा करेंगे।

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