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मुस्लिम विधि में सहदायिक संपत्ति का कोई अस्तित्व नहीं।

समस्या-

शमीम अहमद ने गाँव बुढान नगर, पोस्ट सैथवलिया, जिला सँतकबीरनगर, राज्य उतर प्रदेश से पूछा है-

मेरे मामा नूरुल के चार लडकी और तीन लडके हैं, उनकी उम्र 70 वर्ष है और उनकी सेवा उनकी लडकियाँ करती हैं। उनकी बहुएँ उनसे अलग रहती हैं। मामू ने अपनी चारों लडकियोँ को 24-11-2018 को एक दान पत्र (बैनामा) पंजीकृत किया, जिसमें उन की पुत्रबधु ने सहदायिक सम्पत्ति होने से आपत्ति डाल दी। तो सर क्या ये बैनामा निरस्त करवा सकती है। खारिज दाखिल नहीं हो रही है। सर कोई उपाय बताएँ।

समाधान-

सहदायिक संपत्ति का सिद्धान्त और विधि केवल हिन्दू विधि में है। मुस्लिम विधि में कोई भी संपत्ति सहदायिक नहीं होती है। इस कारण एक मुस्लिम की संपत्ति के संबंध में संपत्ति के सहदायिक होने के मामले में की गयी आपत्ति सही नहीं है।

किसी भी संपत्ति का अंतरण विक्रय या दान के पंजीकृत विलेख के माध्यम से किया जाता है तो ऐसा विलेख राजस्व विभाग में सक्षम अधिकारी के समक्ष प्रस्तुत करते हुए खारिज दाखिल (नामान्तरण)  की अर्जी दी जाती है और उस पर संबंधित व्यक्तियों द्वारा आपत्ति की जा सकती है। इसी क्रम में आप के मामले में अंतरण कर्ता की पुत्रवधु द्वारा आपत्ति की गयी है। इस आपत्ति की सुनवाई कर के निर्णय दिया जाएगा जिस पर दाखिल खारिज का आदेश हो कर दाखिल खारिज के आदेश पर अमल होगा।

लेकिन कोई भी पक्ष दाखिल खारिज के इस आदेश के विरुद्ध अपील कर सकता है और दाखिल खारिज के आदेश के अमल पर भी रोक अपील न्यायालय से करवा सकता है। अपील के निर्णय के उपरान्त दाखिल खारिज का निर्णय अन्तिम हो जाने पर उस पर अमला होगा।

उत्तर प्रदेश में भूमि कानून अन्य राज्यों से भिन्न है। पिछले समय उस कानून में पर्याप्त अंतर तभी आया है। वैसी स्थिति में बेहतर है कि आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे और राजस्व मामले के जानकार वकील से परामर्श कर के अपनी समस्या का समाधान करें। हमारी राय में तो दान पत्र के आधार पर खारिज दाखिल हो जाना चाहिए।

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