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समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।

समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मारे दादा जी ने ज़मीन खरीदी उस वक़्त के उनके हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी रजिस्ट्रार ऑफिस में किए थे। लेकिन जब हम ने इस के बारे मे हमारे भाइयों से पूछा तो उन्होने कहा कि ये ज़मीन हमारे दादा जी ने उनको बेच दी थी। फिर जब हम ने बेचान की रजिस्ट्री की कॉपी निकलवाई तो पता चला कि जमीन बेचान की रजिस्ट्री में उन के सिग्नेचर हस्ताक्षर एवं अंगूठा निशानी मैच नहीं करते हैं। इस की हम ने एफएसएल जाँच भी करवायी है. एफएसएल की रिपोर्ट में भी ये मैच नहीं हुए हैं। कृपया हम को बताएँ कि हम क्या कर सकते हैं।

समाधान-

किसी भी मामले में कानूनी सलाह लेते समय यह आवश्यक है कि जिस विधि विशेषज्ञ से आप सलाह ले रहे हैं उस के समक्ष सभी तथ्य रखे जाएँ। आपने आपके इस मामले में दादाजी द्वारा जमीन खरीदे जाने के विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि तथा फिर दादाजी द्वारा भाइयों के नाम किए गए विक्रय पत्र की रजिस्ट्री की तिथि नहीं बताई है। एफएसएल की रिपोर्ट कब आई है इस की तिथि भी नहीं बताई है। हर उपाय प्राप्त करने के लिए न्यायालय के ममक्ष कार्यवाही करे की एक निश्चित समयावधि होती है और कोई भी उपाय केवल सही समय पर नहीं करने के कारण असफल हो सकता है।

हली बात आप को यह देखनी चाहिए कि जब आप के दादा जी ने जमीन खरीदी थी तब रजिस्ट्री पर उन के हस्ताक्षर हुए थे क्या? यदि उन के हस्ताक्षर उस रजिस्ट्री पर हुए थे तो बेचान की रजिस्ट्री पर हुए उन के हस्ताक्षर पूर्व के हस्ताक्षरों से मिलने चाहिए थे और साथ ही अंगूठा निशानी भी मेल खानी चाहिए थी। इस का एक ही अर्थ हो सकता है कि भाइयों ने किसी अन्य व्यक्ति को आपके दादाजी बना कर रजिस्ट्री अपने नाम करवा ली हो। यदि इस की जरा सी भी संभावना है तो यह गंभीर अपराध है क्यों कि इस में फर्जी दस्तावेज का निर्माण कर के छल हुआ है। इस में अनेक अपराध एक साथ हुए हैं।आप इस की रिपोर्ट पुलिस को करवा सकते हैं और पुलिस के कार्यवाही न करने पर परिवाद प्रस्तुत कर सीधे न्यायालय को कह सकते हैं कि इस मामले को दर्ज कर पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाए।

दि आप को पक्का है कि जो रजिस्ट्री आपके दादा की ओर से भाइयों के नाम हुई है वह फर्जी है और उस में छल हुआ है तो आप इसी आधार पर उस कूटरचित रजिस्टर्ड विक्रय पत्र को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं और जमीन का बंटवारा करा कर अपने हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिए जाने के लिए राजस्व न्यायालय में विभाजन का वाद संस्थित कर सकते हैं।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

समस्या-

चंद्रप्रकाश ओझा ने गांव-छत्तरगढ़, जिला-बीकानेर, राज्य-राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी को 1977 में छत्तरगढ़ जिला बीकानेर में भूदान यज्ञ बोर्ड ने 25 बीघा जमीन आवंटित की। राजस्व रिकार्ड में यह जमीन भूदान यज्ञ बोर्ड के नाम दर्ज थी तथा मेरे पिताजी आवंटी थे। राज्य सरकार ने भूदान बोर्ड के सभी आवंटियों को खातेदारी अधिकार देने का निर्णय किया तथा भूदान बोर्ड को अपने आवंटियों के नाम सपुष्ट सूची में भेजकर छत्तरगढ़ तहसीदार को खातेदारी देने के आदेश देने के लिए अधिकृत किया जिसके तहत भूदान बोर्ड ने अधिकांश को खातेदारी अधिकार देने के लिए तहसीदार छत्तरगढ़ को अलग अलग सपुष्ट सूचियाँ भेजकर सूची में शामिल आवंटियों को खातेदारी अधिकार देने को कहा। जिसमे से अधिकांश को खातेदारी अधिकार दे दिए गए। भूदान बोर्ड ने 27 जुलाई 2018 को जो सूची भेजी उसमें मेरे पिताजी का नाम भी था, लेकिन खातेदारी मिलती उससे पहले ही 17 जुलाई 2018 को 99 वर्ष की उम्र में उनका स्वर्गवास हो गया।

मेरे पिताजी ने अपने जीवन काल में सन 2012 में रजिस्टर्ड वसियत कर अपनी सारी सम्पति अपने पोते (मेरे पुत्र के) नाम कर दी थी। तथा वसीयत में ये भी लिख दिया था कि मेरी मृत्यु के बाद भी अगर कोई सम्पति मेरी बनती है तो उसका स्वामित्व भी मेरे इस पोते के नाम रहेगा । मेरे माता- पिता ने मेरे छोटे भाई, उसकी पत्नी व बच्चों को 2007 में ही मारपीट करने,अभद्र व अमानवीय व्यवहार करने पर अपनी सारी चल व अचल सम्पत्ति से बेदखल कर अखबार में निकाल दिया था। मेरे पिताजी ने मेरे बेटे के नाम वसीयत की थी उसने तहसील में एक प्रार्थना पत्र के साथ रजिस्टर्ड वसीयत की प्रति व बेदखली की कंटिंग लगाकर, खातेदारी अपने नाम करने का निवेदन किया।

तहसीलदार ने जो सूची भूदान बोर्ड ने भेजी थी जिसमें 26 नाम थे उनको खातेदारी अधिकार देने के लिए अखबार में आपत्तियां आमंत्रित की । मेरे छोटे भाई ने आपत्ति लगा दी जिसमें उसने सभी वारिसान के नाम खातेदारी देने का लिखा। मेरे 4 बहनें भी हैं। जबकि उसे, उसकी पत्नी व बेटों को बेदखल किए 11 वर्ष हो चुके है।

अब तहसील द्वारा कोई निर्णय नहीं किया जा रहा। उनका कहना है कि खातेदारी से पहले ही आपके पिताजी की मृत्यु हो गई इसलिए वो गैर खातेदार हुए और गैर खातेदार की वसीयत मान्य नहीं है। जबकि राजस्व रिकार्ड में सभी आवंटियों के नाम इस प्रकार दर्ज है
खातेदार-भूदान यज्ञ बोर्ड
आवंटी-बाबूलाल ओझा

तहसील वालों का यह भी कहना है कि मृतक के भी नाम खातेदारी नहीं हो सकती, जबकि इससे पूर्व जिन 40 आवंटियों को खातेदारी अधिकार दिए गए उनमें कुछ मृतकों के नाम भी खातेदारी दी जा चुकी है। तहसील ऐसे दोहरे मानदंड क्यों अपना रही है।

क्या वसीयतकर्ता के ये लिखने के बाद भी कि “मेरी मृत्यु के बाद भी अगर कोई सम्पति मेरे नाम होती है तो उसका अधिकार भी उसे होगा जिसके हक में वसीयत की गई है।” वसीयतकर्ता की ऐसी इच्छा के बाद भी क्या तहसीलदार ऐसा कर सकते है?

मेरे पिताजी को भूदान बोर्ड ने 1977 में ये भूमि आवंटित करते हुए भूदान बोर्ड का पट्टा दिया था। तब से पिछले 41सालों से खेती कर रहे है ।

कृपया मार्गदर्शन करें कि मेरे पिता की वसीयत व उनकी इच्छानुसार खातेदारी हो सकती है क्या? इसके लिए क्या प्रक्रिया अपनाई जाए? हालांकि अभी तो राजस्थान में विधानसभा चुनावों की आचार संहिता लगी हुई है इसलिए किसी को भी खातेदारी अधिकार नही दिए गए है लेकिन आचार संहिता हटते ही खातेदारी प्रक्रिया शुरू हो जाएगी । इसलिए मार्गदर्शित करें कि इस एक माह की अवधि में क्या प्रक्रिया अपनाई जाए कि सभी के साथ हमारे प्रकरण का भी निस्तारण हो सके।

 

समाधान-

हसील आप मामले में आपके पिता के वसीयती के नाम खातेदारी न देने के जो कारण बता रही है वे सभी बहाने हैं। तहसील को बताना चाहिए कि जो नहीं किया जा रहा है वह किस कानून और नियम के अंतर्गत किया जा रहा है। लेकिन तहसील में तो यह सब क्लर्क और अधिकारी मौखिक रूप से कह रहे होंगे। उन्हों ने अभी तक कोई निर्णय नहीं किया है। वैसे भी आम धारणा यह है कि राजस्थान की तहसीलों में बिना धन खर्च किए कोई फाइल आगे नहीं सरकती है। हमें आप के मामले में ऐसा ही कोई पेच नजर आता है।  मौखिक रूप से जो कुछ तहसील कह रही है उस में से कोई भी तर्क किसी कानून या नियम के अंतर्गत नहीं है। अभी तक तहसील ने आप की खातेदारी की अर्जी को लिख कर अस्वीकार नहीं किया है।

अभी आचार संहिता है तो इस अवधि में आप आरटीआई के माध्य़म से पूछ सकते हैं कि वसीयती के नाम पर खातेदारी  दिए जाने का मामला क्यों अभी तक लंबित है? उस के कारण क्या हैं? यदि कोई नियम या कानून आड़े आ रहा है तो वह बताया जाए। यदि तहसली आरटीआई के अंतर्गत कोई कारण बताती है तो उस उत्तर के आधार पर आगे का उपाय तय किया जा सकता है। उस के आधार पर रिट याचिका भी उच्च न्यायालय में प्रस्तुत की जा सकती है।  यदि कोई कारण बताया जाता है तो उस के आधार परआगे का उपाय तय किया जा सकता है।

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

समस्या-

दुर्गेश शर्मा ने मदनगंज किशनगढ़, जिला अजमेर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे दादा जी दो भाई थे, उनके बड़े भाई ने शादी नहीं की थी और ना ही किसी को गोद लिया था। उन के पिता की मृत्यु के समय मेरे दादा जी की उम्र कम थी तो उन के चाचा जी ने सारी ज़मीन खुद के नाम कर ली और उन्हें कुछ हिस्सा नहीं दिया। कुछ समय बाद मेरे दादा जी ने उन से कुछ ज़मीन खरीदी थी हम को इस बारे मे पता था परंतु हम कभी हमारे गाँव नहीं गये। लेकिन मेरे दादा जी के मृत्यु के बाद हम गाँव गये तो हम को बोला के आप के दादा जी ने सारी ज़मीन बेच दी है हम को। परंतु इस के बारे मे मेरे पापा को कुछ जानकारी नहीं, कब उन से ये सब करवा लिया गया, और आज भी हम को विरासत की ज़मीन नहीं मिली, अब हम क्या कर सकते हैं?

समाधान-

प ने अपनी समस्या में जो विवरण दिया है वह कहानी मात्र है। उस से यह पता नहीं लगता कि आप के दादाजी के पिता की जो जमीन थी वह कौन सी थी। उस के तत्कालीन खसरा नं. और वर्तमान खसरा नंबर कौन से हैं। राजस्थान में राजस्व विभाग के रिकार्ड में सभी भूमि का रिकार्ड होता है। जो जमीन आबादी में परिवर्तित हो जाती है वह पंचायत, नगर पालिका/ परिषद / निगम या विकास प्राधिकरण के नाम दर्ज होती हैं। शेष भूमि उस के खातेदारों के नाम दर्ज होती हैं। इस का वर्तमान रिकार्ड राजस्व विभाग की वेबसाइट अपना खाता पर देखा जा सकता है।

इस तरह आप उक्त वेब साइट देख कर पता लगाएँ कि दादाजी के पिता की जो जमीन थी वह कौन सी हो सकती है। इस तरह आप संभावित खसरा नं. पता लगा लें। वर्तमान रिकार्ड के पहले का करीब सौ वर्षों तक का रिकार्ड राजस्व विभाग में मिल सकता है। पुराना रिकार्ड अजमेर राजस्व मंडल के रिकार्ड रूम में मिल जाएगा। इस में खोज करवा कर या स्वंय निरीक्षण कर के आप पता लगाएँ कि आप के दादा जी के पिता के नाम कौन सी और कितनी जमीन थी। वह जमीन किस आधार पर आप के दादाजी के चाचा के नाम आई। आप के दादाजी ने कौन सी जमीन खरीदी थी और वह जमीन कहाँ गयी। यह सब रिकार्ड देख कर आप पता लगा सकते हैं और उस रिकार्ड की सत्यापित प्रतिलिपियाँ प्राप्त कर सकते हैं।

यह सारा रिकार्ड पता लग जाने के बाद आप अजमेर में किसी अच्छे राजस्व मामलों के  वकील से मिल कर पता लगा सकते हैं कि आप को अब दादाजी के पिताजी की संपत्ति में से कुछ मिल सकता है या नहीं। यदि मिल सकता है तो कैसे मिल सकता है।

समस्या-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम की धारा 251(1)  के अंतर्गत जिस खातेदार पर रास्ते के लिये वाद दायर करते हैं उसी में से रास्ता दिया जाता है या किसी दूसरे  की खातेदारी में से रास्ता दिया जा सकता है,  यदि रास्ते में आने वाली दूरी कम हो।

– राहुल चौधरी, अजमेर

समाधान-

राजस्थान काश्तकारी अधिनियम, 1955 में कृषि भूमि में जाने के लिए रास्ते के संबंध में धारा 251 तथा धारा 251-क हैं। धारा 251 में आपका पहले से उपभोग में लिया जा रहा रास्ता किसी के द्वारा बंद कर देने या उस में बाधा पहुँचाने के संबंध में है तथा धारा 251-क किसी काश्तकार के खेत में आने जाने का रास्ता न होने पर नया रास्ता देने के संबंध में है। ये दोनों धाराएँ निम्न प्रकार हैं-

धारा- 251.

रास्ते तथा अन्य निजी सुखाचार के अधिकार- (1) उस दशा में जब कोई भूमिधारी जो वस्तुतः रास्ते के अधिकार या अन्य सुखाचार या अधिकार का उपभोग कर रहा हो, अपने उक्त उपभोग में बिना उसकी सहमति के, विधि विहित प्रणाली से भिन्न तरीके से, बाधित किया जाय, तहसीलदार उक्तरूपेण बाधित भूमिधारी के प्रार्थना-पत्र पर तथा उक्त उपभोग एवं बाधा के विषय में सरसरी जाँच करने के पश्चात् बाधा को हटायेजाने की अथवा बंद किये जाने की और प्रार्थी भूमिधारी को पुनः उक्त उपभोग करने की आज्ञा, कर सकेगा चाहे उक्तरूपेण पुन: उपयोग किये जाने के विरुद्ध तहसीलदार के समक्ष अन्य कोई हक स्थापित किया जाय।

(2) इस धारा के अन्तर्गत पारित कोई आज्ञा किसी व्यक्ति को ऐसे अधिकार या सुखाचार को स्थापित करने से विवर्जित नहीं करेगी जिसके लिये वह सक्षम सिविल न्यायालय में नियमित रीति से वाद प्रस्तुत करके दावा कर सकता हो।

251-क.

अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना या नया मार्ग खोलना या विद्यमान मार्ग का विस्तार करना.-(1) जहाँ

(क) कोई अभिधारी, अपनी जोत की सिंचाई के प्रयोजन के लिए किसी अन्य खातेदार की जोत में से होकर भूमिगत पाइपलाइन बिछाना चाहता है; या

(ख) कोई अभिधारी या अभिधारियों का कोई समूह अपनी जोत या, यथास्थिति, उनकी जोतों तक पहुंचने के लिए अन्य खातेदार की जोत में से होकर एक नया मार्ग बनाना चाहता है या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित या चौड़ा करना चाहता है

और मामला पारस्परिक सहमति से तय नहीं होता है। तो ऐसा अभिधारी या, यथास्थिति, ऐसे अभिधारी ऐसी सुविधा के लिए संबंधित उप-खण्ड अधिकारी को आवेदन कर सकेंगे और उप-खण्ड अधिकारी, यदि संक्षिप्त जांच के पश्चात् उसका समाधान हो जाता है कि-

(i) यह आवश्यकता आत्यंतिक आवश्यकता है और यह जोत के केवल सुविधाजनक उपभोग के लिए नहीं है; और

(ii) अन्य खातेदार की जोत में से होकर, विशिष्ट रूप से नये मार्ग के मामले में, पहुंचने के वैकल्पिक साधन का अभाव सिद्ध किया गया है

तो आदेश द्वारा, आवेदक को, अभिधारी, जो उस | भूमि को धारित करता है, द्वारा सीमांकित या दर्शित लाईन के साथ-साथ भूमि की सतह से कम से कम । तीन फुट नीचे पाइपलाइन बिछाने के लिए या ऐसे ट्रैक | पर, जो उस अभिधारी द्वारा जो उस भूमि को धारित – करता है, दर्शाया जाये, भूमि में से होकर, और यदि ऐसा ट्रैक दर्शित नहीं किया जाये तो लघुतम या निकटतम रूट से होकर एक नया मार्ग जो तीस फुट से अधिक चौड़ा न हो, बनाने के लिए या विद्यमान मार्ग को तीस फुट से अनधिक तक विस्तारित या चौड़ा

करने के लिए, उस अभिधारी को, जो उस भूमि को धारित करता है, जिसमें से होकर पाइपलाइन बिछाने या एक नया मार्ग बनाने या विद्यमान मार्ग को चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये, ऐसे प्रतिकर के संदाय पर जो विहित रीति से उप-खण्ड अधिकारी द्वारा अवधारित किया जाये, अनुज्ञात कर सकेगा।

(2) जहाँ उप-धारा (1) के अधीन नया मार्ग बनाने या किसी विद्यमान मार्ग को विस्तारित करने या चौड़ा करने का अधिकार मंजूर किया जाये वहाँ ऐसे मार्ग | को समाविष्ट करने वाली उस भूमि के संबंध में अभिधृति निर्वापित की हुई समझी जायेगी और वह भूमि राजस्व अभिलेखों में “रास्ता’ के रूप में अभिलिखित की जायेगी।

(3) वे व्यक्ति, जिनको उप-धारा (1) में निर्दिष्ट सुविधाओं में से किसी भी सुविधा के उपभोग के लिए अनुज्ञात किया गया है, उक्त सुविधा के आधार पर उस जोत में, जिसमें से होकर ऐसी सुविधा मंजूर की जाये, कोई भी अन्य अधिकार अर्जित नहीं करेंगे।’

उक्त दोनों धाराओं के उपबंधों से आप समझ गए होंगे कि आप का मामला धारा 251 (1) का न हो कर धारा 251-क का है।

आप का सवाल यह था कि जिस पड़ौसी की भूमि में से रास्ता मांगा गया है और प्रकरण में पक्षकार बनाया गया है क्या उस के अलावा किसी अन्य जिसे प्रकरण में पक्षकार न बनाया गया हो उस की भूमि में से भी रास्ता दिया जा सकता है क्या? तो हमारा कहना है कि जिस से रास्ता मांगा ही नहीं गया उस से रास्ता नहीं दिलाया जा सकता है। जिस से रास्ता दिलाया जाए उस का प्रकरण में पक्षकार होना आवश्यक है। जिस की जमीन में से रास्ता दिया जाएगा उस का पक्ष सुना जाना आवश्यक है अन्यथा रास्ता दिए जाने का आदेश ही गैर कानूनी होगा। यदि ऐसी कार्यवाही लंबित है तो आप जिस के खेत में से आप रास्ता चाहते हैं वह यदि पक्षकार नहीं है तो उसे प्रकरण में पक्षकार बनाए जाने के लिए आप आवेदन कर सकते हैं।

समस्या-

मेरे दादाजी तीन भाई है और उन सभी ने क़ानूनी रूप से कोई बँटवारा किए बगैर आपसी सहमती से अपनी सुविधानुसार संपत्ति का बँटवारा कर लिया था और अभी तक खसरा नंबर मे भी दादाजी समेत उनके दोनो भाइयो का भी नाम है, दादाजी की दो संतान है एक पिताजी और दूसरी बुआजी, पिताजी ने दो शादियाँ की थी, पहली पत्नी से तीन लड़कियाँ और एक लड़का है सभी लड़कियो की शादियाँ हो चुकी है और मेरा सौतेला भाई और सौतेली माँ दादी और दादाजी के साथ प्रधानमंत्री आवास योजना के तहत बने चार कमरो के मकान मे रहते है, पिताजी ने पाँच कमरो का मकान  बनवाया था जिसमे से दो कमरे पिताजी ने किराए से दुकान चलाने हेतु गाँव के ही एक व्यक्ति को सन २००५ मे दे दिए थे जिसका किराया दादाजी ही लेते रहे है और आज तक ऐसा ही चल रहा है और बाकी बचे तीन कमरो मे माँ, मैं और मेरा भाई रहते है| पिताजी के देहांत (२०११) के बाद जब हमने किराए से दी हुई दुकान को खाली कराना चाहा तो दादाजी ने आपत्ति करते हुए कहा की ये मेरा मकान है और जब हम चाहेंगे तभी खाली होगा, इसी तरह से जब हमने मकान का विस्तार करना चाहा तब भी उन्होने आपत्ति करते हुए कहा की तुम लोगो का कोई हिस्सा नही है, और अपने जीते जी मै बँटवारा भी नही करूँगा, क़ानूनी रूप से बँटवारा करने के लिए जब हम सरपंच के पास खानदानी सजरा बनवाने के लिए गये तो वहाँ से भी नकारात्मक जवाब मिला, दरअसल दादाजी हम लोगो को ज़मीन – जायदाद मे से कोई हिस्सा ही नही देना चाहते और लोगो के बहकावे मे आकर दादाजी संपत्ति को बिक्री करने की तथा मेरे सौतेले भाई के नाम करने की योजना बना रहे है अगर ऐसा हुआ तो हम लोग सड़्क पर आ जाएँगे, कृपया सलाह दें कि –
 (१) संपत्ति का बँटवारा कैसे होगा|
 (२) क्या हमारे दादाजी की संपत्ति मे उनके दोनो भाइयो का भी हिस्सा है|
 (३) हम किरायेदार से किराए की दुकान को कैसे खाली करवा सकते है |

– प्रदीप कुमार ज़ायसवाल, गाँव – सिहावल, पोस्ट- सिहावल, तहसील – सिहावल, थाना – अमिलिया, जिला- सीधी (मध्य प्रदेश)

समाधान-

प के दादाजी और उन के भाइयों के बीच बँटवारा कानूनी तौर पर नहीं हुआ था। बल्कि उन्होंने परिवार के अंदर एक अन्दरूनी व्यवस्था बना रखी थी। उस के अंतर्गत कुछ लगो कहीं काम करते थे और कहीं रहते थे। बँटवारा आज तक नहीं हुआ आप को बँटवारा कराने के लिए बँटवारे का दीवानी/ राजस्व वाद संस्थित करना होगा।  चूंकि दादाजी व उन के भाइयों के बीच बंटवारा नहीं हुआ था इस कारण संपूर्ण संपत्ति जो तीनों भाइयों की संयुक्त रूप से थी उस का बंटवारा इस बंटवारे में होगा। इस में आप के दादा जी के अतिरिक्त शेष दो दादाजी को जो संपत्ति अलग कर के दी गयी थी उस का भी बंटवारा होगा। यह वाद संस्थित करने के साथ ही संपत्ति का कोई भी हिस्सेदार किसी संपत्ति को बेच कर खुर्दबुर्द न करे इस के लिए अदालत से स्टे प्राप्त किया जा सकता है।

आप के  दादाजी की अलग से कोई संपत्ति नहीं है बल्कि तीनों दादाओँ की संयुक्त संपत्ति है इस कारण तीनों  भाइयों की संपत्ति में तीनों का हिस्सा है।

यदि किराएदार को आप के पिताजी ने दुकान किराए पर दी है तो उस के संबंध में आप के पिता ही लैंडलॉर्ड माने जाएँगे और वे दुकान खाली कराने के लिए दीवानी न्यायालय में दावा संस्थित कर सकते हैं।

आप को किसी स्थानीय वकील को सभी दस्तावेज दिखा कर परामर्श प्राप्त कर के तुरन्त कार्यवाहियाँ करनी चाहिए।

 

 

समस्या-

मेरे दादाजी की 6 हेक्टेयर जमीन है,और हम उनके जीते जी ही जमीन का नामांतरण कराना चाहते है,पिताजी के नाम पर,या डायरेक्ट मेरे नाम पर। मेरी 2 बुआजी है, तो क्या कर सकते हैं हम? ,और नामांतरण शुल्क तथा वसीयत के बारे में बताएँ।

-अनिल गुर्जर, ग्राम पोखरनी, तहसील टिमरनी, जिला हरदा, मध्यप्रदेश

समाधान-

प का प्रश्न बिना पूर्ण विवरण के है। आपने यह नहीं बताया कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है या फिर पुश्तैनी है। यदि पुश्तैनी है तो उस में आप के दादाजी का नाम होते हुए भी आप के पिताजी और दोनों बुआएँ भी जन्म से भागीदार हो सकती हैंं। वैसी स्थिति में दादाजी केवल अपने हिस्से की जमीन को ही हस्तान्तरित कर सकते हैं आपके पिता और बुआओँ के हिस्से की जमीन को हस्तान्तरित नहीं कर सकते।

हम यदि यह मान लें कि उक्त भूमि आप के दादाजी की स्वअर्जित है तो उन के जीवनकाल में उक्त भूमि आप के पिता या आप के नाम केवल हस्तान्तरण से ही संभव है। वह विक्रय पत्र या दानपत्र के पंजीकरण से ही संभव है। इस में भूमि के बाजार मूल्य का 7-10 प्रतिशत खर्चा आ सकता है। इस संबंध में आप को अपने उप पंजीयक के कार्यालाय से जानकारी प्राप्त करनी चाहिए। एक बार दान पत्र या विक्रय पत्र का पंजीयन हो जाने पर आप उस के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं।

अत्यधिक कम खर्च मे ंउक्त भूमि को आप के या आप के पिताजी के नाम हस्तांतरित कराने का तरीका यह है कि आप के दादाजी जिस के नाम भी उक्त भूमि को हस्तांतरित कराना चाहते हैं उस के नाम वसीयत कर दें और उस वसीयत को उपपंजीयक के यहाँ पंजीकृत करा लिया जाए। आप के दादाजी के जीवनकाल के बाद आप उस वसीयत के आधार पर नामांतरण करवा सकते हैं। लेकिन दादाजी आपनी वसीयत को अपने जीवनकाल में कभी भी निरस्त कर सकते हैं या बदल सकते हैं।


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