संविदा Archive

समस्या-

अन्तर सोहिल ने सांपला मंडी, जिला रोहतक, हरियाणा से पूछा है-

मुरारीलाल और लाजसिंह दोनों चचेरे भाई प्लाट नम्बर 13, सांपला मण्डी हरियाणा में रहते थे। दोनों का कारोबार और परिवार एक साथ रहता था। गोहाना मंडी हरियाणा में दोनों, एक दुकान खसरा नमबर 30 और एक प्लाट खसरा नम्बर 31 में बराबर के साझीदार थे। मुरारीलाल की एक जमीन सांपला मंडी हरियाणा में दुकान नम्बर 13 की अकेले की मलकियत की थी।

मुरारीलाल का एक पुत्र शिवकरन और दो पुत्रियां हैं। मुरारीलाल की मृत्यु के कुछ वर्षों बाद सन 1973 में शिवकरन पुत्र (1973 में उम्र लगभग 30 वर्ष) और लाजसिंह के बीच एक अदला-बदली का समझौता सवा दो रुपये के स्टाम्प पेपर पर हुआ जिसमें लिखा गया कि लाजसिंह गोहाना की दोनों मलकियत से अपने साझेदारी का हक समाप्त करता है और शिवकरन गोहाना के दोनों जमीनों नम्बर 30 और 31 का अकेला मालिक होगा और सांपला की जमीन नम्बर 13 में कुछ हिस्सा लाजसिंह को कब्जा और मालिकाना हक देता है। दोनों भागीदार जब चाहे रजिस्ट्री करा सकते हैं। इस पत्र पर दोनों जगहों के नक्शे हैं, लाजसिंह और शिवकरन के साथ दो गवाहों के हस्ताक्षर हैं और यह पत्र उर्दू भाषा में लिखा हुआ है।

इसके बाद दोनों ने अलग-अलग कारोबार कर लिया और सांपला में नम्बर 13 पर अपने अपने हिस्से में रहते रहे। लाजसिंह का परिवार केवल उस हिस्से में रहता है, जिसपर समझौता पत्र में शिवकरन द्वारा लाजसिंह को हक और कब्जा दिया गया। 1996 में लाजसिंह की मृत्यु के पश्चात शिवकरन ने सांपला के अपने हिस्से में से आधी जमीन बेच दी और गोहाना की सारी जमीन पहले ही 1980 के आसपास बेच चुका था।

अब शिवकरन लाजसिंह के पुत्रों को जो लाजसिंह की अदला-बदली में मिली जमीन पर काबिज हैं उनकी रजिस्ट्री नहीं करवा रहा है। वो कहता है कि सारी जमीन मेरी है और तहसील में जमाबन्दी में और इंतकाल में मेरा और मेरी बहनो का नाम है। (जोकि उसने अक्तूबर 2018 में अपने नाम लिखाया है इससे पहले उसके पिता मुरारीलाल का नाम था) अब वो कहता है कि मैं ये सारी जमीन बेच दूंगा और लाजसिंह के पुत्रों को खाली करने के लिये कहता है। जबकि लाजसिंह के पुत्र और परिवार उस हिस्से में जन्मसमय से ही रहते आये हैं। 45 वर्षों से राशनकार्ड, वोटर कार्ड, बिजली का बिल और नगरपालिका में 8 वर्षों से हाऊसटैक्स (नगरपालिका बने 8 वर्ष ही हुये हैं) और पानी के बिल लाजसिंह के पुत्रों के नाम हैं।

अब लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये। उनके पास अदला-बदली के समझौते पत्र के अलावा कोई रजिस्ट्री नहीं है। उन्हें अपनी जगह बेचे जाने का डर है और मकान को तोडकर बनाना चाहते हैं। लाजसिंह के पुत्रों को क्या करना चाहिये?

समाधान-

प की इस समस्या में मूल बात यह है कि चचेरे भाइयों के बीच सहमति से पारिवारिक समझौता या बंटवारा (दोनों ही संविदा भी हैं) हो गया, जिस की लिखत भी मौजूद है। दोनों अपने अपने हिस्से पर काबिज हो गए। इस तरह काबिज हुए 45 वर्ष हो चुके हैं और किसी ने कोई आपत्ति नहीं की। लेकिन राजस्व रिकार्ड में टीनेंट के रूप में जो भी अंकन है वह अलग प्रकार का है। राजस्व रिकार्ड में जो भी अंकन है वह नामांतरण के कारण हुआ है। कानून यह है कि नामान्तरण किसी संपत्ति पर स्वामित्व का प्रमाण नहीं है। स्वामित्व का प्राथमिक प्रमाण तो कब्जा है और द्वितीयक प्रमाण संपत्ति के हस्तान्तरण के विलेख हैं।

हाँ लाजसिंह के पुत्रों के पास हस्तान्तरण के विलेख के रूप में 45 वर्ष पूर्व हुए बंटवारे / पारिवारिक समझौते की जो लिखत है उस के अनुसार दोनों पक्ष अपने अपने हिस्से पर काबिज हैं। इस तरह दोनों का अपने अपने हिस्से की जमीन पर कब्जा है जो प्रतिकूल कब्जा हो चुका है। किसी को भी उस कब्जे से दूसरे को हटाने के लिए किसी तरह का कानूनी अधिकार नहीं रहा है। यदि इसे बंटवारा न माना जा कर सम्पत्ति की अदलाबदली (एक्सचेंज) भी माना जाए तब भी अदला बदली की इस संविदा के अनुसार जब कब्जे एक दूसरे को  दे दिए गए हैं तो संविदा का भागतः पालन (पार्ट परफोरमेंस) हो चुका है और संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम की धारा 53-ए के अनुसार अब इस कब्जे को कोई भी नहीं हटा सकता है।

स तरह लाजसिंह के पुत्र जिस संपत्ति पर काबिज हैं उन का उस पर अधिकार एक स्वामी की तरह ही है। इस में उपाय यह है कि वे शिवकरण और मुरारीलाल के तमाम उत्तराधिकारियों को संपत्ति का पंजीयन कराने के लिए कानूनी नोटिस दें और नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर पंजीयन कराने के लिए वाद संस्थित करें और वाद के दौरान अपने कब्जे में किसी तरह का दखल न करने के लिए मुरारीलाल के उत्तराधिकारियों के विरुद्ध अस्थायी निषेधाज्ञा हेतु आवेदन कर अस्थाई निषेधाज्ञा पारित कराएँ। इस काम के लिए कोई वरिष्ठ दीवानी मामलों के वकील की स्थानीय रूप से मदद लें तो बेहतर होगा।

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समस्या-

रियाज़ुद्दीन ने बिलासपुर, जिला गौतम बुद्ध नगर, (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरे ससुर साहब ने 15 साल पहले एक प्लॉट खरीदा था शाइन बाग दिल्ली में उस समय किसी व्यक्ति ने मेरे ससुर साहब से कह कर कि एक ग़रीब फैमिली है अपने यहाँ रेंट पर रख लो। उन्होंने उस को रख लिया, वो भी विना रेंट के  15 साल तक उस से कोई किराया भी नहीं लिया। अब उनको उस प्लाट पर निर्माण करना है। लेकिन वह औरत उस प्लाट को खाली नहीं कर रही। बोलती है मुझ को दो फ्लोर बना कर दो या आधा मकान दो। मेरी पास इस के पेपर हैं, सब कुछ है, और एक दो बदमाशों से भी जा कर मिल ली है वो। उस औरत के आदमी की मृत्यु भी हो चुकी है। अब हम क्या कर सकते हैं। कृपया हमारी मदद करें।

समाधान-

रियाजुद्दीन जी, अपनी किसी संपत्ति पर जब भी किराएदार या लायसेंसी के रूप में किसी को व्यक्ति को कब्जा दिया जाए तो उस की लिखित संविदा की जानी चाहिए, जिस पर दोनों पक्षकारों के सिवा कम से कम दो गवाहों के हस्ताक्षर हों।  बेहतर हो यदि उस संविदा को उचित मूल्य के गैरन्यायिक स्टाम्प पर लिखा जाए और नोटेरी से तस्दीक करा ली जाए। नोटेरी के रजिस्टर में पक्षकारों के साथ-साथ गवाहों के भी हस्ताक्षर कराए जाएँ। इस दस्तावेज को सुरक्षित रखा जाए। इस से भविष्य में यह साबित करने में आसानी रहे कि भूमि या परिसर किराए पर या लायसेंस पर उपयोग के लिए दिया गया था। यदि आप के ससुर साहब के पास इस तरह का कोई दस्तावेज या मामूली लिखत भी हो तो इस स्थिति में वह काम आएगा। यदि कोई भी दस्तावेज नहीं हो तो वहाँ जिस का कब्जा है उसकी किसी तरह की अभिस्वीकृति हो जिस का कोई सीधा या परिस्थिति जन्य सबूत हो।

यदि यह सब नहीं है तो यह माना जाएगा कि आप के ससुर ने उक्त संपत्ति को खुला छोड़ दिया था और फिर वर्तमान कब्जाधारी उस पर अपना काम करने लगा और आप के ससुर ने 12 वर्ष से अधिक से उस संपत्ति पर अपना कोई दावा नहीं किया। अवधि अधिनियम (लिमिटेशन एक्ट) के अनुसार 12 वर्ष से अधिक का कोई कब्जा हो जाने पर उस से कब्जा वापस लेने के लिए दावा नहीं किया जा सकता। इसी को एडवर्स पजेशन कहा जाता है। यदि उस से जबरन कब्जा लिया जाता है तो यह गैर कानूनी होगा और वर्तमान कब्जाधारी धारा  145 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत कब्जा वापसी का प्रार्थना पत्र दे सकता है और उसे कब्जा वापस दिलाया जा सकता है।

आप के ससुर साहब के पास उस प्लाट के स्वामित्व का कोई सबूत जरूर होगा। उस के साथ यदि आप उस कब्जाधारी का कब्जा 12 वर्ष से कम का साबित कर सकें, या फिर यह साबित कर सकें कि वह जमीन / परिसर किराए पर दिया गया था और कम से कम एक बार किराया जरूर लिया गया था। तो आप को दीवानी का कोई अच्छा वकील उस प्लाट पर अपना कब्जा वापस प्राप्त करने का रास्ता सुझा सकता है। इसलिए हमारा सुझाव है कि आप ये सब सबूत या गवाही इकट्ठा करें और फिर किसी अच्छे दीवानी काम करने वाले वकील से मिलें और रास्ता निकालें। वैसे हमें लगता है कि इस जमीन का कब्जा वापस लिया जा सकता है। कानूनी रास्ते में अभी हमारे देश में बहुत समय लगता है। इस कारण लोग मजबूरी में कानूनी रास्ता अपनाने के स्थान पर बहुत कम प्रतिफल में समझौते करना पसंद करते हैं। यदि आप को लगे कि कोई सबूत नहीं हैं जिस से कानूनी तरीके से संपत्ति को वापस लिया जा सके तो बेहतर है कि आपस में ऊंच नीच कर के ही किसी तरह से संपत्ति वापस प्राप्त की जाए। पूरी नहीं तो आधी ही प्राप्त की जाए।

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व्यर्थ धमकियों से न डरें, आवश्यकता होने पर कार्यवाही करें।

July 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

अहमद ने जिला देवरिया, (उत्तर प्रदेश) समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी के पिता जी के नाम पर एक पुश्तैनी जमीन थी जिसका बंटवारा 37 साल पहले मेरे पिता और उनके छोटे भाई ने आपसी रजामंदी से कर लिया था। मेरे पिता ने अपने हिस्से के 15*40 स्क्वायर फुट के प्लाट पर 37 साल पहले ही पक्का मकान बनवा लिया, कितु उनके भाई ने अपने हिस्से के 15*40 पर कोई निर्माण नहीं करवाया। अब मेरे पिता उनके भाई एवं भाई की पत्नी तीनों की मृत्यु हो चुकी है। मेरी माँ जीवित और स्वस्थ है। अभी तक उस पुश्तैनी जमीन के खसरे मे पिता के पिताजी का ही नाम दर्ज है,लेकिन मकान के पिछले 37 सालों की टैक्स पावती,37 साल पुरानी मकान की नंबर प्लेट की पावती मे भी पिताजी का ही नाम है।पिता की मृत्यु के बाद घर का जल कर/बिजली बिल मेरे ही नाम से आ रहा। मेरे परिवार के सद्स्यो का नाम भी राशन कार्ड में है तथा सभी के जाति/ निवास पत्र भी बने है। पिताजी के मकान का नगर निगम टाउन एरिया से स्वीकृत नक्शा भी पिताजी के नाम पर है। अब विवाद का विषय यह है कि मेरे पिता के भाई का इकलौता पुत्र 37 साल पहले हुए बंटवारे को मान नही रहा, उसका कहना है कि जमीन के खसरे मे उसके पिता के पिता का नाम है तथा बंटवारे की कोई बात नही लिखी। अब वह छल कपट मारपीट पर उतारू है। मकान और उसके पीछे मौजूद उसके खुद के प्लाट का बंटवारा करने को कह रहा। मैं ने उससे कहा कि यदि 37 साल पहले बंटवारा नही हुआ होता तो तुम्हारे पिताजी क्या यह मकान बनाने देते,अपने भाई पर केस न कर दिये होते? लेकिन वह नही मान रहा और न ही मुझ पर बंटवारे विवाद पर कोर्ट केस कर रहा क्यों कि वह जानता है कि उसका मकान मे कोई हक नहीं।  वह यही कह रहा कि अपना मकान हमको बेच दो या आधा हिस्सा दो, नहीं तो झूठे केस मे फंसाकर सबको जेल करवा देंगे। महोदय इन परिस्थितियो में मुझे क्या कदम उठाना चाहिये। इस समय मैं मध्यप्रदेश में नौकरी कर रहा हूँ,  मेरा परिवार भी साथ में है और गांव के मकान में मेरा ही ताला लगा है। किस तरह से मकान का खसरा अपने नाम से बनवा सकता हूँ। जिससे  कि भविष्य मे कभी उसे बेच सकूँ। क्या चाचा का पुत्र मेरे पिता का आधा मकान हड़प लेगा? क्या मेरे पास मौजूद डाक्युमेंट से मेरे नाम से खसरा बन जाएगा??  कृपया उचित सलाह दीजिए मै क्या करूं?

समाधान-

कानून और अदालत से तो वह आप के मकान में हिस्सा लेने में असमर्थ है। इसी से वह आप को उलझाने की धमकी देता है। यह सब वह स्थानीय दोस्तों आदि के सिखाए में कहता है। उसे लगता है कि आप परदेसी हो गए हैं। मकान बेचेंगे ही, उसे सस्ते में पल्ले पड़ जाएगा। आप सख्त बने रहें, और यदि वे लोग न्यूसेंस करने की कोशिश करे तो उस की पुलिस को रिपोर्ट कराएँ। साथ के साथ गाँव में मित्र बनाए रखें जिस से आप को वहाँ के हालात की जानकारी मिलती रहे। कोरी धमकियों के आधार पर कोई भी कार्यवाही करना उचित नहीं है, धमकियों को आप प्रमाणित नहीं कर सकेंगे। बेहतर है दृढ़ता बनाए रखें। चचेरा भाई यदि कुछ न्यूसेंस करे तो उस के विरुद्ध अपराधिक कार्यवाही तो करें ही। मकान पर कब्जा करने की उस की कोशिश के विरुद्ध न्यायालय से स्थगन भी प्राप्त करें। आप का मामला परिस्थितियों के अनुसार कार्यवाही करने का है। इस कारण गाँव के जिले के किसी अच्छे वकील से सलाह ले कर जिस तरह की कार्यवाही वे उचित समझें करें। व्यर्थ मुकदमेबाजी में भी न पड़ें।

समस्या-

सुनीता ने निजामुद्दीन, दिल्ली से हरियाणा राज्य की समस्या भेजी है कि-


पावर ऑफ़ अटोर्नी क्या होता है? क्या यह रजिस्ट्री जैसा ही होता है? मैंने जिससे जमीन खऱीदी है, वो यही बोल रहा है। मैं ने प्लाट बल्लबगढ़ हरयाणा में लिया है और वो जेवर, यूपी में बोल रहा है पावर ऑफ़ अटोर्नी करने के लिए। क्या यह सही है? क्या इससे हम बाद में बिना बिल्डर के ही  रजिस्ट्री करा सकते हैं?


समाधान-

आप को और लगभग सभी लोगों को यह समझना चाहिए कि रजिस्ट्री, विक्रय पत्र यानी सेल डीड और पावर ऑव अटॉर्नी अर्थात मुख्तारनामा क्या होते हैं। हम यहाँ बताने का प्रयत्न कर रहे हैं-

रजिस्ट्री या रजिस्ट्रेशन या पंजीकरण-

जब आप कोई पत्र किसी को भेजना चाहते हैं तो साधारण डाक से लिफाफे पर टिकट लगा कर डाक के डब्बे में डाल देते हैं। यह साधारण पत्र होता है। लेकिन जब आप उस पर अधिक (25 रुपए) का डाक टिकट लगा कर तथा एक अभिस्वीकृति पत्र जिस पर आपका व पाने वाले का पता लिख कर डाक घर में देते हैं तो डाक घर आप को रसीद देता है। आप उस के लिए कहते हैं की हमने रजिस्ट्री से चिट्ठी भेजी है। इस चिट्ठी को भेजने के सबूत के तौर पर आपके पास डाकघर की रसीद होती है। डाकघर यह जिम्मेदारी लेता है कि जो अभिस्वीकृति पत्र आप ने लिफाफे के साथ लगाया है उस पर पाने वाले के हस्ताक्षर करवा कर आप के पास लौटाएगा। यदि 30 दिनों में अभिस्वीकृति पत्र आप को वापस नहीं मिलता है तो आप डाकघर को पत्र दे कर पूछ सकते हैं कि उस ने उस पत्र का क्या किया। इस पर डाकघर आप को एक प्रमाण पत्र देता है कि आप का पत्र फलाँ दिन अमुक व्यक्ति को अमुक पते पर डिलीवर कर दिया गया है। अब आप रजिस्टर्ड पत्र या रजिस्ट्री शब्द का अर्थ समझ गए होंगे कि आप का पत्र आप के द्वारा डाक में देने से ले कर पाने वाले तक पहुँचने  तक हर स्थान पर रिकार्ड़ में दर्ज किया जाता है।

इसी तरह जब  कोई भी दस्तावेज जैसे विक्रय पत्र, दान पत्र, मुख्तार नामा, गोदनामा, एग्रीमेंट, राजीनामा, बंटवारानामा आदि लिखा जाता है तो उस में किसी संपत्ति के हस्तांतरण या हस्तान्तरण किए जाने का उल्लेख होता है। अधिकारों का आदान प्रदान होता है। तब उस दस्तावेज को हम डीड या विलेख पत्र, या प्रलेख कहते हैं। हमारे यहाँ पंजीकरण अधिनियम (रजिस्ट्रेशन एक्ट) नाम का एक केन्द्रीय कानून है जिस के अंतर्गत यह तय किया हुआ है कि कौन कौन से दस्तावेज हैं जिन का रजिस्ट्रेशन कराना अनिवार्य होगा, कौन से दस्तावेज हैं जिन का ऐच्छिक रूप से आप पंजीयन करा सकते हैं। इस के लिए हर तहसील स्तर पर और नगरों में एक या एक से अधिक उप पंजीयकों के दफ्तर खोले हुए हैं जिन में इन दस्तावेजों का पंजीयन होता है। यदि पंजीयन अधिनियम में किसी दस्तावेज की रजिस्ट्री कराना अनिवार्य घोषित किया गया है तो उस दस्तावेज की रजिस्ट्री अनिवार्य है अन्यथा उस दस्तावेज को बाद में सबूत के तौर पर मान्यता नहीं दी जा सकती है। उदाहरण के तौर पर किसी भी 100 रुपए से अधिक मूल्य की स्थाई संपत्ति (प्लाट या मकान, दुकान) के किसी भी प्रकार से हस्तांतरण विक्रय, दान आदि का पंजीकृत होना अनिवार्य है अन्यथा वह संपत्ति का हस्तांतरण नहीं माना जाएगा।  अब आप समझ गए होंगे कि रजिस्ट्री का क्या मतलब होता है। रजिस्ट्री से कोई भी दस्तावेज केवल उप पंजीयक कार्यालय में दर्ज होता है उस का निष्पादन किया जाना प्रथम दृष्टया सही मान लिया जाता है।

विक्रय पत्र सेल डीड –

कोई भी स्थाई अस्थाई संपत्ति जो प्लाट, दुकान, मकान,वाहन, जानवर आदि कुछ भी हो सकता है उसे कोई व्यक्ति किसी दूसरे व्यक्ति को हस्तांतरित कर सकता है। यह हस्तांतरण दान हो सकता है अदला बदली हो सकती है, या धन के बदले हो सकता है। जब यह धन के बदले होता है तो इसे विक्रय कहते हैं। इस विक्रय का दस्तावेज लिखना होता है। इसी दस्तावेज को विक्रय पत्र कहते हैं। यदि यह संपत्ति स्थाई हो और उस का मूल्य 100 रुपए हो तो उस का विक्रय पत्र उप पंजीयक के यहाँ पंजीकरण कराना जरूरी है। यदि पंजीकरण नहीं है तो ऐसा विक्रय वैध हस्तान्तरण नहीं माना जाएगा। यह विक्रय पत्र वस्तु को विक्रय करने वाला वस्तु का वर्तमान स्वामी निष्पादित करता है और उस पर गवाहों के ह्स्ताक्षर होते हैं। यदि वस्तु का वर्तमान स्वामी किसी कारण से उप पंजीयक के कार्यालय तक पहुँचने में असमर्थ हो तो उस स्वामी का मुख्तार (अटोर्नी) यह विक्रय पत्र स्वामी की ओर से निष्पादित कर सकता है। इस के लिए उस के पास वैध अधिकार होना चाहिए।

मुख्तारनामा या पावर ऑफ अटॉर्नी-

जब कोई संपत्ति का स्वामी स्वयं पंजीयन के लिए उप पंजीयक के कार्यालय में उपस्थित होने में असमर्थ हो तो वह एक मुख्तार नामा या पावर ऑफ अटॉर्नी निष्पादित कर किसी अन्य व्यक्ति को मुख्तार या अटॉर्नी नियुक्त कर देता है जो कि उस की ओर से उप पंजीयक कार्यालय में उपस्थित हो कर दस्तावेज अर्थात विक्रय पत्र आदि का विक्रय पत्र हस्ताक्षर कर सकता है और उस का पंजीयन करा सकता है विक्रय का मूल्य प्राप्त कर सकता है। इस के लिए यह आवश्यक है कि मुख्तार नामा के द्वारा मुख्तार को ये सब अधिकार देना लिखा हो। मुख्तार नामा किसी भी काम के लिए दिया जा सकता है। लेकिन वह उन्हीं कामों के लिए दिया हुआ माना जाएगा जो मुख्तार नामा में अंकित किए गए हैं इस कारण मुख्तार द्वारा कोई दस्तावेज निष्पादित कराए जाने पर मुख्तारनामे को ठीक से पढ़ना जरूरी है जिस से यह पता लगे कि वह किन किन कामों के लिए दिया जा रहा है। मुख्तार नामा का पंजीकृत होना आवश्यक नहीं है वह किसी नोटेरी से तस्दीक कराया गया हो सकता है लेकिन यदि वह किसी स्थाई संपत्ति मकान, दुकान, प्लाट आदि के विक्रय के हो तो उस का पंजीकृत होना जरूरी है। कई बार जब किसी संपत्ति के हस्तांतरण पर किसी तरह की रोक होती है या कोई और अड़चन होती तब भी वस्तु को विक्रय करने के लिए एग्रीमेंट कर लिया  जाता है और क्रेता के किसी विश्वसनीय व्यक्ति के नाम मुख्तार नामा बना कर दे दिया जाता है ताकि मुख्तार जब वह अड़चन हट जाए तो क्रेता के नाम विक्रय पत्र पंजीकृत करवा ले। लेकिन इस तरह से क्रेता के साथ एक धोखा हो सकता है। मुख्तार नामा कभी भी निरस्त किया जा सकता है। यदि संपत्ति का मालिक ऐसी अड़चन समाप्त होने पर या उस के पहले ही मुख्तार नामा को निरस्त करवा दे तो फिर मुख्तार को विक्रय पत्र निष्पादित करने का अधिकार नहीं रह जाता है। इस तरह मुख्तार नामा के माध्यम से किसी संपत्ति का क्रय करना कभी भी आशंका या खतरा रहित नहीं होता है।

आप से अब मकान का कब्जा कोई छीन नहीं सकता।

November 1, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_property1.jpgसमस्या-

शब्बीर खान ने रीठी, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे पूर्वजों ने 25 वर्ष पहले कच्चा लेख लिखवा कर भूमि खरीदी और मकान बना कर रहने लगे। जिस से भूमि खरीदी थी वह अब अपना हक बता कर कब्जा खाली कराना चाहता है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

ह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चा लेख जो लिखा गया है उस में क्या लिखा है। यदि उस में जमीन बेचने का लिखा है और बेचने की रकम प्राप्त कर कब्जा देने की बात लिखी है तो वह एक एग्रीमेंट है। जिस के अनुसार धन दे कर तथा विक्रेता ने कब्जा दे कर आंशिक रूप से एग्रीमेंट का पालन कर दिया है। यदि ऐसा है तो आप से उक्त प्लाट का कब्जा कोई भी नहीं छीन सकता। आप चुपचाप रहें और विक्रेता को कब्जा वापस प्राप्त करने के लिए कानूनी कार्यवाही करने दें। वैसे भी आप का कब्जा 25 वर्ष का है इस तरह आप का प्रतिकूल कब्जा भी उक्त संपत्ति पर है।

यदि विक्रेता किसी प्रकार से आप को तंग करे तो आप पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि आप को ऐसी आशंका हो कि विक्रेता जबरन आप को बेदखल कर सकता है तो आप जबरन बेदखली के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित कर अस्थाई निषेधाज्ञा व स्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस संबंध में आप को किसी स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करनी चाहिए। स्थानीय वकील दीवानी मुकदमों के मामले में जानकार और अनुभवी हो तो बेहतर होगा।

 

सगाई तोड़ना अपमान हो सकता है।

October 28, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_agni_fera1.pngसमस्या-

विकास ने हरिद्वार, उतराखण्ड से उत्तराखंड राज्य की समस्या भेजी है कि-

शादी से पहले ही यदि रिश्ता वधु पक्ष द्वारा एक तरफा समाप्त कर दिया जाये। वर पक्ष रिश्ता समाप्त करने की बात से सहमत नहीं हो। 27 नवम्बर को शादी होना पूर्व में दोनों पक्षो ने मिलकर तय किया था। वर पक्ष ने अपनी ओर की लगभग सभी तैयारियाँ पूरी कर ली हैं। क्या माननीय न्यायालय उनकी शर्तों को हमें मानने के लिए बाध्य कर सकती है। क्या एक तरफा रिश्ता हटाने पर हम तैयारियों के एवज में क्षतिपूर्ति प्राप्त कर सकते है? क्या मानसिक दुःख पहुचाने का भी कोई मामला बनता है? क्या मानहानि का भी कोई विषय इस में है? इस विषय में क्या उचित कानूनी कदम सिलसिलेवार उठाना चाहिए?

समाधान-

विवाह करने का वायदा हुआ और कन्या पक्ष ने विवाह के इस वायदे को तोड़ते हुए विवाह संपन्न करने से इन्कार कर दिया। इस बीच तैयारियाँ हो गयीं और उन पर खर्च हुआ। मानसिक संताप भी पहुँचा। अब कन्या पक्ष की शर्तें यहाँ कैसे आ गयीं। यदि आई हैं तो क्या हैं? इस का अर्थ यह है कि कन्या पक्ष ने विवाह संपन्न कराने से इन्कार कर दिया है और उन की कुछ शर्तें हैं जिन्हें मान लेने पर वे विवाह संपन्न कराने को तैयार हैं। आप ने बात को कुछ भी नहीं खोला है इस कारण विशिष्ट रूप से कोई उपाय बता पाना संभव नहीं है।

दि वर पक्ष समझता है कि कन्या पक्ष द्वारा रखी गई शर्तें उचित और वैध नहीं हैं तो फिर यह मामला तैयारियों के कारण हुए आर्थिक नुकसान, अपमान और मानसिक संताप के लिए क्षतिपूर्ति का बनता है। अपमान के लिए अपराधिक मामला भी हो सकता है।

स मामले में कन्या पक्ष को नोटिस दिया जा सकता है कि वह क्षतिपूर्ति करे अन्यथा वर पक्ष उन के विरुद्ध क्षतिपूर्ति के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करेगा और अपमान के लिए अपराधिक प्रकरण भी दर्ज कराएगा। यदि दोनों पक्षों के मध्य कोई समझौता नहीं होता है तो दोनों प्रकार के प्रकरण दर्ज कराए जा सकते हैं। लेकिन दोनों मामलों में स्थानीय वकील की सेवाएँ सलाह और मुकदमों की पैरवी के लिए प्राप्त करना उचित होगा।

खरीददार सावधान!

October 4, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

Vagetable marketसमस्या-

चनेश राम साहू ने ग्राम पुरूँगा, रायगढ, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक आदमी से नमकीन बनाने की पुरानी मशीन क्रय की। अपने घर मशीन लाया उस मशीन से मैं ने एक भी दिन समान नही बनाया और मशीन बिगड़ गई। धोखा से मशीन को मेरे पास बेचा अब मैं मशीन को वापस करना चाहता हूँ। लेकिन वह मशीन वापस लेने से इंकार कर रहा है। उसे मशीन वापस करने के लिए क्या करूं?

समाधान

प ने पुरानी मशीन खरीदी है। आप को मशीन खुद पूरी तरह से जाँच परख कर लेनी चाहिए थी। किसी भी सौदे में हमेशा खरीददार को सावधान रहना चाहिए। उसे चाहिए कि वह जो भी वस्तु खरीदे वह जाँच परख कर खरीदे।

फिर भी यदि आप को लगता है कि मशीन पहले से खराब थी और बेचने वाले ने धोखे से खराब मशीन बेच दी है तो यह सीधे सीधे धोखाधड़ी है और अपराध है। आप वकील से मिल कर बेचने वाले को नोटिस दिलाइए कि उस ने आप को कबाड़ मशीन को अच्छा बता कर बेच कर आप के साथ धोखा किया है, यदि उस ने मशीन वापस ले कर आप से कींमत के रूप में प्राप्त की गयी आप उस के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट कराएंगे या अदालत में परिवाद पेश करेंगे। यदि फिर भी कोई बात न बने तो पुलिस रिपोर्ट कराएँ या परिवाद प्रस्तुत करें।

नाना नानी के उत्तराधिकार में नातियों का अधिकार …

March 20, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

ऊसरसमस्या-

रामदेव खीची ने रावतसर /जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे नानाजी के दो संतान थी एक मेरी माँ व एक मेरा मामा मेरी माँ की शादी 1948 में हो चुकी थी और हम 11 बहन भाई पैदा हुए। बाद में हमारी माताजी की 1967 में मृत्यु हो गई। हमारे पिताजी की जायदाद और हमारे दादाजी की जायदाद में हम ने अपना हक ले लिया है परन्तु हमारे नानाजी की जायदाद में हक लेना चाहते हैं जो कि 1992 में देहांत हुआ है नानाजी के मरने के बाद उनकी जायदाद हमारे मामा ने अपने व नानी के नाम 1993 में करवा ली परंतु जब 1994 में नानी की मृत्यु हो गई तो उनके नाम की जायदाद भी एक जमीन के खाते की पूरी और दूसरे खाते की जमीन आधी अपने नाम विरासतन इंतकाल करवा लिया है तो क्या हम अपने पिताजी, दादाजी, व अब नानाजी की जायदाद में हिस्सा ले सकते हैं जब कि हमारी माताजी की मृत्यु नानाजी से 25 साल पहले हो गयी थी,,,,

समाधान-

ब से पहले आप को यह देखना होगा कि जिस संपत्ति में आप अपना हिस्सा चाहते हैं वह नानाजी की स्वयं की थी या हिन्दू सहदायिकी की (पुश्तैनी) संपत्ति थी। दोनों ही स्थिति में परिणाम भिन्न होंगे। नानाजी का देहान्त 1992 में हुआ है, यदि वह संपत्ति उन की स्वयं की थी तो उस में आप की नानी, माता जी और मामाजी का समान हिस्सा था। इस तरह उस समय जो इन्तकाल खुला वह गलत घुल गया है। इस के उपरान्त आप की माताजी का देहान्त हो गया। बाद में नानीजी का देहान्त हुआ। लेकिन नानीजी की मृत्यु पर मृत पुत्री के पुत्र पुत्रियों को भी उन की माता का हिस्सा लेने का अधिकार है। इस कारण से आप के नानीजी की संपत्ति में आप का भी अधिकार है।

प को चाहिए कि आप नानाजी की संपत्ति जो भी वे 1992 में मृत्यु के समय छोड़ गये थे उस के बंटवारे का वाद प्रस्तुत करना चाहिए जिस से आप को अपना अधिकार मिल सके। इस के साथ ही राजस्व विभाग में भी कृषि भूमि के जो नामान्तरण हुए हैं उन के विरुद्ध भी आप को अपील प्रस्तुत करना चाहिए।

विक्रेता वही वस्तु विक्रय कर सकता है जो उस के पास है।

February 12, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

agreementसमस्या-

गजेन्द्र कुमार मीना ने ऑफिस नं. 9, प्रथम तल डीडीए मार्केट, जीएच-4 पश्चिम विवाह दिल्ली से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मैं ने अभी एक अलवर राजस्थान में एक जमीन खरीदी है 110 वर्ग गज, परन्तु रजिस्ट्री नही हुई है, नोटरी का एग्रीमेंट हुआ है। रजिस्ट्री में लिखा गया है कि ये जमीन मंदिर माफ़ी की आराजी महाराज की है, जिस पर विक्रेता का कब्जा है। क्या आप मुझे बतायेंगे कि मंदिर माफ़ी (नाम) की जमीन की रजिस्ट्री नहीं होती है तो मेरा एग्रीमेंट कानून जायज है या नहीं?

समाधान-

प इतना तो समझते ही होंगे कि जो चीज आप की नहीं है उसे आप बेच नहीं सकते। यदि आप किसी ऐसी वस्तु को मुझे बेचने का करार करते हैं जो आप की नहीं है तो वह करार सही नहीं होगा। लेकिन वह वस्तु आप के कब्जे में है और जब तक वह आप के कब्जे में है आप उस के माध्यम से हर वर्ष कुछ कमाई कर लेते हैं या उस वस्तु का उपयोग कर सकते हैं तो वैसी स्थिति में उस वस्तु का कब्जा भी मूल्यवान हो उठता है। यदि आप यह कहते हुए कि इस वस्तु पर मेरा स्वामित्व तो नहीं है लेकिन इस का कब्जा मेरे पास है और यह वस्तु मैं आप को दे रहा हूँ तो वह वस्तु मेरे स्वामित्व की तो नहीं होगी। लेकिन जब तक वह मेरे कब्जे में रहेगी मैं उस का उपयोग कर सकता हूँ या उस से लाभ कमा सकता हूँ।

ऐसी ही स्थिति आप के इस एग्रीमेंट की है। विक्रेता आप को स्पष्ट रूप से कह रहा है कि उस जमीन पर उस का स्वामित्व नहीं है, केवल कब्जा है जिसे वह आप को बेच रहा है। अब आप के पास जब तक वह जमीन कब्जे में है आप उस का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप उस जमीन का स्वामित्व नहीं अपितु उस का केवल कब्जा खरीद रहे हैं।

जहाँ तक रजिस्ट्री का प्रश्न है तो आप के इस एग्रीमेंट की रजिस्ट्री हो भी सकती है। क्यों कि इस एग्रीमेंट में कुछ बी नाजायज या गैर कानूनी नहीं है। उस व्यक्ति के पास केवल कब्जा था और वह आप को वही विक्रय कर सकता है। लेकिन एग्रीमेंट या विक्रय पत्र के पंजीयन से भी आप को केवल कब्जा ही मिलेगा न कि उस जमीन का स्वामित्व। उस जमीन का स्वामित्व तो तभी मिल सकता है जब कि उस जमीन का स्वामी उस वस्तु को आप को विक्रय कर दे। जब तक उस जमीन को आप से वापस लेने के लिए उस का स्वामी कोई कानूनी कार्यवाही कर के आप से उस का कब्जा नहीं ले लेता है तब तक आप उस जमीन का उपयोग कर सकते हैं।

एग्रीमेण्ट या कांट्रेक्ट लिखित ही होने चाहिए …

December 19, 2014 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

No employmentसमस्या-

सुरेन्द्र कुमार ने हनुमानगढ़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क प्राइवेट ब्राइट स्टेप ट्रेनिंग सेन्टर (एजेंसी) ने एनएसडीसी भारत सरकार के दी नेशनल स्किल सर्टिफिकेशन एण्ड मोनेटरी रिवार्ड स्कीम के अन्तर्गत छात्रों को स्किल ट्रेनिंग देने के लिए मुझे लड़के लड़कियों के फार्म (प्रार्थना पत्र) लेने को कहा और प्रति छात्र 500 रुपए देने को कहा। छात्रों की स्कोलरशिप सीधे जीरो बैलेंस पर खुले बैंक खातों में आ गई। एजेंसी को प्रति छात्र 10000 रुपए मिले उन्हें स्किल करने के लिए। एजेंसी ने मुझे मेरे मेहनताने के 21000 रुपए मिलने थे जो देने से एजेंसी ने इन्कार कर दिया। कोई लिखित एग्रीमेंट नहीं हुआ था। मैं बेरोजगार हूँ, मैं क्या करूँ?

समाधान-

जेंसी ने आप के साथ एक एग्रीमेंट किया था कि आप उन के लिए छात्र जुटाएंगे, वे प्रति छात्र आप को 500 रुपया देंगे। आप ने अपनी सेवाएँ दे दीं लेकिन उन्होने आप को आप की सेवाओँ की कीमत अदा नहीं की। इस तरह उन्हों ने इस एग्रीमेंट का उल्लंघन किया। कानूनी रूप से आप उन के विरुद्ध रुपए 21000 की वसूली का दीवानी वाद न्यायालय में प्रस्तुत कर सकते हैं। लेकिन जो भी दीवानी मुकदमा दाखिल करता है यह उस की जिम्मेदारी है कि वह एग्रीमेंट को साबित करे।

चूँकि आप के पास लिखित एग्रीमेंट नहीं है, वह मौखिक था। उस का कोई गवाह भी नहीं है। वैसी स्थिति में आप किसी तरह यह साबित नहीं कर पाएंगे कि आप के व एजेंसी के मध्य कोई एग्रीमेंट हुआ था। आप का वाद सबूतों के अभाव में खारिज हो जाएगा। इसी कारण कोई भी एग्रीमेंट मौखिक नहीं होना चाहिए। हर एग्रीमेंट लिखित होना चाहिए और उस के ऐसे गवाह भी होने चाहिए जो ये कह सकें कि उन के सामने ऐसा एग्रीमेंट हुआ था। इस के साथ इस बात का भी कोई हिसाब होना चाहिए कि वे फार्म आपने ही भरवाए थे। क्यों कि एग्रीमेंट के साथ साथ आप को यह भी साबित करना होगा कि एग्रीमेंट के अनुसार आप ने कितना काम किया था और कितना पैसा आप का बनता है।

क तरह से यह छल है। लेकिन छल यदि संपत्ति के संबंध में किया जाए तो ही अपराध कहलाता है। यदि कोई छल कर के किसी के काम करा ले और पैसा न दे तो यह हरकत भारतीय कानून के अन्तर्गत अपराध नहीं है। वैसी अवस्था में इस तरह का छल एक आम बात है। हमारे पास इस तरह की समस्याएँ ले कर लोग प्रतिदिन आते हैं लेकिन चूंकि यह न तो दंडनीय अपराध है और न ही कांट्रेक्ट व काम करने का कोई सबूत इस कारण हम किसी की कोई मदद नहीं कर पाते। इस लिए जब भी किसी तरह का एग्रीमेंट या कांट्रेक्ट हो वह लिखित होना चाहिए और उस के गवाह भी होने चाहिए वर्ना लोग ऐसे ही छले जाते रहेंगे।

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