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मृत पुत्री की पुत्री को भी उत्तराधिकार का अधिकार है।

समस्या-

             श्रीमानजी,  हम दो भाई  ईशर राम और केशर राम और तीन बहिने नाथी, उमा और इंद्रा थे। मेरी बड़ी

 बहिन नाथी की १९७१ में मृत्यु हो गयी। वह एक लड़की पीछे छोड़ गई। उस टाइम मेरी छोटी बहिन इंद्रा कुंवारी थी और हमने सामाजिक रीती रिवाज़ के हिसाब से नाथी की जगह इंद्रा की शादी कर दी। मेरी माताजी की मृत्यु १९९१ में हो गयी और पिताजी की २०१० में मृत्यु हो गयी। उस के बाद पटवारी ने ईशर राम, केशर राम, नाथी, उमा व इंद्रा के नाम से नामकरण दर्ज कर दिया। जबकि नाथी की मृत्यु १९७१ में ही हो चुकी थी। अब नाथी की लड़की ने नाथी का death certificate व वारिस नामा पेश कर १/५ हिस्से में अपना नामकरण दर्ज करवा लिया है

१.जब नाथी की मृत्यु १९७१ में हो चुकी थी फिर भी पटवारी ने २०१० में उस के नाम नामकरण दर्ज किया है क्या यह कानूनी रूप से उचित है?

२. जब हमने नाथी की जगह इंद्रा  की शादी कर दी तो नाथी की लड़की इंद्रा की गोद की लड़की हो गई। वो इंद्रा के हिस्से में से अपना हिस्सा मांग सकती है और इंद्रा के बच्चे और नाथी की लड़की का पिता तो एक ही हुआ, वहाँ उस के गाँव में उसके पिताजी की मृत्यु के बाद में इंद्रा के बच्चो के बराबर ही हिस्सा मिलेगा, जब उसके गाँव में उसके पिताजी की सम्पति में से उसको इंद्रा के बच्चों के बराबर हिस्सा मिलेगा तो हमारे यहां उसको अलग से हिस्सा कैसे मिलेगा?  क्या मुझे उसके नामान्तरण की कोर्ट में अपील करना चाहिए या और कोई कानूनी कार्यवाही करनी चाहिए?

-केशर राम, निवासी गाँव – पोस्ट–मुर्डकिया, तहसील-सुजानगढ़, जिला चूरू,  राजस्थान

समाधान-

          सब से पहले तो आप यह समझिए कि आप ने अपनी छोटी बहिन इन्द्रा का विवाह किसी दूसरे स्थान पर किया है और फिर समस्या के बारे में सोचिए।

          अब जो नामान्तरण हुआ है उस में यह गलती हुई है कि मृत नाथी के नाम भी हिस्सा चढ़ गया है। यह इस कारण हो सकता है कि नामान्तरण करने वाले अधिकारी के ज्ञान में यह तो आया कि आपके माता पिता के कितनी संतानें हैं और कौन कौन हैं, लेकिन यह ज्ञान में न आया कि उन में से नाथी की मृत्यु हो चुकी है।

          यदि नामान्तरण अधिकारी के ज्ञान में यह होता कि नाथी की मृत्यु हो चुकी है तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार पूर्व में मृत पुत्री की पुत्री को उस का हिस्सा प्राप्त होता। उस स्थिति में भी नाथी का हिस्सा नाथी की पुत्री को प्राप्त होता। इस कारण इस नामान्तरण से पुराने नामान्तरण की गलती दुरुस्त कर दी गयी है।

          नाथी के स्थान पर आप ने इन्द्रा का विवाह कर दिया इस से नाथी की पुत्री इन्द्रा की गोद पुत्री नहीं हुई बल्कि सौतेली पुत्री हुई। उसे इन्द्रा के हिस्से में से हिस्सा प्राप्त करने का कोई अधिकार कभी उत्पन्न नहीं होगा।

          नाथी की पुत्री को अपने पिता की किसी संपत्ति में से कुछ उत्तराधिकार में प्राप्त होता है तो वह प्राप्त होगा इस से उस के माँ या नाना नानी की संपत्ति में से उत्तराधिकार पर कोई असर नहीं पड़ेगा।

          इस तरह जो भी वर्तमान स्थिति है वह कानून के अनुसार बिलकुल सही है। आप यदि किसी की खराब सलाह के कारण कोई कानूनी कार्यवाही करते हैं तो उस से आप को कुछ न मिलेगा। आप का समय और धन भी व्यर्थ ही खर्च होगा।

नामान्तरण निरस्ती को दीवानी न्यायालय में चुनौती दें।

समस्या-

डॉ. मोहन कुमार वर्मा ने उज्जैन, मध्यप्रेदश से  समस्या भेजी है कि-

मैंने नगरपालिका सीएमओ को नामांतरण हेतु आवेदन किया, जिसमें मैंने पिता की पंजीकृत वसियत एवं अनुप्रमाणित गवाह की फोटोकॉपी प्रस्तुत की। इस पर मेरे भाई बहनों ने आपत्ति दर्ज कराई।  उन्होंने बटवारा विलेख नोटरी का प्रस्तुत किया जिस पर सलाहकार ने टीप दिया कि आवेदक ने पंजिकृत वसीयत दिया जिस पर न्यायालय का स्टे नहीं है अतः नामांतरण में आपत्ति नहीं है। न.पा.शुजालपुर पी.आइ.सी. की बैठक में नामांतरण स्वीकार हो मेरा नामांतरण होगया। तत्पश्चात मैंने वर्ष 2011-12 से 2016-17 तक संपत्ति कर प्रति वर्ष जमा किया। वर्ष 17-18 का सं.कर जमा करने गया तो मालुम हुआ कि मेरा नामांतरण निरस्त कर मेरे पिताजी का नाम अंकित कर दिया गया। शायद आपत्तिकर्ताओं ने अधिकारियों से साठगांठ करके मेरे नामांतरण अवैध रूप से निरस्त करा दिया अब मुझे क्या कार्यवाही करना चाहिए?

समाधान-

क बार आप के पक्ष में हो चुका नामान्तरण बिना आप को सुनवाई का अवसर दिए निरस्त नहीं हो सकता था। नगरपालिका ने गलती की है। आप नगर पालिका को इस मामले में नगरपालिका अधिनियम के अंतर्गत नोटिस दें कि उन्हों ने नामान्तरण को निरस्त कर के गलती की है। यदि वे नामान्तरण निरस्तीकरण का आदेश वापस न ले कर नामान्तरण आप के नाम नहीं करते हैं तो आप दीवानी अदालत में नगर पालिका के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित करेंगे।

नोटिस देने के उपरान्त दो माह की अवधि व्यतीत हो जाने पर आप नगर पालिका के विरुद्ध उक्त नामान्तरण निरस्तीकरण को हटाने का व्यादेश पारित करने तथा इस आशय की घोषण करने का वाद संस्थित करें कि पंजीकृत वसीयत से पिता की मृत्यु के बाद आप स्वामी हो गए हैं। इस मामले में वाद संस्थित करने के लिए किसी अच्छे वकील की सेवाएँ प्राप्त करें।

नामान्तरण सही समय पर कराएँ जिस से गलफहमियाँ न पनपें।

समस्या-

राकेश कुमार ने ग्राम पोस्ट माकतपुर जिला कोडरमा, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मेरी फुआ (गुंजारी देवी) शादी के तुरंत बाद बिना कोई औलाद के बल बिधवा हो गई। मेरी फुआ अपने पति की मृत्यु के बाद अपने मायके में अपने भाई भतीजों के साथ रहने लगी। प्रश्नगत भूमि को राज्य सरकार द्वारा गुंजारी देवी के नाम से बंदोबस्ती वाद संख्या 14/75-76 के माध्यम से 1.40 डी (गैर मजरुआ खास) जमीन बंदोबस्त किया गया एवं सरकारी लगान रसीद गुंजारी के से कट रहा है गुंजारी देवी को प्राप्त भूमि जिला निबंध, कोडरमा के कार्यालय से दान पत्र संख्या 7252 दिनांक 09/06/1986 के माध्यम से अपने भाई एवं भतीजों के नाम से कर दिया।  जो आज तक गुंजारी देवी के नाम से रसीद कटवाते आ रहे हैं उक्त जमीन पर माकन दुकान एवं कुआं बनाकर रहते चले आ रहे हैं | गुंजारी देवी की मृत्यु सन 1993 में हो गई। गांव के कुछ लोगों का कहना है की गुन्जरी देवी को वारिस नहीं होने के कारण उनकी मृत्यु के बाद यह जमीन सरकार के खाते में वापस चली गई इसलिए इस जमीन को हम लोग सामाजिक कार्य के लिए उपयोग करेंगे। क्या गावं वालों का आरोप सही है? क्या ऐसा संभव है? उक्त जमीन पर अपनी दावेदारी मजबूत कैसे करें?

समाधान-

गाँव वालों का आरोप सही नहीं है पर इस आरोप के पीछे गलती गाँव वालों की नहीं गुञ्जारी देवी के भाई भतीजों की है। जंगल में मोर नाचता है तो कोई नहीं देखता। जब शहर गाँव में नाचता है तो लोग देखते हैं और कहते हैं आज मोर नाचा है। गुञ्जारी देवी ने दान पत्र अपने भाई भतीजों के नाम निष्पादित कर रजिस्टर कराया तो उस का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में होना चाहिए था। इस नामान्तरण के न होने से राजस्व रिकार्ड में आज भी भूमि गुञ्जारी देवी के नाम है। यदि उस रिकार्ड को देख कर गाँव के लोग आरोप लगाते हैं और जमीन को सार्वजनिक काम में लेने के लिए कहते हैं तो वे गलत कैसे  हो सकते हैं। सही समय पर नामान्तरण न होने से अनेक गलतफहमियाँ उत्पन्न होती हैं।

अब इस समस्या का निदान यह है कि उक्त पंजीकृत दान पत्र के आधार पर नामान्तरण के लिए आवेदन करें और नामान्तरण कराएँ जब राजस्व रिकार्ड में यह जमीन गुञ्जारी देवी के खाते में आ जाएगी तो गाँव वाले अपने आप यह आरोप लगाना बंद कर देंगे। वैसे भी जब गाँव को सार्वजनिक कार्यों के लिए भूमि की जरूरत हो और भूमि उपलब्ध न हो तो सार्वजनिक कार्यों के लिए उपलब्ध होने वाली भूमि पर उन की निगाह रहेगी। इस कारण तुरन्त नामान्तरण कराया जाना जरूरी है।

पिता की संपत्ति में पुत्री का हिस्सा है वह बँटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

समस्या-

वत्सला कुमारी ने पटना, बिहार से  समस्या भेजी है कि-

म लोग तीन बहन और एक भाई है। तीनों बहन औार भाई की शादी हो चुकी है। भाई का एक बेटा है। एक बहन की एक बेटी है। एक बहन की कोई संतान नहीं है। हमारे दो संतान है, एक बेटा और बेटी है। हमारे दादा जी के दो मकान हैं। एक मकान जिला-पटना, राज्य-बिहार में है जो पटना पीपुल्स कॉपरेटिव से सन् 1968 में खरीदी गई थी, और दूसरा मकान जिला-मुंगेर, राज्य-बिहार में है जो सन् 1969 में मेरे दादा जी ने अपने भाई से खरीदा था जो खास महल की जमीन पर बनाया हुआ है। मेरे दादा जी को एक ही संतान मेरे पिताजी थे। मेरे दादा जी का देहांत सन 1983 में, पिताजी का देहांत सन 1999 में तथा मेरे माता जी की देहांत सन 2017 में हुई। मेरे भाई ने पिताजी की देहांत के बाद पटना के मकान जो पिपुल्स कॉपरेटीव में हैं बिना किसी सूचना के अपना नाम सन् 2000 में अपना नाम से करबा लिया। उक्त मकान का विभाजन किस प्रकार किया जा सकता है। मेरा भाई दोनों मकान पर अपना दावा करता है। क्या उक्त मकान पर हमारा अधिकार है?

समाधान-

दोनों मकान आप के दादा जी ने 1956 के बाद खरीदे थे। आप के दादाजी और पिता जी की संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 के अनुसार तय होगा। आप के दादाजी के देहान्त के बाद यदि दादी जीवित रही होंगी तो इन दोनों मकानों के दो हिस्सेदार आप के पिता और आप की दादी हुईं। दादी के देहान्त के बाद केवल आप के पिता उस के स्वामी हुए। अब पिता के तीन बेटियाँ और एक पुत्र है। माताजी का देहान्त भी हो चुका है। ऐसी स्थिति में तीनों पुत्रियाँ और एक पुत्र कुल संपत्ति के ¼ एक चौथाई हिस्से के स्वामी हैं। बंटवारा होने पर चारों को बराबर के हिस्से प्राप्त होंगे।

आप ने लिखा है कि भाई ने मकान अपने नाम करा लिया है। तो अधिक से अधिक यह हुआ होगा कि भाई ने नगर पालिका या नगर निगम में नामान्तरण करवा लिया होगा। लेकिन नामान्तरण से किसी अचल संपत्ति का स्वामित्व निर्धारित नहीं होता है। आप के पिता के देहान्त के साथ ही संपत्ति चारों संतानों की संयुक्त हो चुकी थी। चारों का यह स्वामित्व केवल किसी स्थानान्तरण विलेख ( विक्रय पत्र, दानपत्र, हकत्याग पत्र) आदि के पंजीयन से ही समाप्त हो सकता है अन्यथा नहीं। इस तरह सभी संतानें एक चौथाई हिस्से की अधिकारी हैं।

हमारी राय है कि आप को आप के पिता की समस्त चल अचल संपत्ति के विभाजन के लिए वाद संस्थित कर देना चाहिए। यह वाद पटना या मुंगेर दोनों स्थानों में से किसी एक में किया जा सकता है। आप पटना रहती है  तो वहाँ यह  वाद संस्थित करना ठीक रहेगा। इस काम में जितनी देरी करेंगी उतनी ही देरी से परिणाम प्राप्त होगा। इस कारण बिना देरी के यह काम करें।

नामान्तरण स्वत्व का निर्धारण नहीं है, मांग पर हिस्सा देना होगा।

समस्या-

अशोक अग्रवाल ने हरदा, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

म तीन भाई और एक बहन है, बहन का विवाह हो चूका हे एक भाई की कोई सन्तान नहीं है इसलिए सभी ने पिता की म्रत्यु 1990 में हो जाने के बाद आपसी सहमति से मौखिक रूप से आपसी बटवारा कर मकान दो भाइयो के नाम पंचायत अभिलेख में नामांतरण दर्ज करवा लिया। मकान जीर्ण होने से हम दो भाइयों द्वारा मकान का मरम्मत कार्य करवा लिया एवम् उसे ठीक करवा लिया। आज 20 साल बाद हमारी बहन से आपसी झगड़ा होने से उस नामान्तरण को गलत ठहरा कर हिस्सा मांग रही है, जबकि मकान 20×70 में दो भागो में बना हे जिसमे 10×70 में अलग अलग भाइयो का निवास है। मकान इस तरह बना हुआ है कि किसी तरह हिस्से नहीं हो सकते। क्या कोर्ट दखल देकर हिस्से किस प्रकार दिला सकती है? क्या बहन का हिस्सा मांगना जायज है हमारे द्वारा मकान में किया गया निर्माण में कुछ छूट मिलेगी? सिविल कोर्ट में कितना समय लगेगा? कृपया समस्या का उचित समाधान बताएँ।

समाधान-

प की बहन का हिस्सा मांगना पूरी तरह जायज है। नामांतरण किसी भी संपत्ति के स्वत्व को निर्धारित नहीं करता। पिता की मृत्यु के साथ ही उन के उत्तराधिकारियों का अधिकार उन की संपत्ति में बन गया। कोई भी अपना हिस्सा केवल रिलीज डीड के माध्यम से ही छोड़ सकता है या फिर अन्य विधि से हस्तान्तरित कर सकता है जिस का उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीयन आवश्यक है। आप की बहन का हिस्सा उस संपत्ति में अभी भी विद्यमान है।

यदि न्यायालय समझती है कि भौतिक रूप से संपत्ति को विभाजित किया जाना संभव नहीं है तो भी पहले वह इस मामले में प्राथमिक डिक्री पारित करेगी जिस में हिस्से निर्धारित होंगे। उस के बाद यदि आपस में रजामंदी से हिस्से बांट नहीं लिए जाते अथवा खरीद नहीं लिए जाते हैं तो न्यायालय संपत्ति को विक्रय कर के सभी को हिस्से देने का निर्णय दे सकता है। आप दोनों भाई चाहें तो बहिन का हिस्सा मिल कर खरीद सकते हैं।

आप ने यदि पिता की मृत्यु के उपरान्त निर्माण किया है तो उस का सबूत देने पर न्यायालय उस खर्चे को बंटवारे से अलग रख कर निर्णय कर सकती है, खर्च के अनुरूप बंटवारे में आप का हिस्सा बढ़ा सकती है। मुकदमे मे कितना समय लगेगा इस का उत्तर तो खुद विधाता भी यदि कोई हों तो नहीं दे सकते। यह आप के यहाँ की अदालत में काम के आधिक्य पर निर्भर करेगा।

नामांतरण किसी संपत्ति के स्वामित्व परिवर्तन को प्रकट नहीं करता।

समस्या-

अनिल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के नाम एक मकान है। मेरे पिता वर्ष २००३ से लापता हैं। मेरे पिता ४ भाई हैं। तीनों भाइयों ने मुझे ये मकान मौखिक हिस्से में दे दिया था। मैं २० बर्षो से इस मकान कि देख रेख व टेक्स देता आ रहा हूँ।  मकान पर मेरा कब्ज़ा है तथा किरायेदार भी मुझे ही किराया देते हैं। वर्ष २०१२ में मैंने मकान का नामांतरण अपनी माँ के नाम से करा लिया था।  अब उन्होंने उससे निरस्त करा के उसे मेरी दादी के नाम करा लिया है? क्या वे उसे बेच सकती हैं? उन्हें कैसे रोका जाये?

समाधान-

नामान्तरण किसी भी प्रकार से स्वामित्व और स्वामित्व के हस्तांतरण को प्रकट नहीं करता है। आप का उस मकान पर 20 वर्षों से कब्जा है, इस कारण कोई आप को उस मकान से बेदखल नहीं कर सकता। किन्तु मौखिक बंटवारे में आप को मकान मिला था इसे साबित करना आसान नहीं होगा। देख-रेख करना और टैक्स जमा करने मात्र से यह उपधारणा नहीं ली जा सकती है कि वह मकान आप को मौखिक बंटवारे में दे दिया गया था। यदि यह साबित होता है कि कोई बंटवारा नहीं हुआ था तो दादाजी के मकान और शेष संपत्ति का बंटवारा होना चाहिए और उस स्थिति में उन के सभी उत्तराधिकारियों को उस का हिस्सा मिलना चाहिए।

आप के पिता 2003 से लापता हैं तो आप दीवानी न्यायालय में घोषणा का दावा कर के उन्हें मृत घोषित करवा सकते हैं और इस घोषणा के आधार पर मृत्यु प्रमाण पत्र आप को मिल सकता है। वैसी स्थिति में आप अपने पिता के उत्तराधिकारी हो जाएंगे। चूंकि दादी के नाम मकान का नामान्तरण हो जाने से वह मकान दादी का नहीं हो जाता बल्कि संयुक्त संपत्ति बना रहता है। इस कारण उन्हें इस मकान को बेचना तो नहीं चाहिए। फिर भी ऐसी कोशिश हो सकती है। इस के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर विक्रय पर अस्थाई   निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है। इस वाद में आप यह कथन कर सकते हैं कि आप के पिता 14 वर्षों से लापता है इस कारण साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत उपधारणा के अंतर्गत उन्हें मृत माना जाना चाहिए और आप उन के उत्तराधिकारी होने के नाते यह वाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व को प्रमाणित नहीं करता।

समस्या-

जितेन्द्र ने उज्जैन मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी की मृत्यु के बाद एक मकान जो कि हॉउंसिंग बोर्ड का है, मेरे ताउजी ने अपने सभी 6 भाई बहनों को बहला-फुसलाकर स्वयं के नाम नामान्तरित करवा लिया है। ताउजी द्वारा इस प्रकार हॉउसिंग बोर्ड में नामान्तरण करवा लेने से मेरे पिताजी का क्या उस सम्पति पर अधिकार नही रहेगा? सिर्फ पिताजी ने नामान्तरण के लिये अपनी सहमति दी थी। अभी तक इस सम्पति का रजिस्टर्ड बंटवारा नहीं हुआ है और ना ही ताउजी रजिस्टर्ड बंटवारा करवाना हेतु सहमत हैं। कृपया बताये कि हॉउसिंग बोर्ड में नामान्तरण से क्या वह सम्पति सिर्फ ताउजी की हो जावेगी? एवं हॉउसिंग बोर्ड में नामान्तरण के संबंध में हम क्या कार्यवाही कर सकते है?

समाधान-

नामान्तरण संपत्ति के स्वामित्व को प्रदर्शित नहीं करता है। मकान हाउसिंग बोर्ड से आप के दादाजी को आवंटित हुआ और लीज डीड भी उन के नाम निष्पादित हो गयी। उन के देहान्त के उपरान्त इस मकान की लीज का स्वामित्व उन के सभी उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो गया। सभी उत्तराधिकारियों का यह स्वामित्व अचल संपत्ति के हिस्से का था और उसकी कीमत 100 रुपए से अधिक की थी। यह स्वामित्व बिना किसी रजिस्टर्ड रिलीज डीड के किसी अन्य हिस्सेदार को स्थानान्तरित नहीं किया जा सकता था। इस कारण नामान्तरण के लिए अनापत्ति से भी उस स्वामित्व पर कोई फर्क नहीं पड़ेगा। संपत्ति सभी की बनी रहेगी।

यदि संपत्ति के अन्य हिस्सेदारों में से कोई भी बंटवारा चाहता है तो वह न्यायालय में बंटवारे का वाद संस्थित कर सकता है जिस पर संपत्ति का बंटवारा हो जाएगा। इस वाद में हाउसिंग बोर्ड को भी पक्षकार बनाएँ तो वहाँ भी रिकार्ड दुरुस्त हो जाएगा।

दूसरी पत्नी की पुत्री को भी संपत्ति में वही अधिकार है जो पहली पत्नी की पुत्री को है।

समस्या-

अंजू सिंह मैहर ने ग्राम कटिया थाना न्यू रामनगर, सतना मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी ने दो शादी किया था. मैं उनकी दूसरी पत्नी की बेटी हूँ!  मेरे पिताजी जब हम छोटे थे तभी गुजर गए। मेरी मां भी हमें छोड़कर कहीं और चली गयी। मेरी शादी परिवार के चाचा ने किया है। मेरा एक भाई था वह भी 2010 में कैंसर की बीमारी से गुजर गया। मेरी पहली माँ अभी है उनकी एक लड़की है। मेरे दादाजी भी पहले ही गुजर गए हैं। मेरे दादाजी के पास जमीन ज्यादा होने के कारण मेरी बड़ी माँ और बुआ के नाम जमीन पर चढ़वा दिए हैं।  मेरे पिता जी के न रहने के बाद बाकी सब जमीन पर मेरी बड़ी माँ का नाम आ गया है। एक नम्बर पर हम दोनो बहनों के नाम पर वारिसाना है। तो क्या जो हमारे बड़ी माता के नाम पर जमीन है उस पर हमें हिस्सा मिलेगा? सभी जमीन पर मेरी क्या हक है? मैंने मैहर तहसील में आवेदन किया है। क्या हमें न्याय मिलेगा? सर हमें सुझाव दिया जाए। सभी जमीन पुश्तैनी है।

समाधान-

कोई भी हिन्दू एक पत्नी के जीवित रहते दूसरा विवाह करता है तो वह विवाह अवैध है। इस प्रकार आप की माँ का आप के पिता के साथ विवाह वैध नहीं था। इस कारण से उन्हें तो इस पैतृक संपत्ति में कोई लाभ नहीं मिल सकता था। लेकिन संतानें तो पिता की हैं और उन्हें वही अधिकार प्राप्त है जो कि वैध पत्नी से उत्पन्न संतानों को प्राप्त है। यदि दादा जी ने अपने जीवनकाल में कोई वसीयत नहीं की है तो आप को भी वही अधिकार प्राप्त हैं जो कि बड़ी मां की पुत्री को प्राप्त हैं।

आप के दादाजी की संपत्ति में आप के पिता और बुआ का समान हिस्सा था। अब पिता के स्थान पर बड़ी माँ का नाम भूमि में आ गया है वह गलत है। वस्तुतः एक हिस्सा तो बुआ के नाम होना चाहिए था तथा दूसरे हिस्से में एक तिहाई आप की बड़ी माँ को, एक तिहाई बड़ी माँ की बेटी को और एक तिहाई आप के नाम मिलना चाहिए था।

यदि बडी माँ और बुआ के नाम नामान्तरण हो चुका हो तो आप को उस नामान्तरण आदेश के विरुद्ध अपील करना चाहिए और उस में देरी नहीं करनी चाहिए। आप किसी स्थानीय अच्छे वकील से मिलें और जल्दी से जल्दी अपील दाखिल कराएँ।

गलत तथ्यों के आधार पर गलत नामान्तरण हो सकता है, उसे दुरुस्त कराएँ।

समस्या-

अर्जुन ने चौमू, जयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


म ३ भाई और ३ बहिन है, जिस में से हमारी बड़ी बहिन की डेथ हो गयी २००६ में तथा मेरे पिताजी की डेथ २००९ में हो गई। पिता जी की डेथ के बाद किसी ने हमारी जमीन का गलत नामांतरण खुलवा दिया। अगर बहिन की डेथ पहले हो गयी और पिताजी की बाद में तो क्या बहिन के नाम नामांतरण खुल सकता है क्या? और अगर क़ानूनी रूप से यदि ये गलत है तो गलत नामांतरण खोलने वालों व खुलवाने वालो को दंड दिलवाने के लिए क्या करवाई की जानी है, उस के बारे में उचित जानकारी देने की कृपा करें।


समाधान-

प ने समस्या को ठीक से रखा ही नहीं है। आप ने खुद फैसला कर लिया कि नामान्तरण गलत खुला है। नामान्तरण में क्या गलत हुआ है यह ठीक से नहीं लिखा है। नामान्तरण हिन्दू उत्तराधिकार के नियम के अनुसार किया  जाना चाहिए। यह सही है कि नामान्तरण पिताजी के खाते का खुला है इस कारण उन के उत्तराधिकारियों के नाम उन के स्थान पर खाते में अंकित किए जाएंगे।

आप की बड़ी बहिन का देहान्त पिताजी के देहान्त के तीन वर्ष पहले ही हो चुका है। किसी मृत व्यक्ति के नाम तो नामान्तरण हो नहीं सकता। लेकिन यदि नामांतरण करने वाले अधिकारी को यह न बताया जाए कि आप की बहिन की मृत्यु हो चुकी है तो उसे जीवित मानते हुए ही उस के नाम नामान्तरण किया जा सकता है। यदि उस के समक्ष बड़ी पुत्री की मृत्यु का प्रमाण उपस्थित न किया गया हो तो इस निर्णय में कोई गलती नहीं है। लेकिन फिर भी गलत नामांकन हो गया है तो उस की अपील की जा सकती है।

लेकिन जिस दिन पिताजी का देहान्त हुआ है उस दिन आप की बहिन के उत्तराधिकारी अर्थात उन की संतानें जीवित हुई तो वे भी प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हैं। उन का नाम उन के स्थान पर अंकित होगा।

लेकिन नामान्तरण यदि जानबूझ कर गलत किया गया है तो उस की शिकायत बड़े अधिकारी से की जा सकती है। यह उस अधिकारी के नियोक्ता अधिकारी का कर्तव्य है कि उस की जाँच करे और किसी तरह का दोष पाए जाने पर उसे नियमानुसार दंडित करे।

जिस जन्म-मृत्यु पंजीयक कार्यालय के क्षेत्राधिकार में मृत्यु हुई है वही मृत्यु प्रमाण पत्र जारी कर सकता है।

समस्या-

कमल शुक्ला ने जंजगीर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


दो वर्ष पूर्व मेरे पिता जी की देखभाल के लिए जांजगीर शहर में हमने एक आबादी भूमि में स्थित मकान खरीदा । इसके लिए तीनो भाई ने और पिता जी ने खर्च किया । नगर पालिका में पिता जी के नाम से नामांतरण कराया । पिता जी की देखभाल मेरे जिम्मे थी । पर अक्टूबर से नवंबर महीने में मुझे एक सम्मान समारोह में अमेरिका जाना हुआ । इस बीच मेरे 84 वर्षीय पिता जी की देखभाल के लिए मैंने वही पड़ोस में रहने वाली अपनी बहन को सौंपा था । इस बीच मे पिता जी का स्वास्थ्य खराब हुआ और उनकी मृत्यु हो गयी । मैं अपनी यात्रा स्थगित कर लौट आया और मृतक संस्कार के बाद हम तीनो भाइयों ने दिसम्बर में नामांतरण हेतु अर्जी दी , शुल्क पटाया । इश्तहार प्रकाशन के दो माह बाद भी नगर पालिका से कोई जवाब नही आने पर सम्पर्क किया तो उन्होंने बताया कि हमारे आवेदक पर आपत्ति आया है । पता चला कि मेरी बहन ने पिता जी से उनकी बीमारी की स्थित में मृत्यु से 15 दिन पूर्व वसीयत कराया हुआ है । वसीयत की तिथि के दिन उसने बेहोशी की स्थिति में पिता जी को एक कार में डाल कर मुहल्ले वालों को बताई कि वह उसे अस्पताल ले जा रही है । पिता जी को उसी स्थिति में पंजीयक कार्यालय ले जाकर उसका अंगूठा वसीयत में करवाई जबकि मेरे पिता जी रिटायर्ड शिक्षक थे । उसी तिथि को गंभीर स्थिति में पिता जी का चेकअप भी उसी ने करवाया है । जिसके कागजात हमारे पास ही है । नगर पालिका नबाब तक हमे किसी प्रकार का नोटिश नही दिया । काफी दिन टालने के बाद अब कह रहे हैं कि इस मामले में दोनो की ओर से अलग अलग मृत्य प्रमाण पत्र प्रस्तुत किया गया है । आगे कार्यवहीँ करने से दोनों के खिलाफ रिपोर्ट लिखाना पड़ेगा , इसलिए मामले को ठंठे बस्ते में डाल दिये हैं और इस मकान का नामांतरण नही होगा । क्या ऐसा हो सकता है ? कहीं मेरी बहन के पक्ष में कोई एकतरफा कार्यवाही तो नही कर रहे ? नगर पालिका का बड़ा बाबू मेरे जीजा जी का मित्र है और साथ पढ़ा हुआ है । दो प्रमाण पत्र इसलिए बन गया क्योंकि मुझे नही पता था कि पहले से ही मेरी बहन ने इसी नगर पालिका में बनवा लिया है । जबकि मैंने पास के ही पैतृक गांव से बनवा लिया है । दोनो में एक ही तिथि और समय है ।


समाधान-

मृत्यु प्रमाण पत्र उस कार्यालय से जारी होगा जिस कार्यालय के क्षेत्राधिकार में मृतक की मृत्यु हुई है। इस कारण जो प्रमाण पत्र उस कार्यालय से जारी हुआ है जहाँ आप के पिता मृत्यु नहीं हुई है वह गलत है उसे निरस्त माना जाना चाहिए। आप सही कार्यालय से जारी प्रमाण पत्र की प्रतियाँ प्राप्त कर अपने उपयोग में ले सकते हैं।

यदि नगर पालिका नामांतरण नहीं कर रही है तो नगर पालिका को नोटिस दे कर नोटिस की अवधि समाप्त होने के बाद घोषणा व स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत किया जा सकता है। इस वाद में आप के पिता के सभी उत्तराधिकारी और नगर पालिका को पक्षकार बनाना होगा। यदि आप की बहिन संपत्ति को केवल अपने नाम नामान्तरण कराना चाहती है तो वह वसीयत के आधार पर उस का प्रतिवाद करेगी। आप वहाँ वसीयत को गलत साबित कर सकते हैं जिस से सभी उत्तराधिकारियों के नाम मकान का नामांतरण हो सके।


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