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सीक्योरिटी के रुप में दिए गए चैक पर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (N.I.Act) का परिवाद पोषणीय नहीं है।

समस्या-

अजय कुमार  ने  भरतपुर, राजस्थान से पूछा है –

 मेरी एक जमीन को खरीदने का सौदा एक व्यक्ति ने मेरे साथ किया, जिसके लिए उसने मुझे ने अग्रिम राशि के तौर पर 50 लाख रुपए दिए और एक एग्रीमेंट किया जिसमें बकाया राशि 51 लाख रुपये 15 माह में चुकाने पर रजिस्ट्री करने का वायदा मुझ से कराया। मुझ से खरीददार ने 40 लाख का एक चैक सीक्योरिटी के बदले ले लिया। लेकिन परिवादी ने अपना करार पूरा नहीं किया और करार करने के अगले महीने ही अपनी राशि की वापस मांग की तो मैंने सदभावना में उसकी कुछ राशि 14 लाख नकद जिसका लिखित में अपनी कच्ची खाता बही में एंट्री की और 20 लाख परिवादी के खाते में ट्रांसफर कर दिए। यह रकम किश्तों में परिवादी को चुका दी, लेकिन परिवादी ने इसके बाबजूद भी   बैंक से चैक बाउंस करा कर कोर्टमें 138 एनआई एक्ट का मुकदमा कर दिया है। जिसमें उसने मुझ से वापस प्राप्त कर ली गयी राशि का कोई जिक्र नही किया है और पूरा पैसा मांग रहा है। मुकदमा अभी अभियोजन की गवाही में चल रहा है । खरीददार ने इंटरिम राशि की मांग की है। अब उसे इंटरिम राशी न मिले उसके लिए क्या करना होगा? और परिवादी के खिलाफ क्या कानूनी कार्यवाही इस स्टेज पर की जा सकती है? कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

किसी भी प्रकरण में जो न्यायालय में लंबित हो उस में उस प्रकरण से संबंधित पत्रावली के अवलोकन व अध्ययन के बिना कोई पुख्ता सलाह देना संभव नहीं होता है। फिर भी हम आप के द्वारा बताए गए तथ्यों व विवरण के आधार पर अपनी राय यहाँ प्रकट कर रहे हैं।

आप के व खरीददार के मध्य जो करार हुआ था वह खरीददार ने भंग कर दिया। दूसरा मोखिक करार यह हुआ कि आप उस के द्वारा आप को  दी गयी राशि उसे वापस लौटा देंगे। आप ने 14 लाख नकद लौटा दिए जिस की आपने कोई रसीद नहीं ली केवल अपनी बही में अंकन किया है। यदि यह बही बिजनेस के संबंध में दिन प्रतिदिन पूरी सचाई के साथ रखी जाती है तो इस पर न्यायालय विश्वास कर सकता है। क्यों कि इस में कैश इन हैंण्ड उस दिन 12 लाख रुपए कम होना बताया गया होगा जो आप के पास उपलब्ध होगा। बाकी 20 लाख रुपए जो आप ने खाते में स्थानान्तरित किए हैं उस का सबूत तो बैंक खाते के स्टेटमेंट से हो जाएगा।

आप के पास इस मामले में पहले हुआ एग्रीमेंट है, उस में सीक्योरिटी के रूप में दिए गए चैक का नंबर होगा तथा यह भी लिखा गया होगा कि यह चैक सीक्योरिटी के रूप में दिया गया है। यदि ऐसा कथन एग्रीमेंट में या किसी लिखत में है तो इस से यह साबित होता है कि चैक सीक्योरिटी के रूप में दिया गया था न की किसी दायित्व के भुगतान के रूप में। इस लिखत के अदालत में पेश कर देने से प्रथम दृष्टया यह साबित होगा कि चैक सीक्योरिटी के बतौर दिया गया था। वैसी स्थिति में धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का यह प्रकरण पोषणीय नहीं रह जाएगा। इस से अन्तरिम राशि दिलाने का जो आवेदन दिया गया है वह निरस्त कराया जा सकता है। अंतिम रूप से भी इस आधार पर यह मुकदमा खारिज हो सकेगा।

आप क्या कार्यवाही कर सकते हैं? इस का सीधा उत्तर यह है कि खऱीददार ने आप के साथ धोखाधड़ी की है। ऐसा लगता है कि उस का पहले से ही इरादा ठीक नहीं था। उस ने इस तरह चारा डाल कर आप को फँसाया है। तो आप पुलिस में धोखाधड़ी की रपट लिखा सकते हैं। यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो एस पी को परिवाद दे सकते हैं, फिर भी कार्यवाही न होने पर न्यायालय में अलग से परिवाद प्रस्तुत करवा सकते हैं। बेहतर हो कि इस मामले में किसी स्थानीय वरिष्ठ वकील की सलाह से काम करें।

वाद कारण उत्पन्न हुए बिना किया गए परिवाद पर प्रसंज्ञान लेना अवैध है।

rp_NIAct.jpgसमस्या-

एडवोकेट बृजेश पाण्डेय ने सतना, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (निगोशिएबल इंस्ट्रूमेंट एक्ट) के अंतर्गत चेक बाउंस के प्रकरण में परिवादी के द्वारा परिवाद न्यायालय मे प्रस्तुत करने की समय सीमा के सात दिन पहले ही दायर कर दिये जाने से माननीय न्यायालय ने प्री-मेच्योर प्रकरण होने के कारण प्रकरण को खारिज कर दिया। तब परिवादी ने जिला सत्र-न्यायालय में निगरानी प्रस्तुत की। परंतु न्यायालय ने निचली अदालत के निर्णय की पुष्टि कर के निर्णय यथावत रखा है। कृपया यह सलाह दें की अब परिवादी को क्या करना चाहिए। चेक बाउंस के इस प्रकरण मे आरोपी को क्या फायदा हो सकता है, या आरोपी को कुछ करने की आवश्यकता है।

समाधान

ब्रजेश जी,

प स्वयं वकील हैं। आप ने योगेन्द्र प्रताप सिंह बनाम सावित्री पाण्डे के प्रकरण में सुप्रीम कोर्ट का निर्णय पढ़ा होगा। चैक बाउंस होने की सूचना प्राप्त होने के 30 दिनों में चैक धारक चैक जारीकर्ता को चैक की राशि अदा करने हेतु लिखित नोटिस देगा। यह नोटिस मिलने की तिथि से 15 दिन की अवधि में चैक जारीकर्ता को चैक की राशि चैक धारक को अदा करनी है, यदि वह 15 दिन की अवधि में इस राशि का भुगतान नहीं करता है तो 15 दिन की इस अवधि के समाप्त होने पर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत वाद कारण उत्पन्न होता है। वाद कारण उत्पन्न हो जाने के उपरान्त एक माह की अवधि में इस अपराध का परिवाद लिखित में मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत किया जा सकता है। इस निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने निर्धारित किया है कि यदि वाद कारण उत्पन्न होने के पूर्व कोई शिकायत प्रस्तुत की जाती है तो वह अवैध होगी और ऐसी शिकायत पर प्रसंज्ञान लेना भी अवैध होगा चाहे प्रसंज्ञान लेने के समय तक वाद कारण उत्पन्न क्यों न हो गया हो। इस परिवाद को दुबारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। हाँ, एक नया परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है, लेकिन उसे भी कानून के अनुसार मियाद में होना चाहिए।

स निर्णय में उच्चतम न्यायालय ने सभी तब तक लंबित मुकदमों में यह राहत प्रदान कर दी थी कि यदि इस तरह का कोई प्रीमेच्योर प्रकरण लंबित है तो परिवादी नया परिवाद प्रस्तुत कर सकता है जिस में गलत परिवाद प्रस्तुत करने में व्यतीत समय को माफ करते हुए परिवाद को मियाद में मान लिया जाए। इस तरह आप के मामले में परिवाद के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में लंबित रहते हुए अथवा उस की निगरानी के लंबित रहते हुए प्रीमेच्योर परिवाद को वापस लेते हुए नया परिवाद प्रस्तुत कर दिया जाता तो वह मियाद में होता और मुकदमे को बचाया जा सकता था। लेकिन अब तो निगरानी का निर्णय हो चुका है और नया परिवाद प्रस्तुत नहीं हुआ है तो उस का लाभ नहीं लिया जा सकता।

च्चतम न्यायालय ने यह भी कहा है कि नया परिवाद प्रस्तुत होने पर उस में मियाद की जांच की जाएगी और उचित कारण होने पर मियाद के बाहर हुई देरी को माफ किया जा सकता है। हमारी राय में जिस चैक के बारे में आप ने राय पूछी है उस चैक का मामला तो समाप्त हो चुका है। कोई परिवाद अब दुबारा प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। यदि परिवादी यह प्रमाणित करे कि चैक वास्तव में किसी विशिष्ट दायित्व के लिए दिया गया था और उस दायित्व के संबंध में धन की वसूली के लिए कोई दीवानी वाद अब भी लाया जा सकता है तो दीवानी वाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

स मामले में जो भी करना है वह परिवादी को ही करना है। आरोपी के लिए करने को कुछ नहीं है। आरोपी को तो परिवादी या उस के वकील की जल्दबाजी के कारण जो लाभ मिलना है वह मिल चुका है। अब यह परिवाद दुबारा पुनर्जीवित हो सकना संभव नहीं है।

चैक बाउंस के मुकदमे में समन और वारंट की तामील पुलिस ही कराएगी, लेकिन परिवादी को शुल्क के साथ आवेदन देना होता है।

समस्या-

दिल्ली से शारदा ने पूछा है –

मैं ने एक परिवाद धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत किया है। अब अभियुक्त को समन कोर्ट भेजेगी या मुझे भेजना होगा?

Code of Criminal Procedure
समाधान-

प ने जो परिवाद प्रस्तुत किया है उस पर जो कार्यवाही आरंभ हुई है वह अपराधिक प्रकृति की है और दंड प्रक्रिया संहिता के अनुसार ही समस्त कार्यवाही होगी। पहले आप को शपथ पत्र प्रस्तुत कर के अपने परिवाद के तथ्यों को साबित करना होगा। तब न्यायालय आप के परिवाद पर प्रसंज्ञान ले कर अभियुक्त को समन से बुलाने का आदेश करेगा। तब आप को समन जारी करने के लिए आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत करना होगा। जिस पर मामूली न्यायशुल्क लगेगा। तब न्यायालय अभियुक्त व्यक्ति के लिए समन जारी करेगा। इस समन को पुलिस द्वारा अभियुक्त को पहुँचाया जाएगा। यह हो सकता है कि अभियुक्त किसी दूरस्थ स्थान पर रहता हो तो न्यायालय आप को समन दस्ती देने का आदेश दे दे। तब भी समन आप को एक बंद लिफाफे में सिर्फ इतना करने के लिए दिया जाएगा कि आप उसे उस पुलिस थाने तक पहुँचा दें जिस के अंतर्गत अभियुक्त रहता है।

ब तक अभियुक्त को समन प्राप्त नहीं हो जाता है तब तक आप को समन जारी करने के लिए हर पेशी पर समन जारी करने का आवेदन शुल्क सहित देना पड़ सकता है। यदि समन मिलने पर भी अभियुक्त उपस्थित नहीं हो तो उसे जमानती या गिरफ्तारी वारंट से बुलाए जाने का आदेश न्यायालय दे सकता है। तब भी वारंट जारी करने के लिए सशुल्क आवेदन आप को ही देना होगा। लेकिन वारंट की तामील पुलिस ही कराएगी। वही अभियुक्त को गिरफ्तार कर के न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करेगी।

न्यायालय को सारी परिस्थितियाँ बताएँ और मामले को लोक अदालत में निपटाने का निवेदन करें

समस्या –

मैंने एक आदमी को दो चैक दिये थे।  हम दोनों का पहले से कुछ विवाद चल रहा था। दोनों चैक की पेमेंट मैंने नकद कर दी थी।  लेकिन विवाद की वजह से उसने एक चैक तो मेरा लौटा दिया लेकिन एक चैक देने से मना कर दिया।  जो सिर्फ 35 हजार रूपये का था।  उसने ये चैक बैंक में डाल दिया,  मैंने पेमेंट स्टॉप करवा दी थी।  छह साल से कोर्ट में केस चल रहा है।  कोर्ट में भी उसने एक चैक वापस करने की बात मानी है।  अब मेरी जॉब दूसरे शहर में लग गई है और हर सुनवाई पर कोर्ट आना मुश्किल है।  अब छह साल लगातार लड़ने के बाद हिम्मत टूट गई है।  क्या मैं कोर्ट में चैक की राशि जमा करवाकर ये केस खत्म करने की अपील कर सकता हूं।  कोर्ट जो राशि कहे मैं देने के लिये तैयार हूं।

– प्रदीप, दिल्ली

समाधान –

ब से धारा-138 अपरक्राम्य विलेख अधिनियम के उपबंध अस्तित्व में आए हैं, चैक के संबंध में कुछ बातों का ध्यान रखना और सावधानियाँ बरतना आवश्यक हो गया है।  चैक हमेशा प्राप्त कर्ता का नाम, तारीख और राशि भर कर ही देना चाहिए।  जब तक चैक आप के हाथ वापस न आ जाए तब तक उस के धन का भुगतान नहीं करना चाहिए।  यदि कोई कहे कि बाद में दे दूंगा तो उसे रकम देनी ही नहीं चाहिए।  कोई कहे कि विश्वास करो तो कभी नहीं करना चाहिए अपितु उस से कहना चाहिए कि वह चैक बैंक में प्रस्तुत कर दे वहाँ से उसे भुगतान मिल जाएगा।   वैसे भी चैक देने का अर्थ भुगतान ही है तो चैक की राशि का भुगतान नकद क्यों किया जाए?  अक्सर विश्वास जिस पर किया जाता है वही आप को धोखा देता है।  खैर !

प ने कहा है कि वह एक चैक वापस लौटाना स्वीकार कर चुका है।  लेकिन इस का यह अर्थ भी निकलता है कि आप ने चैक किसी न किसी ऐसे दायित्व के लिए दिया था जो विधिक रूप से वसूल किए जाने योग्य था।   इस तरह के मामलों में वैसे भी जीतने के लिए कोई बचाव के आधार नगण्य हैं।   आप अपने मामले को सिर्फ इसलिए लड़ना नहीं चाहते हैं कि न्यायिक प्रक्रिया थका देने वाली और अत्यन्त असुविधाजनक है।   आप कोशिश करिए कि इस मामले में मुकदमा करने वाले व्यक्ति से आप का समझौता हो जाए।  यदि समझौता न हो रहा हो तो आप मजिस्ट्रेट को सारी बात खुद बता दीजिए कि मामला क्या है और आप क्यों इस मामले में मुकदमा न लड़ कर समझौता चाहते हैं?  मजिस्ट्रेट आप की बात को अवश्य समझेगा और कोई न कोई राह अवश्य निकाल लेगा।  आजकल सभी स्थानों पर हर माह नियत तिथियों पर लोक अदालत लगती है।  आप अपने मजिस्ट्रेट को लिखित में यह आवेदन कर सकते हैं कि मामले का निस्तारण लोक अदालत के माध्यम से किया जाए।   लोक अदालत के माध्यम से इस तरह के मुकदमों में राजीनामा हो सकता है।  निश्चित रूप से न्यायालय कोई न कोई मार्ग अवश्य निकाल लेगा।

उधार चुका देने पर भी चैक न लौटाने पर क्या करें?

 बंटी निहाल ने पूछा है –
मैं बहुत मुश्किल में हूँ। एक व्यक्ति से उधार लिया था और चैक दिया था। पैसे देने के बावजूद वह चैक वापस नहीं किया है और बाउंस करने की धमकी दे रहा है।  लेनदेन की कोई लिखत कोई रसीद नहीं है। कोई जानबूझ कर किसी को फँसाना चाहता है तो वह क्या करे? क्या मै चैक चोरी होने का रिपोर्ट लिखवा सकता हूँ? मैं इस मुसीबत से कैसे बच सकता हूँ?
 उत्तर –

बंटी जी,
प ने उधार लिया और उसे चुकाने को चैक दिया, दोनों ने कोई गलती नहीं की। आप ने उधार लिया और चैक दे कर रकम चुका दी, बात यहीं खत्म हो चुकी थी। दोनों के बीच कोई लेन-देन शेष ही नहीं रहा था। आप पर कोई कर्ज था ही नहीं लेकिन आप ने उसे दुबारा उसी कर्ज को जो चैक से चुकाया जा चुका था चुकाने के लिए नकद रकम उसे दे दी। इस तरह उक्त व्यक्ति ने आप से दो बार धनराशि वसूल कर ली। जब आप दुबारा नकद राशि दे रहे थे तो या पहले चैक वापस लेना चाहिए था या फिर उस की रसीद लेनी चाहिए थी। गलती आप की है।
प जो यह कह रहे हैं कि मैं चैक चोरी करने की रिपोर्ट दर्ज करवा सकता हूँ क्या? आप का यह कथन बिलकुल मिथ्या है। आप ऐसा नहीं कर सकते। यदि करते हैं तो उलटे पुलिस आप को एक मिथ्या रिपोर्ट देने के मामले में फँसा सकती है।  
चैक से संबंधित कानून धारा 138 अपरक्राम्य विलेख अधिनियम में यह प्रावधान है कि यदि किसी ने किसी को चैक दिया है तो न्यायालय को प्रथम दृष्टया यह मानना होगा कि चैक किसी न किसी दायित्व के अधीन दिया गया है। यदि कोई व्यक्ति यह कहता है कि चैक दायित्व के अधीन नहीं दिया गया है तो ऐसा उस व्यक्ति को साबित करना होगा। आप के मामले में आपने चैक दायित्व के अधीन ही दिया था। गड़बड़ी यह हुई है कि आप जिस दायित्व से चैक दे कर मुक्त हो चुके थे वही दायित्व आप ने दुबारा चुका दिया है। वह व्यक्ति आप को चैक बैंक में लगा कर धारा 138 का मुकदमा लगाने की बात कह रहा है वह अपराध कर रहा है। 
प मुसीबत से बच सकते हैं, लेकिन उस के लिए आप को उस व्यक्ति के विरुद्ध पुलिस में रिपोर्ट करवानी होगी  कि उस व्यक्ति ने यह कह कर कि वह आप का चैक आप को लौटा देगा, आप से नकद रुपया प्राप्त कर लिया और अब चैक नहीं दे रहा है। लेकिन आप के पास यह प्रमाणित करने को सबूत चाहिए कि आप ने उसे उस का रुपया चुका दिया है। यदि आप किसी प्रत्यक्षदर्शी साक्षी के माध्यम से यह साबित कर सकते हैं कि आप ने उस का रुपया चुका दिया है तो आप ऐसी रिपोर्ट करवा सकते हैं। उस पर पुलिस को कार्यवाही करनी होगी। यदि पुलिस कार्यवाही नहीं करती है तो आप एस.पी. को अपनी रिपोर्ट दें और एस.पी. को रिपोर्ट देने पर भी कार्यवाही नहीं होती है तो इस मामले में न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर वहाँ अपने और अपने साक्षी के बयान करवा कर  न्यायालय को प्रसंज्ञान लेने का निवेदन करें।

भुगतान का दिनांक अंकित किए बिना चैक फॉर्म चैक नहीं बनता

 बाल मुकुन्द शाह ने एक विचित्र प्रश्न किया है –
क्या आप बिना तारीख के चैक में धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (Negotiable Instruments Act) का मुकदमा कर सकते हैं?
उत्तर- – –
बाल मुकुंद जी,  


म बैंक से जो चैक बुक ले कर आते हैं, उस में चैक नहीं होते अपितु चैक फॉर्म होते हैं। बैंक से रुपया निकालने के लिए या किसी अन्य व्यक्ति को भुगतान करने के लिए हमें चैक फार्म को भरना होता है। चैक फार्म में सब से पहले अपना खाता संख्या अंकित करना होता है फिर उस में उस व्यक्ति का नाम लिखना होता है जिसे धनराशि भुगतान करने के लिए हम बैंक को आदेश देते हैं या किसी का नाम न लिख कर उसे बियरर अर्थात चैक धारक को भुगतान करने का आदेश देते हैं, या फिर हम वहाँ ‘स्वयं’ (Self) लिखते हैं जिस का अर्थ यह होता है कि भुगतान स्वयं मुझे प्राप्त करना है। इस के उपरांत हम चैक फार्म में वह राशि जिस का भुगतान बैंक को करना है उसे अंकों और शब्दों में लिखते हैं। उस में वह दिनांक अंकित करते हैं जिस दिनांक को चैक का भुगतान करना है और सब से अंत में हम अपने हस्ताक्षर चैक फॉर्म पर अंकित करते हैं। चैक फॉर्म पर इतनी प्रविष्टियाँ करने के उपरांत वह चैक बनता है। इन प्रविष्टियों में से किसी एक के बिना वह चैक फॉर्म चैक बनता है। 

दि किसी चैक पर दिनांक अंकित नहीं है तो वह चैक ही नहीं है, उस के आधार पर बैंक द्वारा भुगतान नहीं किया जा सकता है क्यों कि उस पर भुगतान करने की तिथि अंकित नहीं है। यदि हम बैंक में बिना दिनांक अंकित चैक फॉर्म प्रस्तुत करते हैं तो बैंक कैशियर तुरन्त ही चैक लौटा कर कहता है कि इस पर दिनांक अंकित नहीं है दिनांक अंकित कीजिए। 
ब यह हो सकता है कि कोई किसी को चैक फॉर्म केवल हस्ताक्षर कर के दे दे और उस पर अन्य प्रविष्टियाँ न करे। ऐसी स्थिति में चैक फॉर्म पर अन्य प्रविष्टियाँ किसी भी व्यक्ति के द्वारा की जा सकती हैं और  उसे चैक बनाया जा सकता है। आप अब समझ गये होंगे कि मेरा मंतव्य क्या है? यदि किसी चैक फॉर्म पर दिनांक अंकित नहीं है तो उस का भुगतान बैंक द्वारा नहीं किया जा सकता है। बैंक उस चैक फॉर्म को वापस लौटा देगा। यहाँ बैंक वापस लौटाने का कारण यह बताएगा कि चैक अपूर्ण है। लेकिन हो सकता है कि ऐसे में बैंक त्रुटि करते हुए यह कारण बताए कि बैंक में पर्याप्त धन नहीं है। लेकिन बैंक की त्रुटि है। उस के आधार पर मुकदमा नहीं किया जा सकता। क्योंकि धारा 138 अपरक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत चैक बैंक द्वारा लौटाए जाने के उपरांत भी नोटिस देने पर और नोटिस की अवधि में भुगतान न करने पर ही मुकदमा किया जा सकता है। एक अपूर्ण चैक फॉर्म को बैंक द्वारा लौटा दिए जाने पर उस के आधार पर मुकदमा नहीं किया जा सकता है। यदि कोई व्यक्ति ऐसा मुकदमा कर दे तो यह त्रुटि न्यायालय के ध्यान में ला कर मुकदमा निरस्त करवाया जा सकता है, न्यायालय के ऐसा न करने पर प्रसंज्ञान आदेश के विरुद्ध सेशन न्यायालय में पुनरीक्

प्रतिवादी या अभियुक्त के पते की जानकारी के बिना उस के विरुद्ध मुकदमा चलाया जाना संभव नहीं है

 मैजिक विंग्स ने पूछा है – – –

मैं भीलवाड़ा का रहने वाला हूं। मैं जयपुर के एक आदमी से 11 हजार रुपए मांगता था, उसने मुझे आईसीआईसीआई बैंक का एक अकाउंट पेयी चैक दिया जब मैंने उसको बैंक में डाला तो वह बाउंस हो गया उसमें पर्याप्‍त पैसा नहीं था। मैं उसके घर का पता नहीं जानता था, ऑफिस का पता जानता था। लेकिन वह ऑफिस बंद कर चुका है। जब मैंने आईसीआईसी बैंक से उसके घर का पता किया, और उस पते पर गया तो वह पता फर्जी निकला। बैंक में भी उसने फर्जी पता ही दे रखा था।  अब क्‍या किया जा सकता है,? क्‍या बैंक वालों के खिलाफ भी धोखाधड़ी का मुकदमा दर्ज होगा या उस आदमी का कुछ नहीं हो सकता।

कृपया मुझे इसकी पूरी जानकारी दें।


उत्तर – – – 

 महोदय,

जिस आदमी से आप को धन प्राप्त करना है, उस का पता तो आप को ही बताना पड़ेगा। आईसीआईसीआई ने भी अपने यहाँ खाता किसी न किसी फोटो आईडी के आधार पर ही खोला होगा। बैंक के विरुद्ध कार्यवाही करने पर अधिक से अधिक यह हो सकता है कि बैंक को कायदे-कानून की पालना करने में लापरवाह माना जाए और उन्हें कुछ दंड भुगतना पड़े। लेकिन इस से बैंक को कोई फर्क नहीं पड़ता। 
चैक तो बाद में अस्तित्व में आया है। पहले तो आपने उस व्यक्ति को रुपया दिया है या उस पर कोई दायित्व छोड़ा है। उस दायित्व की पूर्ति के लिए चैक तो बाद में जारी किया गया है। आप को उस व्यक्ति को रुपया उधार देने या उस पर दायित्व छोड़ने के पहले उस का पता आदि ले कर रखना चाहिए था। बिना पते के तो कोई कार्यवाही अदालत में नहीं की जा सकती है। यदि पुलिस में धोखाधड़ी का मुकदमा भी दर्ज कराएंगे तो पुलिस भी उस में अभियुक्त लापता होने की रिपोर्ट लगा कर अपने कर्तव्य की इतिश्री कर लेगी। आप को स्वयं ही उस व्यक्ति का पता ज्ञात करना होगा। तभी आप कोई कार्यवाही कर पाएंगे।
हाँ, यदि आप को संभावना प्रतीत होती हो कि आप बाद में उस व्यक्ति का पता मालूम कर सकते हैं तो बैंक से चैक अनादरित होने के एक माह के भीतर उस के बैंक में दिए गए पते पर नोटिस भेज कर परक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत कार्यवाही आरंभ कर सकते हैं। बाद में जब भी उस व्यक्ति का पता मालूम हो अदालत को बता कर कार्यवाही को गति प्रदान की जा सकती है।

तीसरे पक्ष का चैक भुगतान नहीं हुआ है, मैं क्या कर सकता हूँ?



श्री प्रेम सारस्वत ने पूछा है — 
सर!
मेरी समस्या ये है कि मैं एक छोटा सा दुकानदार हूँ, सूरत में मेरी एक दुकान है। एक माह पहले मैं ने  एक मिस्त्री के हस्ते माल बेचा था। उस मिस्त्री ने मुझे एक चैक दिया था जो कि तीसरे पक्ष का था। यह चैक बाउंस हो गया है। चैक देने वाला पक्ष चार पाँच दिन से मुझे और उस मिस्त्री को पैसे देने के वायदे कर के घुमा रही है, मेरा चैक देने वाले पक्ष से कोई सीधा संबंध नहीं है, इस लिए मेरे बिल पर तीसरे पक्ष के नाम के साथ हस्ते मिस्त्री का नाम है। अब मैं परेशान हूँ कि मैं क्या करूँ? आप कोई रास्ता बताएँ?
उत्तर —
प्रेम जी,
प बेकार ही परेशान हो रहे हैं। बिल के अनुसार आप ने तीसरे पक्ष को ही मिस्त्री के हस्ते माल बेचा है। यहाँ मिस्त्री तीसरे पक्ष का अभिकर्ता/एजेंट था। उस के अभिकर्ता होने का सब से बड़ा साक्ष्य यह है कि मिस्त्री के पास तीसरे पक्ष का चैक था जो कि भुगतान के रूप में उस ने आप को दिया। इस तरह आप किसी परेशानी में नहीं हैं। 
रक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अंतर्गत आप तीसरे पक्ष को नोटिस दे सकते हैं कि आप के चैक को बैंक में प्रस्तुत किया गया था, लेकिन बैंक ने उस का भुगतान नहीं किया है। यह नोटिस आप को बैंक से चैक के भुगतान न होने की लिखित सूचना (वह पर्ची जिस पर चैक के भुगतान न होने का कारण लिखा होता है) मिलने की तारीख से तीस दिन की अवधि में दिया जा सकता है। इस में एक विकल्प यह भी है कि चैक की वैधता साधारणतः छह माह की होती है यदि उस पर उस से कम अवधि अंकित न हो तो, और चैक को उस की वैधता की अवधि में कितनी ही बार बैंक में पेश किया जा सकता है। 
दि आप को विश्वास हो कि तीसरा पक्ष कुछ दिनों में आप की बकाया राशि का भुगतान कर देगा तो आप प्रतीक्षा कर सकते हैं कि वह नकद भुगतान कर दे। यदि वह नकद भुगतान कर दे तो आप उस का चैक वापस लौटा दें। यदि वह कहे कि चैक दुबारा बैंक में पेश किया जाए तो आप वैधता की अवधि के अंतर्गत दुबारा तिबारा भी उसे बैंक में पेश कर सकते हैं और उस का भुगतान प्राप्त कर सकते हैं। यदि चैक का भुगतान फिर भी न मिले तो अंतिम बार बैंक द्वारा चैक का भुगतान न करने की सूचना प्राप्त होने के दिन के तीस दिन के भीतर आप तीसरे पक्ष को रजिस्टर्ड डाक से नोटिस भेज सकते हैं कि आप का चैक बैंक द्वारा बिना भुगतान के वापस कर दिया गया है, आप पंद्रह दिनों में चैक की राशि का भुगतान कर दें अन्यथा आप के विरुद्ध परक्राम्य विलेख अधिनियम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय में प्रस्तुत किया जाएगा। यदि वह नोटिस मिलने के पंद्रह दिनों में चैक की राशि का भुगतान आप को नहीं करता है तो पंद्रह दिनों की अवधि समाप्त होने के उपरांत अगले तीस दिनों में आप न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर सकते हैं। आप नोटिस देने के लिए और परिवा

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