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सीक्योरिटी के रुप में दिए गए चैक पर धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (N.I.Act) का परिवाद पोषणीय नहीं है।

समस्या-

अजय कुमार  ने  भरतपुर, राजस्थान से पूछा है –

 मेरी एक जमीन को खरीदने का सौदा एक व्यक्ति ने मेरे साथ किया, जिसके लिए उसने मुझे ने अग्रिम राशि के तौर पर 50 लाख रुपए दिए और एक एग्रीमेंट किया जिसमें बकाया राशि 51 लाख रुपये 15 माह में चुकाने पर रजिस्ट्री करने का वायदा मुझ से कराया। मुझ से खरीददार ने 40 लाख का एक चैक सीक्योरिटी के बदले ले लिया। लेकिन परिवादी ने अपना करार पूरा नहीं किया और करार करने के अगले महीने ही अपनी राशि की वापस मांग की तो मैंने सदभावना में उसकी कुछ राशि 14 लाख नकद जिसका लिखित में अपनी कच्ची खाता बही में एंट्री की और 20 लाख परिवादी के खाते में ट्रांसफर कर दिए। यह रकम किश्तों में परिवादी को चुका दी, लेकिन परिवादी ने इसके बाबजूद भी   बैंक से चैक बाउंस करा कर कोर्टमें 138 एनआई एक्ट का मुकदमा कर दिया है। जिसमें उसने मुझ से वापस प्राप्त कर ली गयी राशि का कोई जिक्र नही किया है और पूरा पैसा मांग रहा है। मुकदमा अभी अभियोजन की गवाही में चल रहा है । खरीददार ने इंटरिम राशि की मांग की है। अब उसे इंटरिम राशी न मिले उसके लिए क्या करना होगा? और परिवादी के खिलाफ क्या कानूनी कार्यवाही इस स्टेज पर की जा सकती है? कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

किसी भी प्रकरण में जो न्यायालय में लंबित हो उस में उस प्रकरण से संबंधित पत्रावली के अवलोकन व अध्ययन के बिना कोई पुख्ता सलाह देना संभव नहीं होता है। फिर भी हम आप के द्वारा बताए गए तथ्यों व विवरण के आधार पर अपनी राय यहाँ प्रकट कर रहे हैं।

आप के व खरीददार के मध्य जो करार हुआ था वह खरीददार ने भंग कर दिया। दूसरा मोखिक करार यह हुआ कि आप उस के द्वारा आप को  दी गयी राशि उसे वापस लौटा देंगे। आप ने 14 लाख नकद लौटा दिए जिस की आपने कोई रसीद नहीं ली केवल अपनी बही में अंकन किया है। यदि यह बही बिजनेस के संबंध में दिन प्रतिदिन पूरी सचाई के साथ रखी जाती है तो इस पर न्यायालय विश्वास कर सकता है। क्यों कि इस में कैश इन हैंण्ड उस दिन 12 लाख रुपए कम होना बताया गया होगा जो आप के पास उपलब्ध होगा। बाकी 20 लाख रुपए जो आप ने खाते में स्थानान्तरित किए हैं उस का सबूत तो बैंक खाते के स्टेटमेंट से हो जाएगा।

आप के पास इस मामले में पहले हुआ एग्रीमेंट है, उस में सीक्योरिटी के रूप में दिए गए चैक का नंबर होगा तथा यह भी लिखा गया होगा कि यह चैक सीक्योरिटी के रूप में दिया गया है। यदि ऐसा कथन एग्रीमेंट में या किसी लिखत में है तो इस से यह साबित होता है कि चैक सीक्योरिटी के रूप में दिया गया था न की किसी दायित्व के भुगतान के रूप में। इस लिखत के अदालत में पेश कर देने से प्रथम दृष्टया यह साबित होगा कि चैक सीक्योरिटी के बतौर दिया गया था। वैसी स्थिति में धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का यह प्रकरण पोषणीय नहीं रह जाएगा। इस से अन्तरिम राशि दिलाने का जो आवेदन दिया गया है वह निरस्त कराया जा सकता है। अंतिम रूप से भी इस आधार पर यह मुकदमा खारिज हो सकेगा।

आप क्या कार्यवाही कर सकते हैं? इस का सीधा उत्तर यह है कि खऱीददार ने आप के साथ धोखाधड़ी की है। ऐसा लगता है कि उस का पहले से ही इरादा ठीक नहीं था। उस ने इस तरह चारा डाल कर आप को फँसाया है। तो आप पुलिस में धोखाधड़ी की रपट लिखा सकते हैं। यदि पुलिस कार्यवाही न करे तो एस पी को परिवाद दे सकते हैं, फिर भी कार्यवाही न होने पर न्यायालय में अलग से परिवाद प्रस्तुत करवा सकते हैं। बेहतर हो कि इस मामले में किसी स्थानीय वरिष्ठ वकील की सलाह से काम करें।

चैक के दुरुपयोग की सूचना पुलिस को दें और कार्यवाही न होने पर अदालत में परिवाद पेश करें।

समस्या-

मेरा एक चैक दिनांक 8-3-2016 को बैंक जाते हुए रास्ते में गिर गया था और काफी ढूढंने पर भी नहीं मिला, कुछ मिनटो बाद मेने उस चेक के गुम की होने लिखित में सूचना बैंक में देकर उस चेक का भुगतान रोक दिया। अब डेढ साल बाद वह चैक किसी लङके को मिला और भुगतान के लिये मेरे खाते मे लगाकर बाउंस करा दिया। उसने मेरे को सूचना देकर केस भी कर दिया। अब   आप ही हल बतायें मैं क्या करूं?

-रवि कामरानी, डन्डापुरा सिन्धी कालोनी, विदिशा-464001 (म.प्र.)

समाधान-

ब आप को चैक बाउंस का नोटिस मिला तो उस के जवाब में यह बात लिखनी चाहिए थी और पुलिस को सूचना देनी चाहिए थी कि आप के खोए हुए चैक का कोई गलत इस्तेमाल कर रहा है। आप अब भी इस मामले में पुलिस में मुकदमा दर्ज करवा सकते हैं। यदि पुलिस कोई कार्यवाही न करे तो अदालत में परिवाद के माध्यम से मामला दर्ज कराएँ।

आप के विरुद्ध यदि मुकदमा हो गया है तो आप को लड़ना पड़ेगा। प्रतिरक्षा में अच्छा वकील खड़ा करें। आप बैंक से अपनी सूचना की प्रति मांगें जिसे आप अपनी प्रतिरक्षा मे प्रस्तुत कर सकते हैं, बैंक के शाषा प्रबंधक को अपनी गवाही में प्रस्तुत कर सकते हैं, क्यों की डेढ़ वर्ष पहले जो पत्र बेंक को दिया था वह बहुत बढ़िया सबूत है। जब कि चैक की तारीख अधिक से अधिक चार छह माह पहले की रही होगी। आप चिन्ता न करें आप का पक्ष मजबूत है।

चैक का भुगतान बैंक को लिख कर रुकवाना भी चैक अनादरण ही है।

समस्या-

मैंने किसी व्यक्ति को उसके नाम से अगले महीने की डेट का चेक दिया हैतो क्या मैं उसे कैंसिल करवा सकता हूं। क्या वह मुझ पर केस कर सकता है?   मैंने उससे कोई उधार नहीं लिया है।

-राजीव यादव, आवास विकास, रुद्रपुर

समाधान-

कोई भी चैक आप ने किसी को दिया है तो वह उसे बैंक में समाशोधन के लिए प्रस्तुत कर सकता है। यदि चैक किसी भी वजह से डिसऑनर होता है तो चैक धारक आप को चैक की राशि का भुगतान करने के लिए 15 दिन मे ंकरने की लिखित सूचना देगा। आप नोटिस मिलने से 15 दिन में यदि राशि का भुगतान नहीं करते हैं तो आप के विरुद्ध धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनयम के अंतर्गत परिवाद न्यायालय में दाखिल किया जा सकता है।

यदि आप ने चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया है तो भी चैक धारक आप के विरुद्ध परिवाद दे सकता है। क्यों कि चैक के मामले में अदालत द्वारा  यह  माना जाएगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन दिया गया था। आपको यह साबित करना होगा कि चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था।

आप को चैक रुकवाने के लिए बैंक में आवेदन देना होगा कि चैक का भुगतान न किया जाए। लेकिन आप को तब बैंक को यह भी लिखना चाहिए कि वह चैक दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था तो किस कारण से दिया गया था। जब आप को नोटिस मिल जाए तो भी आप नोटिस का जवाब देते हुए कहें कि यह चैक दायित्व के अधीन नहीं था। बल्कि अमुक कारण से दिया गया था।

एक बार चैक डिसऑनर हो जाने के बाद और नोटिस कानून के मुताबिक आप को मिल जाने के बाद केस तो हो ही सकता है, आप को लड़ना भी पड़ेगा और अपनी सफाई पेश करनी होगी अन्यथा कुछ भी निर्णय हो सकता है।

बिना किसी दायित्व के किसी को भी चैक नहीं दें।

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

सुनील सिंह सिसोदिया ने गोविन्द कॉलोनी, टिगरिया बादशाह रोड, इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने अपना एक चेक किसी कंसलटेंट को दिया था नौकरी लगवाने के बदले और मुझ से एक फॉर्म फिल करवाया था कि जैसे ही आप को अपना ऑफर लेटर मिलेगा आप मुझे अपने एक माह का वेतन देंगे, उसने मुझे कुछ इंटरव्यू दिलवाए और ऑफर लेटर भी मिले और ऑफर लेटर के बदले में मैं ने उसे एक रुपए 5000/- चेक दे दिया। पर सैलरी कम होने की वजह से मैंने वह ज्वाइन नहीं किया और वह कोई और नौकरी नहीं लगवा पाया मैंने इसी बीच किसी और कंपनी में जॉब कर ली है! मैं जहाँ जॉब कर रहा हूँ वो जॉब उसने नहीं दिलवाई है और मेरी कंपनी वालो ने कहा है कि हम किसी प्रकार का फीस अमाउंट किसी भी कैंडिडेट से नहीं लेते हैं जो भी फीस अमाउंट होता है हम वो एम्प्लायर से चार्ज करते हैं ना कि किसी कैंडिडेट से और इसके अगेंस्ट में उन्होंने मुझे मेल भी कर दिया है कि हम स्वयं एक थर्ड पार्टी कंसलटेंट हैं और मेन पॉवर प्रोवाइड करते हैं बहुत सी कंपनी को अपने पे रोल पे मेन पॉवर प्रोवाइड करते हैं। मैंने अपना चेक तो स्टॉप करवा दिया है पर अब वो मुझे धमकी दे रहा है कि आप मुझे अपने चेक में लिखा अमाउंट चुकाएँ नहीं तो में आपके खिलाफ सेक्शन १३८ का केस लगाउँगा। कृपया मुझे उचित समाधान बताएँ।

समाधान-

प ने किसी व्यक्ति को चैक दिया है। जिस के बारे में आप के पास कोई सबूत नहीं है कि वह आप ने किसी दायित्व के अधीन न दे कर किसी और कारण से दिया है तो यही माना जाएगा कि आप ने किसी दायित्व के अधीन चैक दिया है। यदि वह व्यक्ति चैक बैंक में लगाता है और वह बाउंस हो जाता है तो वह आप के विरुद्ध मुकदमा कर सकता है। वैसी स्थिति में आप यदि यह साबित नहीं कर पाते हैं कि उक्त चैक किसी दायित्व के अधीन नहीं दिया गया था तो आप को सजा हो सकती है। स्टॉप पेमेंट भी चैक बाउंस की ही श्रेणी में आता है।

प ने जो चैक दिया है वह मात्र रु.5000/- का है। यदि वह व्यक्ति चैक को बाउंस करवा कर आप को नोटिस भिजवाता है तो बेहतर है कि आप उसे नोटिस मिलने के 15 दिनों में चैक की राशि का भुगतान कर दें और रसीद के साथ बाउंस हुआ चैक वापस प्राप्त कर लें। अन्यथा उस के मुकदमा करने पर मुकदमा लड़ने में ही इस से अधिक का खर्च हो जाएगा। आप ने चैक देने की गलती की है तो इतना तो भुगतना ही होगा। भविष्य में बिना किसी दायित्व के कोई चैक किसी को न दें।

क्या138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के मामलों में नोटिस का अभियुक्त को प्राप्त होना आवश्यक है?

rp_permanent-address.jpgसमस्या-

संतोष ने रूपवास, भऱतपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम (N I Act) के मामले में अभियुक्त को नोटिस का प्राप्त होना आवश्यक है?

समाधान-

दि चैक अनादरित हो जाए तो चैक धारक चैक जारी करने वाले को अनादरण की सूचना प्राप्त होने के 30 दिनों में लिखित रूप से सूचित करेगा कि चैक की राशि उसे 15 दिनों की अवधि में भुगतान की जाए। यह नोटिस चैक जारी करने वाले को मिलने के 15 दिनों की अवधि में भुगतान न करने पर 16वें दिन उक्त धारा में अपराध है तथा 16वें दिन वाद कारण पैदा होता है। इस के एक माह की अवधि में नोटिस जारीकर्ता के विरुद्ध न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत किया जा सकता है।

कानून का मंतव्य तो यही है कि नोटिस चैक जारीकर्ता को प्राप्त होना चाहिए। लेकिन चैक जारीकर्ता इस नोटिस से बचने का उपाय कर सकता है। वह नोटिस का अनुमान होने पर डाक वितरण समय पर पूरे एक माह गायब रह सकता है और वहाँ उपस्थित लोगों से कह सकता है कि वह बाहर गया हुआ है। वह डाकिए से यह भी नोट लगवा सकता है कि पते पर ताला लगा हुआ है आदि।

स कारण यह मामला विवादित हो गया कि नोटिस मिलना चाहिए कि नहीं और क्या नोटिस भेजना पर्याप्त है?

स मामले पर अनेक मामलों में सुप्रीम कोर्ट ने विचार किया है। C.C. Alavi Haji vs Palapetty Muhammed & Anr on 18 May, 2007 के प्रकरण में विचार के बाद यह माना कि चैक धारक के द्वारा दिया गया नोटिस सही पते पर भेजा जाना चाहिए। यदि चैक जारी कर्ता नोटिस से बचने की कोशिश करता है तो फिर सही पते पर से नोटिस लौटने पर भी यह माना जाएगा कि नोटिस चैक जारीकर्ता को प्राप्त हो गया है। परिवाद के विचारण के समय परिवादी को न्यायालय में साक्ष्य प्रस्तुत करना चाहिए कि उस ने नोटिस अभियुक्त के सही पते पर प्रेषित किया लेकिन स्वयं अभियुक्त द्वारा नोटिस से बचने की कोशिश के कारण उक्त नोटिस लौट कर प्राप्त हो गया जिसे नोटिस का मिलना मानते हुए तथा वाद कारण उत्पन्न होना मानते हुए परिवाद प्रस्तुत किया गया है।

चैक अनादरण मामलों का क्षेत्राधिकार किस मजिस्ट्रेट को है? कानून में ताजा संशोधन क्या है?

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

संतोष शर्मा ने भरतपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रक्राम्य विलेख अधिनियम Negotiable Instrument Act मेँ सरकार द्वारा सन 2015 मेँ जून माह मेँ जो संशोधन किया गया है क्या वह प्रभाव मेँ आ गया है और वह क्या संशोधन किया गया है?

समाधान

रक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के द्वारा चैक अनादरित होने की तिथि के 30 दिनों के भीतर नोटिस देने पर चैक की धनराशि नोटिस मिलने से 15 दिनों में चैक धारक को अदा न करने को अपराधिक कृत्य बनाया गया था। नोटिस के उपरान्त 15 दिन की अवधि समाप्त होने के दिन उक्त अपराध के लिए वाद कारण उत्पन्न होता है। वाद कारण उत्पन्न होने के दिन से एक माह में चैक धारक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकता है। दशरथ रूपसिंह राठौर के मामले में सुप्रीमकोर्ट द्वारा 01.08.2014 को दिए गए निर्णय से यह विवादित हो गया था कि यह परिवाद किस मजिस्ट्रेट को प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस निर्णय में कहा गया था कि जिस शाखा द्वारा चैक अनादरित किया जाता है उस शाखा के स्थित होने के क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में यह परिवाद प्रस्तुत किया जाना चाहिए। इस मामले में एक व्याख्या यह थी कि जब चैक भारत की सभी शाखाओं में भुगतान योग्य हो तो अक्सर जहाँ चैक प्रस्तुत किया जाता था उसी नगर की शाखा द्वारा वह अनादरित किया जाता है, और इस तरह जिस नगर में चैक समाशोधन हेतु प्रस्तुत किया जाता है उसी नगर में अनादरित होने के कारण उसी नगर के मजिस्ट्रेट के न्यायालय को यह परिवाद सुनने का क्षेत्राधिकार होगा। लेकिन इस व्याख्या को कोई भी न्यायालय स्वीकार नहीं कर रहा था।

सुप्रीम कोर्ट के उक्त निर्णय में इस तथ्य का विस्तार से उल्लेख किया गया था कि किस तरह चैक अनादरण के मुकदमों ने देश भर के मजिस्ट्रेट न्यायालयों में मुकदमों की बाढ़ पैदा की है। उस के मुकाबले मजिस्ट्रेट न्यायालयों की संख्या अतिन्यून है। (भारत में पहले ही जरूरत की चौथाई से भी कम अदालतें हैं।) इस से अपराधिक न्याय व्यवस्था संकट में आ गयी है। इस तरह सुप्रीमकोर्ट के इस निर्णय का एक उद्देश्य यह भी प्रतीत होता था कि यदि चैक जारीकर्ता बैंक शाखा में प्रस्तुत करने की बाध्यता होगी तो इस तरह के मुकदमे प्रस्तुत करने की संख्या बहुत कम हो जाएगी। एक तरह से यह फैसला सरकारों और न्याय व्यवस्था के बीच एक अंतर्विरोध को प्रकट करता है। इस निर्णय से इस तरह के मुकदमों के विचारण में अराजकता सी आ गयी। अदालतें मुकदमों को चैकजारीकर्ता शाखा के न्यायक्षेत्र के मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करने के लिए लौटाने लगीं।

रकारें कभी यह नहीं सोचतीं कि आबादी के हिसाब से पर्याप्त न्यायालय स्थापित करने चाहिए। ब्रिटेन के मुकाबले हमारे यहाँ आबादी के अनुपात में एक चौथाई से भी कम और अमरीका के मुकाबले 1/10 से भी कम अदालतें स्थापित हैं। इन की संख्या तुरन्त बढ़ाए जाने की आवश्यकता है। लेकिन इस दिशा में कभी किसी सरकार ने गंभीरता से नहीं सोचा है और न्याय व्यवस्था पंगु हो गयी है। उस की यह पंगुता दिनों दिन बढ़ती जा रही है।

स मामले में सरकार ने तय किया कि कानून में संशोधन कर के चैक को समाशोधन के लिए प्रस्तुत किए जाने वाली शाखा के न्याय क्षेत्र को अन्तिम रूप से धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के परिवाद प्रस्तुत करने का क्षेत्राधिकार प्रदान कर दिया जाए। इस के लिए दिनांक 15 जून 2015 को अध्यादेश जारी कर संशोधन कर दिया गया। वर्तमान में यह संशोधन प्रभावी है और अब केवल इस संशोधन के अनुसार चैक को समाशोधन के लिए प्रस्तुत किए जाने वाली शाखा के न्याय क्षेत्र के मजिस्ट्रेट के न्यायालय को ही प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन इस अध्यादेश का प्रभाव केवल 14 दिसंबर 2015 तक ही रहेगा। यदि इस बीच संसद इस कानून को पारित कर उसे अधिसूचित नहीं करती है तो यह अध्यादेश निष्प्रभावी हो सकता है और यह कानून उसी पटरी पर आ जाएगा।

प संदर्भित निर्णय व अध्यादेश निम्न लिंकों को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं-

  1. निर्णय दशरथ रूप सिंह राठौर
  2. अध्यादेश परक्राम्य विलेख अधिनियम 15.06.2015

चैक दिया है तो राशि का भुगतान करना ही होगा, अन्यथा सजा भुगतनी होगी।

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

सोनिया शर्मा ने अजमेर राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति ने बहुत सारे लोगों से धन ले रखा है और उसे अदा करने के लिए चैक दे रखे हैं। अब वे पैसा वापस नहीं दे पा रहे हैं। लोगों ने उन के विरुद्ध चेक बाउंस के नोटिस वकीलों के माध्यम से भिजवाना आरंभ कर दिए हैं जो हमारे घर पर आने लगे हैं। किसी वकील ने मेरे पति को कहा है कि वह खुद नोटिस को रिसीव नहीं करे बल्कि किसी दूसरे व्यक्ति से प्राप्त करवा लें। पर हम लोगों ने ऐसा नहीं किया बल्कि पोस्ट मेन को कहा है कि वह इस पते पर नहीं रहते हैं। नोटिस की डाक वापस चली गयी है। क्या मेरे पति का बचाव का कोई तरीका है?

समाधान-

प के पति ने लोगों से पैसा लिया है। इस कारण उन का यह दायित्व है कि वे उन का पैसा लौटाएँ। जिन लोगों को आप के पति ने चैक दिए हैं वे तो उन का पैसा न मिलने पर और चैक बाउंस होने पर आप के पति के विरुद्ध मुकदमा करेंगे उसी के लिए वकीलों के नोटिस आप के पास आ रहे हैं। यदि आप नोटिस न लेंगे तो भी किसी न किसी तरह वे यह साबित करेंगे कि उन्हों ने आप के पति के ज्ञात पते पर नोटिस भिजवाए थे।

चैक बाउंस मामले में एक बार चैक बाउंस हो जाने पर केवल एक ही बचाव हो सकता है कि आप के पति उस व्यक्ति का पैसा लौटा कर अपने चैक वापस प्राप्त कर लें। अन्यथा किसी न किसी प्रकार से आप के पति को नोटिस भेजा जाना कानून द्वारा माना जाएगा और चैक बाउंस होने के कारण आप के पति को सजा हो सकती है। फिर तो एक ही मार्ग शेष रह जाएगा कि आप के पति अदालत द्वारा दी गयी सजा भुगत लें। हमारी सलाह तो यही है कि आप अपने पति को सलाह दें कि जिन लोगों को चैक दे रखे हैं उन्हें धन का भुगतान कर के अपने चैक वापस प्राप्त कर लें। यही एक मात्र बचाव का उपाय है, अन्य कोई नहीं।

चैक बाउंस मामले में वाद कारण नोटिस मिलने के 16 वें दिन उत्पन्न होता है।

rp_cheque-dishonour-295x300.jpgसमस्या-

आनन्द सिंह तोमर ने ठीकरी, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मुझ पर धारा १३८ परक्राम्य विलेख अधिनियम के अन्तर्गत चैक बाउंस का मामला चल रहा है। परिवादी ने अपने परिवाद के पैरा सं. 10 में कथन किया है कि “१०-यह कि वाद का कारण दिनांक ०६-०७-१० को उत्पान हुआ जब अभियुक्त को भेजे गए सूचना पत्र दिनांक २२-०५-२०१० के ४५ दिन के अन्दर चैक का भुगतान नहीं किया गया। “अगले पैरा में लिखा गया है कि “ ११-यह कि परिवाद पत्र परक्राम्य विलेख अधिनियम १८८१ की धारा १३८ के अन्तर्गत वाद का कारण उत्प्पन होने के ३० दिनों के अन्दर प्रस्तुत किया गया है। इन दो पैराओं के कथनों में ऐसा कुछ है जिस का मुझे लाभ मिल सकता है।

स मामले में जो चैक मैं ने पार्टी को दिया था उस में पार्टी ने मुझे ०३-११-०९ को तीन लाख तथा १३-११-०९ को दो लाख देना कोर्ट में बताया है। जब कि मैं मेरे बड़े भैया का एक्सीडेंट दिनांक २७-१०-२००९ को दाहोद में हो जाने से खबर लगते ही २८-१०-०९-से २४-११-२००९ तक दहोद के अर्बन बैंक अस्पताल में रहा ठीकरी आया भी नहीं, ठीकरी आता तो ३०० किलोमीटर आना और जाना पड़ता। अब मैं कोर्ट में कैसे साबित करूँ कि में दहोद में था।

समाधान-

रक्राम्य विलेख अधिनियम की धारा 138 के अपराध में अनुसार यदि कोई चैक बाउंस हो जाता है तो चैक धारक को चाहिए कि वह चैक बाउंस की सूचना उसे प्राप्त होने के 30 दिनों की अवधि में चैक जारी करने वाले व्यक्ति को उस चैक की राशि का 15 दिनों में भुगतान करने की सूचना दे। यदि वह ऐसी सूचना चैक जारी करने वाले को प्रेषित करता है तो सूचना प्राप्त होने के 15 दिनों में उसे चैक की राशि का भुगतान चैक धारक को करना है। यदि वह इन पन्द्रह दिनों में भुगतान नहीं करता है तो उस के विरुद्ध वाद कारण उत्पन्न हो जाता है। इस तरह वाद कारण ऐसी सूचना भेजे जाने की तिथि से नहीं अपितु ऐसी सूचना प्राप्त होने की तिथि से 15 दिन पूर्ण होने तथा चैक की राशि का भुगतान न होने पर उत्पन्न होता है।

म तौर पर इस तरह के नोटिस रजिस्टर्ड ए.डी. डाक से प्रेषित किए जाते हैं जो उन्हें प्रेषित किए जाने के 3 से 7 दिनों में पाने वाले को प्राप्त हो जाते हैं। इस तरह नोटिस प्रेषित होने और उसे प्राप्त होने के बीच अधिकतम 7 दिन भी मान लें तो नोटिस प्रेषित होने के 22 वें दिन ही वाद कारण उत्पन्न हो जाएगा। आप को चाहिए कि आप उक्त प्रकरण की पत्रावली देख कर यह पता कर लें कि वास्तव में यह नोटिस आप को किस तिथि को प्राप्त हुआ है आप के मामले में उस तिथि से 15 दिन बाद वाद कारण उत्पन्न हुआ है।

वाद कारण उत्पन्न होने की इस तिथि से एक माह की अवधि में अर्थात जिस तिथि को वाद कारण उत्पन्न हुआ है अगले माह की उसी तिथि तक परिवादी को यह परिवाद न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत करना था। यदि ऐसा नहीं हुआ है और परिवाद को प्रस्तुत करने की तिथि उस बाद की है तो यह परिवाद अवधि पार है और चलने योग्य नहीं है। इस स्थिति का लाभ आप उठा सकते हैं। आप को और आप के वकील को सिर्फ मौन रहना है तथा परिवादी के बयान के दौरान जिरह में उस से आप को नोटिस मिलने की तिथि, तथा परिवाद प्रस्तुत करने की तिथि प्रमाणित करवा लेनी है। यदि परिवाद मियाद बाहर प्रस्तुत हुआ है तो वह निरस्त कर दिया जाएगा।

प इस मामले में यह साबित करना चाहते हैं कि आप ने उक्त चैक किसी दायित्व की पूर्ति के लिए नहीं दिया था। तो आप को बताना पड़ेगा कि यह चैक आप ने किन परिस्थितियों में परिवादी को दिया था। आप की राशि देने की तारीख को ठीकरी में अनुपस्थिति तो आप भाई और अस्पताल के स्टाफ के किसी सदस्य के बयान करवा कर साबित कर सकते हैं। लेकिन आप को यह भी साबित करना पड़ेगा कि आप ने यह चैक किन परिस्थितियों में उसे दिया था।

धोखाधड़ी, छल व ब्लेकमेलिंग का मुकदमा दर्ज कराएँ।

cheque dishonour1समस्या-

सुनील ने  हिरनमगरी, उदयपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं ने दुकान की आवश्यकता के लिए डेली बेस पर डायरी खुलवाने हेतु एक खाली चैक डायरी वाले को दिया। उस के बदले उस ने एक बीस हजार का चैक दिया। जब मैं ने चैक बैंक में डाला तो उसने चैक स्टॉप करा दिया। जब मैं उसके पास गया तो उस ने रूपया नहीं होना बताया। कुछ समय बाद दूसरा चैक देने की बात की। मैं ने भी जरूरत के कारण हाँ भर दी कॉफी समय निकलने के बाद भी उस ने चैक नहीं दिया। जब फिर से उसके आफिस गया तो पता चला कि उसने आफिस खाली कर दिया। फिर मैं ने उसे बहुत तलाश किया पर उसका कोई पता नही चला। करीब दो साल बाद उस ने मेरे चैक में राशि भरकर मुझ पर केस कर दिया। उस से मिलने पर वह बात करने को भी तैयार नहीं है। बात जिरह तक पहुँच गई है। मुझे कानूनी ज्ञान बिलकुल नहीं है और वकील साब भी कुछ नहीं बताते। कृपया उचित सलाह दें।

समाधान-

ह समझ नहीं आया कि दैनिक आधार पर यह किस तरह की डायरी खुलवाने की बात आप कर रहे हैं। उस व्यक्ति ने आप को 20000/- हजार का चैक दिया और आप ने उसे खाली चैक हस्ताक्षर कर के दे दिया। फिर उस का चैक डिसऑनर हो गया। उसी वक्त आप उस के विरुद्ध चैक डिसऑनर के लिए नोटिस दे कर कार्यवाही कर सकते थे लेकिन उस ने आश्वासन दे कर आप को टाल दिया। फिर दो साल का वक्त निकाल कर उस ने चैक में राशि भर कर बैंक में प्रस्तुत किया और डिस ऑनर करवा कर मुकदमा लगा दिया।

स तरह के मुकदमों में कोई मजबूत डिफेंस नहीं होता। सजा और चैक की राशि से अधिक राशि जुर्माना होता है। इसी परिस्थिति के आधार पर वह व्यक्ति आप को ब्लेक मेल कर रहा है। जब वह व्यक्ति आप का हस्ताक्षर युक्त खाली चैक ले कर फरार हुआ था तभी आप को पुलिस में उस के विरुद्ध मुकदमा दर्ज कराना चाहिए था। खैर।

ब भी जब कि आप जान चुके हैं कि आप के साथ छल हुआ है और वह व्यक्ति ब्लेकमेलिंग कर रहा है आप को चाहिए कि आप पुलिस में उस के छल, धोखाधड़ी और ब्लेकमेलिंक के विरुद्ध रिपोर्ट दर्ज करानी चाहिए। यदि पुलिस इस तरह कोई मुकदमा दर्ज करने से इन्कार करे तो न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर उसे पुलिस को जाँच के लिए भेजा जाना चाहिए तभी आप को कोई राहत इस मुकदमे में मिल सकती है। यदि आप के पास उस का डिसऑनर हुआ चैक हो तो उसे तथा आप के बैंक खाते में उस चैक के डिसऑनर होने का जो रिकार्ड है उसे भी प्रतिरक्षा में न्यायालय में प्रस्तुत किया जा सकता है। लेकिन इन सब का लाभ आपको तभी मिलेगा जब आप उस व्यक्ति के विरुद्ध मुकदमा दर्ज करा देंगे।

हस्ताक्षरित रिक्त चैक किसी को न दें, राशि लिखा हुआ दें तो भी बिना प्रयोजन अंकित रसीद के न दें।

cheque dishonour1समस्या-

मन ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं ने एक जने से रूपये उधार लिये, उसके बदले दो चैक दिये। एक खाली, एक भरा, दोनों की फोटो कापी कर के। रुपये देने के बाद उसने भरा चैक लोटा दिया। पर खाली चैक बाद में देने को कहा। मैं बहुत दिनों तक उस के घर के चक्कर काटता रहा। वह हर बार टालता रहा। फिर उस ने मकान खाली कर दिया। कभी मिल भी जाता तो कहता कहीं मिस हो गया है। मिलते ही दे दुंगा तीन साल बाद मुझे पता चला कि उस ने वही चैक किसी और को दे, उस में बडी रकम भर मुझ पर केस कर दिया है। मैं थाने गया वहाँ जवाब मिला कि तुमने रूपये लिये चैक दिया इस में हम कया करें। सभी बडे अफसरों को लिख कर दिया कि इस ठग पर कार्यवाही हो। पर सभी कार्यवाही चल रही है कहते हैं, करता कोई नहीं। अदालत में कार्यवाही चल रही है अब शायद जिरेह चालू होगी आप ही बतायें मैं कया करूँ जिस से उस ठग पर कार्यवाही हो।

समाधान-

ब से पहले तो कोई भी खाली चैक हस्ताक्षर कर के किसी भी व्यक्ति को देना नहीं चाहिए। भरा हुआ चैक दें तो उस की रसीद अवश्य प्रप्त कर लें जिस में उस का प्रयोजन स्पष्ट अंकित हो। फोटो प्रति रखने से कुछ नहीं होता। जब आप ने रुपए चुकाए तभी दोनों चैक वापस प्राप्त कर लेने चाहिए थे। जब उस ने दो या तीन बार टाल मटोल की तभी उस व्यक्ति के विरुद्ध कार्यवाही करनी चाहिए थी। आप ने नहीं की, तो भी जब उस ने मकान खाली कर दिया तब करनी चाहिए थी। लेकिन आप ने नहीं की।

कोई भी चैक का केस धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अन्तर्गत तभी हो सकता है जब चैक अनादरित होने के बाद उस की राशि के भुगतान का नोटिस आप को मिल जाए। यदि आप को यह नोटिस मिला है तो उस का सही से जवाब यह होना चाहिए था कि यह चैक मैं ने आप को नहीं अपितु किसी अन्य व्यक्ति को दिया था और उस ने न्यास भंग कर के आप को दे दिया। आप के विरुद्ध मेरा कोई दायित्व नहीं है। जिस व्यक्ति को चैक दिया था उस के व आप के विरुद्ध धारा 406 आईपीसी में मुकदमा दर्ज करवा रहा हूँ।

प ने इस तरह के नोटिस व उस के उत्तर का कोई उल्लेख अपने प्रश्न में नहीं किया है। हो सकता है नोटिस आप को नहीं मिला हो। तो आप को जैसे ही धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का समन मिला तब तुरन्त कार्यवाही करनी थी। यदि पुलिस ने कोई कार्यवाही नहीं की थी तो रजिस्टर्ड एडी डाक से पुलिस अधीक्षक को शिकायत भेजनी थी और उस के द्वारा भी दो सप्ताह में कोई कार्यवाही न करने पर आप को न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत कर पुलिस को अन्वेषण के लिए भेजने हेतु प्रार्थना करनी चाहिए थी और न्यायालय के न मानने पर आप को खुद अपनी साक्ष्य से मुकदमा दर्ज करवाना चाहिए था। कुल मिला कर आप ने बहुत गलतियाँ की हैं और बहुत सुस्ती बरती है।

प को अब भी चाहिए कि आप उन दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध मजिस्ट्रेट के न्यायालय में धारा 420, 406 आईपीसी में परिवाद दर्ज कराएँ। आप का धारा 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम का मुकदमा साक्ष्य में आ गया है। उस में बचाव के अनेक बिन्दु हो सकते हैं। जैसे कि आप को नोटिस नहीं मिला, जिस व्यक्ति ने चैक का मुकदमा किया है उस के प्रति आप का कोई दायित्व नहीं है, आदि आदि। आप का वकील इन बचाव के बिन्दुओं पर जिरह कर के आप की प्रतिरक्षा कर सकता है। इस मामले में हम कोई भी ठोस सुझाव नहीं दे सकते। क्यों कि सुझाव केवल पूरे मामले की पत्रावली के समस्त दस्तावेजों का अध्ययन कर के ही दिए जा सकते हैं। यदि आप का वकील अच्छा हुआ तो वह अच्छी प्रतिरक्षा कर सकेगा, उस के साथ ही वह आप का परिवाद प्रस्तुत करवा कर भी उन दोनों व्यक्तियों के विरुद्ध कार्यवाही कर सकेगा।

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