कानूनी उपाय Archive

प्रत्येक पक्षकार को दावे की सूचना होना जरूरी है।

October 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मनोज ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरी माँ ने अपने स्वर्गीय पिता की कृषि भूमि पर अपना उतराधिकार का दावा कर रखा है। कोर्ट ने मेरी माँ की अन्य बहनों को नोटिस भेजा है, उनको भी दावा करने हेतु हिदायत दी है ताकि एक एक करके न आये और केस में लम्बी प्रक्रिया ना हो। दो बार नोटिस भेजे गये हैं लेकिन उन्होंने कोर्ट में अपनी उपस्थिति नहीं दी। दो नोटिस भेजने में 2 साल हो गए हैं। वैसे में ये जानना चाहता हूँ कि कानूनन रूप से कितनी बार नोटिस भेजा जाता है? और अन्य क्या प्रक्रिया करने के बाद, कोर्ट स्वतंत्र रूप से उनकी गैर हाजरी में अपना फैसला सुना सकता है?

समाधान-

किसी भी मुकदमे में सभी संबंधित लोगों को पक्षकार बनाना जरूरी होता है जिन का हित प्रभावित होने वाला हो। आप की माताजी के इस मुकदमे में उन के पिता के सभी उत्तराधिकारियों को पक्षकार बनाना जरूरी था क्यों कि माताजी के पिताजी की संपत्ति का बंटवारा सभी उत्तराधिकारियों के मध्य होना है। इस के लिए सभी को दावे का समन भी भेजा जाना जरूरी है और इस समन का सभी पक्षकारों को मिलना भी जरूरी है।

आम तौर पर समन एक ही बार भेजा जाता है। यदि समन के संबंध में कोर्ट को यह रिपोर्ट प्राप्त हो कि समन संबंधित व्यक्ति ने प्राप्त कर लिया है या उसे सम्यक प्रकार से समन और दावे की सूचना मिल गयी है तो दुबारा समन नहीं भेजा जाता है। इस तरह यह आवश्यक है कि समन जिस व्यक्ति को भेजा गया है उसे मिल जाए और उस की सूचना भी पर्याप्त रूप से न्यायालय को मिल जाए। जब तक समन संबधित व्यक्ति को नहीं मिलता है तब तक यह प्रक्रिया चालू रहती है। एक बार प्रतिवादी को समन मिल जाने पर यदि वह अदालत में उपस्थित नहीं होता है तो अदालत उस के विरुद्ध एक तरफा कार्यवाही कर सकती है। एक तरफा कार्यवाही हो जाने पर उपस्थित पक्षकारों की साक्ष्य प्राप्त कर निर्णय किया जाता है।

कानूनी कदम उठाने में देरी आपके मामले को कमजोर करेगी

October 8, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

 समस्या-

राशि सिंह ने उन्‍नाव, यूपी से सवाल पूछा है कि- 

र् मेरी शादी फरवरी 2015 में हुई थी कुछ दिन तो सब ठीक रहा लेकिन कुछ दिन बाद से मेरे ससुराल वालों का व्यवहार चेंज हो गया मेरे पति नोएडा में जॉब करते है।उनका पहले से किसी और लड़की से संबंद्ध था जो मुझे पता चला जिसका मैन विरोध किया परंतु किसी ने भी मेरा साथ नही दिया ।उल्टामुझे ही गलत ठहराया गया और मुझसे गाली गलौज हर हफ्ते लड़ाई झगड़े करने लगे इन सब ने केवल दहेज के लिये शादी की थी बस मेरा जीवन इन सब ने नरक बना दिया है मैं केवल घर मे कहना बनाने वाली की हैसियत से रहती हूं।जब तब मुझे और मेरे घर वालो को अपशब्द कहते है ।घर पर मैंने ये बात बताई तो घर वाले मुझे ले गए फिर इसी बीच इन सब ने मेरे घर आकर हंगामा किया जिसके कारण मेरे पिता को हार्ट अटैक आ गया उनकी नवंबर 2016 में मृत्यु हो गयी मैं और मेरे घर वाले अवसाद में चले गए । फिर मेरे चाचा लोगो ने बीच मे पड़कर फिर से एक मौका देने की बात कही उनकी बात मॉनकर मैं अप्रैल 2017 को फिर अपने ससुराल आ गयी कुछ दिन ठीक रहा फिर वही सब शुरू हो गया इस बार तो और ज्यादा अत्याचार शुरू हुए उनको लगा बिना बाप की बेटी है अब कंहा जाएगी सहते सहते मैं 31 aug 2017 को अपने घर आ गयी अब मैं क्या करूँ मुझे अलग होना है तालाक लेकर और इनको सज़ा भी हो कृपया सही कानूनी मार्गदर्शन करें ।मेरे सारे जेवर भी उन लोगो के पास ही हैं।

समाधान-

हम ने इस समस्या को तीसरा खंबा के सहयोगी श्री भुवनेश शर्मा को प्रेषित किया था। उन्हों ने इस पर परामर्श दिया है जिसे आप उन के ब्लाग विवाह परामर्श पर जा कर पढ़ सकते हैं।

समस्या-

अक्कू यादव ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मको हमारे पिता के चाचा ने 2012 में कानून के अनुसार सब रजिस्ट्रार के सामने गोद लिया गया था। उनकी दो शादी शुदा बेटी है, जिन की गोद लेने के पहले शादी हो गयी थी। उनकी पत्नी का देहांत 2008 में हो गया। तब उन्होने अपनी सेवा और वंशज के लिए हमको पंजीकृत गोद ले लिया, वे सरकारी सेवा पर कार्यरत थे। सेवा के दौरान उनकी 2016 में देहांत हो गया। उनकी जो दो बेटियाँ हैं उन्होंने गोद नामा कैंसल करवाने के लिए मुकदमा किया है। जब गोद लिया गया था तब उनको कोई समस्या नहीं थी। परन्तु अब मरने के बाद बोल रही 30 लाख रुपये दो तब अनुकम्पा के लिए सहमति पत्र दूँगी। अनुकम्पा के लिए मैने बिभाग में अबेदन किया तो बोले बिना सहमति के अनुकम्पा नहीं मिल सकती है तो क्या हम हाईकोर्ट में बिभाग के खिलाफ याचिका कर सकते हैं? हमको अनुकंपा कैसे मिल सकती है और क्या पंजीकृत गोद नामा कैंसल हो सकता है? जब कि सभी दस्तावेज में पिता के स्थान पर दत्तक पिता का नाम है और नॉमिनी फॉर्म भी मेरे नाम है जिला अधिकारी द्वारा वारिस पत्र भी है हम क्या करें हमे बतायें?

समाधान-

प को सही प्रकार से गोद लिया गया है और गोदनामा निरस्त होना असंभव प्रतीत होता है। लेकिन अनुकंपा नियुक्ति के लिए बहिनों की सहमति आवश्यक है। गोद लिए जाने से आप को गोद पुत्र के रूप में वही अधिकार प्राप्त हुए हैं जो एक पुत्र को होते। यदि आपके गोद पिता के कोई पुत्र होता तब भी यही स्थिति बनती। ऐसा लगता है कि आप कुछ छिपा रहे हैं। आप के गोद पिता ने और भी संपत्ति छोड़ी होगी। उस की कीमत भी कम नहीं होगी। बहनें उस संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी हैं और अनापत्ति देने के पहले उस संपत्ति का हिस्सा आप से प्राप्त कर लेना चाहती हैं जिस के कारण बाद में उन्हें बंटवारे आदि की कार्यवाही न करनी पड़े।

आप ने यह नहीं बताया कि आप किस विभाग में नौकरी चाहते हैं। यदि अनुकंपा नियुक्ति के नियमों में विवाहित बहनें आश्रित हैं तो यह स्पष्ट है कि बिना बहनों की अनापत्ति के अनुकंपा नियुक्ति नहीं मिल सकती। वैसे भी अनुकंपा नियुक्ति मात्र अनुकंपा है कोई अधिकार नहीं है और इस कारण दी जाती है कि परिवार को सहारा मिले। लेकिन आपके मामले में परिवार तो है ही नहीं। बहने शादीशुदा हैं। और आप के अलावा परिवार में कोई अन्य नहीं। तो सरकार वैसे भी नौकरी देने से इन्कार कर सकती है। यह दूसरी बात है कि उस स्थिति में आप उच्च न्यायालय में रिट याचिका कर सकते हैं।

हमारी राय है कि यदि आप की विवाहित बहनें आश्रित अनुुकंपा नियुक्ति नियमों में आश्रित की परिभाषा में हैं तो आप को बहनों से कोई समझौता कर लेना चाहिए और सहमति प्राप्त कर अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त करने की कोशिश करें। अन्यथा अनुकंपा नियुक्ति को भूल जाएँ तो बेहतर है। यदि विवाहित बहने आश्रित की श्रेणी में नहीं आती हैं और विभाग आप से उन की अनापत्ति मांग रहा है तो आप विभाग के पत्र के आधार पर रिट याचिका उच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं।

 

कोशिश करें और लोक अदालत की भावना से मुकदमे को निपटाएँ!

October 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

स्वाती ठाकुर ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरा कोर्ट मे एक केस चल रहा है 294, 323, 506 आईपीसी की धाराओँ में, जिसमे मैं और मेरी ३ सहेलियाँ भी शामिल हैं। जो सामने वाली लड़की है, जिसने हमारे खिलाफ रिपोर्ट लिखवाई है, वो एक बार भी कोर्ट नहीं आयी है और मेरे साथ जो ३ लड़कियाँ हैं वो भी कोर्ट नहीं आती हैं। सिर्फ़ मैं ही हर महीने पेशी में जाती हूँ इस केस में आगे क्या होगा? वक़ील भी मुझे कुछ नहीं बताते हैं? मैं क्या करूँ? क्या जैसे सब इस केस में कोई और लड़की नहीं आती हैं मैं भी जाना बंद कर दूँ? इस केस को एक साल होने जा रहा है, कृपया राह दिखाएँ।

समाधान-

प के विरुद्ध जो मुकदमा है उस में धारा 294 आईपीसी संज्ञेय भी है और इस में आपस में राजीनामा भी नहीं हो सकता। इस धारा के कारण आप के विरुद्ध जिस लड़की ने रिपोर्ट की है उस की रिपोर्ट पर पुलिस ने मुकदमा दर्ज कर लिया, अन्वेषण किया और आप चारों के विरुद्ध न्यायालय में मुकदमा प्रस्तुत कर दिया है। अब वह लड़की केवल फरियादी है लेकिन अभियोग राज्य सरकार की ओर से है इस कारण उसे हर पेशी पर आने की जरूरत नहीं है। उसे तो न्यायालय तब बुलाएगा जब उस की गवाही अदालत को दर्ज करनी होगी।

इस मुकदमे में शिकायतकर्ता लड़की से सुलह हो जाए तो भी राजीनामा संभव नहीं है। यह हो सकता है कि 294 के सिवा दो अन्य धाराओं में राजीनामा पेश कर दिया जाए और 294 को स्वीकार कर के आइंदा ऐसी हरकत नहीं करने की चेतावनी के आधार पर न्यायालय लोकअदालत की भावना से मुकदमे का निपटारा कर दे। इस संबंध में आप को अपने वकील से बात करनी चाहिए। आप उन से बात करने की जिद करेंगी तो वे आप को सब बताएंगे। यदि नहीं बताएँ तो आप वकील बदल सकती हैं।

यदि तीन सहेलियाँ मुकदमे में पेशी पर हाजिर नहीं होती हैं तो उन की हाजरी माफी का आवेदन हर तारीख पर पेश किया जाता होगा या फिर उन की जमानत जब्त हो कर उन के वारंट निकल चुके होंगे। आप पेशी पर नहीं आएंगी तो आप के भी गिरफ्तारी के वारंट निकल जाएंगे।

सब से बेहतर तरीका यह है कि यदि इस मामले में अपना अपराध स्वीकार करना किसी लड़की के कैरियर को प्रभावित न करता हो तो आप चारों अपना अपराध स्वीकार कर लें और अदालत से कहें कि इस मामले में लोक अदालत की भावना से निर्णय कर दिया जाए। वैसी स्थिति में आप को चेतावनी के दंड से दंडित कर के या थोड़ा बहुत जुर्माना कर के मुकदमे का निर्णय हो सकता है। बेहतर है कि आप इस मामले में अपने वकील से बात कर के तय करें कि क्या करना चाहिए।

समस्या-

शशि भूषण कुमार ने समस्तीपुर, झितकाही, बिहार वैशाली से समस्या भेजी है कि-

दो बच्चों की विधवा माँ से शादी कर लिया और उसके दोनों बच्चों को अपना लिया। पुनर्विवाह के बाद दो और बच्चा हुआ है। पूर्वजों ने किसी के नाम वसीयत ना की। इस संपत्ति का अधिकार सब बच्चो को बराबर मिलेगा या उस विधवा के पुनर्विवाह होने के बाद जन्में बच्चो को मिलेगा?

समाधान-

पूर्वजों से चली आई संपत्ति को सहदायिक संपत्ति कहा जाता है। इस संपत्ति में केवल पुरुष संतानों को ही अब तक अधिकार मिलता था। 2005 में हुए हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के बाद से इस संपत्ति में पुत्रियों को भी अधिकार मिलना आरंभ हुआ है। इस संपत्ति में से केवल पुरुष की औरस तथा गोद ली हुई संतानो को ही उत्तराधिकार प्राप्त हो सकता है अन्य किसी को नहीं।

विधवा के पूर्व विवाह से जन्मी संतानों को किसी प्रकार का कोई अधिकार अपनी माँ के नए पति की संपत्ति या उस के पूर्वजों की संपत्ति में प्राप्त नहीं होगा। विधवा के नए पति ने बच्चों को अपनाया है तो वह उन का लालन पालन कर सकता है। स्वअर्जित संपत्ति में से कुछ भी अपनी इच्छा से दे सकता है लेकिन बच्चों को उत्तराधिकार का कोई अधिकार माता के नए पति या पूर्वजों से चली आई सहदायिक संपत्ति में उत्पन्न नहीं होता है।

विधवा की मृत्यु के बाद जो भी संपत्ति वह छोड़ कर जाएगी उस संपत्ति में उस के पूर्व पति तथा पुनर्विवाह के बाद वर्तमान पति दोनों से जन्मी संतानों को समान रूप से उत्तराधिकार प्राप्त होगा।

समस्या-

विशाल कुमार ने मवई कलाँ, मलीहा बाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी समस्या यह है कि मेरे पापा ने दो शादियाँ की थी। उनकी पहली पत्नी के लडका पैदा हुआ, उसके बाद किसी बीमारी के कारण पहली पत्नी की मृत्यु हो गई उसके बाद मेरे पापा ने दूसरी शादी की जिनका पुत्र मै हूँ।  कुछ समय बाद मेरे पापा की भी मृत्यु हो गयी। उसके बाद मेरे पापा की सारी संपत्ति 1/3 हो गई जिसमें पहले पत्नी के लडके व मेरी माँ को एवम मुझे अधिकार प्राप्त हुआ था अब मेरी माता जी की भी मृत्यु हो गई है क्या मेरी माता जी की संपत्ति मुझे अकेले को प्राप्त होगी।

समाधान-

प की माता जी को जो संपत्ति आपके पिता से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई वह उन की व्यक्तिगत संपत्ति हो चुकी थी। अब आप की माता जी के देहान्त के उपरान्त आप के माताजी का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-15 व 16 से शासित होगा।

इन धाराओं के अनुसार सब से पहले स्त्री की संपत्ति उस के पुत्रों व पुत्रियों को प्राप्त होगी। इस तरह यदि आप के अपनी माता से कोई भाई व बहिन नहीं हैं तो फिर उनकी सारी संपत्ति आप को ही प्राप्त होगी। धारा 15 की उपधारा (2) (बी) में यह उपबंध है कि स्त्री को कोई संपत्ति यदि उस के पति या ससुर से प्राप्त हुई थी तो वह मृतका की संतानों को प्राप्त होगी। निश्चित रूप से आप का सौतेला भाई आप की माँ की संतान नहीं है। इस कारण उसे आप की माता से उत्तराधिकार के रूप में कुछ भी प्राप्त नहीं होगा।

समस्या-

राजेश ने इसराना, पानीपत, हरियाणा से समस्या भेजी है कि-

म चार भाई बहन हैं हमारे पिता जी एक सरकारी अधिकारी थे उनकी मृत्यु के बाद, nomination होने के कारण सारे पैसे मेरी माँ के नाम हो गए हैं। बहन की शादी हो चुकी है मेरी माँ हम दोनों छोटे भाइयों के पास रहती है। बड़ा भाई 10 साल से अलग है, वो सरकारी नौकरी पर है और अलग राशन कार्ड है, और अलग मकान है। हम दोनों छोटे भाई बेरोजगार हैं पिता की खरीदी हुई गाड़ी भी वही चलाता है जो कि मेरी माँ के नाम है और अब पिता की मृत्यु के एक महीने बाद वो हमसे अपना हिस्सा मांगने लगा है, जबकि वो हमसे 10 साल से अलग है तो क्या पिता के retirement वाले और pension वाले पेसों में उसका हिस्सा है? बताइये हमें क्या करना चाहिये?.

समाधान-

प के भाई ने आप के पिता की संपत्ति में क्या क्या अधिक ले लिया है यह एक अलग विषय है। पिता की संपत्ति में आप की माँ, आप तीनों भाई और आप  की बहन सब का बराबर का हिस्सा है। आप को बराबरी से बांटने की बात करना चाहिए था। यदि आपके भाई इस से अधिक ले लिए हैं तो गलत है, यदि शादी होने के बाद बहिन को कम दिया गया है या कुछ नहीं दिया गया है तो वह भी गलत है।

किसी भी मामले में नोमिनेशन का अर्थ होता है कि नामिनेशन करने वाले व्यक्ति की मृत्यु के बाद उस के नोमिनी को उस की राशि दे दी जाए। लेकिन इस राशि को प्राप्त करने वाला केवल एक ट्रस्टी होता है उसे वह राशि मृत व्यक्ति के उत्तराधिकारियों में समानता से बाँटनी होती है।

पेंशन पर को आप की माता जी के सिवा किसी का अधिकार नहीं है क्यों कि आप भाई बहनों में कोई भी नाबालिग नहीं है। रहा सवाल रिटायर होने पर मिलने वाली ग्रेच्युटी व भविष्य निधि और अन्य राशियों की तो यह सभी उत्तराधिकारियों तीनों भाइयों, माँ और बहिन में बराबर बाँटी जानी चाहिए।

सहदायिक संपत्ति में पुत्रियों/ स्त्रियों का अधिकार

September 21, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

मोहिनी देवी ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

रदादा द्वारा खरीदी गयी कृषि भूमि है जो 1956 के पूर्व खरीदी गयी है, परदादा की मृत्यु 1956 के पूर्व हुई है, मृत्यु पश्चात दादा के नाम हो गयी, दादा की मृत्यु 1956 के बाद हुई है और मेरे पिता की मृत्यु 1993 में हुई है। कृपया मुझे ये बताये की उक्त भूमि में मेरे पिता की मृत्यु पश्चात पुत्रियों का अधिकार उक्त कृषि भूमि में है क्या? इस कृषि भूमि में मेरे पिता द्वारा कोई वसीयत नही बनायीं गयी है?

समाधान-

क्त कृषि भूमि में आप का तथा आपके पिता की अन्य पुत्रियों का अधिकार है।

17 जून 1956 को हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी हुआ था। इस अधिनियम की धारा-6 में यह व्यवस्था थी कि जो संपत्ति सहदायिक है उस का उत्तराधिकार सर्वाइवरशिप से अर्थात प्राचीन हिन्दू विधि के अनुसार ही होता रहेगा न कि हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार।  सहदायिक संपत्ति का अर्थ था जो संपत्ति किसी पुत्र को उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हो वह सहदायिक है और उस में उस  पुरुष सन्तानों और उन की पुरुष सन्तानों को जन्म से अधिकार प्राप्त हो जाता है।

आपके परदादा की स्वयं की खरीदी हुई कृषि भूमि 1956 के पूर्व उन की मृत्यु के कारण आप के दादा को उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है। इस तरह यह संपत्ति सहदायिक हो गयी और हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होने के उपरान्त भी उस में आप के पिता और यदि उन का कोई भाई हुआ तो उस को जन्म से ही अधिकार प्राप्त होता रहा। किन्तु आप को व आप की अन्य बहनों को यह अधिकार जन्मसे प्राप्त नहीं हुआ।

इस तरह की सहदायिक संपत्ति में हिस्सा रखने वाले किसी पुरुष की मृत्यु होने पर उस के हिस्से का उत्तराधिकार सहदायिक संपत्ति के दाय के उत्तरजीविता (सर्वाइवरशिप) के नियम के अनुसार होता था। किन्तु इसी अधिनियम की धारा-6 में यह प्रावधान था कि ऐसे पुरुष की मृत्यु के समय अधिनियम की अनुसूची प्रथम में वर्णित कोई ऐसी स्त्री उत्तराधिकारी या ऐसी स्त्री के माध्यम से अपना उत्तराधिकार क्लेम करने वाला पुरुष उत्तराधिकारी हुआ तो उस के हिस्से का दाय उस पुरुष की वसीयत के द्वारा और वसीयत न होने पर अधिनियम के अनुसार होगा।

आपके पिता की मृत्यु 1993 में हुई तब आप और आप की बहने मौजूद थीं। इस कारण आप के दादा की छोड़ी हुई संपत्ति में जो हिस्सा आप के पिता को प्राप्त हुआ था वह पुश्तैनी होने पर भी उस का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार हुआ और आप को तथा आप की बहनो को पिता की संपत्ति में उन की मृत्यु के उपरान्त हिस्सा प्राप्त हुआ।जब कि आप के भाई को उसी संपत्ति में जन्म से ही अधिकार प्राप्त था। उस को जितना अधिकार जन्म से प्राप्त हो चुका था। इस कारण आपके पिता की छोड़ी हुई अविभाजित संपत्ति में आप को आपके पिता की मृत्यु के दिन से ही उत्तराधिकार के कारण हिस्सा प्राप्त है। यदि आप का कोई भाई जीवित है  तो उसे भी उस संपत्ति में आप के ही समान अधिकार प्राप्त है। लेकिन आपके भाई की कोई पुत्री 2005 के पहले पैदा हो चुकी है तो उसे 2005 में धारा 6 में किए गए संशोधन के प्रभावी होने की तिथि से आप के भाई के जीवनकाल में ही अधिकार प्राप्त हो चुका है, और यदि भाई की कोई पुत्री 2005 के संशोधन के प्रभावी होने के बाद जन्मी है तो उसे जन्म से इस सहदायिक संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

समस्या-

अब्दुल्लाह ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी तीन भाई हैं और शुरु से साथ रहते आये हैं। अब वो अलग हुये तो एक भाई ने जो सबसे बड़ा है जमीन के कुछ हिस्से पर बराबर न लेकर ज्यादा कब्ज़ा कर लिया है। अब पहले की जमीन है न उनके पास किसी तरह का कागज है न हमारे पास। पीढी दर पीढी ऐसे ही चला आ रहा था। क्या पिताजी अपने हिस्से की सही जमीन पा सकते हैं? और जो अभी कब्जे में है उसकी रजिस्ट्री कैसे कराई जाये?

समाधान-

क लंबे समय से कब्जा अचल संपत्ति के स्वामित्व का सब से प्राथमिक और मजबूत सबूत है। इस कारण संपत्ति के स्वामित्व का दस्तावेज न होने से परेशान नहीं हों। बंटवारा आपस में हुआ है इस कारण उस का पंजीकृत होना जरूरी है। यदि नहीं होता है तो बाद में कभी भी समस्या आ सकती है। इस कारण पहली जरूरी बात तो यह है कि आप के पिता व उन के भाइयों के बीच बंटवारा विलेख लिखा जा कर उसे पंजीकृत करा लिया जाए। बंटवारा विलेख की दो अतिरिक्त प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर शेष दो भाई रख लें। इस तरह संपत्ति का एक पंजीकृत दस्तावेज हासिल हो सकता है। यह कर लेना चाहिए।

आप के पिता को जमीन कम मिली है इस से केवल आपको ही असंतोष है या आप के पिता को भी है। साझे में कई बार बंटवारे के समय जो थोड़ा बहुत हिस्सा जो कम अधिक होता है उस का कोई न कोई कारण होता है। एक ही जमीन के एक हिस्से की कीमत कम और दूसरे की अधिक होती है। पहले इस का कारण पता कर लें। यदि फिर भी लगता है कि गलत हो रहा है तो बंटवारे का वाद दाखिल करें। बंटवारा कानून के अनुसार हो जाएगा।जब बंटवारे की डिक्री होगी तब संपत्ति के संबंध में एक दस्तावेज भी हो जाएगा।

समस्या-

संगीता ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं शादी शुदा हूँ और मेरी एक बहन है, वो भी शादी शुदा हैं। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी पर कार्यरत थे। दोनों बेटियों की शादी कर देने पर उन्होंने हम दोनों बहनो को बिना बताये अपने सगे भतीजे के बेटे को पंजीकृत गोद ले लिया। उसे  अपनी सम्पति का मालिक बना दिया सेवा के दौरान उनका देहांत हो गया तो क्या हम दोनों बहनो गोद नामा कैंसल करवा सकती हैं और अनुकम्पा के आधार पर नौकरी किसे मिल सकती है? हम को या दत्तक पुत्र को और मेरी सहमति के बिना दत्तक पुत्र को नौकरी मिल सकती है?

समाधान-

आप कैसे कहती हैं कि दत्तक पुत्र को आप के पिता ने संपूर्ण संपत्ति का स्वामी बना दिया? क्या उन्हों ने कोई वसीयत की है। यदि कोई वसीयत नहीं की है तो जैसे एक पुत्र के होते हुए विवाहित पुत्रियों को जो अधिकार प्राप्त हैं वे सभी अधिकार आपको प्राप्त हैं। आप कृषि भूमि के अतिरिक्त तमाम संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं और दत्तक पुत्र भी। आप तीनों  में से प्रत्येक पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में एक तिहाई हिस्से की हकदार हैं। अनुकंपा के आधार पर उस आश्रित को नियुक्ति मिल सकती है जो शेष आश्रितों की अनापत्ति ले आए।  आप की आपत्ति करेंगी या अनापत्ति नहीं देंगी तो दत्तक पुत्र अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त नहीं कर सकेगा। गोदनामा आप तभी निरस्त करवा सकती हैं जब कि वह कानून के अनुसार न हो। इस के लिए आप गोदनामा की प्रति प्राप्त कर किसी स्थानीय वकील से सलाह कर सकती हैं और गोद के नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो उसे निरस्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

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