कानूनी उपाय Archive

समस्या-

अब्दुल्लाह ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से उत्तर प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी तीन भाई हैं और शुरु से साथ रहते आये हैं। अब वो अलग हुये तो एक भाई ने जो सबसे बड़ा है जमीन के कुछ हिस्से पर बराबर न लेकर ज्यादा कब्ज़ा कर लिया है। अब पहले की जमीन है न उनके पास किसी तरह का कागज है न हमारे पास। पीढी दर पीढी ऐसे ही चला आ रहा था। क्या पिताजी अपने हिस्से की सही जमीन पा सकते हैं? और जो अभी कब्जे में है उसकी रजिस्ट्री कैसे कराई जाये?

समाधान-

क लंबे समय से कब्जा अचल संपत्ति के स्वामित्व का सब से प्राथमिक और मजबूत सबूत है। इस कारण संपत्ति के स्वामित्व का दस्तावेज न होने से परेशान नहीं हों। बंटवारा आपस में हुआ है इस कारण उस का पंजीकृत होना जरूरी है। यदि नहीं होता है तो बाद में कभी भी समस्या आ सकती है। इस कारण पहली जरूरी बात तो यह है कि आप के पिता व उन के भाइयों के बीच बंटवारा विलेख लिखा जा कर उसे पंजीकृत करा लिया जाए। बंटवारा विलेख की दो अतिरिक्त प्रमाणित प्रतियाँ प्राप्त कर शेष दो भाई रख लें। इस तरह संपत्ति का एक पंजीकृत दस्तावेज हासिल हो सकता है। यह कर लेना चाहिए।

आप के पिता को जमीन कम मिली है इस से केवल आपको ही असंतोष है या आप के पिता को भी है। साझे में कई बार बंटवारे के समय जो थोड़ा बहुत हिस्सा जो कम अधिक होता है उस का कोई न कोई कारण होता है। एक ही जमीन के एक हिस्से की कीमत कम और दूसरे की अधिक होती है। पहले इस का कारण पता कर लें। यदि फिर भी लगता है कि गलत हो रहा है तो बंटवारे का वाद दाखिल करें। बंटवारा कानून के अनुसार हो जाएगा।जब बंटवारे की डिक्री होगी तब संपत्ति के संबंध में एक दस्तावेज भी हो जाएगा।

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समस्या-

संगीता ने प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं शादी शुदा हूँ और मेरी एक बहन है, वो भी शादी शुदा हैं। मेरे पिता जी सरकारी नौकरी पर कार्यरत थे। दोनों बेटियों की शादी कर देने पर उन्होंने हम दोनों बहनो को बिना बताये अपने सगे भतीजे के बेटे को पंजीकृत गोद ले लिया। उसे  अपनी सम्पति का मालिक बना दिया सेवा के दौरान उनका देहांत हो गया तो क्या हम दोनों बहनो गोद नामा कैंसल करवा सकती हैं और अनुकम्पा के आधार पर नौकरी किसे मिल सकती है? हम को या दत्तक पुत्र को और मेरी सहमति के बिना दत्तक पुत्र को नौकरी मिल सकती है?

समाधान-

आप कैसे कहती हैं कि दत्तक पुत्र को आप के पिता ने संपूर्ण संपत्ति का स्वामी बना दिया? क्या उन्हों ने कोई वसीयत की है। यदि कोई वसीयत नहीं की है तो जैसे एक पुत्र के होते हुए विवाहित पुत्रियों को जो अधिकार प्राप्त हैं वे सभी अधिकार आपको प्राप्त हैं। आप कृषि भूमि के अतिरिक्त तमाम संपत्ति में बराबर की हिस्सेदार हैं और दत्तक पुत्र भी। आप तीनों  में से प्रत्येक पिता की छोड़ी हुई संपत्ति में एक तिहाई हिस्से की हकदार हैं। अनुकंपा के आधार पर उस आश्रित को नियुक्ति मिल सकती है जो शेष आश्रितों की अनापत्ति ले आए।  आप की आपत्ति करेंगी या अनापत्ति नहीं देंगी तो दत्तक पुत्र अनुकंपा नियुक्ति प्राप्त नहीं कर सकेगा। गोदनामा आप तभी निरस्त करवा सकती हैं जब कि वह कानून के अनुसार न हो। इस के लिए आप गोदनामा की प्रति प्राप्त कर किसी स्थानीय वकील से सलाह कर सकती हैं और गोद के नियमों का उल्लंघन हुआ हो तो उसे निरस्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

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समस्या-

नताशा ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी के 4 महीने बाद से मेरी सास और पति मुझ से मारपीट करते थे क्यूं की मेरे पति को कोई और लडकी पसन्द थी। उन्होने मुझ से दहेज के लिए शादी की थी।  अखिर मे मुझे उन लोगों ने इतना सताया कि मूझे उन का घर छोड कर अना पडा। मैं ने आपने पति के खिलाफ दहेज प्रताड़ना का केस भी कर दिया है। जिस से मेरे पति एक दिन के लिऐ जेल भी जा चुके हैं ओर दूसरी पेशी पर अदालत सबूत मांग रही है। पर मेरे पास सबूत नहीं हैं कयूं कि मेरे पास ना फोन था ना कोई पड़ौसी मेरी मदद कर रहे है। एसे मे मैं कया करूं? मे खुद ही गवाह हूं कया अदालत मुझ पर यकीन करेगा? मे एक बार पेशी पर भी नहीं गई हूं। पेशी पर नहीं जाने से कया होता है? मूझे उन जालिमों से छूटकारा चाहिए मैं कया करूं? मेरा दहेज केसे मिलेगा? मेरा आगे पीछे कोइ सहारा नहीं है जिस कारन मुझे मेरे पति से रवानगी चाहिये मैं कया करूं?

समाधान-

प के प्रश्न से यह स्पष्ट नहीं है कि आप ने दहेज प्रताड़ना का मुकदमा कैसे किया है। यदि यह मुकदमा 498ए, व धारा 406 आईपीसी में है तो इसे देखने की जिम्मेदारी पुलिस की है। इस में तो जब आप को गवाही के लिए बुलाया जाए आप अपना बयान करवा दें। बाकी सब कुछ पुलिस और सरकारी अभियोजन पक्ष देखेगा। बयान देने के सिवाय अन्य किसी भी दिन इस मुकदमे पर आप के जाने की कोई आवश्यकता नहीं है।

406 आईपीसी के केस में ही पुलिस को आपका दहेज का सामान बरामद कर के आप के सुपुर्द कर देना चाहिए था। वह क्यों नहीं हुआ यह बात आप उस पुलिस स्टेशन से पता करें जिस में आप ने रिपोर्ट दर्ज कराई थी और जिस ने आप के मामले में आप के पति को गिरफ्तार किया था।

आप को विवाह से छुटकारा प्राप्त करने के लिए अपने पति से तलाक के लिए मुकदमा करना पड़ेगा। इसी मुकदमे में आप अपना स्त्रीधन (जिसे आप दहेज का सामान कहती हैं) मांग सकती हैं और न्यायालय आप को दिला सकता है।) इस मामले में बेहतर होगा कि आप किसी स्थानीय विश्वसनीय वकील से संपर्क कर के सलाह करें।

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खेत में जाने के रास्ते के लिए एसडीओ को आवेदन प्रस्तुत करें।

September 16, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

नवरतन सैन ने रानीसर, बीकानेर से राजस्थान राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरा खेत जो कि मेरे पास के गांव बबलु की कांकड़ में पड़ता है उस खेत का मार्ग किसी व्यक्ति ने रोक दिया है और बोल रहा है कि तुम्हारा मार्ग नहीं है। जब मैंने इस सम्बन्ध में पटवारी से बात की तो वह बोला कि तुम्हारा कागजों में कटान का मार्ग नहीं है! तो अब मैं अपने खेत केसे जाउंगा और मुझे अपने खेत का ( कटान) का मार्ग कैसे मिलेगा?

समाधान-

प के खेत पर जाने का मार्ग आप को कितने वर्षों से प्राप्त था यह आप ने नहीं बताया जिस से यह निर्धारित किया जा सके कि क्या यह आप का सुखाधिकार था। यदि आप को यह मार्ग 20 वर्ष से अधिक से मिला हुआ था तो वह  सुखाधिकार हो सकता है। यदि ऐसा है तो फिर उस आधार पर सिविल न्यायालय में भी वाद किया जा सकता है और आप को उस रास्ते से जाने से रोकने के विरुद्ध निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है।

यदि आप के खेत पर जाने के लिए कोई रास्ता नहीं है और आप को अपने खेत तक जाने के लिए किसी के खेत से गुजरना ही हो तो आप राजस्थान टीनेंसी एक्ट 1955 की धारा 251 ए के अंतर्गत एसडीओ के न्यायालय में सब से कम दूरी वाला रास्ता दिलाने के लिए आवेदन कर सकते हैं।

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समस्या-

मनोज राठोड़ ने बांसवाडा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या ऐसा कोई प्रावधान है? जिस में पत्नी पति के साथ 5 वर्षो से साथ न रहती हो तो लिव इन रिलेशनशिप के तहत किसी अन्य महिला के साथ कानूनी रूप से एक नियत समय के एग्रीमेंट के साथ वह पुरुष रह सके? यदि ऐसा हो सकता है  तो किस कानून के तहत और ना तो किस कानून के तहत नहीं रह सकते?

समाधान-

ह समस्या बड़ी व्यापक है। पहले इस के कारणों पर कुछ रोशनी डाना चाहूंगा। यदि पति पत्नी के बीच विवाद हो और पति पत्नी का साथ रहना संभव नहीं रहा हो तो दोनों के बीच इन सब समस्याओं का हल केवल और केवल न्यायालय के माध्यम से ही संभव है। इस के लिए पति या पत्नी दोनों में से कोई एक को या दोनों को न्यायालय की शरण लेनी पड़ेगी। अब आप की जो समस्या है उस का मूल इस तथ्य में है कि न्यायालय कम समय में वैवाहिक विवादों का हल नहीं कर पा रहे हैं। यदि वे एक दो साल में विवाद को अंतिम रूप से हल कर दें तो यह स्थिति उत्पन्न ही नहीं होती।

एक बार जब यह तय हो गया है कि न्यायालय की मदद के बिना कोई वैवाहिक विवाद हल नहीं किया जा सकता और न्यायालयों के संचालन के लिए साधन जुटाने की जिम्मेदारी सरकार की है तो उसे पर्याप्त संख्या में पारिवारिक न्यायालय स्थापित करने चाहिए जिस से किसी भी वैवाहिक विवाद का समापन कम से कम समय में व अधिकतम एक वर्ष की अवधि में अन्तिम रूप से किया जा सके। यदि ऐसा हो सके तो यह आदर्श स्थिति होगी। लेकिन न तो इस आदर्श स्थिति में देश को पहुँचाने की मानसिकता किसी राजनैतिक पार्टी और सरकार में है और न ही सिविल सोसायटी या जनता की ओर से इस तरह का कोई आंदोलन है। इस कारण यह स्थिति फिलहाल कई सालों तक बने रहने की संभावना है। यह भी सही है कि जब हमारी न्याय व्यवस्था किसी समस्या का हल कम समय में प्रस्तुत करने में असमर्थ रहती है तो लोग न्याय व्यवस्था से इतर  उस के लिए अस्थाई हल तलाशने लगते हैं। अनेक बार ये अस्थायी हल ही लगभग स्थायी हल का रूप ले लेते हैं। लिव इन रिलेशन वैवाहिक मामलों में वर्तमान विधि और न्याय व्यवस्था की असफलता का ही परिणाम हैं।

आप ने समस्या का जो हल सुझाया है उस पर विचार करें तो पाँच वर्ष से पत्नी किसी पति से अलग रह रही है और यह अकारण है तो यह विवाह विच्छेद का एक मजबूत आधार है। यदि पृथक रहने का कोई कारण भी है तो भी इस से सप्ष्ट है कि विवाह पूरी तरह से असफल हो चुका है और न्यायालय को तलाक की डिक्री पारित कर देनी चाहिए। लेकिन हमारी न्याय व्यवस्था यह सब समय रहते नहीं कर सकती उस के पास इन कामों के लिए जज बहुत कम लगभग चौथाई हैं और समस्याएँ चार गुनी। इस कारण ऐसे पति और पत्नी लिव इन रिलेशन की बात सोचते हैं। यदि आप एग्रीमेंट के साथ किसी स्त्री के साथ लिव इन रिलेशन बनाते हैं तो उस में यौन संबंध बनना अनिवार्य होगा और आप का तलाक नहीं हुआ है तो विवाह में रहते हुए दूसरी स्त्री से यौन संबंध बनाना ऐसा कृत्य होगा जिस के कारण तलाक के लिए आप की पत्नी के पास एक मजबूत आधार तैयार हो जाएगा। चूंकि आप एक नियत समय के लिए यह एग्रीमेंट कर रहे हैं इस कारण इसे विवाह की श्रेणी में नहीं रखा जा सकता। वैसी स्थिति में यह आईपीसी या किसी अन्य कानून के अंतर्गत  किसी तरह का अपराध  तो नहीं होगा, लेकिन इसे पत्नी के प्रति क्रूरता की श्रैणी में रखा जा सकता है। जिस से पत्नी या पति मानसिक रूप से पीड़ित हो कर आत्महत्या के लिए प्रेरित हो सकता/ सकती है।  तब यह धारा 498-ए का अपराध हो सकता है। हमारी राय यह है कि तलाक होने के पूर्व किसी भी तरह किसी भी पक्ष द्वारा एग्रीमेंट के माध्यम से लिव इन रिलेशन में रहना अपराध हो सकता है। इस से बचना चाहिए।

फिर भी जो वर्तमान परिस्थितियाँ हैं उन में लोग ऐसे वैकल्पिक मार्ग निकालते रहेंगे जिन से जीवन को कुछ आसान बनाया जा सके। यह तब तक होता रहेगा जब तक हमारी न्याय व्यवस्था पर्याप्त और कानून सामाजिक परिस्थितियों के लिए पूरी तरह उचित नहीं हो जाएंगे।

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जमानत के लिए हैसियत प्रमाण पत्र मांगा जाना कानूनी नहीं है।

September 11, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

इरशाद मोहम्मद मंसूरी ने बकानी, जिला झालावाड़, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

धारा 107, 151 दंड प्रक्रिया संहिता के मामले में हैसियत प्रमाण जरूरी है क्या? जरूरी हो तो कितने का होना चाहिए?

 

समाधान- 

धारा 107, 151 दंड प्रक्रिया संहिता के उपबंध किसी अपराध को घटने से रोकने के लिए हैं। धारा 151 में पुलिस को किसी व्यक्ति को तब गिरफ्तार करने की शक्ति दी गयी है जब कि उस के किसी कृत्य  से समाज में शान्ति भंग होने की संभावना उत्पन्न हो जाए। किसी भी  व्यक्ति के गिरफ्तार होने के 24 घंटों में उसे न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत किया जाना जरूरी है। इस तरह गिरफ्तार व्यक्ति को धारा 107 में एक परिवाद बना कर किसी कार्यपालक  दंडनायक के समक्ष प्रस्तुत करती है। इस धारा में कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह शक्ति प्रदान की गयी है कि शान्ति भंग होने की संभावना प्रमाणित होने पर उस व्यक्ति को छह माह या एक वर्ष तक की अवधि के लिए जमानत मुचलके पर पाबंद करे कि वह शान्ति बनाए रखे और शान्ति भंग करते हुए पाया जाएगा तो उस की जमानत और मुचलके की राशि की जब्ती कर ली जाएगी।

कभी कभी इस तरह के परिवादों में धारा 116(3) भी जुड़ी होती है। इस धारा के अंतर्गत कार्यपालक मजिस्ट्रेट को यह शक्ति है कि यदि उसे सुनवाई के दौरान भी शांति भंग की आशंका होती है तो वह तुरन्त जमानत और मुचलके से व्यक्ति को पाबंद कर सकता है।

इन सभी मामलों में कानून यह है कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट जो जमानत लेता है वह उस मजिस्ट्रेट की संतुष्टि की होनी चाहिए। मजिस्ट्रेट को ऐसी संतुष्टि जमानत देने वाले व्यक्ति की संपत्ति के स्वामित्व के मूल दस्तावेज देख कर कर लेनी चाहिए। उस के लिए हैसियत प्रमाण पत्र न तो आवश्यक है और न ही जरूरी है। जब मजिस्ट्रेट को लगे कि उसे अभी जमानत नहीं लेनी चाहिए तो वह जानबूझ कर ऐसा आदेश देता है कि वह हैसियत प्रमाण पत्र प्रस्तुत करे। यदि यह पहले से बना न हो तो इसे बनाने मेे कई दिन लग जाते हैं। यह तहसीलदार बनाता है जो कि कार्यपालक मजिस्ट्रेट के अधीन होता है या उस से नीचे की रैंक का अधिकारी होता है कही कहीं जहाँ तहसीलदार खुद कार्यपालक मजिस्ट्रेट हो तो वह भी उसे खुद ही बनाना होता है। इस तरह गिरफ्तार व्यक्ति को गिरफ्तारी में रोके रखने का एक कानूनी कारण तैयार कर लिया जाता है। वस्तुतः इस तरह का आदेश गैर कानूनी है और व्यक्ति के मूुल अधिकारोे का उल्लंघन करता है। इस तरह के आदेश को सेशन न्यायालय तथा उच्च न्यायालय के समक्ष चुनौती दी जा सकती है । लेकिन उस न्यायलय से ऐसे आदेश को निरस्त कराने में कम से कम दो तीन दिन का समय लग जाता है। कार्यपालक मजिस्ट्रेट की मंशा भी ऐसे व्यक्ति को दो-चार दिन रोकने की ही होती है। इस कारण आम तौर पर इस तरह के आदेश को कोई चुनौती नहीं देता है।

हैसियत प्रमाण पत्र उतनी राशि का होना चाहिए जितनी राशि की जमानत मांगी गयी हो।सामान्य तौर पर इस काम के लिए एक लाख की हैसियत का प्रमाण पत्र पर्याप्त होता है।

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न्याय के लिए जल्दी से जल्दी न्यायालय का द्वार खटखटाएँ।

September 9, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कृष्ण ने नोएडा उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैंने 25 साल पहले 40000 रू. पगड़ी पर दुकान दी थी। अब मुझे दोबारा मकान बनाना है। दुकान खाली करने के लिए उसको 5 लाख का ऑफर दिया लेकिन वो 20 लाख मांग रहा है। 10 साल से किराया भी नहीं देता। उसने यहाँ के लोगों से 20 लाख रुपए उधार ले रखे थे। पैसे ना होने की वजह से उसकी दूकान 7 महीनो से बंद है। उसका भी कोई पता नहीं। क्या में उसकी दुकान खाली करवा सकता हूँ?

समाधान-

प बड़े सुस्त व्यक्ति हैं। आप के किराएदार ने दस साल से किराया नहीं दिया है और आप अब पूछ रहे हैं कि क्या मैं दुकान खाली करवा सकता हूँ। यदि किराया छह माह का भी बकाया हो जाए तो तुरन्त किराएदार को नोटिस दे कर वसूली के वाद के साथ दुकान खाली करने का वाद संस्थित करना चाहिए। लेकिन आप ने यह सब नहीं किया। यदि एक संपत्ति का स्वामी इतना सुस्त होगा तो उस की संपत्ति ही संकट में पड़ जाएगी। न्याय का सिद्धान्त यह है कि पीड़ित को शीघ्र से शीघ्र न्यायालय के पास फरियाद ले कर जाना चाहिए। वह जितनी देरी करेगा उतना ही न्याय उस से दूर चला जाएगा।

देरी का नतीजा यह है कि आप कभी भी तीन वर्ष से अधिक का किराया वसूल करने के लिए न्यायालय में कोई वाद संस्थित नहीं कर सकते। अब भी देरी न करें। तुरन्त दुकान खाली करने का वाद संस्थित करें। दुकान खाली कराने के आधारों में व्यक्तिगत आवश्यकता के लिए मकान का पुनर्निर्माण, किराया अदायगी में कानूनी चूक तथा छह माह से अधिक समय से दुकान का उपयोग न करने को शामिल करें।

याद रखे कि पगड़ी पर दुकान देना और दुकान खाली करने के लिए धनराशि मांगना अपराध हैं। इन्हें स्वीकार करने वाले को दंडित कराने के लिए अभिजोजन पक्ष को अधिक समस्या नहीं होती।

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विक्रय निरस्त करने, विभाजन और पृथक हिस्से के कब्जे का वाद

September 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कल्पना ने फरीदाबाद, हरयाणा से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने अपनी पैतृक जमींन अपनी पुत्र वधू के नाम 6 वर्ष पूर्व बेच दी। पिताजी को किसी प्रकार की आर्थिक आवश्यकता नहीं थी तथा पुत्र वधू किसी प्रकार की आय नहीं करती थी। अब मेरे पिताजी और मेरा बड़ा भाई मुझे, मेरे बच्चों व मेरे पति का मान सम्मान नहीं करते व हमें गाली-गालोंज भी करते है। .क्या अब मैं अपना हक/ ज़मीन वापस ले सकती हूँ?  समाज में बेटी के मान-सम्मान का भी प्रश्न है। कृपया राह सुझाएँ।

समाधान-

प पहले जाँच लें कि जमीन पैतृक ही है। कौन सी जमीन पैतृक है जिस में संतानों का जन्म से अधिकार होता है इस पर तीसरा खंबा पर पहले पोस्टें लिखी जा चुकी हैं, उन्हें सर्च कर के पढ़ लें। लड़कियों को 2005 से पैतृक संपत्ति में अधिकार मिला है। आप की जमीन की बिक्री बाद में हुई है। इस तरह आप जमीन के विक्रय को चुनौती दे सकती हैं। इस मामले में लिमिटेशन की बाधा भी नहीं आएगी। यदि पिता किसी संतान का का हक किसी और को दे देता है तो वाद 12 वर्ष तक की अवधि में किया जा सकता है। आप को चाहिए कि आप विक्रय पत्र निरस्त करवाने तथा संपत्ति का बँटवारा कर आप का हिस्सा अलग करते हुए उस का पृथक कब्जा आप को देने का वाद दीवानी न्यायालय में संस्थित करें।

 

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पति को प्रतिबंधित करना पड़ेगा।

September 3, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

कविता ने इन्दौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी को 14 साल हो गए हैं 2 बच्चे हैं। शादी बहुत जल्दी मे हुई थी दोनों परिवार आपस में एक दूसरे को समझ नहीं पाए। मेरे पापा ने अपनी क्षमता अनुसार शादी की परन्तु ससुराल वालों को व्यवस्थाओं मे भारी कमी लगी। ससुराल वाले मुझसे पहले दिन से ही शिकायत करने लगे। पति को काफी भड़काया ना पति का व्यवहार मेरे साथ ठीक था ना परिवार का। मेरे पति सरकारी नौकरी में थे परन्तु उन्होंने मुझे अपने साथ नही रखा, मुझसे कहते थे तुम्हे मम्मी पापा के साथ ही रहना होगा। देवर ननद दोनों की शादी पहले ही हो चुकी थी। देवर भी अपनी पत्नी को साथ ले गया था। पति हर शनिवार आते थे और जब भी आते थे शादी की कमियों को लेकर झगड़ा करते थे। मै नौकरी भी छोड़ चुकी थी। मेरे पास रोने के अलावा कोई रास्ता नही था फिर भी माता पिता और मैं रिश्ते को सामान्य करने के लिए कोशिश करते रहे। एक साल तक सिर्फ़ झगड़े होते रहे। विवाह विच्छेद जैसी बात कभी दिमाग में ही नही थी। मैने इन सब के साथ भी पढ़ाई जारी रखी मेरा अब बड़े पद पर चयन हो गया। लेकिन पति और ससुराल वाले नौकरी के सख्त खिलाफ थे। उन्होंने शर्त रखी यदि नौकरी करेगी तो हम रखेंगे नही। मेरे ससुराल वाले ना तो मेरा कोई खर्च उठा रहे थे। कम दहेज के लिए ताने मारते रहते थे। उस समय मै तीन महीने के गर्भ से थी जीवन भर मैं अपने पापा पर निर्भर नहीं रहना चाहती थी इसलिए मैने मेरे परिवार की हिम्मत से नौकरी कर ली। तब से अभी तक ससुराल वाले मुझसे कोई रिश्ता नही रखते। धीरे धीरे पति आने लगे लेकिन मुझे ससुराल नहीं ले जाते थे। फिर मैंने महिला परामर्श केन्द्र में शिकायत की फिर ससुराल वालों ने पति के साथ घर में आने की इजाजत दी। पति अब साथ में ही रहते हैं लेकिन ससुराल वाले अभी भी रिश्ता नहीं रखते। मै जब भी जाने की कोशिश करती हूँ ससुराल में सास देवर देरानी ताने मारते हैं। कभी कोई बात नहीं करते। देवर ननद को फोन करती हूँ तो भी बात नहीं करते हैं। पति के अपने परिवार से सामान्य रिश्ते हैं परन्तु मुझसे अभी भी वैसे ही हैम मै यदि शिकायत करती हूँ तो कहते हैं, तुम बहू हो तुम्हें ऐसे ही रहना होगा। मै 14 सालों से उपेक्षित हूँ। लगातार अपमान सह सह कर मैं मानसिक रूप से परेशान हो गयी हूँ। पति कहते हैं तुम्हे हमेशा ऐसे ही रहना है। मै कुछ नहीं कर सकता। पति का बेटियों के प्रति प्रेम देखकर मै कोई कानूनी कदम नहीं उठाना चाहती परन्तु अब यह अपमान की जिन्दगी जीते नहीं बन रही है। समझ नहीं आ रहा है क्या करूँ?

समाधान-

प का अपमान सास, ननद और देवर ही नहीं कर रहे हैं। आप के पति भी कर रहे हैं। आप की सास, ननद और देवरों से अधिक कर रहे हैं। पति का बेटियों के प्रति प्रेम है तो कुछ उन्हें भी उस के लिए त्याग करना चाहिए। आप आत्मनिर्भर हो कर भी इतने बरसों से क्यों सहन कर रही हैं यह हमारी भी समझ से परे हैं।

आप कानूनी कार्यवाही नहीं करना चाहती हैं तो न करें। लेकिन मानसिक परेशानी से बचने के लिए पति को स्पष्ट रूप से कह दें कि उन्हें अपने परिवार और आप में से एक को चुनना पड़ेगा। यदि वे परिवार को चुनना चाहते हैं तो आप से और बेटियों से रिश्ता समाप्त समझें और आपसे व बेटियों से मिलने आना बन्द करें। वे फिर भी नहीं मानते हैं तो हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत न्यायिक पृथक्करण के लिए आवेदन अवश्य कर दें। उस आवेदन में अन्तरिम रूप से यह आवेदन भी प्रस्तुत करें कि आप के पति को आदेश दिया जाए कि वह आप से दूर रहें। इस के बाद देखें कि क्या होता है? आगे का रास्ता आप के पति की प्रतिक्रिया पर निर्भर करेगा।

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संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदार अपना हिस्सा विक्रय कर सकता है।

September 2, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ज़मीला खातून निवासी बाराबंकी, हाल सीतापुर मैंने सन १९९५ में एक ६०० स्क्वायर फुट का घर ख़रीदा था। उस बैनामे पर मेरा नाम व मेरी ५ पुत्रियों के नाम भी अंकित हैं। अब मैं अपना मकान बेचना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बड़ी पुत्री उसमे टांग मार रही है और उससे मेरा विवाद चल रहा है। तो कृपा करके उसके बेचने का हल बताएँ कि किस प्रकार मैं उसे बेच सकती हूँ? क्या उसमें मैं कोई केस करूँ या पुलिस से शिकायत करूँ? अभी मकान में ताला पड़ा है। मेरी ५ नंबर की पुत्री जिससे मेरा विवाद चल रहा है वो भी अब उस मकान में नहीं रहती है परन्तु जबरन पूरा मकान हथियाना चाह रही है।

समाधान-

प का मकान एक संयुक्त संपत्ति है। इस के छह हिस्सेदार हैं। इस कारण कोई भी हिस्सेदार पूरा मकान नहीं बेच सकते। पूरा मकान सभी छह हिस्सेदार मिल कर ही बेच सकते हैं। हाँ आप पाँच हिस्सेदार अर्थात आप और आप की चार बेटियाँ मिल कर मकान के पाँच हिस्से बेच सकते हैं और मकान का कब्जा आप के पास हो तो खरीददार को हस्तान्तरित कर सकते हैं। लेकिन इस के बाद आपत्ति करने वाली पुत्री का छठा हिस्सा उस मकान में उसी का बना रहेगा। चाहे तो खरीददार प्रयत्न कर के आप की बेटी से छठा हिस्सा भी बाद में खरीद सकता है। या आप की आपत्ति करने वाली बेटी विभाजन का वाद कर सकती है। मकान छोटा होने से उस के भौतिक विभाजन की संभावना नहीं होने से स्थिति यही होगी कि बेटी को कहा जाएगा कि जो भी बाजार मूल्य है उस का छठा हिस्सा ले कर अपना हिस्सा छोड़ दे।

दूसरा रास्ता है कि आप बंटवारे का वाद प्रस्तुत करें और विभाजन करवाएँ विभाजन की कार्यवाही में भी वही होगा जो पहले हम बता चुके हैं। जब आप बेटी का हिस्सा खरीद लें तब आप पूरा मकान बेच सकती हैं।

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