कानूनी उपाय Archive

हक तर्क करना या रिलीज डीड निष्पादित करना क्या है?

June 15, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

सुरेन्द्र पाल सिंह ने बालोतरा, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

क्या किसी नाबालिग (18 वर्ष से कम) के नाम जमीन का हक तर्क किया जा सकता हे? हक तर्क करने के नियम क्या है ?  हक तर्क से सम्बंधित नियम और कानून की जानकारी कौन सी किताब या नियमावली या अधिनियम में मिल सकती है? जानकारी प्रदान करवाने की कृपा करावे।

समाधान-

क तर्क करना अथवा रिलीजी डीड निष्पादित करने का अर्थ है किसी संपत्ति में अपने अधिकार को किसी दूसरे के हक में छोड़ देना है। लेकिन  इस के लिए जरूरी है कि जो हक तर्क कर रहा है और जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है दोनों एक ही सम्पत्ति में हिस्सेदार हों और संपत्ति संयुक्त हो। जैसे किसी व्यक्ति के देहान्त के उपरान्त उत्तराधिकार में संपत्ति उस के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो जाती है। तब कोई एक या अधिक उत्तराधिकारी किसी दूसरे उत्तराधिकारी के हक में अपना हक छोड़ सकते हैं। दो लोगों ने संयुक्त रूप से संपत्ति खरीदी हो और दोनों संयुक्त स्वामी हों तो उन में से एक दूसरे के हक में हक त्याग कर सकता है।
हक तर्क करने वाले का वयस्क होना जरूरी है।  जिस के हक में हक तर्क किया जा रहा है उस का बालिग होना जरूरी नहीं है वह नाबालिग हो सकता है। हक तर्क करना एक प्रकार से संपत्ति का हस्तान्तरण है और 100 रुपए से अधिक मूल्य की अचल संपत्ति के हस्तान्तरण का पंजीकरण होना जरूरी है। यदि हक तर्क की जाने वाली सम्पत्ति का मूल्य यदि 100 रुपए से अधिक है और वह अचल संपत्ति है तो हक तर्क करने के दस्तावेज का पंजीकृत होना जरूरी है।
हक तर्क करने / रिलीज डीड निष्पादन के मामले में दो अधिनियम सामने हैं। एक तो संपत्ति हस्तान्तरण अधिनियम और दूसरा पंजीकरण अधिनियम। पंजीकरण के लिए स्टाम्प ड्यूटी और फीस का पता करना भी जरूरी है क्यों कि रिलीज डीड पर पंजीकरण शुल्क अन्य हस्तान्तरणों से कम है।

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व्यर्थ मुकदमे में भी प्रतिरक्षा करना जरूरी है।

June 14, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

शिवानी ने इलाहाबाद, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे ताऊजी का अपनी पत्नी से 2008 से घरेलू हिंसा का मुकदमा चल रहा है, जिस में न्यायालय ने सितम्बर 2016 में निर्णय देते हुए भरण पोषण के लिए 5000 रूपये प्रति माह देने और 20000 रुपए एक मुश्त क्षतिपूर्ति देने के लिए कहा है। ताऊजी सेंट्रल गवर्नमेंट के पेंशनर है और चलने फिरने उठने बैठने में असमर्थ है। उनके कोई संतान नहीं है। लड़का था, उसकी मृत्यु 2005 में रोड एक्सीडेंट में हो गयी थी। ताऊजी की देखभाल मेरी माँ करती है । वह भी केंद्रीय कर्मचारी है । मेरे पिताजी की भी मृत्यु हो चुकी है 1994 में। मेरे चाचा भी हैं हम सभी एक घर में रहते हैं। चाचा ने बटवारे का मुकदमा दर्ज किया था 2008 में, जिस में  प्राथमिक डिक्री 2011 में हुई जिसमें चाचा का एक तिहाई हिस्सा घोषित किया गया। फाइनल डिक्री के लिए मेरी माँ की तरफ से 2017 जनवरी में आवेदन दिया गया है जो विचाराधीन है। मैं जानना चाहती हूँ की क्या ताऊ जी के हिस्से में ताईं जी का भी हिस्सा बनता है? ताऊजी के मरने के बाद ताऊ जी ने अपनी रजिस्टर्ड वसीयत मेरे यानि अपनी भतीजी के नाम कर रखी है। ताईजी क्या हिस्से की मांग कर सकती है। डाइवोर्स का केस ख़ारिज हो चुका है। ताई जी का कहना है कि वह परेशान करने के लिए ये सब कर रही है, मुझे कुछ मिले न मिले वकीलो को दिलवाऊंगी और भरना पोषण के लिए और ज्यादा पैसों की मांग के लिए 127 में केस करुंगी। ताऊजी की जिंदगी का कोई भरोसा नहीं है मार्गदर्शन करें।क्योंकि मेरी माँ ही उनकी देखभाल करती है तो यदि ताऊजी को कुछ हो जाता है तो उसमें मेरी माँ को तो कोई दिक्कत नहीं हो जायेगी। क्योंकि ताई जी ने माँ के ऊपर भी ताऊजी से सम्बन्ध के आरोप लगाए हैं।

समाधान-

केवल आरोप लगा देने से कोई चीज सिद्ध नहीं हो जाती। और कानूनी निर्णय और अधिकार ठोस सबूतों पर निर्भर करते हैं। आप की माँ पर आरोप लगा देने से उन का कुछ बिगड़ने वाला नहीं है। उन्हें कानून की तरफ से कोई परेशानी नहीं होगी। ताऊजी का जो हिस्सा है यदि उन्हों ने उसे वसीयत कर दिया है तो उस का दाय वसीयत के अनुसार होगा बशर्ते कि ताऊजी और कोई वसीयत न करें या की हुई वसीयत में अपने जीवनकाल में कोई बदलाव न करें।

जहाँ तक नाराज और बदले पर उतारू ताईजी का प्रश्न है तो वे कुछ भी कर सकती हैं। वे जितने चाहें मुकदमे करें। आप और आप की माँ पर उस का कोई असर नहीं होगा। हाँ वे यह कर सकती हैं ताऊजी के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत को चुनौती दे दें। तब आप को फिजूल में मुकदमा लड़ना पड़ सकता है। आप को कोई अन्य फर्क नहीं पड़ेगा। पर यह भी याद रखें कि यदि किसी के विरुद्ध बेकार और बेदम मुकदमा भी होता है और उस में प्रतिरक्षा ठीक से न की जाए तो उस से नुकसान भी हो सकता है। इस लिए सावधान रहना और अपनी प्रतिरक्षा करने की सजगता रखना आप के लिए आवश्यक है।

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बिना रसीद के किराया अदा करना पैसे को पानी में फैंकना है।

June 13, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विकास सिंह ने आजादपुर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

म 3० दुकादार पिछले 9 सालों से एक कॉम्पलेक्स में शॉप चला रहे हैं। जिसका किराया 5000 है और एग्रीमेंट 36 महीने का (बिना रजिस्टर्ड वाला) होता था। किराया हर एग्रीमेंट के ख़त्म होने के बाद 10% बढ़ता था। हमारा वो एग्रीमेंट ख़तम हो गया, लेकिन नया नहीं बना रहा। मकान मालिक सबको बहुत परेशान करता था और अब हम सबको दुकाने खाली करने की धमकी दे रहा है। किराया लेना भी बंद कर दिया। उसने किसी को भी पिछले 3 सालो में किराये की रसीद नहीं दी, न कभी चेक से किराया लिया। हमेशा बहाने बनाता था। अब हम क्या करें। क्या कोर्ट में किराया जमा करवायें? या उसके नोटिस का इंतज़ार करे। क्या वो हम सबसे दुकानें खली करवा सकते हैं।

समाधान-

प लोगों की सब से बड़ी गलती है कि आप ने मकान मालिक को बिना रसीद के किराया दिया है। बिना रसीद के दिया हुआ किराया भुगतान किया हुआ नहीं माना जा सकता। बिना रसीद के किराया अदा करना पैसे को पानी में फैंकना है। मकान मालिक 3 साल से अधिक के किराए की मांग नहीं कर सकता।  लेकिन वह 3 साल का किराया बकाया बता कर किराया अदायगी में कानूनी चूक के आधार पर दुकान खाली कराने का दावा कर सकता है। इस तरह आप को 3 साल का किराया जो आप दे चुके हैं वह दुबारा देना पड़ सकता है।

हमारी राय यह है कि आप सभी दुकानदार न्यायालय में आवेदन प्रस्तुत कर चालू किराया यह कह कर अदालत में जमा करवा दें कि दुकानदार किराया ले कर रसीद नहीं देता। पहले हम उस के विश्वास पर थे पर अब जब उस से रसीद मांगी तो उस ने मना कर दिया इस कारण बकाया किराया जमा करवा रहे हैं।

हो सकता है मकान मालिक नोटिस दे कर पिछला किराया बकाया बताए। बाद में दुकान खाली करने का दावा करे। उस स्थिति में न्यायालय दावे में बकाया किराए का निर्धारण करे। तब यदि न्यायालय आदेश देता है तो आप को पिछले तीन वर्ष के किराए में से उतना किराया दुबारा देना पड़ेगा जितना न्यायालय निर्धारित करती है। यदि कोर्ट द्वारा निर्धारित किराया  आदेश से एक माह में जमा नहीं करवाएंगे तो दुकान किराया अदायगी में चूक के आधार पर खाली करने का निर्णय हो सकता है।

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आप ने मकान का स्वामित्व नहीं बल्कि केवल कब्जा खरीदा है।

June 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राधेश्याम ने इंदौर, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिताजी ने २०१२ में इंदौर में एक मकान ३०० वर्गफुट जिस पर चद्दर का शेड है, 1,25,000/- रूपये में ख़रीदा था, जिसकी १०० रूपये के स्टाम्प पर नोटरी करायी गयी थी! उस वक़्त पिताजी के पास रजिस्ट्री कराने के पैसे उपलब्ध नहीं थे इसलिए उस वक़्त सिर्फ नोटरी कराकर कब्ज़ा हासिल कर लिया था, बाद में पैसे आने पर जब पुराने मकान मालिक से रजिस्ट्री कराने के लिए कहा तो उसने साफ़ इनकार कर दिया और कहा कि मकान का अब न तो हमारे पास पट्टा है और न हॉं कोई लिखा पढ़ी है ! जबकि पुराना मकान मालिक उस मकान में पिछले बीस वर्षों से रह रहा था! और नगर पालिका में संपत्ति कर भी भर रहा था, जो की अब हम भर रहे हैं, लेकिन मकान मालिक के नाम से (हस्ते में पिताजी का नाम)। एक नयी बात पता चली कि उस मकान सम्बन्धी और आसपास के मकान पर जमीन विवादित कोर्ट में केस चल रहा है। लेकिन अभी तक हमारे पास उक्त सम्बन्ध में कोई भी नोटिस या कानूनी तौर पर किसी ने कुछ भी नहीं कहा। सिर्फ आसपास वाले ही हमें भयभीत करते है कि आपने यह मकान क्यों लिया यह तो कभी भी टूट सकता है। मेरे पिताजी मकान में दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं परन्तु अनचाहे डर से भयभीत हैं! मेरे पिताजी की उम्र ७५ वर्ष है, और इस विषय को लेकर वो बहुत चिंतित रहते हैं! इस स्थिति में हमें क्या कदम उठाना चाहिए?

समाधान-

प के पिताजी ने 300 वर्गफुट जमीन और उस पर बने मकान को खरीदा नहीं है बल्कि केवल खरीदने का सौदा किया है। किसी भी अचल संपत्ति का जिस का मूल्य 100 रुपये या उस से अधिक का हो खऱीदना तभी पूर्ण हो सकता है जब कि उस का विक्रय पत्र पंजीकृत करवा दिया हो। इस कारण जो नोटेरी से प्रमाणित दस्तावेज है वह केवल मकान खरीदने का एग्रीमेंट या अनुबंध है।

किसी भी वस्तु को वही विक्रय कर सकता है जिस का वह स्वामी हो या स्वामी से उसे उस वस्तु को विक्रय करने का लिखित अधिकार मुख्तार नामे से प्राप्त हो। आप बता रहे हैं कि विक्रेता के पास न तो पट्टा है और न ही कोई लिखा पढ़ी है। इस से पता लगता है कि उक्त विक्रेता के पास भी उस मकान का कब्जा ही है हो सकता है यह कब्जा बीस वर्ष से बना हुआ हो। इस प्रकार आप के पिताजी ने उस व्यक्ति से केवल उस मकान का कब्जा खरीदा है जो उस व्यक्ति के पास था।

अब आप को यह पता करना चाहिए कि वह जमीन किस की है और उस पर कैसा मुकदमा चल रहा है। यह तो स्थानीय रूप से पता करने पर ही पता चल सकता है। नगर निगम आदि से यह पता किया जा सकता है कि वह जमीन किस की है। उसी से यह भी पता लग सकता है कि यदि कोई मुकदमा चल रहा है तो वह किस का किस के विरुद्ध हो सकता है। आम तौर पर यदि वह जमीन किसी की निजी हुई तो उस पर से आप को कोई हटा नहीं सकेगा। बस आप को प्रमाणित करना पड़ेगा कि जिस व्यक्ति ने आप को कब्जा बेचा है वह उस पर बीस वर्ष से काबिज था। और उस जमीन या मकान से संबंधित मुकदमे से बेचने वाले का कोई लेना देना नहीं था। वैसे भी जिस मूल्य में आप के पिताजी ने मकान लिया है उस में इसी तरह का विवादित भूखंड मिल पाना इंदौर नगर में  मुमकिन था। हो सकता है कभी उस मामले में निर्णय हो जाए और बाद में नगर निगम या न्यास आदि वहाँ काबिज लोगों को पट्टे जारी कर दे। तब आप के पिताजी उस संपत्ति के स्वामी हो जाएँ। पर इस सब के लिए सतर्क रहना होगा और पट्टा जारी करने की कार्यवाही करते रहना होगा। तब तक यदि आप दूसरी मंजिल बनाना चाहते हैं तो बना कर रह सकते हैं। जितना रिस्क इस संपत्ति के छिनने का है उतना ही दूसरी मंजिल का भी होगा। पर कब्जा बना कर उसी मकान में रहते रहेंगे तब ही इस संपत्ति को आप बचा सकेंगे।

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समस्या-

राहुल मेहरा ने गाजियाबाद, उत्तर प्रदेस से समस्या भेजी है कि-

मने लगभग 1 साल पहले ग़ाज़ियाबाद उत्तर प्रदेश में अपना घर किराये पर दिया। कुछ महीनो के पश्चात वहां रहने वाले पड़ोसियों ने शिकायत की कि हमारे किरायेदार घर में अवैध शराब का कारोबार करता है। हमने किरायेदार को मकान खाली करने को बोला तो वह खाली नहीं कर रहा है। अब न तो वह मकान खाली कर रहा और पिछले 4 महीनो से न तो वह किराया दे रहा न बिजली का बिल जमा कर रहा। क्या उपाय संभव है कृपया सहायता कीजिये।

समाधान-

दि किरायेदार बिजली का बिल नहीं जमा कर रहा है तो सब से पहले बिजली कंपनी को आवेदन प्रस्तुत कर बिजली का कनेक्शन कटवा दें।

यदि यह शिकायत सच है कि किराएदार शराब के अवैध कारोबार में लिप्त है तो सीधे पुलिस और प्रशासन के उच्चाधिकारियों को शिकायत करें। क्यों कि इस तरह के कारोबारियों की स्थानीय पुलिस से सैटिंग होती है और कोई कार्यवाही नहीं होती। पुलिस को की गयी शिकायत की प्रति अवश्य रखें।

किसी वकील से मिल कर किराएदार को बकाया किराया जमा कराने, मकान खाली कराने का नोटिस दिलवाएँ। वकील को कहें कि मकान खाली कराने के जितने आधार हो सकते हैं उन मे से जितने आधार काम में लिए जा सकते हैं उन का नोटिस में उल्लेख करें। नोटिस की अवधि समाप्त हो जाने पर तुरन्त मकान खाली कराने तथा बकाया किराया प्राप्त करने का दावा न्यायालय में प्रस्तत करें।

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बंटवारे का वाद प्रस्तुत कर न्यायालय से बंटवारा कराएँ।

June 10, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

उमाकान्त ने देवी तहसील सौसर, जिला छिंदवाड़ा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

दादाजी ने अपने जीवनकाल में कोई बंटवारा नहीं किया और न ही नाप के हिसाब से जोतने के लिए दिया। लेकिन उन की मृत्यु के बाद जिन्हें जोतने को ज्यादा मिला वे बंटवारा नहीं चाहते लेकिन बाकी हिस्सेदार बंटवारा चाहते हैं। हमन कुछ कानूनी कार्यवाही की लेकिन उन्हों ने जानपहचान से रद्द करवा दी। बताए हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

प ने क्या कानूनी कार्यवाही की यह नहीं बताया। हमें लगता है कि आप ने कोई कानूनी कार्यवाही नहीं की बल्कि आप राजस्व अधिकारियों को फिजूल मैं आवेदन देते रहे। अब आप की समस्या का हल न्यायालय द्वारा बंटवारे में है। आप ने यह भी नहीं बताया है कि दादाजी के देहान्त के बाद नामान्तरण भी हुआ है या नहीं। यदि नहीं हुआ है तो नामान्तरण कराना चाहिए।

यदि नामान्तरण हो गया है तो ठीक वर्ना नामान्तरण की कार्यवाही के साथ साथ आप को चाहिए कि आप राजस्व न्यायालय में अपनी जमीन के बंटवारे, खाते अलग अलग करने और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा दिलाए जाने के लिए वाद प्रस्तुत करें। बाकी सभी हिस्सेदार और राज्य सरकार जरिए तहसीलदार पक्षकार बनेंगे। यह वाद तब तक चलेगा जब तक कि बंटवारा हो कर सब को अपने अपने हिस्से पर अलग कब्जा न मिल जाए।

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समस्या-

ना़जिया खान ने लखनऊ, उत्तर प्रदेश  से भेजी है कि-

क्या सरकारी नौकरी वाला बिना सरकारी इजाजत के दूसरी शादी कर सकता है? और दूसरी बात ये कि क्या पीएफ में जिस का नाम नौमिनी के रूप में दर्ज  है उसी को मिलता है?

समाधान-

दि किसी व्यक्ति की पर्सनल लॉ में दूसरा विवाह करना अवैध नहीं है तो वह व्यक्ति दूसरा विवाह कर सकता है। यदि किसी नौकरी के नियमों में यह शर्त है कि वह दूसरा विवाह बिना अनुमति के नहीं कर सकता तो वैसी स्थिति में दूसरा विवाह करने के बाद शिकायत हो जाने पर ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध नौकरी मेें अनुशासनिक कार्यवाही की जा सकती है और परिणाम स्वरूप नौकरी से बर्खास्त किया जा सकता है। लेकिन यदि उस की मृत्यु हो गयी है तो फिर कुछ भी नहीं किया जा सकता।

यदि कोई आपत्ति नहीं करे तो पीएफ अर्थात भविष्यनिधि की राशि नौमिनी को ही दी जाती है। लेकिन नौमिनी के पास यह राशि एक ट्रस्टी के रूप में होती है और नौमिनी की यह जिम्मेदारी होती है कि वह इस राशि को उस के उत्तराधिकारियों में नियम के अनुसार वितरित कर दे। यदि किसी उत्तराधिकारी को आशंका हो कि नौमिनी सारी राशि उस के उत्तराधिकारियों को देने के बजय खुद रख सकता है तो वे उस की विभाग को शिकायत कर सकते हैं और जिला न्यायाधीश के यहाँ उत्तराधिकार प्रमाण पत्र के लिए आवेदन प्रस्तुत कर सकते हैं और पीएफ की राशि के भुगतान को रोकने का आदेश जिला न्यायाधीश से प्राप्त कर सकते हैं।

 

 

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समस्या-

राधेश्याम गुप्ता ने इंदौर , मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मैंने इंदौर जिला कोर्ट में २०१३ से धारा १३८ का परिवाद प्रस्तुत किया था, आरोपी ने मुझे २,१५०००/- का चेक दिया था जो बैंक में अनादरित हो गया था। उसके पश्चात मैंने केस दायर किया था, जो कि अभी तक चल रहा है। नोटिस, जमानती वारंट के बाद अब गिरफ्तारी वारंट तक जारी हो चुका है, परन्तु आरोपी पुलिस की पकड़ से बाहर है।  मैंने परिवाद में आरोपी के दो पते दिए हुए हैं, एक उसका स्वयं का घर जहाँ उसकी माँ रहती है और दूसरा उसके ससुराल का जहाँ वह ज्यादातर रहता था। आरोपी कैसे पकड़ में आये और पुलिस और कोर्ट से मुझे कैसे राहत मिल सकती है, जिससे कि मेरा पैसा मुझे जल्द से जल्द मिल सके। कृपया मार्गदर्शन प्रदान करें।


समाधान-

ह एक बड़ी समस्या है। कोर्ट में मुकदमा करने के बाद कोई भी व्यक्ति आप की तरह यह सोचता है कि अब तो पैसा वसूल हो ही जाएगा। वह हो  भी जाता है यदि अभियुक्त पकड़ में आ जाए। लेकिन इस के लिए कोर्ट केवल समन, जमानती या गैरजमानती वारंट जारी कर सकता है। पुलिस ही अभियुक्त को पकड़ कर लाएगी। पुलिस के पास पहले ही बहुतेरे काम हैं। अब 138 परक्राम्य विलेख अधिनियम के अभियुक्तों को पकड़ने का काम भ ी उस के जिम्मे है। पुलिस की स्थिति आप जानते हैं कि यदि उसे पता हो कि किसी को गरज है तो अदना सा सिपाही भी अकड़ कर चलता है, जब तक उस की पर्याप्त फीस नहीं मिल जाती वह सरकता नहीं है या फिर ऊटपटांग रिपोर्ट लिख कर समन /वारंट अदालत को वापस लौटा देता है। इस मामले में आप अधिक से अधिक यह कर सकते हैं कि अदालत से वारंट दस्ती प्राप्त कर लें उस थाने के नाम पर जिस थाने के सिपाही को आप साथ ले जा सकें। जैसे ही आप को पता लगे कि अभियुक्त एक खास स्थान पर है तब आप सिपाही को ले जा कर उसे गिरफ्तार करवा सकते हैं।

इतना तो आप भी जानते होंगे कि यह एक अपराधिक मुकदमा होता है, अभियुक्त की उपस्थिति के बिना इस मेंं आगे कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। यदि एक बार पकड़ में आ कर अदालत से जमानत पर छूट जाने के बाद भी यदि अभियुक्त गैर हाजिर हो जाता है तो भी मुकदमा वहीं रुक जाता है,आगे नहीं बढ़ता है। यह एक प्रकार का छिद्र है जिस के कारण देश में हजारों मामलों की सुनवाई लटकी पड़ी है।

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समस्या-

दीपक के. बगौरिया ने श्रीमाधोपुर, सीकर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-


मैं अनुसूचित जाति से हूँ।  मेरे 4 साल का बेटा है और मेरी बीवी 4 माह की गर्भवती है जिसके गर्भ में जुड़वाँ बच्चे (twins) हैं। इस तरह मेरे 3 बच्चे हो जाएंगे। मैं राजनीति में भी सक्रिय हूँ तथा सरकारी नौकरी की तैयारी भी कर रहा हूँ।  3 बच्चे होने की वजह से मुझे कोई दिक्कत तो नही होगी न? कृपया मार्गदर्शन करें।


समाधान-

स मामले में आप को बिलकुल भी परेशान होने की आवश्यकता नहीं है। यदि किसी व्यक्ति को एक संतान है और एक संतान के होते हुए उसे या उस की पत्नी को कोई प्रसव होता है और उस से जुड़वाँ बच्चों का जन्म होता है जिस से उस के तीन संतानें हो जाती हैं तो उन्हें राजनीति में चुनाव लड़ने अथवा इसी कारण से सरकारी नौकरी से वंचित नहीं होना पड़ेगा।

आप के दिमाग में जो प्रश्न है वही प्रश्न उक्त कानून और नियम बनाने वाले विधायकों के मन भी रहा होगा। इस कारण उन्होंंने इस नियम को  इस तरह बनाया है कि इस तरह अंतिम प्रसव से यदि जुड़वाँ सन्तानें जन्म लेती हैं तो इस तरह के जन्म से हुई तीसरी संतान का कोई असर इस कानून पर नहीं होगा।

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समस्या-

अनिल ने भोपाल, मध्य प्रदेश से मध्य प्रदेश राज्य की समस्या भेजी है कि-

मेरे दादाजी के नाम एक मकान है। मेरे पिता वर्ष २००३ से लापता हैं। मेरे पिता ४ भाई हैं। तीनों भाइयों ने मुझे ये मकान मौखिक हिस्से में दे दिया था। मैं २० बर्षो से इस मकान कि देख रेख व टेक्स देता आ रहा हूँ।  मकान पर मेरा कब्ज़ा है तथा किरायेदार भी मुझे ही किराया देते हैं। वर्ष २०१२ में मैंने मकान का नामांतरण अपनी माँ के नाम से करा लिया था।  अब उन्होंने उससे निरस्त करा के उसे मेरी दादी के नाम करा लिया है? क्या वे उसे बेच सकती हैं? उन्हें कैसे रोका जाये?

समाधान-

नामान्तरण किसी भी प्रकार से स्वामित्व और स्वामित्व के हस्तांतरण को प्रकट नहीं करता है। आप का उस मकान पर 20 वर्षों से कब्जा है, इस कारण कोई आप को उस मकान से बेदखल नहीं कर सकता। किन्तु मौखिक बंटवारे में आप को मकान मिला था इसे साबित करना आसान नहीं होगा। देख-रेख करना और टैक्स जमा करने मात्र से यह उपधारणा नहीं ली जा सकती है कि वह मकान आप को मौखिक बंटवारे में दे दिया गया था। यदि यह साबित होता है कि कोई बंटवारा नहीं हुआ था तो दादाजी के मकान और शेष संपत्ति का बंटवारा होना चाहिए और उस स्थिति में उन के सभी उत्तराधिकारियों को उस का हिस्सा मिलना चाहिए।

आप के पिता 2003 से लापता हैं तो आप दीवानी न्यायालय में घोषणा का दावा कर के उन्हें मृत घोषित करवा सकते हैं और इस घोषणा के आधार पर मृत्यु प्रमाण पत्र आप को मिल सकता है। वैसी स्थिति में आप अपने पिता के उत्तराधिकारी हो जाएंगे। चूंकि दादी के नाम मकान का नामान्तरण हो जाने से वह मकान दादी का नहीं हो जाता बल्कि संयुक्त संपत्ति बना रहता है। इस कारण उन्हें इस मकान को बेचना तो नहीं चाहिए। फिर भी ऐसी कोशिश हो सकती है। इस के लिए स्थाई निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर विक्रय पर अस्थाई   निषेधाज्ञा प्राप्त की जा सकती है। इस वाद में आप यह कथन कर सकते हैं कि आप के पिता 14 वर्षों से लापता है इस कारण साक्ष्य अधिनियम के अंतर्गत उपधारणा के अंतर्गत उन्हें मृत माना जाना चाहिए और आप उन के उत्तराधिकारी होने के नाते यह वाद प्रस्तुत कर रहे हैं।

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