Civil Law Archive

किसी को भी स्थावर संपत्ति से जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता।

May 6, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

गोलू साहू ने पंडुका, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-


मेरे पिता ने पैतृक संपत्ति को बिना हमारे जानकारी व सहमति तथा बिना हमारा हिस्सा अलग किये बिना ही 1/2 एकड़ जमीन को अज्ञात महिला व्यक्ति के नाम पर रजिस्ट्री कर दी है। तथा उस व्यक्ति द्वारा नामांतरण व रिकॉर्ड में अपना नाम भी दर्ज करवा लिया है।  लेकिन जमीन पर कब्जा हमारा है , सर क्या हम कब्जे पर बने रहे..? क्या वह व्यक्ति जबरदस्ती हमसे कब्जा छीन सकता है….? हमें क्या करना चाहिए…….?


समाधान-

कोई भी व्यक्ति जबरन किसी से स्थावर सम्पत्ति का कब्जा छीन कर वर्तमान में काबिज व्यक्ति को बेदखल नहीं कर सकता। यदि कोई ऐसी कोशिश करता है या बेदखल करता है तो तुरन्त पुलिस को रिपोर्ट करें तथा एसडीएम के न्यायालय में धारा 145-146 दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत आवेदन प्रस्तुत करें। यदि किसी को ऐसा आवेदन प्रस्तुत करने के पहले के 60 दिनों में बेदखल भी कर दिया गया है तो उसे संपत्ति का कब्जा वापस दिलाया जाएगा।

पैतृक/ सहदायिक संपत्ति का बंटवारा हुए बिना कोई भी पिता अपनी संतानों को पैतृक संपत्ति से अलग नहीं कर सकता। इस तरह संपत्ति का उक्त हस्तान्तरण वैध नहीं है। लेकिन उस जमीन में पिता अपने हिस्से की जमीन को बिना बंटवारा किए भी हस्तांतरित कर सकता है, उस हस्तान्तरण के आधार पर नामान्तरण भी खोला जा सकता है। लेकिन जिस व्यक्ति को संपत्ति का हिस्सा हस्तांतरित किया गया है वह व्यक्ति संपत्ति पर कब्जा केवल बंटवारे के माध्यम से ही प्राप्त कर सकता है। आप रजिस्ट्री को निरस्त कराने के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत कर सकते हैं तथा संपत्ति से बेदखली के विरुद्ध इसी न्यायालय से अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस मामले में दस्तावेजों को किसी स्थानीय वकील को दिखा कर सलाह लें और आगे की कार्यवाही करें।

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समस्या-

सुधा ने इन्दौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरे पति द्वारा मुझ पर तलाक प्रकरण किया गया है मैं अपने गम्भीर रूप से बीमार एवं वृद्ध माता के घर पर हूँ। दो अलग-अलग न्यायालयों द्वारा स्वीकृत भरण पोषण एवं अंतरिम भरण पोषण की राशि मेरे पति द्वारा हीला हवाली करने और न्यायालय के दखल के पश्चात मुझे प्रदान की जाती है। उक्त भरण पोषण राशियों की स्वीकृति के सम्बन्ध में मेरे पति द्वारा एक प्रकरण के माध्यम से माननीय उच्च न्यायालय मैं चुनौती प्रस्तुत की थी, जिस में उच्च न्यायालय के आदेश द्वारा उक्त भरण पोषण राशियों को उचित एवं सही माना है। उक्त तलाक प्रकरण को मैं अपने घर से 300 कि.मी.दूर परिवार न्यायालय से स्थानीय ए डी.जे न्यायालय में स्थानांतरित करवाना चाहती हूँ, इसके लिये मुझे क्या करना होगा ?


समाधान-

प का विवाह विच्छेद का प्रकरण पति द्वारा हिन्दू विवाह अधिनियम के अन्तर्गत प्रस्तुत किया गया है। इस अधिनियम की धारा 21-ए में इस अधिनियम के अंतर्गत प्रस्तुत प्रकरणों के स्थानान्तरण के उपबंध हैं। इस के अतिरिक्त इस अधिनियम के प्रकरणों पर दीवानी प्रक्रिया संहिता प्रभावी है। धारा 21-ए में उपबंधित है कि यदि धारा 10 और 13 के प्रकरण अलग अलग स्थानों पर प्रस्तुत किए गए हों तो बाद वाले मुकदमे को पहले वाले मुकदमे के स्थान पर स्थानान्तरित किया जा सकता है। इस के लिए स्थानान्तरण चाहने वाले व्यक्ति को उच्च न्यायालय में आवेदन करना होगा। धारा 24 दीवानी प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय किसी भी प्रकरण को किसी पक्षकार की सुविधा के लिए अपने अधीन किसी भी न्यायालय को स्थानान्तरित कर सकता है।

आप को चाहिए कि आप उक्त प्रकरण के स्थानान्तरण के लिए अपने उच्च न्यायालय को आवेदन प्रस्तुत करें। जिस में वे कारण अंकित किए जाएँ जिनके आधार पर आप अपना प्रकरण किसी खास न्यायालय में स्थानान्तरित करना चाहती हैं। उच्च न्यायालय विपक्षी पक्षकार को सुनवाई का अवसर प्रदान करने के उपरान्त स्थानान्तरण के सम्बंध में उचित आदेश पारित कर सकता है।

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समस्या-

नेहा सोनी ने इंदौर, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरे पति मुझे मेरे मायके छोड़ कर चले गये और मुझे आने के लिए भी मना कर दिया। वो मुझे साथ रखना नहीं चाहते। मैं ने कोर्ट में 125 और 498 ए के मुकदमे लगा रखे हैं।  मेरे पति प्राइवेट कॉलेज मे प्रोफसर हैं। मेरे पास  उन की सैलरी का प्रमाण नहीं है।   मेरा अंतरिम मेंटेनेन्स 1700 रुपए प्रतिमाह तय हुआ है। जबकि मेरे ससुराल वाले काफ़ी संपन्न हैं। वो मुकदमे की कार्यवाही आगे नहीं बढ़ने दे रहे हैं, ना ही कोई हाल निकालना चाहते हैं।  क्या करूँ बहुत परेशान हूँ। मेरी मदद करें।

समाधान-

भारत में अदालतों की संख्या आबादी के मुकाबले बहुत कम है। दस लाख की आबादी पर अमरीका में 140 अदालतें हैं और ब्रिटेन में 55 जब कि भारत में इसी जनसंख्या पर केवल 12 अदालतें हैं। वैसी स्थिति में न्याय में देरी होना स्वाभाविक है। 498ए की कार्यवाही तो धीमे ही चलेगी उस पर आपका नियंत्रण नहीं हो सकता। वहाँ अभियोजक सरकार होती है। आपको केवल गवाही के लिए बुलाया जाएगा।

धारा 125 दं.प्र.सं. के भरण पोषण के मामले में आप को अंतरिम राहत न्यायालय ने दे दी है। अब जब भी अन्तिम निर्णय होगा तब जो भी गुजारा भत्ता आप का तय होगा वह आप के द्वारा आवेदन न्यायालय में प्रस्तुत किए जाने की तिथि से प्रभावी होगा। इस तरह यदि आप का गुजारा भत्ता 5000 प्रतिमाह तय होता है तो 1700 के अलावा जितना गुजारा भत्ता बकाया होगा वह आप को बाद में मिल जाएगा। इस लिए आप को चाहिए कि आप 125 दं.प्र.सं. के प्रकरण में उचित गुजारा भत्ता तय होने पर अधिक ध्यान दें। गुजारा भत्ता का आधार हमेशा पति की आर्थिक स्थिति और मासिक आय होती है। मासिक आय तो आप को प्रमाणित  करनी होगी।

आप को चाहिए कि आप पति के निजी कालेज का पता लगाएँ अपने स्तर पर उन की सेलरी की जानकारी करें और आर्थिक स्थिति का ज्ञान करें। धारा 125 दं.प्र.संहिता का प्रकरण अपराधिक कानून का हिस्सा होने के साथ साथ दीवानी प्रकृति का है। इस कारण से दीवानी प्रक्रिया संहिता (सीपीसी) के प्रावधान सिद्धान्त रूप में इस प्रकरण में प्रभावी होते हैं। इकबाल बानो बनाम स्टेट ऑफ यूपी के मामले में 05.06. 2007 को सुप्रीम कोर्ट ने इस मामले को दीवानी प्रकृति का माना है।आप इस मामले में सीपीसी के प्रावधानों केअनुरूप प्रतिपक्षी को देने के लिए प्रश्नावली दे सकती हैं और न्यायालय उन का उत्तर देने का आदेश प्रतिपक्षी को दे सकता है इसी तरह आप कोई भी दस्तावेज जो प्रतिपक्षी के शक्ति और आधिपत्य में है उसे प्रकट और प्रस्तुत कराने के लिए आवेदन न्यायालय को दे सकती हैं। दं.प्र.संहिता में भी धारा 91 में दस्तावेज प्रतिपक्षी से अथवा किसी से भी मंगाया जा सकता है और दस्तावेज लाने वाले को दस्तावेज साथ ला कर बयान देने के लिए कहा जा सकता है। इस तरह जिस संस्था में आप के पति काम करते हैं उस संस्था के प्रमुख को दस्तावेज ले कर न्यायालय में बुलाने के लिए समन जारी किया जा सकता है। आप इस मामले में अपने वकील से बात करें कि वह सीपीसी और दं.प्र.सं. के प्रावधानों में ऐसे आवेदन प्रस्तुत करे और इस संबंध में न्यायालयों के निर्णय तलाश कर उन का उपयोग करते हुए वस्तु स्थिति को न्यायालय के समक्ष रखे जिस से उचित रूप से आप का गुजारा भत्ता न्यायालय तय कर सके।

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समस्या-

अशोक ने खंडवा, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारी पुस्तैनी अचल सम्पत्ति गाँव में है, मेरे पिताजी 3 भाई और एक बहन हैं एक ताउजी की 5 साल पहले मृत्यु हो गई, आज से 25 साल पहले 1989 में दादा जी की मृत्यु हो गई थी। दादाजी की मृत्यु के बाद 1991 में गाव की ग्राम सभा में चारो भाई बहन ने मौखिक रूप से सभी की सहमति से हमारा मकान मेरे पिताजी और ताउजी के नाम नामांतरण कर दिया। 20 सालों से उस मकान पर हमारा कब्जा है तथा हमारे द्वारा भवन कर जमा किया जा रहा है। बिजली बिल नल कनेक्सन पिताजी और ताउजी के नाम है। आज 20 साल बाद बुआ मकान में हिस्सा मांग रही है। उसके लिए दीवानी वाद दायर किया है। बुआ भी हमारे साथ ही मकान में रहती है। कृपया उचित सलाह दें।


समाधान-

म यहाँ तीसरा खंबा में कानूनी समाधान प्रदान करते हैं, आप ने उचित सलाह मांगी है।

Deokoo Bai W/O Anna Rao And Ors. vs Keshari Chand S/O Ganeshlal Jain व अन्य अनेक मामलों में मध्यप्रदेश उच्च न्यायालय का निर्णय है कि नामान्तरण से किसी भी हिस्सेदार के अधिकार प्रभावित नहीं होते। आप उक्त मामले में उक्त निर्णय का पैरा 10 देखें। यदि कोई किसी अचल संपत्ति में अपना हिस्सा छोड़ना चाहता है तो उसे अपने हिस्से का हकत्याग विलेख उस व्यक्ति या व्यक्तियों के पक्ष में निष्पादित कर उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत कराना चाहिए। तभी हकत्याग को सही माना जा सकता है।

बुआ यदि अपने हिस्से की  मांग कर रही है तो उचित ही कर रही है। आप लोगों को बुआ का हिस्सा सहर्ष दे देना चाहिए था, उसे न्यायालय में जाने की आवश्यकता नहीं होनी चाहिए थी। अब भी कोई देरी नहीं हुई है। आप लोग एक ही मकान में निवास करते हैं अब भी इस मामले को परिवार में ही आपस में बैठ कर निर्णय कर लेना उचित कदम होगा।

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समस्या-

कल्याण सिंह ने राजीव नगर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मुझे एक कंपनी ने (जिस से मेने एक कियोस्क लिया था) नोटिस भेजा है जिसमें यह कहा गया है कि कंपनी जो कमीशन देती है उसमें जितना कमीशन देना चाहिए था उस अमाउंट से 13957 रुपए  ग़लती से ज़्यादा दे दिया है वो नही लोटाए जाने पर आईपीसी की धारा 409 के तहत अपराध है जबकि यह कंपनी मुझे फॉर्म 16 नहीं प्रोवाइड करवा रही और वो भी पिछले 3 साल से जिसमे मेरा टीडीएस कट रहा हे तो सर टीडीएस काट कर इनकम टैक्स डिपार्टमेंट में जमा नही करवाना भी तो एक अपराध है। मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

प को कंपनी ने कमीशन खुद स्वैच्छा से दिया है। यदि अधिक दे दिया है तो वह उस की कानूनी तरीके से वसूली कर सकती है। आप उन्हें लिखिए कि आप के हिसाब से जो कमीशन मिला है वह सही है। इस तरह कमीशन की धनराशि विवादित हो जाएगी और अमानत नहीं रहेगी। यदि वे समझते हैं कि अधिक भुगतान हो गया है तो इस का निर्णय न्यायालय से कराने के लिए कार्यवाही करें। आपने कोई अपराध नहीं किया है।

उन्हें सूचित करें कि उन्होंने आप का जो टीडीएस आज तक काटा है उस का विवरण आप को नहीं भिजवाया है जो कि इनकम टैक्स कानून का उल्लंघन है यदि वे उचित समय में यह विवरण नहीं भिजवाते हैं तो आप इनकम टैक्स विभाग को शिकायत करेंगे। टीडीएस काट कर इनकम टैक्स विभाग में जमा न कराना गंभीर अपराध है इनकम टैक्स विभाग स्वयमेव कार्यवाही करेगा। वैसे यदि कंपनी ने टीडीएस काटा होगा तो आप के पैन नंबर से इनकम टैक्स विभाग की वेबसाइट पर आप को पता लग जाएगा कि कितना टीडीएस काटा गया है।

 

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हिस्से के लिए विभाजन का वाद करें।

February 23, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

हेमन्त मिश्रा ने अजमेर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मैं जिस मकान में रहता हूँ वो मेरे दादाजी के नाम है। उनकी कोई वसीयत नहीं है, रजिस्ट्री की कॉपी मेरे पास है। ओरिजनल रजिस्ट्री मेरी दादी और बुआ ने गायब कर दी है। मेरे दादाजी का देहांत 1992 में हो गया था। मेरे पिताजी का देहांत भी 2015 में हो गया है। अब घर में मैं, दादी, मम्मी, एक क्वांरी बहिन, मेरी पत्नी और मेरा बच्चा रहता है। हम यहाँ लगभग 30 साल से रह रहे हैं। अब दादी कहती है कि मैं अपनी लड़कियों को हिस्सा या इस मकान को बेच कर पैसे दूंगी। तुम सब जाओ यहाँ से ये मेरे पति का घर है। जबकि मेरे पिताजी ने अपनी बहनों (5) में से (3) की शादी की। अपने जीवित समय तक सारी रस्में निभाई। पर अब दादी अपनी उम्र का फायदा उठा कर मुझे और बाकी सब को परेशान करती रहती है। उन्होंने मेरी छोटी बुआ के साथ मिलकर मेरे खिलाफ झूठी पुलिस कंप्लेन भी की थी। इसके कारण मैं बहुत परेशान रहता हूँ। मैंने घर का हिस्सा करने की बात भी कह दी उनसे पर न तो दादी हिस्सा कर रही है न कोई वसीयत और न ही घर में कुछ मरम्मत करवाती है। घर भी जर्जर हो रहा है। मैं इसमें पैसे लगाने से डरता हूँ क्यूंकि कब दादी और बुआ मिलकर क्या कर दे कुछ पता नहीं। कुछ समाधान बताये।

समाधान-

दि मकान की रजिस्ट्री की मूल प्रति आप को नहीं मिल रही है तो उस की फोटो कॉपी में दर्ज विवरण के आधार पर रजिस्ट्री की प्रमाणित प्रतिलिपि सहायक कलेक्टर स्टाम्प के यहाँ से प्राप्त की जा सकती है।

मकान दादा जी के नाम था। इस कारण उन की मृत्यु के उपरान्त आप की दादी, आप के पिता और आप की 5 बुआओं के कुल सात हिस्से हुए। इस में से एक हिस्सा आप का है। आप के पिता ने अपनी बहनों का विवाह किया है तो वह उन का पारिवारिक दायित्व था। इस से बहनों का अपने पिता की संपत्ति में हिस्सा कम नहीं हो जाता है।

आप की दादी आप के कहने पर भी हिस्से नहीं कर रही है तो आप न्यायालय में विभाजन का वाद प्रस्तुत कर सकते हैं। यदि आप की बुआओं में से कोई अपना हिस्सा नहीं लेना चाहती है तो उस से आप अपने नाम या अपनी माँ के नाम रिलीज डीड करवा सकते हैं। यदि आप विभाजन का वाद प्रस्तुत करने के पहले बुआओं से रिलीज डीड पंजिकृत करवा लेते हैं तो बेहतर होगा।

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पंजीकृत बैनामा को रद्द कराना आसान नहीं होगा।

January 12, 2017 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

विजयलक्ष्मी ने झिंझक, कानपुर देहात, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरा नाम विजय लक्ष्मी है। हम तीन बहिनें हैं, मेरी माँ के पास ६ बीघा जमीन थी। मेरी माँ ने मुझे सबसे पहिले 2 बीघा खेत का बैनामा किया, उसके बाद अन्य दो को। मुझे जो जमीन मिली वह माँ के नाम थी और अन्य दो को मिली वह मेरे पिता की मरने के बाद माँ के नाम हो गयी थी।  मेरी माँ ने मेरी ऊपर दीवनी वाद कर दिया कि बैनामा फर्जी तरीके से किया गया है। मेरी माँ को दिखाई नहीं देता है। मेरी दोनों बहिने माँ को गुमराह करके बैनामा निरस्त करवाना चाहती हैं। क्या बैनामा निरस्त हो सकता है? मेरे बैनामा में मेरी बहिन गवाह भी है, दूसरा गवाह भी माँ की तरफ है।  क्या मैं भी पिता की जमीन में हिस्सा मांग सकती हूँ बैनामा को ३ साल हो चुके हैं।  मैंने लव मैरिज की है, क्या लव मैरिज करने के कारण क्या किसी अपने हक़ से बहिष्कृत क्या जा सकता है मेरे दो बच्चै हैं।

समाधान-

दि बैनामा पंजीकृत है तो उसे निरस्त किया जाना आसान नहीं है वह भी तब जब कि बैनामे को पंजीकृत हुए तीन वर्ष हो चुके हों।

यदि माँ को दिखाई नहीं देता है तो रजिस्ट्री कराते समय रजिस्ट्रार कार्यालय ने सारी पूछताछ के बाद ही उसे रजिस्टर किया होगा तो उस का निरस्त होना और भी दुष्कर है। पर कोई दीवानी वाद हुआ है तो अच्छा वकील करें। कभी कभी वकीलों की गलती से भी जीता हुआ मुकदमा मुवक्किल हार बैठता है।

पिता की जमीन कृषि भूमि होगी तो उत्तर प्रदेश में कृषि भूमि के उत्तराधिकार का कानून भिन्न है। इस संबंध में अपने दस्तावेज दिखा कर किसी स्थानीय वकील से सलाह करें तो बेहतर होगा।

लव मैरिज या परिवार को छोड़ कर अपनी मर्जी से विवाह करने से परिवार बहिष्कार कर सकता है लेकिन उसे उस के हकों से बेदखल नहीं कर सकता।

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पिता की संपत्ति में हिस्सा?

December 15, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

partition of propertyसमस्या-

सुबाला देवी ने रांची, झारखंड से समस्या भेजी है कि-

मैं एक शादीशुदा महिला हूँ। मैं अपने पिताजी के चल-अचल संपति में हिस्सा चाहती हूँ। लेकिन मेरे पिताजी माँ और मेरे भाई हिस्सा नहीं देना चाहते हैं।  इसके लिए मुझे क्या करना होगा? मेरे पास कोई कगजात भी नहीं हैं।

समाधान-

किसी भी पुत्र या पुत्री को अपने पिता या माता की स्वअर्जित सम्पत्ति में हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। जब तक वे जीवित हैं यह संपत्ति उन की है और वे अपनी इच्छानुसार इस का उपयोग कर सकते हैं। यदि माता या पिता में से किसी का देहान्त हो जाए और मृतक ने अपनी संपत्ति या उस का भाग वसीयत न किया हो तो ऐसी संपत्ति का स्वामित्व मृत्यु के साथ ही उस के उत्तराधिकारियों में निहीत हो जाता है। सभी उत्तराधिकारी उस संपत्ति के संयुक्त स्वामी हो जाते हैं। ऐसे संयुक्त स्वामियों में से कोई भी संपत्ति के बंटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकता है।

यदि आप के पिता के पास कोई पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति है तो उस में जन्म से ही पुत्रों का अधिकार होता है। 2005 से पुत्रियों का अधिकार भी होने लगा है। तब आप उस संपत्ति की संयुक्त स्वामी हो सकती हैं और उस में आप का हिस्सा हो सकता है। आप चाहें तो बँटवारे और अपने हिस्से पर पृथक कब्जा प्राप्त करने का वाद न्यायालय में संस्थित कर सकती हैं।

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संयुक्त स्वामी तंग करते हैं तो विभाजन का वाद संस्थित करें।

December 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

समस्या-

राकेश कुमार ने बी-21/ 12 बी, ब्लॉक-बी, ओम नगर, मीठापुर, बदरपुर, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-


र्तमान में मैं जिस मकान में रहता हूँ वह मेरी माँ के नाम है। माँ का देहान्त दिसम्बर 2014 में हो चुका है। मेरे पिता और भाई मुझ से और मेरी पत्नी से रोज लड़ाई करते हैं और कहते हैं कि यहाँ तेरा कोई हक नहीं है तू अपने बीवी बच्चों को ले कर यहाँ से निकल जा। मेरे दो छोटे छोटे बच्चे हैं। मैं जानना चाहता हूँ कि उस संपत्ति में मेरा कोई अधिकार है या नहीं है। मैं अपने पिता और भाई के विरुद्ध क्या कार्यवाही कर सकता हूँ?


समाधान-

जिस स्थान पर जो निवास करता है अथवा जिस मकान /जमीन पर जिस का कब्जा है वहाँ उसे कब्जा बनाए रखने और निवास करने का अधिकार प्राप्त है। किसी भी व्यक्ति से जिस  संपत्ति पर वह काबिज है उसे जबरन बेदखल नहीं किया जा सकता। इस तरह आप को भी मकान के उस परिसर से जिस पर आप का कब्जा है और जिस में आऐप रहते हैं जबरन नहीं निकाला जा सकता।

यह मकान माँ के नाम था तो माँ के देहान्त के साथ ही उस का उत्तराधिकार निश्चित हो चुका है। यदि वह मकान किसी के नाम वसीयत था तो उस का स्वामी वह वसीयती हो चुका है। यदि कोई वसीयत नहीं की थी तो माँ के सभी उत्तराधिकारी उस के संयुक्त रूप से स्वामी हो चुके हैं। कोई भी उत्तराधिकारी उस मकान का बँटवारा करवा कर अपने हिस्से का पृथक रूप से कब्जा प्राप्त करने का अधिकारी है। यदि आप के केवल एक भाई है और बहिन नहीं है तो माँ के केवल 3 उत्तराधिकारी आप, आप के पिता और भाई है। इस तरह आप को उस मकान के एक तिहाई हिस्से का स्वामित्व प्राप्त है।

आप चाहें तो तुरन्त उक्त मकान का विभाजन करने और आप के हि्स्से का पृथक कब्जा देने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। इसी वाद में आप यह आवेदन भी दे सकते हैं कि जब तक इस वाद का निर्णय न हो तब तक आप के पिता और भाई आप को उस मकान के उस परिसर से बेदखल न करें और न आप को सामान्य रूप से उस परिसर में रहने में किसी तरह की बाधा उत्पन्न करें। आप को इस वाद के निर्णय तक इस आशय की अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त हो सकती है।

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प्रतिकूल कब्जा प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है।

December 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश तिवारी ने सोरों बदरिया, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारे गाँव से दो किलो मीटर की दुरी पर ४ बीघा जमीन को हमारे पूर्वज 40साल से करते आ रहे थे।  उनकी मोत के बाद अब हम कर रहे हेै।  उस जमीन में २६ लोगों के नाम हैं, सब ने वह जमीन छोड़ रखी है।  अब एक आदमी आता है  वह जमीन छोड़ने के लिए कहता है।  उस आदमी के बाप का नाम उस जमीन में है, बाप जिन्दा है।  हम जानना चाहते हैं कि क़ानूनी तरीके से उस जमीन पर हमारा कुछ हक बनता है कि नहीं, जब कि 40 साल से कोई जमीन पर अपना हक जताने नहीं आया। हम किस कोर्ट में कोन सी धारा में अपना मुकद्दमा डाल सकते हैं। हमें उचित सलाह दें।


समाधान-

जिस जमीन पर आप और आप के पूर्वज 40 वर्ष से खेती करते आ रहे हैं और इन 40 वर्षों में किसी ने आप के खेती करने पर कोई आपत्ति नहीं की इस तरह आप का उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) है। लेकिन प्रतिकूल कब्जे का यह सिद्धान्त केवल प्रतिरक्षा के लिए। यह हथियार हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षा के लिए है। जिस का सीधा अर्थ ये है कि यदि कोई आप को उस जमीन से हटाने  के लिए वाद संस्थित करे या कोई भी कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप को अदालत जा कर किसी तरह का आवेदन देने, वाद प्रस्तुत करने या कोई और कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। आप तो जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

यदि कोई आप को धमकी देता है कि वह जबरन कब्जा छीन लेगा तो यह अपराधिक कार्यवाही है। आप को उस के विरुद्ध पुलिस में रपट दर्ज करानी चाहिए और पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर अपराधिक परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।  आप दीवानी /राजस्व न्यायालय में  इस तरह की निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वाद संस्थित कर सकते हैं कि आप 40 वर्षों से अधिक से भूमि पर काबिज काश्त हैं, आप का कब्जा अवैध तरीके से नहीं हटाया जा सकता है, यदि किसी का अधिकार है तो वह न्यायालय से आदेश या डिक्री प्राप्त किए आप को न हटाए।

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