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पुलिस कार्यवाही नहीं कर रही है तो मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें

समस्या-

बबीता सक्रे ने बैतूल मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ने बैतूल सिटी की चौकी गैंग पर पुलिस को मेरे पड़ौसी के विरुद्ध रिपोर्ट दी थी। लेकिन पुलिस ने पड़ौसी का पक्ष लिया। उस ने मुझे गालियाँ दीं, अश्लील शब्द कहे, घर के अन्दर घुस कर मेरा हाथ पकड़ा और बलात्कार करने की धमकी दी। उस की माँ ने रोड के बीच जा कर जाति से संबंधित गालियाँ दीं। पर पुलिस का कहना है कि गवाह ले कर आओ, वह लड़का भी वहीं था। जबकि मैं ने वीमेन  हेल्पलाइन पर शिकायत की था इस के बाद एसपी को शिकायत की। तब पुलिस ने 294,323, 506 का मुकदमा बनाया तो मैं ने एफआईआर पर हस्ताक्षर नहीं किए। दूसरे दिन फिर एसपी साहब के पास गयी तो 452 और लगा दी। पर छेड़छाड़ और जाति से संबंधित गाली गलौच का केस नहीं बनाया। इस के चार दिन बाद उस लड़के की बहन की रिपोर्ट पर मेरे पति के विरुद्ध झूठी रिपोर्ट लिख ली जब कि पति उस दिन शहर में ही नहीं थे। पुलिस ने धमकी दी कि राजीनामा नहीं करोगे तो मेरे पति पर 354 का मुकदमा बना देंगे। पुलिस घर आ कर हमें परेशान कर रही है। जिस की शिकायत 181 पर की। एसडीओपी जाँच कर रहे हैं पर पड़ौसी अभी भी हम को धमकी देता है और पुलिस गवाह सबूत लाने को कहती है।

समाधान-

प की समस्या से पता लगता है कि आप के पड़ौसी की मिली भगत पुलिस के साथ है। पुलिस आप की शिकायत पर आप से सबूत और गवाहों के लिए कह रही है। पुलिस का यह कथन सही है यदि अपराध का कोई सबूत और गवाह नहीं मिलते हैं तो पुलिस द्वारा की गयी कार्यवाही न्यायालय में जा कर समाप्त हो सकती है। इस कारण आप को कम से कम परिस्थितिजन्य सबूत तो देने होंगे।

आप के विपक्षी की मिथ्या शिकायत पर पुलिस आप के पति के विरुद्ध कार्यवाही कर रही है तो इस कारण कि आप के विपक्षी ने पुलिस को झूठे ही सही पर कुछ गवाह उपलब्ध कराए होंगे। पुलिस उन की गवाही के आधार पर आप के विरुद्ध कार्यवाही कर सकती है। आप के पति अपना प्रतिवाद पुलिस के समक्ष पेश कर सकते हैं पुलिस द्वारा आप के पति के विरुद्ध न्यायालय में कोई आरोप दाखिल किया जाता है तो आप के पति वहाँ बचाव कर सकते हैं।

आपकी शिकायत पुलिस नहीं सुन रही है। एसपी को भी आप शिकायत कर चुकी हैं। यदि आप के पास परिस्थितिजन्य सबूत हैं तो आप सीधे मजिस्ट्रेट के न्यायालय में अपना परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं और वहाँ अपने गवाहों के बयान करवा कर तथा परिस्थिति जन्य साक्ष्य प्रस्तुत कर मुकदमा दर्ज करवा सकती हैं। इस के लिए बेहतर है कि आप अपराधिक मामले देखने वाले किसी स्थानीय वकील की मदद लें।

मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करें तथा डाइवोर्स के मुकदमे में काउंटर क्लेम के माध्यम से डाइवोर्स की मांग करें।

rp_domestic-violence-14.jpgसमस्या-

श्वेता द्विवेदी ने रीवा, मध्यप्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मेरी शादी 29 फरवरी 2012 को वैधान में आशीष द्विवेदी से हुई। पर मेरे पति मेरे साथ बिना किसी कारण के मार पीट करते थे। मेरी सहनशक्ति की सीमा पार हो गई तो आवाज़ उठाई। मेरा छोटा सा बेटा है जो 15 माह का है, उस का जन्म सीजेरियन हुआ। उस के एक मा3ह में ही मेरे पति ने मुझे बहुत मारा। फिर मैं ने 31 जुलाइ को महिला थाने में ही शिकायत की। मेरा मेडीको लीगल परीक्षण भी हुआ। उस के बाद मुझे महिला थाना से यह कहा गया कि वे कार्यवाही करेंगे। पर आज 13 माह पूरे हो गए मैं एसपी और आईजी तक से निवेदन कर चुकी हूँ लेकिन कोई भी मेरी बात नहीं सुनता सब मेरा समय जाया कर रहे हैं। मेरी प्रथम सूचना तक नहीं लिखी गयी है। मेरी शिकायत के बाद मेरे पति ने मुझे डाइवोर्स देने के लिए वैधान में फरवरी में केस कर दिया है। अब पुलिस वाले कहते हैं कि अब प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं हो सकती। आप बताएँ मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान

प ने बहुत देर कर दी, 13 माह पुलिस के चक्कर काट कर निकाल दिए। पुलिस के एक दो सप्ताह में कार्यवाही न करने पर एसपी को रजिस्टर्ड डाक से रिपोर्ट भेज देनी चाहिए थी। फिर भी कार्यवाही न होने पर दो सप्ताह में ही न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए था। पर अभी भी कुछ नहीं बिगड़ा है। आप धारा 498ए, 323 व 406 आईपीसी में न्यायालय के समक्ष परिवाद प्रस्तुत कर सकती हैं और न्यायालय आप के व गवाहो के बयानों पर प्रसंज्ञान ले सकता है या फिर 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता में पुलिस को अन्वेषण हेतु भिजवा सकता है।

ति ने जिस न्यायालय में डाइवोर्स का मुकदमा किया है वहाँ आप न्यायालय का खर्च मांग सकती हैं और साथ ही अपने व अपने पुत्र के लिए भरण पोषण का खर्चा मांग सकती हैं। डाइवोर्स के आवेदन पर विचार करने के पूर्व आप को न्यायालय का खर्च तथा भरण पोषण की राशि दिए जाने का आदेश हो सकता है।

मारी सलाह है कि आप को अपने पति से विवाह विच्छेद कर लेना चाहिए लेकिन पति के आधारों पर नहीं बल्कि पति द्वारा मारपीट करने और क्रूरतापूर्ण व्यवहार करने के आधार पर। इस के लिए आप उसी अदालत में जहाँ पति ने डाइवोर्स का आवेदन प्रस्तुत किया है उसी में काउंटर क्लेम प्रस्तुत कर ऐसा कर सकती हैं। इस के साथ ही अपने व अपने पुत्र के लिए स्थाई एक मुश्त निर्वाह राशि के लिए भी आवेदन कर सकती हैं। आप धारा 125 दंड प्रक्रिया संहिता के अन्तर्गत भी अपने व पुत्र के लिए भरण पोषण की मांग कर सकती हैं।

प को चाहिए कि आप किसी सक्षम स्थानीय वकील से संपर्क कर के उस की सेवाएँ प्राप्त करें। यह आवश्यक है इस से आप को समय समय पर सलाह मिलेगी और वह सारी कार्यवाहियों की जिम्मेदारी से देखभाल कर सकेगा।

मिथ्या शिकायत का नतीजा आने के बाद कार्यवाही करें …

Service of summonsसमस्या-

सुशील कुमार शर्मा ने अवन्तिका, रोहिणी, दिल्ली से समस्या भेजी है कि-

मेरी पुत्री रात को साढ़े आठ बजे के करीब बाजार से सामान खरीद कर अपने फ्लैट पर जा रही थी। रास्ते में मेरी पुत्री की सास और देवर (जो कि अलग रहते हैं) ने उसे घेर लिया और मारपीट की तथा बदतमीजी की। 100 नंबर पर फोन किया, पुलिस आई और थाने में जाकर एफआईआर दर्ज हो गई। उसमें धारा 354 के साथ-साथ और भी धाराएं लगीं। चूंकि मेरी पुत्री के ससुराल वाले पैसे वाले हैं सो उन्होंने पुलिस और अन्य लोगों को प्रभावित कर अपनी गिरफ्तारी तीन महीने तक रुकवाए रखी। जब मैंने और मेरी पुत्री ने काफी लिखा-पढ़ी की तब जाकर गिरफ्तारी के लिए पुलिस पुत्री की ससुराल में गई। चूंकि पुलिस पहले से ही प्रभावित थी सो ससुराल वाले पहले ही फरार हो गए और आई (जांच अधिकारी) से मिलकर अदालत से जमानत करवा ली। जमानत तक तो बात ठीक थी। ससुराल वालों ने जमानत करवाने के साथ-साथ जज साहब के सामने एक अर्जी दी जिसमें ससुराल वालों ने दरख्वास्त की है कि पुलिस उनकी (ससुराल वालों की) भी एफआईआर दर्ज करे। अर्जी में उन्होंने बहुत सारे झूठे आरोप लगाए हैं तथा उसमें मेरी पुत्री के साथ-साथ मेरा नाम भी घसीटा गया है। अर्जी में पांच झूठे गवाह भी खड़े कर दिए गए हैं। उसमें आरोप लगाया गया है कि मैं भी उस वक्त घटनास्थल पर था जबकि मेरे पास पुख्ता एवं अकाट्य सबूत हैं कि मैं वहां नहीं था। अब प्रश्न यह है कि क्या मैं उस अर्जी के विरुद्ध मानहानि एवं झूठा मुकदमा करने का मुकदमा डाल सकता हूं या नहीं।

समाधान-

प की पुत्री के ससुराल वाले अपना बचाव करने में लगे हैं। अपनी खुद की शिकायत से एक बात तो उन्हों ने स्वीकार कर ली है कि घटना हुई है और वे खुद घटना में उपस्थित थे। इस तरह उन्हों ने अपने बचाव का एक तर्क तो खो दिया है। अभी उन्हों ने अदालत को शिकायत की है। अदालत उस शिकायत की प्रारंभिक जाँच कर के यह तय करेगा कि इस शिकायत को अन्वेषण के लिए पुलिस को भेजा जाए या स्वयं ही जाँच की जाए। यदि पुलिस को भेजा जाता है तो पुलिस उस की जाँच कर के शिकायत सही पाने पर आरोप पत्र प्रस्तुत कर सकती है। अन्यथा स्थिति में न्यायालय खुद जाँच कर के शिकायत पर प्रसंज्ञान ले सकता है या लेने से इन्कार कर सकता है। यदि न्यायालय प्रसंज्ञान लेता है तो आप उस आदेश को सेशन न्यायालय में निगरानी कर चुनौती दे सकते हैं।

ब तक उक्त मामले में पुलिस प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज नहीं करती या प्रसंज्ञान नहीं लिया जाता तब तक आप की कोई भूमिका नहीं है। यदि प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज होती है तो आप पुलिस के समक्ष अपना पक्ष रख सकते हैं।

ब तक उक्त शिकायत अपनी अंतिम परिणति पर नहीं पहुँच जाती है तब तक आप द्वारा मानहानि का मुकदमा करना ठीक नहीं है। यदि यह सिद्ध हो जाता है कि शिकायत मिथ्या थी और आप की प्रतिष्ठा को नुकसान पहुँचाने और अपना मिथ्या बचाव करने के लिए की गई थी। तब आप मानहानि और दुर्भावनापूर्ण अभियोजन के लिए अपराधिक और दीवानी दोनों प्रकार के मुकदमे उन के विरुद्ध कर सकते हैं।

फर्म के पर्चों के आधार पर हस्ताक्षरकर्ता और फर्म मालिक दोनों के विरुद्ध अपराधिक और दीवानी कार्यवाही की जा सकती है

समस्या-

दुर्गा नगर, राजपुर चुँगी, आगरा, उत्तर प्रदेश से अनिल कुमार कुशवाहा ने पूछा है –

मैं ने अपने पिताजी के रिटायरमेंन्ट की राशि 4,20,000/- रुपए ब्याज 1.5 प्रतिशत प्रतिमाह दर पर (जिसके यहाँ मैं जून 2008 से नौकरी करता था) आपसी भरोसे पर दे दिये। उसने मुझे ट्रेड स्लिप दी जो माल के दायित्व में दी जाती है जिसे पर्चा कहा जाता है। यह पर्चा सिस्टम आगरा हींग की मंडी (जूता मार्केट) में प्रसिद्ध है।  यह पर्चा फर्म के खातों में डाला जाता है एवं आगरा इनकमटैक्स में शू ट्रेडिग में मान्य है। फर्म के नाम से छपा हुआ पर्चा जिस में दुकान का पता पेमेंन्ट की तिथि और प्रोपराइटर के हस्ताक्षर हैं। अब वह कोई ब्याज नहीं दे रहा। उसने वापस धनराशि भी देने से मना कर दिया और लड़ने के लिए तैयार हो गया। मेरे पास मनी लेन्डरिंग का कोई लाइसेंन्स नहीं है। मैं मात्र 6500/रु मासिक की नौकरी करता था पिछले छ महीने से खाली बैठा हूँ। मैने कभी इनकमटैक्स नहीं भरा, आवश्यकता नहीं पड़ी। मेरे पिताजी सेना से रिटायर होकर केन्द्र सरकार के (509 वर्कशाप आगरा) में कार्यरत हैं। पिताजी के रिटायरमैंन्ट का पैसा नगद में थोडा-थोडा कर के पांच-छः बार (नवम्वर 2010 से मार्च 2011 तक) में दिया था। जिस फर्म के पर्चे दिये हैं उसका वह (रियासत हुसैन) मालिक नहीं था। वह जूते की दूसरी फर्म फैक्ट्री का प्रोपराइटर है। दोनों फर्म एक ही स्थान पर थी जहाँ मैं एकाउन्टेन्ट का काम करता था। परिवार का मुखिया या भाइयों  में बडा होने के कारण (रियासत हुसैन) का दोनो फर्मों पर कब्जा या अधिकार रखा था। शू केयर नाम की फर्म के पर्चे हैं जिसका प्रो0 (रियासत हुसैन) का छोटा भाई फिरासत हुसैन है। शू केयर फर्म से पूँजी निकाल कर वर्ष 2011 अप्रेल में नई फर्म अलोफ शू के नाम से खोल ली है तथा मार्च 2012 में बीस साल पुरानी फर्म शू केयर को बन्द कर दिया है। जून -जुलाई 2011 में पैसे वापस मांगने पर उसने नवम्बर 2011 यानि दीवाली के बाद देने को कहा। मैं इस भरोसे था कि मैं इसके यहाँ काम कर रहा हूँ अतः मेरे साथ धोखा नहीं करेगा। जनवरी 2012 से अक्टूबर 2012 तक टालता रहा। मैं ने उससे पोस्ट डेटेड चैक देने को कहा तो चैक देने के लिए उसने मना कर दिया। कहता था थोड़े-थोड़े कर के तीन-चार साल में दूँगा। तीन-चार महीने तक के तन्खवाह के पैसे नहीं देता था। साल भर तक मानसिक क्लेश सहने के बाद परेशान होकर इसकी नौकरी छोड दी। नबम्बर 2012 में पिताजी के पैसे 420,000/व तन्खवाह के शेष 24000/का तकाजा करने पर कुछ भी देने के लिए मना कर दिया। अब वह रुपये इसलिए नहीं लौटाना चाहता क्योंकि वह सोचता है प्रिन्टेड पर्चा जिस पर उसके हस्ताक्षर हैं कानूनी कार्यवाही के लिए पर्याप्त नहीं हैं। कहता है भाई की फर्म थी जो कि फेल (बन्द) हो गयी। मुझे किसी का पैसा नहीं देना मेरे भाइयों (तीन छोटे भाई हैं) ने पैसा लिया था। जबकि तीनों छोटे भाईयों को सवा साल पहले इसने बिजनेस से अलग कर दिया था इस कारण अन्य तीनों छोटे भाईयों से मुझे कोई शिकायत नहीं है। विश्वास के कारण नगद उधार देने पर बहुत लोगों के साथ धोखा हो जाता है। इस आगरा शहर के जूता व्यवसाय में पर्चे की समस्या बहुत लोगों के साथ प्रतिवर्ष होती है। फाईनेंसर के नियुक्त दलाल पर्चे के काम को (पैसे के लेन देन) हींग की मँडी आगरा मैं सडक पर खडे हो कर प्रतिदिन करते हैं। इस कारण दलाल या फाईनेंसर पुलिस कार्यवाही व कानूनी कार्यवाही में नहीं पडते। मैं जानना चाहता हूँ कि क्या हस्ताक्षर करे पर्चों के आधार पर दीवानी वाद कर अपना पैसा ब्याज व कानूनी खर्चे सहित वसूल सकते हैं? दीवानी वाद के लिए इसके हस्ताक्षर करे पर्चा के अलावा इसका पेन कार्ड, राशन कार्ड, प्रोपर्टी, मकान व दो प्लाट, गाडी की आर सी व 600 ग्राम सोना (इस सभी पर बैंक से लोन लिया गया है) की फोटो कापी है। मेरे अलावा छः-सात लोगों का पूरा 15 लाख रुपया पर्चों में इसी रियासत हुसैन पर फँसा है। क्या (रियासत हुसैन) पर 420 व धोखाधडी का केस लगाया जा सकता है? क्योंकि छोटे भाई की फर्म के पर्चों हस्ताक्षर क्यों करे। और फर्म फेल (शू केयर बन्द करने से पहले) नई फर्म छोटे भाई फिरासत हुसैन ने अलोफ शू के नाम से खोल ली है एफआईआर इसलिए नहीं की क्योंकि बातचीत से मामला सुलझाना चाह रहा था। तकलीफ इस बात की है कि पाँच-छः हजार रुपये माह की नौकरी करने वाले के (मेरे हाथ से) घर से चार (4,20,000$24000) लाख रुपये और फँस गये मैं बेहद परेशान हूँ मेरे पास अन्य कोई पूँजी नहीं है जिससे मै कोई व्यवसाय कर सकूँ। कृपया मेरा उचित मार्ग दर्शन करें?

समाधान-
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विश्वास और धोका दोनों एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। बिना विश्वास के कोई धोखा नहीं होता। सही विश्वास तो वही होता है जब व्यक्ति लेने देन को मौखिक या मामूली दस्तावेजों के आधार पर नहीं करता है। रुपया जब भी उधार दिया जाए कभी भी फर्म या कंपनी के नाम से नहीं देना चाहिए अपितु व्यक्तिगत जिम्मेदारी पर ही देना चाहिए और उस का लिखत स्टाम्प पेपर पर लिखवा कर नोटेरी से सत्यापित करवा लेना चाहिए। खैर, अभी तक जो हो चुका है उस का तो कुछ नहीं किया जा सकता। आप को आगे की कार्यवाही के बारे में सोचना चाहिए। आप का कहना है कि आप के पास मनी लेंडिंग का लायसेंस नहीं है। यदि किसी के पास रुपया है और वह उस रुपए को किसी संबंधी, मिलने वाले को या व्यापारिक संबंधों के कारण उधार देता है तो ऐसी देनदारी के लिए मनीलेंडिंग का लायसेंस होना आवश्यक नहीं है।

प का यह मामला पूरी तरह से भा.दंड संहिता की धारा 420 से 424 तक में गंभीर अपराध करने का मामला है। आप को तुरन्त प्रथम सूचना रिपोर्ट संबंधित पुलिस थाना में करानी चाहिए। यदि पुलिस थाना रिपोर्ट दर्ज करने से मना करे तो किसी अच्छे वकील के माध्यम से न्यायालय में परिवाद प्रस्तुत करना चाहिए। इस मामले में आप को रियासत हुसैन और फिरासत हुसैन दोनों के विरुद्ध मामला चलाना चाहिए क्यों कि रियासत हुसैन के पर्चों पर हस्ताक्षर हैं तथा उस ने फिरासत हुसैन की फर्म के पर्चों का उपयोग किया। इस तरह इस छल में फिरासत हुसैन की सहमति भी थी। यह इस लिए भी जरूरी है कि फिरासत हुसैन के इस मामले में लिप्त हो जाने से वह रियासत हुसैन पर दबाव भी बनाएगा।

स के अतिरिक्त आप रूपयों व ब्याज की वसूली के लिए रियासत हुसैन के विरुद्ध दीवानी दावा भी कर सकते हैं। पर्चों पर रियासत हुसैन के हस्ताक्षर हैं। लेकिन पर्चे हिरासत हुसैन के स्वामित्व की फर्म के नाम से हैं। इस कारण से यह दावा रियासत हुसैन व हिरासत हुसैन की फर्म दोनों को प्रतिवादी बनाते हुए करना चाहिए। फर्म हिरासत हुसैन के जरिए पक्षकार बनेगी तथा फर्म के समन हिरासत हुसैन को तामील कराए जाएंगे। हमें पूरा विश्वास है कि यदि सही कानूनी कार्यवाही की गई तो आप को आप का पैसा ब्याज सहित वापस मिल जाएगा। कार्यवाही में समय तो अवश्य लगेगा।

अपना धन वसूल करने के लिए मुकदमा तो करना पड़ेगा

समस्या-

मुम्बई, महाराष्ट्र से भूपेन्द्र सिंह ने पूछा है –

फेसबुक के माध्यम से मेरी एक लड़की से दोस्ती हुई थी, मैं कई बार उससे मिला भी था।  उसके फैमिली में कुछ प्रॉब्लम थी तो उसने मुझसे पैसे मांगे थे।  मैंने दो बार में उसे 30000 रुपये दिए हैं।  एक बार में कैश 15000 और दूसरी बार उसके अकाउंट में 15000 डाले थे। अब उस लड़की ने अपना नंबर बंद कर दिया है और उसके द्वारा दिया गया पता भी गलत है। चूँकि वह एक लड़की है इसीलिए मैं कोई केस दर्ज नहीं करना चाहता।  उससे मैं अपना पैसा कैसे वसूल सकता हूँ।  कहाँ पर मुझे अपनी शिकायत दर्ज करनी चाहिए।  उसके द्वारा मेरे मोबाइल पर पैसे मांगने का मेसेज भी है मेरे पास और डिपाजिट का स्लिप भी। प्लीज हेल्प मी।

समाधान-

Havel handcuffदि आप के पास मोबाइल में उस का उधार मांगने का संदेश है और आप के द्वारा रुपया उस के बैंक खाते में डिपोजिट करवाया गया है तो आप उस पर दीवानी वाद दायर कर के उतना पैसा वसूल कर सकते हैं जितना आप ने उस के खाते में जमा करवाया था। बिना किसी रसीद के उसे जो रुपया आप ने नकद दिया है वह रुपया कानून के माध्यम से वापस मिलना दुष्कर है।

स लड़की ने आप को गलत पता बताया यह इस बात का सबूत है कि आप के साथ धोखाधड़ी/छल हुआ है जो कि एक गंभीर तथा अपराध है।  आप इस के लिए पुलिस में रिपोर्ट दर्ज करवा सकते हैं। एक बार पुलिस कार्यवाही करेगी तो उस के दबाव में आप को अपना पूरा रुपया मिल सकता है। लेकिन आप लड़की होने के कारण उस के विरुद्ध कोई मुकदमा नहीं करना चाहते तो फिर समझिए कि आप को अपना धन कभी भी वापस नहीं मिलेगा।  आप को रुपया वापस चाहिए तो आप को कोई न कोई कार्यवाही तो करनी होगी।  या तो आप दीवानी वाद उस के विरुद्ध न्यायालय में प्रस्तुत करें या फिर पुलिस में धोखाधड़ी करने के लिए रिपोर्ट दर्ज करवाएँ, या फिर दोनों काम करें।  तभी आप को अपना रुपया वापस मिलने की संभावना है। लेकिन आप चाहे पुलिस में रिपोर्ट कराएँ या फिर दीवानी वाद प्रस्तुत करें पहले आपको उस लड़की का सही सही वर्तमान पता ठिकाना पता करना होगा। तभी कोई कार्यवाही की जा सकती है।

प्रसंज्ञान लेने के पूर्व मजिस्ट्रेट को अभियुक्त को सुनने का अधिकार नहीं

समस्या-

मुम्बई, महाराष्ट्र से नारायण ने पूछा है-

मेरी पत्नी ने अदालत में भा.दं.विधान (आईपीसी) की धारा ४२०, ४९३, ४९४ में मुझ पर मिथ्या शिकायत दाखिल की है। जिस में कुछ भी सत्य नहीं है। वह शिकायत न्यायाधीश महोदय को मान्य नहीं है। अब तक वह शिकायत दाखिल किए हुए एक साल हो रहा है। फिर भी अब तक न्यायालय ने समन जारी नहीं किया  है।  मैं ने न्यायाधीश महोदय से निवेदन किया कि वे शिकायत रद्द करें। लेकिन वे मेरी बात नहीं मान रहे हैं । मैं कौन से कानून के तहत वह शिकायत रद्द करने कि गुजारिश कर सकता हूँ। मुझे अभी तक न्यायालय से समन नहीं मिला है।

समाधान-

किसी व्यक्ति द्वारा न्यायालय को किसी अपराध के किए जाने की शिकायत करना एक कानूनी अधिकार है और इसे किसी भी प्रकार से बाधित नहीं किया जा सकता। किसी अपराध की शिकायत प्राप्त होने पर न्यायालय उस पर शिकायत करने वाले का बयान लेता है। इस से न्यायालय यह समझे कि शिकायत तथ्यपूर्ण है तो उसे अन्वेषण के लिए पुलिस को भेज सकता है या स्वयं ही उस शिकायत की जाँच साक्ष्य ले कर कर सकता है। जाँच के उपरान्त यदि न्यायालय यह समझे कि मामला प्रसंज्ञान लेने लायक है तो उस शिकायत पर प्रसंज्ञान ले कर समन जारी करता है। यदि मामला प्रंसज्ञान लेने लायक नहीं है तो शिकायत को निरस्त कर सकता है।

किसी शिकायत पर प्रसंज्ञान लिए जाने के पहले उस शिकायत में वर्णित अभियुक्त को यह अधिकार नहीं कि वह न्यायालय के समक्ष अपनी ओर से कुछ तथ्य प्रस्तुत कर सके अथवा न्यायालय से कोई निवेदन कर सके।  इसी कारण से न्यायालय ने आप के निवेदन को अस्वीकार कर दिया है।

दि न्यायालय आप के विरुद्ध प्रसंज्ञान लेता है और समन जारी करने के लिए आदेश करता है तो आप न्यायालय के प्रसंज्ञान लेने और समन जारी करने के आदेश के विरुद्ध पुनरीक्षण आवेदन सेशन न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकते हैं और उस आदेश को निरस्त करवाने की चेष्टा कर सकते हैं। यदि मजिस्ट्रेट न्यायालय स्वयं ही शिकायत को निरस्त कर देता है तो आप को कुछ करने की आवश्यकता नहीं है।

एलआईसी एजेण्ट के विरुद्ध अपराधिक न्यास भंग के लिए परिवाद तथा धन वापसी के लिए दीवानी वाद प्रस्तुत करें

समस्या-

लआईसी के डायरेक्ट सेल्स एक्जक्यूटिव ने मुझसे नगद 41000 रुपए ले कर दो पालिसी खोली।  जिसमें एक फिक्स पालिसी 38378 तथा एक तिमाही प्रिमीयम पालिसी 3068 रू0 की थी जिसकी रसीद भी मुझे डीएसई द्वारा उपलब्ध करा दी गयी।  तिमाही प्रीमियम पालिसी संचालित हो गयी तथा बाण्ड मेरे पास आ गया।  किन्तु फिक्स पालिसी का जब बाण्ड नहीं आया तो मैने इंटरनेट के माध्यम से पालिसी रजिस्टर्ड किया जिसमें बताया गया कि डीएसई द्वारा चैक के माध्यम से पालिसी का प्रस्ताव किया गया है लेकिन चैक अनादरित होने के कारण प्रस्ताव पूर्ण नहीं हुआ और पालिसी बाण्ड जारी नही किया जा सकता।  चूंकि मैंने एलआईसी के पक्ष में कोई चैक जारी नहीं किया था तथा उपरोक्त बातों की सत्यता के लिये मैंने जन सूचना अधिकार अधिनियम के तहत एलआईसी कार्यालय से सूचना मांगी तो एलआईसी द्वारा जो सूचना उपलब्ध कराई गई उसके अनुसार उक्त चैक डीएसई के एकाउण्ट से जारी किया गया था तथा रसीद भी मुझे दे दी गई थी जिसमें एलआईसी द्वारा यह कहा गया कि सूचना अधिकार का पत्र प्राप्ति के 30 दिन के भीतर आप अपीलीय प्राधिकारी वरिष्ठ मण्डल प्रबन्धक के यहां अपील कर सकते हैं।  इसमें मुझे क्या करना चाहिए जिससे कि मेरा पैसा मुझे वापस मिल जाय और तथाकथित एलआईसी एजेण्ट को धोखाधड़ी की सजा भी मिले? इसके लिये मैने प्रथम सूचना रिपोर्ट थाने पर दिया परन्तु थाने पर कोई कार्यवाही न करके मुझे लौटा दिया गया। एलआईसी द्वारा दिये गये समय के अनुसार मेरे पास अपील का समय बहुत ही कम है।

-संजय कुमार, गाजीपुर, उत्तर प्रदेश

समाधान-

लआईसी के किसी भी एजेण्ट को एलआईसी की ओर से धनराशि प्राप्त करने का अधिकार नहीं है।   इस प्रकार किसी एजेण्ट द्वारा प्रीमियम के लिए किसी ग्राहक से प्राप्त की गई राशि के लिए एलआईसी जिम्मेदार नहीं होती।  इस कारण से आप इस मामले में एलआईसी से कोई भी सहायता प्राप्त नहीं कर सकते। यदि आप उक्त पालिसी के प्रीमियम का भुगतान कर देते हैं तो आप की वह पालिसी  एलआईसी द्वारा चालू की जा सकती है।  फिर भी आप को वरिष्ठ मंडल प्रबंधक के पास अपील जरूर कर देनी चाहिए।  जिस से एलआईसी को उस एजेण्ट के विरुद्ध कार्यवाही करने में सुविधा हो।

लआईसी एजेंट ने आप का पैसा अपने खाते में जमा कर लिया और अपने खाते का चैक एलआईसी को दिया जो अनादरित हो गया।  इस तरह एजेंट ने आप के साथ धारा 406 भारतीय दंड संहिता के अंतर्गत  अपराधिक न्यास भंग का अपराध किया है।  पुलिस ने आप की रिपोर्ट पर कोई कार्यवाही नहीं की तो आप उस की शिकायत अपनी रिपोर्ट संलग्न करते हुए क्षेत्र के पुलिस अधीक्षक से कर सकते हैं।  फिर भी कार्यवाही न होने पर आप एक परिवाद उक्त पुलिस थाना पर क्षेत्राधिकार रखने वाले न्यायिक मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत कर उसे धारा 156 (3) दंड प्रक्रिया संहिता के अंतर्गत पुलिस थाने भिजवा सकते हैं।  पुलिस को इस परिवाद पर कार्यवाही करनी पड़ेगी।

चूंकि आप को एजेण्ट से अपना रुपया भी वापस लेना है इस लिए आप एक नोटिस रजिस्टर्ड ए.डी. से भेज कर एजेण्ट से अपना रुपया एक सप्ताह में ब्याज तथा हर्जाने सहित वापस देने को कहें।  यदि वह एजेण्ट आप का रुपया वापस नहीं लौटाता है तो आप अपने धन की वसूली के लिए उस के विरुद्ध दीवानी वाद प्रस्तुत कर रुपया ब्याज और हर्जाने सहित वसूल कर सकते हैं।

अपमानजनक अभिवचनों के आधार पर मानहानि का मुकदमा किया जा सकता है

समस्या-

मेरे एक परिचित ने अपनी समस्या मुझे बताई और आप से समाधान पूछने के लिए कहा है।  उन की समस्या इस प्रकार है –

– मेरी के 2 पुत्रों और 3 पुत्रियों में से 1 पुत्र और 1 पुत्री ने मेरे उपर आरोप लगाया कि मैं ने उनकी माँ के नाम की खेती की जमीन धोखे से हडप ली। जब कि उनकी माँ ने कोई हिबानामा नही किया था। मेरी बुआ ने जब मैं नाबालिग था तो मेरे पिता के देहांत के बाद यह जमीन मुझे हिबा (दान) कर दी थी। यह बात उनके बच्चों को भी पता थी। बुआ की मृत्यु के 20 साल बाद उन्हों ने दूसरों के बहकावे मे आकर एक वाद दायर किया कि मैं ने उनकी माँ के नाम की झूठी रिपोर्ट लगा कर रजिस्ट्री करा ली। न्यायालय में वाद चला। लेकिन वे यह साबित नही कर पाये कि हमने झूठा काम किया है और समय सीमा के कारण भी यह वाद वो हार गये। मेरी बुआ के बच्चों ने बडी चालाकी से 1 पुत्र और 2 पुत्रियों को मेरे साथ इस वाद मे प्रतिवादी बनाया था कि उन को जमीन का हिस्सा मिल गया है हमें नही।  हमारे कहने के बाद भी उन्हों ने इस पर कोई ऐतराज नहीं किया और हमारे साथ प्रतिवादी बने रहे। उनका यह काम मुझे भविष्य में हानि तो नहीं पहुँचाएगा? मेरी बुआ के बच्चों ने वाद में वंशावली प्रस्तुत की और यह आरोप लगाया कि मेरे पिता ने मेरी माता को तलाक देकर उनकी दूसरी बहन से शादी कर ली थी और उसके के बाद हुई मेरी दो बहनों को उन्हों ने नाजायज और मेरी माँ को उनकी तलाक शुदा पत्नी बताया। जबकि मेरी माँ न तो तलाक शुदा थी और न मेरी बहनें नाजायज थीं। क्या मैं उनके विरूद्ध इस कृत्य के लिए न्यायालय में मानहानि और झुठा मुकदमा लगाने के लिए उन के विरुद्ध वाद दायर कर सकता हूँ?

-हाज़ी अमजद, गंजबासोदा, मध्यप्रदेश

समाधान-

म तौर पर यह माना जाता रहा है कि किसी मुकदमे में किसी पक्षकार द्वारा प्रस्तुत किए गए अभिवचनों को विशेषाधिकृत होते हैं और उन में जो तथ्य प्रस्तुत किए जाते हैं उन के आधार पर मानहानि का वाद प्रस्तुत नहीं किया जा सकता। पर ऐसा नहीं है। यदि अभिवचनों में अंकित किए गए तथ्य किसी के सम्मान को चोट पहुँचाते हैं और बाद में गैर आवश्यक या मिथ्या सिद्ध होते हैं तो ऐसे मामलों में मानहानि के लिए अपराधिक और हर्जाने का दीवानी वाद प्रस्तुत किए जा सकते हैं। इस सम्बन्ध में कलकत्ता उच्च न्यायालय का धीरो कोच व अन्य बनाम गोविंददेव मिश्रा के मामले में दिया गया निर्णय तथा दिल्ली उच्च न्यायालय का संजय मिश्रा बनाम दिल्ली सरकार के मुकदमे में दिया गया निर्णय महत्वपूर्ण है। इन निर्णयों को आप उन पर क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

क्त मामले में आप के परिचित की माता जी और बहनों की मानहानि हुई है जिस से वे स्वयम् भी प्रभावित हुए हैं। वे स्वयं और उन की बहनें उक्त मामले में अपनी बुआ की उन संतानों के विरुद्ध जिन्होंने उन के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया था मानहानि के लिए अपराधिक परिवाद भी प्रस्तुत कर सकते हैं और हर्जाने के लिए दीवानी वाद भी प्रस्तुत कर सकते हैं।

ह प्रतिवादियों द्वारा वादी के मिथ्या कथनों पर ऐतराज न करने से आप के परिचित को कोई अंतर न पड़ेगा। क्यों कि न्यायालय ने वादी के कथनों को नहीं माना और वाद निरस्त कर दिया गया है। आप के परिचित को इस मामले में परेशान होने की कोई आवश्यकता नहीं है।

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