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संयुक्त संपत्ति में हिस्सेदार अपना हिस्सा विक्रय कर सकता है।

समस्या-

जमीला खातून ने सीतापुर उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

मैं ज़मीला खातून निवासी बाराबंकी, हाल सीतापुर मैंने सन १९९५ में एक ६०० स्क्वायर फुट का घर ख़रीदा था। उस बैनामे पर मेरा नाम व मेरी ५ पुत्रियों के नाम भी अंकित हैं। अब मैं अपना मकान बेचना चाहती हूँ, लेकिन मेरी बड़ी पुत्री उसमे टांग मार रही है और उससे मेरा विवाद चल रहा है। तो कृपा करके उसके बेचने का हल बताएँ कि किस प्रकार मैं उसे बेच सकती हूँ? क्या उसमें मैं कोई केस करूँ या पुलिस से शिकायत करूँ? अभी मकान में ताला पड़ा है। मेरी ५ नंबर की पुत्री जिससे मेरा विवाद चल रहा है वो भी अब उस मकान में नहीं रहती है परन्तु जबरन पूरा मकान हथियाना चाह रही है।

समाधान-

प का मकान एक संयुक्त संपत्ति है। इस के छह हिस्सेदार हैं। इस कारण कोई भी हिस्सेदार पूरा मकान नहीं बेच सकते। पूरा मकान सभी छह हिस्सेदार मिल कर ही बेच सकते हैं। हाँ आप पाँच हिस्सेदार अर्थात आप और आप की चार बेटियाँ मिल कर मकान के पाँच हिस्से बेच सकते हैं और मकान का कब्जा आप के पास हो तो खरीददार को हस्तान्तरित कर सकते हैं। लेकिन इस के बाद आपत्ति करने वाली पुत्री का छठा हिस्सा उस मकान में उसी का बना रहेगा। चाहे तो खरीददार प्रयत्न कर के आप की बेटी से छठा हिस्सा भी बाद में खरीद सकता है। या आप की आपत्ति करने वाली बेटी विभाजन का वाद कर सकती है। मकान छोटा होने से उस के भौतिक विभाजन की संभावना नहीं होने से स्थिति यही होगी कि बेटी को कहा जाएगा कि जो भी बाजार मूल्य है उस का छठा हिस्सा ले कर अपना हिस्सा छोड़ दे।

दूसरा रास्ता है कि आप बंटवारे का वाद प्रस्तुत करें और विभाजन करवाएँ विभाजन की कार्यवाही में भी वही होगा जो पहले हम बता चुके हैं। जब आप बेटी का हिस्सा खरीद लें तब आप पूरा मकान बेच सकती हैं।

लीज की संपत्ति का पुत्र के नाम हस्तान्तरण कैसे हो?

समस्या-

अमित भारद्वाज ने गणेश चौक, बारघाट रोड, मध्य प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मेरी दादी की एक दुकान इंदिरा गांधी जिला चिकित्सालय  रोगी कल्याण समिति के काम्प्लेक्स के अंतर्गत है । दुकान 2000 सन में रोगी कल्याण समिति से क्रय की गई थी। किरायेदारी पर रोगी कल्याण समिति 500 रुपये किराया हर माह किरायेदारी के रूप में सभी दुकानदार से लेती है। दादी अब यह चाहती है की दुकान पापा जी के नाम से हस्तान्तरित हो जाये । समिति केअध्यक्ष कलेक्टर महोदय होते हैं और सचिव जिला अस्पताल के सर्जन होते है। दादी ने रोगी कल्याण समिति को आवेदन भी दे दिया है, जन सुनवाई में कलेक्टर ने यह बताया था कि यदि दादी दुकान पापा के नाम करना चाहती है और अन्य पुत्रों को कोई आपत्ति नहीं है तो वह कोर्ट जाने में स्वतंत्र है। लेकिन आवेदन देने के बाद समिति के बाबू काम नहीं कर रहे हैं बोलते है कि कोर्ट जाओ। इस पर हम ने उन से कहा कि दादी अभी जीवित है और जीवित अवस्था में दुकान जिसे चाहे उसे दे सकती है। दादी और पिताजी को क्या करना चाहिए।

समाधान-

प के द्वारा प्रेषित तथ्यों से ऐसा प्रतीत होता है कि दुकान का स्वामित्व रोगी कल्याण समिति का है और दुकान आप की दादी के नाम लीज पर है। लीज पर दी गयी संपत्ति को हस्तान्तरित करने के लिए मूल स्वामी की अनुमति की आवश्यकता है। दादी के नाम जो लीज डीड है उस की शर्तों पर निर्भर करता है कि दादी दुकान कैसे अपने किसी पुत्र या अन्य व्यक्ति के नाम हस्तान्तरित कर सकती है। सब से पहला काम तो यह किया जा सकता है कि दादी एक वसीयत कर के दुकान को आप के पिता के नाम वसीयत कर दे और इस वसीयत को उप पंजीयक के कार्यालय में वसीयत करा दिया जाए। इस से यह सुनिश्चित हो जाएगा कि दादी के देहान्त के तुरंत बाद यह दुकान आप के पिता जी के स्वामित्व में स्वतः ही आ जाएगी। तब आप के पिताजी वसीयत की प्रमाणित प्रति रोगी कल्याण समिति के समक्ष प्रस्तुत कर लीज का नामान्तरण उनके नाम करने का आवेदन कर सकते हैं।

विकल्प में आप यह भी कर सकते हैं कि आप उप पंजीयक कार्यालय में लीज डीड को दिखा कर यह पूछ सकते हैंं कि क्या दादी इस लीज को विक्रय या दानपत्र के माध्यम से आप के पिता जी को हस्तान्तरित कर सकती है। यदि उन्हें कोई आपत्ति न हो तो दान पत्र लिख कर उसे पंजीकृत करवा कर दादी उस दुकान को आप के पिताजी के नाम कर सकती है। पंजीकृत दानपत्र के आधार पर लीज आपके पिताजी के नाम नामांतरित करने के लिए रोगी कल्याण समिति को आवेदन किया जा सकता है। वसीयत और दान पत्र दोनों के आधार पर लीज का नामान्तरण न किए जाने पर न्यायालय के समक्ष व्यादेश जारी करने के लिए समिति के विरुद्ध वाद प्रस्तुत किया  जा सकता है।

दिया हुआ दान स्वीकार कर लिए जाने के बाद वापस नहीं हो सकता।

Giftसमस्या-

शकुन्तला ने सहारनपुर, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-

पिताजी ने सन् 2010 में मकान खरीदा, इसी मकान को पिताजी ने दानपत्र निष्पादित कर पंजीकृत करवा कर बड़ी बेटी को हस्तान्तरित कर दिया। क्या पिता की छोटी बेटी इस मकान में हिस्सा पा सकती है? क्या पिता इस दान को वापस लेने का अधिकार रखते हैं। क्या पिता के देहान्त के बाद छोटी बेटी इस मकान में हिस्सा प्राप्त कर सकती है। अब बड़ी बेटी के पिता इस मकान की कीमत बड़ी बेटी से मांग रहे हैं। बड़ी बेटी भी पिता को मकान की कीमत देना चाहती है। यह राशि दी जाए तो क्या कैसे दी जाए? क्या दस्तावेज लिखवाया जाए?

समाधान-

दि किसी व्यक्ति ने दानपत्र निष्पादित कर उसे पंजीकृत करवा कर कोई अचल संपत्ति किसी को दान कर दी हो, जिसे दान की हो उस ने उस दान को स्वीकार कर लिया हो तथा अचल संपत्ति का कब्जा भी प्राप्त कर लिया हो तो ऐसा दान निरस्त किया जाना संभव नहीं है।

दि बड़ी बेटी ने पिता के दान पत्र को स्वीकार कर उस संपत्ति पर कब्जा प्राप्त कर लिया है तो यह दानपत्र निरस्त नहीं किया जा सकता। छोटी बेटी पिता के जीवनकाल में या उन के जीवन के उपरान्त भी इस दान पत्र को निरस्त नहीं करवा सकती है और न ही उस मकान में कोई हिस्सा प्राप्त करना चाहती है। कोई भी व्यक्ति अपने द्वारा किए हुए दान को दान लेने वाले द्वारा स्वीकार करने के बाद वापस नहीं ले सकता है।

दि पिता दान किए हुए मकान का मूल्य अब मांग रहे हैं तो यह कानून के विरुद्ध है वह अब ऐसा नहीं कर सकते। लेकिन यदि पुत्री अपने पिता को धन देना चाहती है तो वह धन किसी अन्य रूप में ही देना होगा। इस धन का हस्तान्तरण किस विलेक के माध्यम से देना चाहिए यह परिस्थितियों पर निर्भर करेगा। कोई अच्छा वकील बड़ी बेटी और पिता से बात कर के निष्पादित दानपत्र का अध्ययन और परिस्थितियों का मूल्यांकन कर के तथा दोनों पक्षों की शंकाओं और कानून को ध्यान में रखते हुए तय कर सकता है कि इस धनराशि के हस्तान्तरण के लिए किस तरह का विलेख लिखना चाहिए।

बेहतर है कि माँ संपत्ति को आप के नाम गिफ्ट डीड कर हस्तान्तरित कर दे।

समस्या-

संजय ने पाली, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे भाई संजय की शादी सन् 2002 में हुई थी, वह दो चार महीने के बाद ही हमारे घर से अलग हो गया। मैं ने मेरे माँ मधु के नाम से बैंक से लोन लेकर शहर पाली जिला पाली (राजस्थान) में प्रॉपर्टी सन् 2000 में खरीदी। उस बैंक लोन की समस्त राशि मेरे द्वारा जमा करवाई गई। अभी भी मैं मेरी माँ के साथ में ही रहता हु। तो क्या मेरा भाई संजय मेरी माँ की मृत्यु के बाद इस प्रॉपर्टी का हिस्सेदार रहेगा? अभी मेरी माँ जीवित है। यदि मेरा भाई संजय हिस्सेदार रहता है तो उसे हिस्सेदारी से अलग करने के लिए मुझे मेरी माँ से इस प्रॉपर्टी सम्बन्ध में क्या क्या दस्तावेज तैयार करवाने चाहिए? जिस से इस मेरी माँ मधु के नाम से बैंक लोन से मेरे द्वारा खरीदी सम्पति का पूरा स्वामित्व मेरा ही रहे, बाद में किसी भी तरह का विवाद न हो।

समाधान

प ने उक्त संपत्ति माँ के नाम से खरीदी, ऋण भी चुका दिया गया। वैसी स्थिति में अब उक्त संपत्ति पर किसी तरह का कोई भार भी नहीं है और वह भार मुक्त है। वैसी स्थिति में उक्त संपत्ति माँ की मानी जाएगी और माता जी की मृत्यु के उपरान्त वह उत्तराधिकार में चली जाएगी। जिस में माँ के सभी उत्तराधिकारी बराबर के हिस्सेदार होंगे। निश्चित रूप से आप का भाई भी होगा और वह बंटवारा करने और हिस्सा देने का वाद संस्थित कर सकता है।

दि आप की माँ उक्त संपत्ति को आप के नाम वसीयत कर उसे पंजीकृत करवा देती हैं और फिर अपने जीवन काल में उस वसीयत को परिवर्तित या रद्द नहीं करती हैं तो वसीयत के अनुसार उक्त संपत्ति आप की हो जाएगी। लेकिन यदि माँ उक्त वसीयत को रद्द करती है या उसे परिवर्तित करती है तो उन की अन्तिम वसीयत ही सही मानी जाएगी।

दि आप वसीयत के बदले जाने की इस आशंका से बचना चाहते हैं तो बेहतर होगा कि उक्त संपत्ति को आप की माँ आप को गिफ्ट डीड से हस्तान्तरित कर सकती हैं। इस से आप माताजी के जीवन काल में ही उक्त संपत्ति के स्वामी हो जाएंगे।

पिता से पुत्र और चाचा से भतीजे के नाम हस्तान्तरण पर स्टाम्प शुल्क देय होगी।

ऊसरसमस्या-

मुकेश वर्मा ने रायपुर, छत्तीसगढ़ से समस्या भेजी है कि-

मेरे पिता जी और चाचा जी का आपसी बंटवारा हो चुका है। चूंकि हमारी सम्पत्ति दो गांवों (कठिया एवं डिघारी) में है एवं बंटवारे में पिता जी एवं चाचा को दोनों गावों से बराबर-बराबर (कठिया में 11-11 एवं डिघारी में 10-10 एकड़) हिस्सा प्राप्त है। खाता विभाजन होने के पश्चात् दोनों अपने अपने हिस्से पर कृषि कार्य कर रहे है। मेरे पिता जी और चाचा जी आपसी सहमति से हिस्से में प्राप्त सम्पत्ति का अदला-बदली करना चाहते हैं। अर्थात मेरे पिता जी डिघारी में प्राप्त 10 एकड़ जमीन चाचा जी के नाम कर ग्राम कठिया की 10 एकड़ जमीन लेना चाह रहे है। खेती-बाड़ी का कार्य अब अपने हाथ में लेना चाहता हूं, और चाचा जी से बदले में प्राप्त 10 एकड़ जमीन को पिता जी के नाम पर न करके सीधे अपने नाम पर करवाना चाहता हूं तथा जो जमीन ग्राम कठिया में मेरे पिता जी के नाम पर है उसे अपने बड़े भाई के नाम पर करवाना चाहता हूं। चूंकि दोनों गांव का पटवारी अलग अलग है एवं अभी तक मैं ने पटवारी से मुलाकात कर कोई सलाह-मशविरा नहीं किया है। अदला-बदली एवं नामांतरण की प्रक्रिया क्या है? इसके किस-किस प्रकार की चार्जेस लगते है? क्या चाचा जी के हिस्से की जमीन को अपने नाम पर करवाने पर मुझे अलग से रजिस्ट्री करवाना पड़ेगा? ऐसी कोई प्रक्रिया बताये जिससे कम खर्च में (या बिना कोई खर्च के) चाचा जी की जमीन अपने नाम पर करवा सकूं। इस पर मेरे पिता जी, मेरे बड़े भाई एवं चाचा जी पूरी तरह से सहमत है।

समाधान-

कृषि भूमि से संबंधित कानून,नियम व प्रक्रिया प्रत्येक राज्य के लिए भिन्न भिन्न है। इस कारण इस मामले में आप को स्थानीय वकील से मशविरा करना चाहिए।

म आप को सिर्फ इतनी राय दे सकते हैं कि विभाजन के बाद पिताजी और चाचाजी आपस में भूमि की अदला बदली करना चाहते हैं तो वे इस के लिए एक्सचेंज डीड निष्पादित कर सकते हैं। जिस में स्टाम्प ड्यूटी कम लगेगी। लेकिन यदि आप के चाचाजी और पिताजी की जमीन आप अपने और बड़े भाई के नाम कराना चाहते हैं तो यह गिफ्ट या विक्रय होगा और इस पर पूरी स्टाम्प ड्यूटी देनी पड़ेगी।

बेहतर होगा कि पहले एक्सचेंज डीड निष्पादित करवा ली जाए। जमीन पिताजी के नाम आ जाए। फिर आप अपने पिता जी से वसीयत करवा लें जिस से जमीन उन के जीतेजी उन के नाम रहे और उन के जीवनकाल के उपरान्त वसीयत के हिसाब से दोनों भाइयों को उन के हिस्से की भूमि मिल जाए।

कोई भी हिन्दू केवल अपनी स्वअर्जित व संयुक्त संपत्ति में अपने हिस्से को हस्तान्तरित कर सकता है।

ऊसरसमस्या-

शिरीष अग्रवाल ने गोदारी, महासमुन्द, छत्तीसगढ़ से पूछा है- 

कुछ दिनों से पिताजी का मानसिक संतुलन बिगड़ गया है, वे मुझसे काफी नाराज हैं।  मुझे सबक सिखाने के लिए वे कृषि भूमि, घर, ट्रेक्टर, कृषि उपकरण, खदान की जमीन में से ज्यादातर हिस्सा मेरे प्रिय अनुज को देना चाहते हैं। पिताजी ने उक्त पैतृक कृषि भूमि अपने भाइयों से खरीदी थी जिसका केवल मौखिक बँटवारानामा सादे कागज पर हुआ है। वर्तमान में कुल 18 एकड़ कृषिभूमि में से 3 मेरे, 3 मेरी पत्नी, 6 अनुज के तथा 6 पिताजी के नाम से खाते (ऋण पुस्तिका) पर चढ़ी है। क्या भूमि मेरे खाते पर चढ़ी होने के बाद भी पिताजी मुझसे जमीन वापस लेकर अनुज भाई को दे सकते हैं। मैं किस प्रकार से इस विवाद से बच सकता हूँ? कृपया उचित मार्गदर्शन देने की कृपा करें।


समाधान-

प के पिता द्वारा कृषि भूमि को उन के भाइयों से खरीदने की बात पूरी तरह स्पष्ट नहीं है। देखना यह है कि पिताजी के भाइयों से आप के पिता के नाम किस दस्तावेज के माध्यम से भूमि का हस्तान्तरण हुआ है। हो सकता है वह रिलीज डीड के माध्यम से हुआ हो या किसी अन्य रीति से। जिस रीति से हस्तान्तरण हुआ है वह कृषि भूमि के स्वामित्व को प्रभावित करेगी। जिस 18 एकड़ भूमि की आप बात कर रहे हैं वह पहले से ही विभिन्न व्यक्तियोें के खाते चढ़ी हुई है। उन में से केवल 6 एकड़ भूमि आप के पिता के खाते की है वे उसे आप के भाई को या किसी अन्य व्यक्ति को हस्तान्तरित कर सकते हैं, अन्य भू्मि को नहीं। आप के व आप की पत्नी के खाते जो 3-3 एकड़ भूमि है उसे वे् हस्तान्तरित नहीं कर सकते।

 कोई भी हिन्दू अपनी स्वअर्जित अथवा सहदायिक (पुश्तैनी) संपत्ति में अपना हिस्सा हस्तान्तरित कर सकता है या उस के संबंध में वसीयत कर सकता है। लेकिन किसी दूसरे के खाते की संपत्ति को हस्तान्तरित नहीं कर सकता और न ही उस की वसीयत कर सकता है। यदि आप के पिता किसी तरह से आप के व आप की पत्नी के खाते की भूमि में दखल करें और उस का हस्तान्तरण करना चाहेँ तो आप उस के हस्तान्तरण पर रोक के लिए दीवानी न्यायालय में निषेधाज्ञा का वाद प्रस्तुत कर निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। यदि अन्य संपत्तियों का निर्माण पुश्तैनी संपत्ति की आय से हुआ है तो आप अन्य संपत्तियों को भी संयुक्त कृषि भूमि की आय से बनी हुई बताते हुए उस के हस्तान्तरण पर भी निषेधाज्ञा के लिए प्रयास कर सकते हैंं।

कोई भी व्यक्ति अपनी संपत्ति को किसी को भी हस्तान्तरित कर सकता है।

lawसमस्या-

निर्मल मालवीय ने राजगढ़, मध्य प्रदेश से पूछा है-

गर कोई पिता अपने दो लडको में से किसी एक के नाम से अपनी संपत्ति करना चाहता है तो यह सम्भव है या नहीं?

समाधान-

बिलकुल संभव है। प्रत्येक व्यक्ति अपनी स्वयं की संपत्ति को किसी को भी वसीयत कर सकता है, उसे विक्रय, दान आदि प्रकार से हस्तान्तरित कर सकता है। पिता भी एक व्यक्ति है वह भी यह सब कर सकता है। यहाँ तक कि कोई पुश्तैनी/सहदायिक संपत्ति में उस का हिस्सा भी वह इसी प्रकार से वसीयत, विक्रय, दान आदि कर सकता है।

केवल जो संपत्ति पुश्तैनी /सहदायिक है उस में अपने पुत्रों, पुत्रियों के हिस्से को किसी अन्य को हस्तान्तरित नहीं कर सकता न ही वसीयत कर सकता है। कोई व्यक्ति यदि अपनी किसी संपत्ति को अपने जीवन काल में स्थानान्तरित नहीं करता है या उस की वसीयत नहीं करता है तो ही उस के उत्तराधिकारियों का उस संपत्ति में उस की मृत्यु के बाद अधिकार बनता है उस से पहले नहीं।

संयुक्त संपत्ति का हिस्सेदार संपत्ति में अपने हिस्से की संपत्ति हस्तान्तरित कर सकता है।

court-logoसमस्या-
यश ने कैथल हरियाणा से पूछा है-

मेरी एक महिला मित्र है उसका 498ए, 406,506 368 आईपीसी का एक मुकदमा कोर्ट में चलरहाहै। उस महिला ने अपने ससुर से कुछ जमीनभी खरीदी थी। उसमहिला के दो बचचेभी हैंजो उस की ससुराल में उसके पति के पास हैं अबउसमहिला का ससुर बाकीसबजमीन बेचनाचाहताहै। क्या वह महिला उसको किसी भीप्रकार से बेचने से रोक सकती है! उस महिला और उसके ससुर तथा कुछ अन्य लोगभी उस जमीन के सांझी खेवट के हिस्सेदार हैं उस महिला का उद्देश्य अपने बच्चोंके भविष्य की सुरक्षा करना है यदि वह खेवट अलग करने का दावा करे तो क्या तब तक जमीन नहीं बिक सकती है जब तक खेवट अलग न हो?

 

समाधान-

भूमि, कृषिभूमि और स्थावर संपत्तियों के स्वामित्व में परिवर्तन होते रहते हैं। किसी की मृत्यु हो जाने पर उस का स्थान उस के वसीयती या फिर उत्तराधिकारी ले लेते हैं। इस तरह सम्पत्ति के स्वामित्व में हिस्सेदारी बदलती रहती है। कोई भी हिस्सेदार अपने हिस्से के स्वामित्व को हस्तान्तरित कर सकता है। जब की वास्तविक उपभोग या सपंत्ति पर कब्जा उस के सभी स्वामियों का नहीं होता। वर्तमान में आप की महिला मित्र ने जिस जमीन को खरीदा है वह भी स्वयं उस के कब्जे में नहीं है। केवल उस के पास जमीन के एक हिस्से का स्वामित्व है। जब वह खुद अपने ससुर से किसी जमीन के हिस्से का स्वामित्व खरीद सकती है तो कोई दूसरा भी खरीद सकता है। यदि उस का ससुर उस के हिस्से की जमीन को छोड़ कर शेष का स्वामित्व विक्रय करता है तो वह सारी जमीन का कब्जा जिस में आप की महिला मित्र का हिस्सा भी सम्मिलित है उस का कब्जा भी क्रेता को दे सकता है। तब जमीन का स्वामित्व तो आप की महिला मित्र का रहेगा लेकिन कब्जा ससुर से किसी और के पास चला जाएगा। फिर आप की मित्र उस क्रेता से कब्जा प्राप्त करने के लिए लड़ती रहे और कब्जेदार क्रेता जब तक कब्जा न छोड़े तब तक उस का उपभोग करता रहे।

प की मित्र को चाहिए कि वह तुरन्त विभाजन का वाद राजस्व न्यायालय में प्रस्तुत करे जिस में वह यह प्रार्थना न्यायालय से करे कि विभाजन कर के उसे उस के हिस्से की जमीन का पृथक कब्जा दिलाया जाए। उसे उसी वाद में एक अस्थाई निषेधाज्ञा का आवेदन दे कर यह प्रार्थना करे कि उस के हिस्से को न बेचा जाए और जमीन का कब्जा किसी अन्य को हस्तान्तरित नहीं किया जाए।

अचल संपत्ति का हस्तान्तरण बिना पंजीकृत दस्तावेज के अमान्य है।

Joint propertyसमस्या-
वाराणसी, उत्तर प्रदेश से शैवी ने पूछा है-

मेरे दादा ने बड़ी माँ के नाम से जमीन 1907 में खरीदी और मकान पीएफ लोन  ले कर बनवाया।  अब मेरी बड़ी माँ ने अपने पति के मरने के बाद अपने लड़के के साथ मिलकर मुक़दमा कर दिया और कोर्ट के बाहर 100 के स्टाम्प पर सुलह कर के गाँव की जमीन के बदले मकान ले लिया।  ये तीन वर्ष पूर्व की बात है।  तीन वर्ष बाद बड़ी माँ का बेटा हमारे गाँव की जमीन में दावा कर रहा है। अब गाँव की जमीन भी बाँटनी है क्योंकि दादी मर गई।  मतलब गाँव के हिसाब से हम संयुक्त परिवार में है। और परिवार की बड़ी बहू ने यानि मेरी बड़ी माँ ने संयुक्त रूप से बने मकान में किसी को हिस्सा नहीं दिया और मकान सुलहनामे के माध्यम से ले लिया। उनका लड़का कहता है की पीला कर लिखवाया है। हम क्या करें?

समाधान-

खेती की जमीन का बँटवारा राजस्व न्यायालय से हो सकता है। लेकिन खेती की जमीन और मकान सारी संयुक्त संपत्ति का बँटवारा दीवानी न्यायालय कर सकता है। इस कारण यदि बड़ी माँ और उन का लड़का राजस्व न्यायालय में बँटवारे का वाद दायर करता है तो आप पूर्व में सुलह के आधार पर बड़ी माँ को दिए गए मकान व खेती की जमीन को शामिल करते हुए संपूर्ण संयुक्त संपत्ति के बँटवारे का दीवानी वाद दीवानी न्यायालय में कीजिए। दीवानी वाद प्रस्तुत करने के बाद राजस्व न्यायालय में उन के द्वारा खेती के लिए कोई मुकदमा नहीं चलाया जा सकेगा और यदि पहले से प्रस्तुत कर दिया है तो सिविल न्यायालय से उस की सुनवाई रुकवाई जा सकती है।

कोई भी अचल संपत्ति केवल पंजीकृत प्रलेख के माध्यम से ही हस्तान्तरित की जा सकती है। इस कारण सुलहनामे का कोई प्रभाव नहीं है। मकान में सभी हिस्सेदारों का हक बना हुआ है। आप को सफलता मिलेगी। आप के द्वारा किए गए दीवानी वाद में वह सुलहनामा सामने आ सकता है। किन्तु उस में तो यह लिखा है कि खेती की जमीन के बदले दिया गया है इस कारण हो सकता है वह सामने ही नहीं आए। आएगा तो भी लाभ आप को ही होगा। आप अपने क्षेत्र के किसी अच्छे दीवानी मामलों के वकील को सभी दस्तावेज दिखाते हुए सलाह ले कर कार्यवाही करें।

हक-त्याग केवल पंजीकृत हक-त्याग विलेख से ही मान्य . . .

Release Deed
समस्या-
शाजापुर, मध्य प्रदेश से नवीन चंद्र कुम्भकार ने पूछा है –

क्या पैतृक संपत्ति में महिलाएँ अपना हक अन्य उत्तराधिकारियों के पक्ष में तहसीलदार के न्यायालय में केवल बयान के आधार पर त्याग सकती हैं? जब कि मृत्यु  के उपरान्त नामांतरण के लिए वाद वैध उत्तराधिकारियों द्वारा प्रस्तुत किया गया है।

समाधान-

किसी भी संपत्ति में यदि किसी स्त्री या पुरुष को स्वामित्व का या खातेदारी का अधिकार प्राप्त है तो यह अधिकार त्यागना एक तरह से संपत्ति का हस्तान्तरण है जो केवल हकत्याग विलेख (रिलीज डीड) को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवा कर ही त्यागा जा सकता है। इस के अतिरिक्त किसी भी प्रकार से नहीं। संविधान और कानून के समक्ष स्त्रियाँ और पुरुष दोनों समान हैं। अक्सर तहसीलदार ही उस इलाके का उप पंजीयक भी होता है। लेकिन वह किसी के बयान के आधार पर हकत्याग को स्वीकार नहीं कर सकता। उस के लिए अलग से हकत्याग विलेख लिखा जाएगा, निर्धारित स्टाम्प ड्यूटी भी देनी होगी और पंजीकरण शुल्क भी देना होगा और उसे पंजीकृत भी किया जाएगा।

कत्याग विलेख आवश्यक रूप से पंजीकरणीय प्रलेख है। यदि किसी भी कार्यवाही में यह कहा जाता है कि किसी ने किसी के हक में या शेष स्वामियों के हक में हक त्याग कर दिया है तो हकत्याग का पंजीकृत विलेख ही उस का प्रमाण होगा। अपंजीकृत प्रमाण को कोई भी न्यायालय साक्ष्य के रूप में स्वीकार नहीं कर सकता। यदि नामांतरण के लिए आवेदन किया गया है तो यह भी एक न्यायिक कार्यवाही है तथा हक त्याग का आधार केवल हकत्याग विलेख ही हो सकता है।

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