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नाना की संपत्ति में उत्तराधिकार

समस्या-

राजेश कुमार गुप्ता ने बिरसिंगपुर पाली, जिला उमरिअ, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मेरे नाना की दो संतानें थीं। एक पुत्र एवं एक पुत्री। मेरे नाना की मृत्त्यु 1960 के लगभग हो गई और मेरी माँ की मृत्त्यु 1970 में हो गई। मेरे नाना का जमीन 9 एकड़ है जो कि 1958-59 के रिकार्ड पर मेरे मामा का नाम है। मेरे मामा की मृत्त्यु 2000 के आसपास हुई है। वर्तमान में जमीन मेरे मामा के लड़के एवं बहन के नाम पर है। क्या मुझे मेरे माँ का हिस्सा मिल सकता है।

समाधान-

आप के नाना की जो भी भूमि थी वह या तो पुश्तैनी अर्थात सहदायिक संपत्ति रही होगी अथवा स्वअर्जित रही होगी। यदि वह स्वअर्जित थी तो उस में आप की माताजी का उतना ही अधिकार था जितना कि आप के मामाजी का था।

यदि वह सहदायिक संपत्ति भी रही हो तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 जिसे अब 2005 के संशोधन से निरसित कर दिया गया है में यह उपबंध था कि यदि किसी हिन्दू मिताक्षर सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का कोई हिस्सा हो तो उस का दाय उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यदि ऐसे पुरुष की अधिनियम की अनुसूची के प्रथम खंड में वर्णित कोई स्त्री संबंधी अथवा कोई ऐसा पुरुष संबंधी जीवित हो एसी स्त्री के माध्यम से दावा करता हो तो ऐसे मृत पुरुष का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से शासित होगा। इस तरह संपत्ति सहदायिक होने पर भी आप की माताजी का उस संपत्ति में उतना ही अधिकार था जितना आप के मामा जी का।

यदि राजस्व रिकार्ड में नाना जी के देहान्त के उपरान्त भूमि का नामान्तरण मामाजी के नाम और अब मामाजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संतानों के नाम हो गया है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। स्वयं मध्यप्रदेश उच्चन्यायालय का निर्णय है कि नामान्तरण से संपत्ति में अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं होता। इस तरह आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद संस्थित कर अपने हिस्से पर पृथक कब्जे की राहत की मांग कर सकते हैं।

आप के इस मामले में एक ही बाधा हो सकती है वह यह कि कहीं आपकी माताजी से आप के मामाजी ने उन का हक छोड़ने का आग्रह किया हो और आप की माताजी ने स्वयं स्वैच्छा से अपना हक छोड़ दिया हो। वैसी स्थिति में आप का इस संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं होगा। इस तथ्य का पता रिकार्ड देख कर लगाया जा सकता है या फिर आप दावा करें तो मामा की संतानें अपने प्रतिवाद में यह कह सकती हैं और साबित कर सकती हैं।

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