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नाना की संपत्ति में उत्तराधिकार

February 16, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार गुप्ता ने बिरसिंगपुर पाली, जिला उमरिअ, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मेरे नाना की दो संतानें थीं। एक पुत्र एवं एक पुत्री। मेरे नाना की मृत्त्यु 1960 के लगभग हो गई और मेरी माँ की मृत्त्यु 1970 में हो गई। मेरे नाना का जमीन 9 एकड़ है जो कि 1958-59 के रिकार्ड पर मेरे मामा का नाम है। मेरे मामा की मृत्त्यु 2000 के आसपास हुई है। वर्तमान में जमीन मेरे मामा के लड़के एवं बहन के नाम पर है। क्या मुझे मेरे माँ का हिस्सा मिल सकता है।

समाधान-

आप के नाना की जो भी भूमि थी वह या तो पुश्तैनी अर्थात सहदायिक संपत्ति रही होगी अथवा स्वअर्जित रही होगी। यदि वह स्वअर्जित थी तो उस में आप की माताजी का उतना ही अधिकार था जितना कि आप के मामाजी का था।

यदि वह सहदायिक संपत्ति भी रही हो तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 जिसे अब 2005 के संशोधन से निरसित कर दिया गया है में यह उपबंध था कि यदि किसी हिन्दू मिताक्षर सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का कोई हिस्सा हो तो उस का दाय उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यदि ऐसे पुरुष की अधिनियम की अनुसूची के प्रथम खंड में वर्णित कोई स्त्री संबंधी अथवा कोई ऐसा पुरुष संबंधी जीवित हो एसी स्त्री के माध्यम से दावा करता हो तो ऐसे मृत पुरुष का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से शासित होगा। इस तरह संपत्ति सहदायिक होने पर भी आप की माताजी का उस संपत्ति में उतना ही अधिकार था जितना आप के मामा जी का।

यदि राजस्व रिकार्ड में नाना जी के देहान्त के उपरान्त भूमि का नामान्तरण मामाजी के नाम और अब मामाजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संतानों के नाम हो गया है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। स्वयं मध्यप्रदेश उच्चन्यायालय का निर्णय है कि नामान्तरण से संपत्ति में अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं होता। इस तरह आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद संस्थित कर अपने हिस्से पर पृथक कब्जे की राहत की मांग कर सकते हैं।

आप के इस मामले में एक ही बाधा हो सकती है वह यह कि कहीं आपकी माताजी से आप के मामाजी ने उन का हक छोड़ने का आग्रह किया हो और आप की माताजी ने स्वयं स्वैच्छा से अपना हक छोड़ दिया हो। वैसी स्थिति में आप का इस संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं होगा। इस तथ्य का पता रिकार्ड देख कर लगाया जा सकता है या फिर आप दावा करें तो मामा की संतानें अपने प्रतिवाद में यह कह सकती हैं और साबित कर सकती हैं।

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भांजे को अपने नाना की संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

February 9, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

अजय कुमार ने ग्राम बासमतिया, जिला अररिया, बिहार से पूछा है-

पापा मम्मी की मृत्यु 1990 के पहले हो चुकी है। अब मेरी बहिन का पुत्र (भांजा) संपत्ति में हिस्सा मांगता है, जब कि उसकी मां-मेरी बहिन की मृत्यु हो चुकी है।

समाधान-

आप के पापा मम्मी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति आप भाई बहिन को समान रूप से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। इससे यह संपत्ति संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति हो गयी जिस में आप और आप की बहिन सम्मिलित हैं।

जब आप की बहिन की मृत्यु हो गयी तो उस का इस संपत्ति में जो हिस्सा है उस की संतानों को प्राप्त हो गया। इस तरह आप की बहिन के स्थान पर उस की संतानें संयुक्त हिन्दू परिवार का हिस्सा हो कर उस संयुक्त संपत्ति के स्वामी हो गए।

इस तरह आप की बहिन के पुत्र, आप के भांजे का इस संपत्ति में हिस्सा है, वह सही अपना हिस्सा मांग रहा है जो आप को देना पड़ेगा। नहीं देंगे तो वह विभाजन का वाद संस्थित कर के प्राप्त कर सकता है।

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समस्या-

बिकास कुमार ने गया, बिहार से पूछा है-

मेरे पापा ने सिविल केस किया था 2012 में, जिसमें और 5 भाई जिन पर केस हुआ था वह 4 सालों तक केस में नहीं आया। एक दिन बोलता है कि हमें किसी केस की जानकारी नहीं थी हमें कॉल फॉर रिटर्न के लिए समय दिया जाए। जबकि उसका वकील हमेशा पीठ पीछे जाकर इंक्वायरी लिया करता था। अचानक ऑर्डर के डेट पर एक भाई उपस्थित हो गया जिसमें बयान तैयारी के लिए 90 दिन का समय मांगना गया और उसने केस को फिर से 8 महीना कोर्ट में लंबा समय लेने का काम किया। उसके विरुद्ध भी ऑर्डर से पहले फिर एक बार हाजिरी दे दिया। जिसमें कोर्ट ने फिर से 3 महीने के टाइम पिटिशन दे दिया। आप से मेरा एक ही सवाल है इसमें सब संपूर्ण भाइयों को एक साथ कैसे उपस्थिति कराया जाए। नहीं तो हमें कोई ऐसा रास्ता बताइए जिससे यह सभी भाई जो अनुपस्थिति हैं उसे कोर्ट के माध्यम से उपस्थिति कराया जाए। आपसे विनम्र अनुरोध है कि हमें कोई रास्ता बताया जाए आज 6 साल से परेशान हैं। मैं चाहता हूं सिविल केस में कुछ बदलाव होने आवश्यकता है इसके लिए मैं क्या करूं और कहां जाऊँ? जिससे बदलाव हो सके। सिविल केस में मानव को शोषण किया जाता है, जो गरीब है उसके लिए सिविल केस नहीं है। जो सिविल केस 1 साल में खत्म हो जानी चाहिए उसे हमारे सरकार 20 सालों तक ले जाती है।

समाधान –

आप बहुत सही निष्कर्ष पर पहुँचे हैं कि हमारी सरकार एक साल में निपटने वाले सिविल केस को 20 सालों तक ले जाती है। हमें इस के कारणों तक जाना पड़ेगा। इस का बड़ा कारण यह है कि हमारे देश में अदालतों की संख्या आबादी के हिसाब से बहुत कम है। हमारा देश सब से कम जज-आबादी औसत  वाले देशों में से एक है। सब से ताजा उपलब्ध आंकड़ों के मुताबिक दस लाख आबादी पर अमरीका में 107, कनाडा में 75, इंग्लेंड में 51 और आस्ट्रेलिया में 41 जजों का अनुपात है, जब कि भारत में 10 लाख की आबादी पर केवल मात्र 18 जज हैं। उसी हिसाब से अदालतें हैं। हमारी प्रत्येक अदालत पर अमरीका के मुकाबले पाँच गुना मुकदमों का बोझा है। सभी मुकदमों में लगातार सुनवाई होना जरूरी है। इस कारण से अदालतों में तीन-चार माह में एक पेशी होती हैं। उस पेशी पर भी काम नहीं होता बल्कि तारीख हो जाती है क्यों कि अदालत की सूची में जितना काम वह अदालत कर सकती है उस से दस गुना तक काम लगा होता है। अदालत के बहुमूल्य समय में से एक तिहाई समय तो अधिकांश मुकदमों की तारीख बदलने में जाया हो जाता है। वकीलों, जजों, पेशकारों और पक्षकारों के बीच इसी बात पर बहुत हुज्जत होती है कि पेशी ज्यादा लंबी या छोटी दी जाए। यदि यह नियम कर दिया जाए कि जब तक अदालत में दो साल से अधिक पुराने मुकदमे न निपट जाएँ तब तक नए मुकदमे की सुनवाई न की जाए तो नये मुकदमें में पेश होने के बाद पाँच दस साल तक सुनवाई ही शुरू न हो। असल में सबसे विपन्न न्यायपालिका वाले देश हैं। एक वर्ग-विभाजित पुरुष-प्रधान समाज में जो हालत गरीब की जोरू की होती है वही हालत आज हमारे देश की न्यायपालिका की है।

जब किसी बस में सीटें 50 हों और यात्री 150 होती हैं तो लोग सीट पाने के लिए कंडक्टर को रिश्वत देंते हैं, कोई सिफारिश लगाता है, कुछ बस शुरू होने के कई घंटे पहले ही बस के पास जा खड़े होते हैं ओर बस का दरवाजा खुलने का इंतजार करते हैं। जब दरवाजा खुलता है तो तब तक वहाँ आए लोग दरवाजे की ओर लपकते हैं और आपस में घमासान करते हैं। बस की सीटें भर जाती हैं तो लोग खड़े होने के लिए अच्छी जगह तलाशते है। खड़े होने की जगह नहीं रहती है तो बस की छत पर भी चढ़ जाते हैं। यही हालत हमारी न्यायपालिका की है। वहाँ जल्दी की तारीख के लिए लोग जज से प्रार्थना करते हैं, पेशकारों को रिश्वत देते हैं। फिर भी मामला कई सालों तक नहीं निपटता है तो हाईकोर्ट जा कर निर्देश करा लाते हैं कि मुकदमे को साल या छह माह में निपटाया जाए।

मैं जिन अदालतों में प्रेक्टिस करता हूँ उन में से एक में 1985 में दायर हुए मामले भी अभी लंबित हैं। सुप्रीम कोर्ट ने पिछले साल एक मुहिम चलाई थी उस में दस साल से पुराने मुकदमे एक साल में निर्णीत करने का लक्ष्य तय किया गया। पर यह नहीं हो सका। फिर इस अदालत के लिए 25 साल से अधिक मुकदमे निपटाने का लक्ष्य मिला। तो हालात ये हैं कि यदि कोई मुकदमा 1995 में दायर हुआ था और वह अन्तिम बहस हो कर निर्णय के लिए है तो भी जब तक 1994 तक दायर हुए मुकदमे नहीं निपट जाते उस में बहस का नंबर न आएगा। जैसी कि इस अदालत की स्थिति है  हो सकता है 1994 में दायर मुकदमे में बहस होने का नंबर एक साल बाद भी आ जाए। लेकिन जो मुकदमा 2012 में दायर हुआ है और उस में सारा काम हो चुका है बस आखिरी बहस होनी है और फैसला होना है उसे तो कम से कम 8-10 साल केवल अंतिम बहस होने का इंतजार करना पड़ सकता है।

हमारी न्यायपालिका को इस दुर्दशा से निकालने का सब से पहला उपाय यही हो सकता है कि हम जजों और अदालतों की संख्या बढ़ाएँ। कम से कम हर साल जजों की कुल संख्या के दस प्रतिशत जज अवश्य बढ़ाए जाएँ। वर्तमान जजों की संख्या में जितने जज हर साल रिटायर होने वाले हों जोड़ कर जो संख्या आए उतने जज हर साल भर्ती किए जाएँ। इस से  हम दस साल बाद एक पर्याप्त जज संख्या प्राप्त कर सकते हैं। जजों के साथ साथ अदालतों की संख्या, इन्फ्रास्ट्रक्चर भी बढ़ाने होंगे तभी हम एक सक्षम न्यायपालिका प्राप्त कर सकते हैं। लेकिन यह केन्द्र और राज्य सरकार को करना है, उस के लिए धन जुटाना है। आज सरकारें न्यायपालिका पर अपने बजट का 1% के लगभग खर्च करती हैं। इसे बढ़ा कर कम से कम 3% करना होगा। इस के लिए राजनैतिक इच्छा शक्ति चाहिए। तो हमें इस तरह की राजनैतिक इच्छा शक्ति वाला राजनैतिक दल बनाना होगा। वर्तमान राजनैतिक दलों से तो यह होने से रहा।

अब आप के मुकदमे की बात की जाए। आपने जिस तरीके से अपने मुकदमे का वर्णन किया है, “काल फॉर रिटर्न” और  “बयान की तैयारी” शब्दों का प्रयोग किया है, उस से लगता है कि आप को अदालत की प्रक्रिया की जानकारी नहीं है। काल फॉर रिटर्न कुछ नहीं होता, दोनों मामलों में जवाब देने के लिए समय दिया गया है जो कि मुकदमे का समन मिल जाने के बाद दिया जाना कानूनन जरूरी है। आप के मुकदमें में आप के वकील और आप की भी गलती रही है। किसी भी दीवानी मुकदमे में सब से पहला काम विपक्षी पक्षकारों को दावे के समन की तामील का होता है। यह तामील कराने में यदि वकील और पक्षकार रुचि लें तो यह काम दो-तीन पेशी में हो जाता है। तामील होने के बाद अधिकतम 90 दिनों में जवाब पेश करना जरूरी है। यदि कोई पक्षकार अनुपस्थित हो जाए तो उस के विरुद्ध एक तरफा सुनवाई की जा कर मुकदमे में निर्णय हो सकता है। हमारे सभी मुकदमों में 2-3 पेशियों में तामील हो जाती है। जिन मामलों में विपक्षी पक्षकारों के पते सही नहीं होते और हमारा पक्षकार रुचि नहीं लेता उन में ही ऐसी देरी होती है जैसा आप के मामले में हुआ है।

समस्या –

दिनेश नेताम ने टिल्डा, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मैं एक जनजाति परिवार से हूँ, मेरा विवाह 2011 में सामाजिक रीति से हुआ था। बाद में पता चला कि मेरी पत्नी और उस के परिवार के लोग अनुसूचित जाति के हैं और हम लोग अनुसूचित जनजाति के।  लेकिन दोनों समाज में बेटी रोटी व्यवहार बहुत पहले से मान्य है। मेरी पत्नी ने मेरे पूरे परिवार के ऊपर दहेज प्रथा का केस लगाया उसे मैं जीत चुका हूँ, फिर अपील की उसे भी मैं जीत चुका हूँ। अब मुकदमा हाईकोर्ट चला गया है। मैं इतना जानना चाहता हूँ कि मेरी प्तनी अनुसूचित जाति की है जिस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। क्या मैं इस विवाह को न्यायालय से निरस्त करवा सकता हूँ। मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

आप की समस्या जटिल है। जहाँ तक जनजाति का प्रश्न है उस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप की जनजाति में एक खास अनुसूचित जाति की लड़की से विवाह को मान्यता प्राप्त है।  इस कारण आप का विवाह आप की जनजाति की सहमति से संपन्न हुआ है और आप की जनजाति ने उसे मान्य भी कर दिया है। इस कारण आप पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप का विवाह आप की परंपरा से ही हुआ है।

ऐसी परिस्थिति में आप को अपनी जनजाति पंचायत में मामला ले जाना चाहिए और वहाँ जनजातीय विधि से पंचायत बैठा कर तलाक, झगड़ा आदि का मामला निर्णीत कराना चाहिए। जब पंचायत मामले को सुलझा ले तो पंचायत से प्रमाण पत्र ले कर पारिवारिक न्यायालय में विवाह विच्छेद की घोषणा का वाद संस्थित करना चाहिए।

इस तरह के मामले पर किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की नजीर उपलब्ध नहीं है। यदि है भी तो हमारी नजर में तलाश करने पर भी नहीं आई है। इस कारण हो सकता है आप की पत्नी विरोध करे कि पंचायत द्वारा दिया गया निर्णय अवैध है और आप का विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होता है। पर हमारी राय में  आप की पत्नी का यह तर्क मान्य नहीं हो सकेगा।

रणनीतिक रूप से आप पहले हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें। यदि वहाँ जवाब में यह आए कि हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। तो आप वहाँ से उस के जवाब की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर अपने पास रखें और उस के बाद हमारे द्वारा ऊपर सुझाई गयी प्रक्रिया का अनुसरण कर सकते हैं।

समस्या-

मोहम्मद दानिश खान ने मानिकपुर, तहसील कुन्दा, जिला प्रतापगढ़, उत्तर प्रदेश से पूछा है-

मेरे दादा जी का देहांत 1953 को हुआ है, मेरे पिताजी 2 भाई और एक बहिन हैं। मेरे दादा जी का पैतृक मकान है, जिसका कुछ भाग मेरे चाचा के लड़कों ने सिर्फ़ स्टांप पेपर के ज़रिये बेच दिया है। जिसे किराएदार बनवा रहा है। मेरी फूफी की मौत हो चुकी है, उनकी लड़की ने अपने हिस्से के लिए मुक़दमा दायर किया है। क्या उन्हें हिस्सा मिलेगा? क्या मेरी फूफी की बेटी स्टे ले सकती है? मैं यह भी जानना चाहता हूँ कि हम किस तरह अर्जेंट्ली स्टे ले सकते हैं। मेरे पिता जी ने अपना हिस्सा न्ही बेचा है। अभी तक बँटवारा भी क़ानूनी तौर पे नहीं हुआ था, फिर भी मेरे चाचा के लड़कों ने कुल मकान का 1/2 भाग बेच दिया है।

समाधान-

आप एक मुस्लिम हैं, आप का दाय मुस्लिम विधि के अनुसार तय होगा। आपके दादाजी की मृत्यु के उपरान्त आप के पिता, चाचा और फूफी तीनों का उन की संपत्ति पर अधिकार है। पुत्री का हिस्सा पुत्रों के हिस्से से आधा होता है, यह कहा जा सकता है कि पुत्री का 1 हिस्सा होता है तो पुत्रों के 2-2 हिस्से होते हैं।

इस गणना के अनुसार आप के पिता व चाचा को संपत्ति के 2/5-2/5 हिस्से पर अधिकार है और 1/5 हिस्से पर फूफी का अधिकार है। इस तरह चाचा का अधिकार संपत्ति के ½ हिस्से पर नहीं है। उसने यदि ½ हिस्सा बेच दिया है तो वह उसके हिस्से से अधिक है और अवैधानिक है।

यदि आप की फूफी ने बंटवारे का दावा किया है तो उन्हें तुरन्त उसी दावे में मकान में निर्माण कार्य को रुकवाने के लिए अस्थायी निषेधाज्ञा का आवेदन प्रस्तुत कर निर्माण कार्य रुकवाना चाहिए। यह तुरन्त हो सकता है। बंटवारे के उसी दावे में आप के पिता भी पक्षकार हैं तो वे फूफी के आवेदन का समर्थन कर सकते हैं या खुद भी उसी दावे में अलग से स्टे के लिए प्रार्थना पत्र प्रस्ततु कर सकते हैं।

समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

समस्या-

शमशेर ने बीकानेर, राजस्थान से पूछा है-

हत्या का प्रयास करने वाले अपराधी को पुलिस को सौंप दिया। लेकिन पुलिस ने उसे बिना मजिस्ट्रेट के सामने पेश किये छोड़ दिया।  अब पुलिस कहती है कि उसकी जमानत हो गयी है। क्या पुलिस थाने में जमानत होती है? क्या अगर होती है, तो पुलिस उसे वापिस कब लाएगी?

समाधान-

शमशेर भाई, साधारण लोग चीजों को ठीक से समझने की कोशिश नहीं करते। असल में चीजें बिना कोशिश के समझ नहीं आतीं। आप थोड़ा कोशिश करते तो यह सब आप को भी समझ आ जाता। कोशिश से हमारा मतलब कुछ आसपास के जानकार लोगों से पूछना और जरूरत पड़ने पर किसी किताब का सहारा लेना भी है। खैर, आप का यहाँ यह सवाल पूछना भी एक कोशिश ही है, इस कोशिश के लिए आप को बधाई¡

सब से पहली बात तो ये कि आप ने “अपराधी” शब्द का गलत प्रयोग किया है। अपराधी का अर्थ होता है जिस के विरुद्ध किसी अपराध का आरोप अदालत ने सिद्ध मान लिया हो। जब तक उस पर आरोप होता है वह “अभियुक्त” या “मुलज़िम” कहलाता है। जैसे ही अपराध सिद्ध हो जाता है, उसे “अपराधी” या “मुज़रिम” कहा जा सकता है। यहाँ आप को इस के लिए अभियुक्त शब्द का प्रयोग करना चाहिए था।

दूसरी बात ये कि जमानत पुलिस थाना में भी होती है और अदालत में भी होती है। अपराध दो तरह के होते हैं, एक तो संज्ञेय और दूसरे असंज्ञेय। संज्ञेय अपराध की सूचना मिलने पर पुलिस उसे प्रथम सूचना रिपोर्ट के रूप  में दर्ज करती है और अनुसंधान आरंभ कर देती है, असंज्ञेय अपराधों के मामले में सूचना को पुलिस केवल रोजनामचे में दर्ज करती है और सूचना देने वाले को कहती है कि यह असंज्ञेय मामला है इस कारण वह सीधे मजिस्ट्रेट की अदालत में परिवाद प्रस्तुत करे। असंज्ञेय मामलों पर मजिस्ट्रेट प्रसंज्ञान ले कर सुनवाई के लिए तलब कर सकता है।

अब संज्ञेय मामलों में भी दो तरह के मामले होते हैं। जमानती और ग़ैरजमानती। जमानती मामलों में अभियुक्त के गिरफ्तार होने पर पुलिस खुद जमानत ले लेती है, बल्कि ऐसे मामलों में अभियुक्त से पुलिस को पूछना जरूरी होता है कि वह जमानत पेश करे तो उसे छोड़ दिया जाएगा। अभियुक्त अक्सर जमानत पेश करते हैं और रिहा हो जाते हैं। गैर जमानती मामलों में पुलिस जमानत नहीं ले सकती। उसे गिरफ्तार करने पर 24 घंटों में अदालत में पेश करना होता है। वहाँ अभियुक्त जमानत की अर्जी पेश कर सकता है और मजिस्ट्रेट जमानत ले कर उसे रिहा कर सकता है।

जो अपराध गैरजमानती हैं उनमें भी अभियुक्त चाहे तो पहले से सेशन कोर्ट में अग्रिम जमानत की अर्जी दे सकता है और सेशन न्यायालय पुलि से उस मामले की डायरी मंगा कर सुनवाई कर सकती है। उचित होने पर उसे अग्रिम जमानत का लाभ देते हुए आदेश दे सकती है कि उसे गिरफ्तार करने की जरूरत हो तो उसे जमानत ले कर छोड़ दिया जाए।

हत्या का प्रयास करने का अपराध गैरजमाती है। इस कारण यदि अभियुक्त को पुलिस को सौंप दिया गया है तो उसे मजिस्ट्रेट के समक्ष पेश करना पुलिस के लिए आवश्यक है। लेकिन यदि अभियुक्त ने पहले से ही अग्रिम जमानत का आदेश ले रखा है तो पुलिस को उसे जमानत पर छोड़ना जरूरी है। आप के मामले में यही हुआ होगा। अब जब पुलिस मजिस्ट्रेट के समक्ष उस मामले में आरोप पत्र प्रस्तुत करेगी तब अभियुक्त को सूचित करेगी और उसे मजिस्ट्रेट के न्यायालय के समक्ष उपस्थित होना पड़ेगा। वहाँ उसे दुबारा जमानत पेश करनी होगी।

राजस्थान की मीना जनजाति में तलाक

December 23, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

एक मीना पंचायत

समस्या-

रजत ने करौली, राजस्थान से पूछा है-

मैं मीना जाति से हूँ। मैं पत्नी से तलाक़ चाहता हूँ। हम दोनो सरकारी नौकरी मैं हैं। पत्नी का स्वभाव क्रूर प्रकृति का है, मेरी सास व साले का हमारे बीच दखल है। ये लोग दहेज का केस करने की धमकी देते हैं। पत्नी कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है, जैसे चलती बाइक से कूद जाना, मेरी बिना सहमति व जानकारी के 4 बार गर्भपात करवा देना जिसके हॉस्पिटल के जाँच के पेपर मेरे पास हैं। इस कृत्य के लिए मैने लीगल नोटिस दिनांक 02 मई 2018 को भिजवाया था। लेकिन उसने रजिस्टर्ड डाक को डाकिये से लेने से इनकार कर दिया था। अब पिछले 6 महीने से मेरे 2 साल के पुत्र को पत्नी ने अपनी मां के पास छोड़ रखा हैं व खुद नौकरी करती है। बालक से मुझे जब भी मिलने गया तो पत्नी की मां छुपा देती है। पत्नी द्वारा साल भर पहले मुझे दहेज लेने का नोटिस दिया व उसके बाद नौकरी के लिए शपथ पत्र दिया कि विवाह के समय दहेज न तो लिया गया और न ही दिया गया। पत्नी से मुझे किसी भी स्थति में तलाक़ चाहिये।  सामाजिक पंचायत के अलावा तलाक़ के लिए क्या सीधे कोर्ट में आवेदन किया जा सकता है?

समाधान-

आप मीना जाति से हैं जो कि राजस्थान में एक घोषित अनुसूचित जनजाति है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 के अनुसार आप की जाति पर यह अधिनियम प्रभावी होना चाहिए, किन्तु इसी धारा की उपधारा (2) में यह उपबंधित है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के क्लॉज (25) में घोषित अनुसूचित जनजातियों पर इस अधिनियम का कोई उपबंध प्रभावी नहीं होगा। इस तरह हिन्दू विवाह अधिनियम आप के विवाह पर प्रभावी नहीं है। आप पर परंपरागत विधि ही प्रभावी होगी जो कि आप की जाति में निरन्तर तथा समान रूप से प्रचलित है।

आप की मीना जाति की परंपरागत विधि है कि विवाहित युगल के बीच विवाह विच्छेद केवल पंच पटेल ही स्वीकृत कर सकते हैं। इस कारण आप को अपने पंच पटेलों की पंचायत ही बुलानी होगी, उसी में तलाक संभव है अन्य किसी प्रकार से नहीं।

पंच पटेलों द्वारा तलाक स्वीकृत या अस्वीकृत कर देने के बाद आप पारिवारिक न्यायालय में जा कर घोषणा का वाद संस्थित कर सकते हैं कि अब आप दोनों वैवाहिक संबंध में नहीं रहे हैं, और इस आशय की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।  यदि आप सीधे ही न्यायालय में आवेदन करेंगे तो वह क्षेत्राधिकार न होने के कारण निरस्त हो जाएगा।

समस्या-

अमन ने 510 धानमंडी, जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी ने खुद के पैसे से 1976 में एक मकान खरीदा था। 1976 से अभी तक मैं और मेरी माताजी साथ रह रहे हैं। मेरी चार शादीशुदा बहनें हैं। मेरे पिताजी की 2001 में निर्वसीयत मृत्यु हो चुकी है। अभी मैंने मकान को वापस बनाया है। कानून मे बेटियों को 2005 में  हक दिया गया था। अब क्या मुझे बहनों हक-तर्कनामा की जरूरत पडेगी। मैने सुना है कि अगर बेटी अपना हक माँगती है तो पिता 9 दिसंबर 2005 को जीवित होना चाहिए। जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु 2005 अधिनियम लागू होने से पहले 2001 में हो चुकी है। अतः अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

आप 2005 के जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं वह कानून केवल पुश्तैनी / सहदायिक संपत्तियों के संबंध में है। आप का मकान आप के पिता ने खुद अपने धन से 1976 में खरीदा था। इस कारण वह उन की स्वअर्जित संपत्ति है। उस का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। आप के मामले में 1905 का संशोधन अधिनियम प्रभावी नहीं है।

धारा -8 के अनुसार मृतक पुरुष की पत्नी, पुत्र व पुत्रियाँ और माता समान हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप का मकान आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस में आप की माताजी, चार बहनों तथा आप सब को 1/6 हिस्सा प्राप्त है। इन में से कोई भी विभाजने की मांग कर सकता है और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

यदि आप की बहनें चाहती हैं कि उन का हिस्सा औऱ आप की माँ का हिस्सा भी आप को ही प्राप्त हो तो आप को आप की बहनों और माताजी से हक-त्याग विलेख या रीलीज डीड अपने हक में निष्पादित करानी होगी। तभी आप उक्त मकान के एक मात्र स्वामी हो सकते हैं।

सहदायिक और स्वअर्जित संपत्तियों में बँटवारा

December 19, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार ने भूठन कलाँ, ज़िला फ़तेहाबाद, हरियाणा से पूछा है-

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि अभी जीवित हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम २ भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बुआ जी अपना हिस्सा माँग रही हैं तो हमारे घर का बँटवारा कैसे होगा? क्या ज़मीन के 5 हिस्से होंगे या पापा और बुआ के नाम आधी ज़मीन होगी, बाद में पापा को जो जमिन मिलेगी उसमें हमारा हिस्सा होगा? अगर दादा जी अपनी इच्छा से ज़मीन अपने बेटे के नाम कर देते हैं तो क्या बुआ ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप की संपत्ति का बंटवारा इस तथ्य पर निर्भर करता है कि दादाजी के नाम जो जमीन है वह पुश्तैनी /सहदायिक है या नहीं? यदि वह सहदायिक नहीं हो कर उन की स्वअर्जित संपत्ति हुई तो उस का बँटवारा भिन्न रीति से होगा।

यदि संपत्ति स्वअर्जित है तो दादाजी के जीवन काल में किसी का कोई हिस्स नहीं है और बुआ को हिस्सा मांगने का कोई अधिकार नहीं है। यदि दादाजी उस संपत्ति की वसीयत कर देते हैं तो जिस के नाम वसीयत होगी उसे यह संपत्ति प्राप्त होगी।  वसीयत किए बिना ही दादाजी का देहान्त हो जाता है तो उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार दाय होगा और आप के पिता और बुआ को आधी आधी संपत्ति प्राप्त होगी। आप को पिता के हिस्से की संपत्ति में इसी प्रकार अधिकार प्राप्त होगा।

दि संपत्ति पुश्तैनी /सहदायिक है (पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति क्या है यह इसी साइट पर अन्यत्र देखा जा सकता है) तो इस संपत्ति में आप के पिता, बुआ और दादाजी तीनों का समान हिस्सा है। दादाजी के रहते बुआ अपना हिस्सा मांगती है तो उसे 1-3 हिस्सा मिलेगा। यदि दादाजी वसीयत कर देते हैं तो दादाजी के जीवनकाल के बाद भी बुआ को 1/3 हिस्सा ही प्राप्त होगा। यदि वे वसीयत करते हैं तो उन के देहान्त के बाद जिस के नाम वसीयत होगी उसे उनके हिस्से की 1-3 संपत्ति प्राप्त हो जाएगी। अन्यथा यह हिस्सा भी उन के जीवनकाल के बाद आधा आधा आपकी बुआ और पिता के बीच बंट जाएगा।


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