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नाना की संपत्ति में उत्तराधिकार

February 16, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार गुप्ता ने बिरसिंगपुर पाली, जिला उमरिअ, मध्य प्रदेश से पूछा है-

मेरे नाना की दो संतानें थीं। एक पुत्र एवं एक पुत्री। मेरे नाना की मृत्त्यु 1960 के लगभग हो गई और मेरी माँ की मृत्त्यु 1970 में हो गई। मेरे नाना का जमीन 9 एकड़ है जो कि 1958-59 के रिकार्ड पर मेरे मामा का नाम है। मेरे मामा की मृत्त्यु 2000 के आसपास हुई है। वर्तमान में जमीन मेरे मामा के लड़के एवं बहन के नाम पर है। क्या मुझे मेरे माँ का हिस्सा मिल सकता है।

समाधान-

आप के नाना की जो भी भूमि थी वह या तो पुश्तैनी अर्थात सहदायिक संपत्ति रही होगी अथवा स्वअर्जित रही होगी। यदि वह स्वअर्जित थी तो उस में आप की माताजी का उतना ही अधिकार था जितना कि आप के मामाजी का था।

यदि वह सहदायिक संपत्ति भी रही हो तो भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 जिसे अब 2005 के संशोधन से निरसित कर दिया गया है में यह उपबंध था कि यदि किसी हिन्दू मिताक्षर सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का कोई हिस्सा हो तो उस का दाय उत्तरजीविता के आधार पर होगा। लेकिन यदि ऐसे पुरुष की अधिनियम की अनुसूची के प्रथम खंड में वर्णित कोई स्त्री संबंधी अथवा कोई ऐसा पुरुष संबंधी जीवित हो एसी स्त्री के माध्यम से दावा करता हो तो ऐसे मृत पुरुष का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से शासित होगा। इस तरह संपत्ति सहदायिक होने पर भी आप की माताजी का उस संपत्ति में उतना ही अधिकार था जितना आप के मामा जी का।

यदि राजस्व रिकार्ड में नाना जी के देहान्त के उपरान्त भूमि का नामान्तरण मामाजी के नाम और अब मामाजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संतानों के नाम हो गया है तो उससे कोई फर्क नहीं पड़ता। स्वयं मध्यप्रदेश उच्चन्यायालय का निर्णय है कि नामान्तरण से संपत्ति में अधिकार पर कोई प्रभाव नहीं होता। इस तरह आप उक्त भूमि के बंटवारे का वाद संस्थित कर अपने हिस्से पर पृथक कब्जे की राहत की मांग कर सकते हैं।

आप के इस मामले में एक ही बाधा हो सकती है वह यह कि कहीं आपकी माताजी से आप के मामाजी ने उन का हक छोड़ने का आग्रह किया हो और आप की माताजी ने स्वयं स्वैच्छा से अपना हक छोड़ दिया हो। वैसी स्थिति में आप का इस संपत्ति में कोई हिस्सा नहीं होगा। इस तथ्य का पता रिकार्ड देख कर लगाया जा सकता है या फिर आप दावा करें तो मामा की संतानें अपने प्रतिवाद में यह कह सकती हैं और साबित कर सकती हैं।

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भांजे को अपने नाना की संपत्ति में अधिकार प्राप्त है।

February 9, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

अजय कुमार ने ग्राम बासमतिया, जिला अररिया, बिहार से पूछा है-

पापा मम्मी की मृत्यु 1990 के पहले हो चुकी है। अब मेरी बहिन का पुत्र (भांजा) संपत्ति में हिस्सा मांगता है, जब कि उसकी मां-मेरी बहिन की मृत्यु हो चुकी है।

समाधान-

आप के पापा मम्मी की मृत्यु के बाद उन की संपत्ति आप भाई बहिन को समान रूप से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। इससे यह संपत्ति संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति हो गयी जिस में आप और आप की बहिन सम्मिलित हैं।

जब आप की बहिन की मृत्यु हो गयी तो उस का इस संपत्ति में जो हिस्सा है उस की संतानों को प्राप्त हो गया। इस तरह आप की बहिन के स्थान पर उस की संतानें संयुक्त हिन्दू परिवार का हिस्सा हो कर उस संयुक्त संपत्ति के स्वामी हो गए।

इस तरह आप की बहिन के पुत्र, आप के भांजे का इस संपत्ति में हिस्सा है, वह सही अपना हिस्सा मांग रहा है जो आप को देना पड़ेगा। नहीं देंगे तो वह विभाजन का वाद संस्थित कर के प्राप्त कर सकता है।

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समस्या –

दिनेश नेताम ने टिल्डा, जिला रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मैं एक जनजाति परिवार से हूँ, मेरा विवाह 2011 में सामाजिक रीति से हुआ था। बाद में पता चला कि मेरी पत्नी और उस के परिवार के लोग अनुसूचित जाति के हैं और हम लोग अनुसूचित जनजाति के।  लेकिन दोनों समाज में बेटी रोटी व्यवहार बहुत पहले से मान्य है। मेरी पत्नी ने मेरे पूरे परिवार के ऊपर दहेज प्रथा का केस लगाया उसे मैं जीत चुका हूँ, फिर अपील की उसे भी मैं जीत चुका हूँ। अब मुकदमा हाईकोर्ट चला गया है। मैं इतना जानना चाहता हूँ कि मेरी प्तनी अनुसूचित जाति की है जिस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी है। क्या मैं इस विवाह को न्यायालय से निरस्त करवा सकता हूँ। मार्गदर्शन करने की कृपा करें।

समाधान-

आप की समस्या जटिल है। जहाँ तक जनजाति का प्रश्न है उस पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप की जनजाति में एक खास अनुसूचित जाति की लड़की से विवाह को मान्यता प्राप्त है।  इस कारण आप का विवाह आप की जनजाति की सहमति से संपन्न हुआ है और आप की जनजाति ने उसे मान्य भी कर दिया है। इस कारण आप पर हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। आप का विवाह आप की परंपरा से ही हुआ है।

ऐसी परिस्थिति में आप को अपनी जनजाति पंचायत में मामला ले जाना चाहिए और वहाँ जनजातीय विधि से पंचायत बैठा कर तलाक, झगड़ा आदि का मामला निर्णीत कराना चाहिए। जब पंचायत मामले को सुलझा ले तो पंचायत से प्रमाण पत्र ले कर पारिवारिक न्यायालय में विवाह विच्छेद की घोषणा का वाद संस्थित करना चाहिए।

इस तरह के मामले पर किसी उच्च न्यायालय या सर्वोच्च न्यायालय की नजीर उपलब्ध नहीं है। यदि है भी तो हमारी नजर में तलाश करने पर भी नहीं आई है। इस कारण हो सकता है आप की पत्नी विरोध करे कि पंचायत द्वारा दिया गया निर्णय अवैध है और आप का विवाह हिन्दू विवाह अधिनियम से शासित होता है। पर हमारी राय में  आप की पत्नी का यह तर्क मान्य नहीं हो सकेगा।

रणनीतिक रूप से आप पहले हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13 में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन करें। यदि वहाँ जवाब में यह आए कि हिन्दू विवाह अधिनियम प्रभावी नहीं है। तो आप वहाँ से उस के जवाब की प्रमाणित प्रति प्राप्त कर अपने पास रखें और उस के बाद हमारे द्वारा ऊपर सुझाई गयी प्रक्रिया का अनुसरण कर सकते हैं।

समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।

राजस्थान की मीना जनजाति में तलाक

December 23, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

एक मीना पंचायत

समस्या-

रजत ने करौली, राजस्थान से पूछा है-

मैं मीना जाति से हूँ। मैं पत्नी से तलाक़ चाहता हूँ। हम दोनो सरकारी नौकरी मैं हैं। पत्नी का स्वभाव क्रूर प्रकृति का है, मेरी सास व साले का हमारे बीच दखल है। ये लोग दहेज का केस करने की धमकी देते हैं। पत्नी कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है, जैसे चलती बाइक से कूद जाना, मेरी बिना सहमति व जानकारी के 4 बार गर्भपात करवा देना जिसके हॉस्पिटल के जाँच के पेपर मेरे पास हैं। इस कृत्य के लिए मैने लीगल नोटिस दिनांक 02 मई 2018 को भिजवाया था। लेकिन उसने रजिस्टर्ड डाक को डाकिये से लेने से इनकार कर दिया था। अब पिछले 6 महीने से मेरे 2 साल के पुत्र को पत्नी ने अपनी मां के पास छोड़ रखा हैं व खुद नौकरी करती है। बालक से मुझे जब भी मिलने गया तो पत्नी की मां छुपा देती है। पत्नी द्वारा साल भर पहले मुझे दहेज लेने का नोटिस दिया व उसके बाद नौकरी के लिए शपथ पत्र दिया कि विवाह के समय दहेज न तो लिया गया और न ही दिया गया। पत्नी से मुझे किसी भी स्थति में तलाक़ चाहिये।  सामाजिक पंचायत के अलावा तलाक़ के लिए क्या सीधे कोर्ट में आवेदन किया जा सकता है?

समाधान-

आप मीना जाति से हैं जो कि राजस्थान में एक घोषित अनुसूचित जनजाति है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 के अनुसार आप की जाति पर यह अधिनियम प्रभावी होना चाहिए, किन्तु इसी धारा की उपधारा (2) में यह उपबंधित है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के क्लॉज (25) में घोषित अनुसूचित जनजातियों पर इस अधिनियम का कोई उपबंध प्रभावी नहीं होगा। इस तरह हिन्दू विवाह अधिनियम आप के विवाह पर प्रभावी नहीं है। आप पर परंपरागत विधि ही प्रभावी होगी जो कि आप की जाति में निरन्तर तथा समान रूप से प्रचलित है।

आप की मीना जाति की परंपरागत विधि है कि विवाहित युगल के बीच विवाह विच्छेद केवल पंच पटेल ही स्वीकृत कर सकते हैं। इस कारण आप को अपने पंच पटेलों की पंचायत ही बुलानी होगी, उसी में तलाक संभव है अन्य किसी प्रकार से नहीं।

पंच पटेलों द्वारा तलाक स्वीकृत या अस्वीकृत कर देने के बाद आप पारिवारिक न्यायालय में जा कर घोषणा का वाद संस्थित कर सकते हैं कि अब आप दोनों वैवाहिक संबंध में नहीं रहे हैं, और इस आशय की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।  यदि आप सीधे ही न्यायालय में आवेदन करेंगे तो वह क्षेत्राधिकार न होने के कारण निरस्त हो जाएगा।

समस्या-

अमन ने 510 धानमंडी, जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी ने खुद के पैसे से 1976 में एक मकान खरीदा था। 1976 से अभी तक मैं और मेरी माताजी साथ रह रहे हैं। मेरी चार शादीशुदा बहनें हैं। मेरे पिताजी की 2001 में निर्वसीयत मृत्यु हो चुकी है। अभी मैंने मकान को वापस बनाया है। कानून मे बेटियों को 2005 में  हक दिया गया था। अब क्या मुझे बहनों हक-तर्कनामा की जरूरत पडेगी। मैने सुना है कि अगर बेटी अपना हक माँगती है तो पिता 9 दिसंबर 2005 को जीवित होना चाहिए। जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु 2005 अधिनियम लागू होने से पहले 2001 में हो चुकी है। अतः अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

आप 2005 के जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं वह कानून केवल पुश्तैनी / सहदायिक संपत्तियों के संबंध में है। आप का मकान आप के पिता ने खुद अपने धन से 1976 में खरीदा था। इस कारण वह उन की स्वअर्जित संपत्ति है। उस का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। आप के मामले में 1905 का संशोधन अधिनियम प्रभावी नहीं है।

धारा -8 के अनुसार मृतक पुरुष की पत्नी, पुत्र व पुत्रियाँ और माता समान हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप का मकान आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस में आप की माताजी, चार बहनों तथा आप सब को 1/6 हिस्सा प्राप्त है। इन में से कोई भी विभाजने की मांग कर सकता है और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

यदि आप की बहनें चाहती हैं कि उन का हिस्सा औऱ आप की माँ का हिस्सा भी आप को ही प्राप्त हो तो आप को आप की बहनों और माताजी से हक-त्याग विलेख या रीलीज डीड अपने हक में निष्पादित करानी होगी। तभी आप उक्त मकान के एक मात्र स्वामी हो सकते हैं।

सहदायिक और स्वअर्जित संपत्तियों में बँटवारा

December 19, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार ने भूठन कलाँ, ज़िला फ़तेहाबाद, हरियाणा से पूछा है-

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि अभी जीवित हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम २ भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बुआ जी अपना हिस्सा माँग रही हैं तो हमारे घर का बँटवारा कैसे होगा? क्या ज़मीन के 5 हिस्से होंगे या पापा और बुआ के नाम आधी ज़मीन होगी, बाद में पापा को जो जमिन मिलेगी उसमें हमारा हिस्सा होगा? अगर दादा जी अपनी इच्छा से ज़मीन अपने बेटे के नाम कर देते हैं तो क्या बुआ ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप की संपत्ति का बंटवारा इस तथ्य पर निर्भर करता है कि दादाजी के नाम जो जमीन है वह पुश्तैनी /सहदायिक है या नहीं? यदि वह सहदायिक नहीं हो कर उन की स्वअर्जित संपत्ति हुई तो उस का बँटवारा भिन्न रीति से होगा।

यदि संपत्ति स्वअर्जित है तो दादाजी के जीवन काल में किसी का कोई हिस्स नहीं है और बुआ को हिस्सा मांगने का कोई अधिकार नहीं है। यदि दादाजी उस संपत्ति की वसीयत कर देते हैं तो जिस के नाम वसीयत होगी उसे यह संपत्ति प्राप्त होगी।  वसीयत किए बिना ही दादाजी का देहान्त हो जाता है तो उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार दाय होगा और आप के पिता और बुआ को आधी आधी संपत्ति प्राप्त होगी। आप को पिता के हिस्से की संपत्ति में इसी प्रकार अधिकार प्राप्त होगा।

दि संपत्ति पुश्तैनी /सहदायिक है (पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति क्या है यह इसी साइट पर अन्यत्र देखा जा सकता है) तो इस संपत्ति में आप के पिता, बुआ और दादाजी तीनों का समान हिस्सा है। दादाजी के रहते बुआ अपना हिस्सा मांगती है तो उसे 1-3 हिस्सा मिलेगा। यदि दादाजी वसीयत कर देते हैं तो दादाजी के जीवनकाल के बाद भी बुआ को 1/3 हिस्सा ही प्राप्त होगा। यदि वे वसीयत करते हैं तो उन के देहान्त के बाद जिस के नाम वसीयत होगी उसे उनके हिस्से की 1-3 संपत्ति प्राप्त हो जाएगी। अन्यथा यह हिस्सा भी उन के जीवनकाल के बाद आधा आधा आपकी बुआ और पिता के बीच बंट जाएगा।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

समस्या-

नितिका चौहान ने ग्राम खेडली, पोस्ट भद्रबाद, जिला हरिद्वार, उत्तराखंड से पूछा है-

मेरा जन्म 1992 में हुआ था। मेरे मेरे दादाजी के दो पुत्र मेरे ताऊजी आदित्य कुमार और मेरे पिताजी रविंद्र कुमार थे। मैं रविंद्र कुमार जी की इकलौती संतान हूँ। मेरे पिताजी रविंद्र कुमार जी का देहांत 1994 में हो गया था।  उसके पश्चात मेरे दादा जी का देहांत 2011 में हो गया। मेरे दादाजी के बैंक खाते में जो धनराशि थी, मेरे दादाजी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी ने उसको निकाल लिया और उसमें मुझे कोई हिस्सा नहीं दिया। मुझे बैंक जाकर पता चला कि मेरे ताऊजी ने परिवार रजिस्टर की जो नकल वहां लगाई थी उसमें मेरे ताऊजी ने मुझे अपनी पुत्री दर्शाते हुए बैंक खाते से धनराशि प्राप्त कर ली है।  मैं जानना चाहती हूं कि क्या उस धनराशि पर मेरा भी उतना ही हक था, जितना कि मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी का था।

समाधान-

बिलकुल आप ने सही कहा। उस धनराशि पर आप का उतना ही अधिकार था जितना की आप के ताउजी को था। किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत तय होता है। धारा 8 में सब से पहले उन लोगों का बराबर का अधिकार होता है जो अधिनियम की अनुसूची की प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हों। उस में पुत्र और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र-पुत्री एक साथ रखे गए हैं। क्यों कि आप अपने पिता की इकलौती संतान हैं तो आप का अपने दादाजी की संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि आप के ताऊजी को है।

बैंक किसी भी प्रकार से आप के ताऊ जी को यह धन नहीं देता और उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की मांग करता। लेकिन आप के ताऊजी ने आप को अपनी पुत्री बता दिया। जीवित पुत्र की पुत्री तो प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी नहीं है इस कारण बैंक ने वह धन आप के ताऊजी को दे दिया।

लेकिन इस तरह गलत सूचना दे कर बैंक से धन प्राप्त करना धारा 402 भारतीय दंड संहिता व अन्य कुछ धाराओं के अंतर्गत अत्यन्त गंभीर अपराध है। यदि आप पुलिस में रिपोर्ट करें या पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद करें और आप के ताऊजी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित हो तो उन्हें हर हाल में कारावास की सजा हो जाएगी।

स के अतिरिक्त आप जितना धन आप के ताऊजी ने बैंक से प्राप्त किया है उस के आधे धन और वह धन प्राप्त करने से लेकर उस की अदायगी तक के ब्याज प्राप्त करने के लिए आप दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।


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