हिन्दू Archive

समस्या-

अजय ने बांदा, उत्तर प्रदेश से पूछा है-      

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि जीवित नही हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम दो भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बहन अपना हिस्सा माँग रही है। हमारे घर की ज़मीन का बँटवारा कैसे होगा? क्या उसमें हमारा भी हिस्सा होगा? अगर पिता जी अपनी इच्छा से ज़मीन हमारे नाम कर देते हैं तो क्या बहन ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप के घर की जमीन का अर्थ है कि यह जमीन राजस्व भूमि न हो कर आबादी भूमि है। यदि ऐसा है तो यह भूमि हिन्दू विधि से शासित होगी। उत्तर प्रदेश में राजस्व भूमि के उत्तराधिकार के लिए अलग कानून है उस पर जमींदारी विनाश अधिनियम प्रभावी होता है। जिस में विवाहित पुत्रियों को कोई अधिकार प्राप्त नहीं है।

आप के दादाजी के नाम के मकान में भी यदि वह भूमि 1956 से पहले आप के दादाजी या उन के किसी पूर्वज को उन के किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो और सहदायिक हो गयी होगी, तभी उस में आप की बहिन और आप का हिस्सा हो सकता है। यदि ऐसा नहीं है  तो वह आप के पिता के पास साधारण उत्तराधिकार में प्राप्त भूमि हो सकती है और ऐसी भूमि में पिता के जीवित रहते पुत्र पुत्रियों को कोई अधिकार नहीं होता है। सहदायिक संपत्ति के अलावा अन्य संपत्तियों में पिता के रहते संतानों का कोई अधिकार नहीं होता है।

इसलिए पहले यह जानकारी करें कि आप के मकान की भूमि सहदायिक है या नहीं। यदि आप के मकान की भूंमि सहदायिक होगी तभी उस में आप के पिता के जीवित रहते आप भाई बहनों का अधिकार हो सकता है, अन्यथा नहीं।

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हिन्दू स्त्री की संपत्ति का उत्तराधिकार

January 10, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

मुकेश कुमार ने अशोक नगर, काँकरबाग, पटनारोड से पूछा है-

माँ के नाम जमीन थी। माँ अब नहीं है। पिता का जमीन पर हक है। बड़ा बेटा 15 साल से देख-रेख नहीं करता है। अब मैं अपने नाम जमीन करना चाहता हूँ।  कैसे कैसे हो?

समाधान-

जमीन माँ के नाम थी। माँ एक स्त्री थीं और स्त्रियों की संपत्ति हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 14 के अंतर्गत उन की एब्सोल्यूट संपत्ति होती है। स्त्री की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति का उत्तराधिकार इसी अधिनियम की धारा 15 से तय होता है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 15 के अनुसार आप की माताजी की मृत्यु के उपरान्त उन की संपत्ति के उत्तराधिकारी पुत्र, पुत्री एवं पति होंगे। इस तरह आप की माताजी की संपत्ति के उत्तराधिकारी केवल आप के पिता ही नहीं अपितु आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन है तो वे सब हैं। क्योंकि इन उत्तराधिकारियों के बीच बंटवारा नहीं हुआ है इस कारण यह संपत्ति अभी तक संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस के सदस्य आप, आप के भाई और यदि कोई बहिन  या बहिनें हैं तो वे सब तथा आप के पिता हैं।

माँ की छोड़ी हुई यह जमीन संयुक्त है और किसी एक की संपत्ति नहीं है।  बड़े भाई की देखभाल की कोई ड्यूटी नहीं है। मुखिया आप के पिता हैं तो वे देखेंगे। यदि कोई भी उस जमीन की देखभाल नहीं करता है तो आप उस जमीन के बंटवारे का वाद न्यायालय में दाखिल कर सकते हैं। जमीन यदि राजस्व विभाग की है तो यह दावा राजस्व न्यायालय में होगा जिस के लिए आप किसी स्थानीय वकील से परामर्श कर के दाखिल कर सकते हैं। इस तरह आप पूरी जमीन नहीं बल्कि उस जमीन में अपने हिस्से पर पृथक खाता और कब्जा प्राप्त कर सकते हैं।

आप के नाम सारी जमीन तभी हो सकती है जब कि आप के पिता, भाई और बहिनें सब अपना हिस्सा आप के नाम रिलीज डीड निष्पादित कर के हस्तान्तरित कर दें, या आप उन के हिस्सों को खऱीद कर  अपने नाम विक्रय पत्र निष्पादित करवा कर हस्तान्तरित करवा लें।

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कानून के उल्लंघन पर अदालत के चक्कर काटना लाजमी है।

January 2, 2019 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

वनराजसिंह चौहण ने धामतवाण दश्कोई, अहमदाबाद से पूछा है-


मेरे दादाजी के पास 2 ऐकर पुश्तैनी जमीन है। दादाजी को 7 संतान हैं। 4 लडके 3 लड़कियाँ है। लडकियों की शादी हो चुकी है। दादाजी का ही पूरे 2 ऐक़ड़ में नाम है। वो जमीन दादाजी ने पैसे ले कर बेचदी है। कबजा भी दे दिया है। पैसा भी सब मिल गया है। दादाजी की 3 में से 1 लडकी ने सिविल कोर्ट में 2005 के उत्तराधिकार अधिनियम संशोधन एक्ट के तहत हिस्सा मांगा है। दादाजी को कोर्ट के चक्कर काटने पड़े हैं। और जमीन का पैसा चारों लडकों को दे दिया है। इसका समाधान बताइए।

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के संशोधन को अस्तित्व में आए 13 वर्ष से अधिक समय हो चुका है। अभी तक भी यदि उसे लागू करने की इच्छा इस अधिनियम के अंतर्गत हिन्दू शब्द की परिभाषा में आने वाले तमाम समाजों में सहदायिक/ पुश्तैनी संपत्ति में पुत्रियों को पुत्रों के समान हिस्सा देने की मानसिकता नहीं बनी है और वे अपनी इच्छा से लड़कियों को दूसरे तरीकों से संपत्ति से वंचित करने की कोशिश करेंगे तो ये दिन तो देखने को मिलेंगे।

आप के दादाजी ने काम ही ऐसा किया है कि उन्हें अदालत के चक्कर काटने पड़ें। कोई भी व्यक्ति यदि कानून के विरुद्ध या उस के उल्लंघन में कोई काम करेगा तो उसे कभी भी और कितने भी समय तक के लिए अदालत के चक्कर काटने पड़ सकते हैं। चक्कर तो उसे भी काटने पड़ेंगे जिस ने दादाजी से यह माल खरीदा है। चूंकि हिस्सा मांगा है इस कारण से चारों पुत्रों और दो दूसरी पुत्रियों को भी अदालत का मुहँ देखना पड़ रहा होगा।

आप के दादाजी ने उस पुश्तैनी संपत्ति को बेच कर जो धन प्राप्त किया है वह भी सहदायिक संपत्ति है जो अब चारों भाइयों के पास है। इस कारण आप की बहिनें चारों भाइयों और दादाजी के विरुद्ध जमीन में या विक्रय से प्राप्त धन से अपना हि्स्सा मांग सकती हैं।

अब तो इस का एक ही रास्ता है। चारों भाई मिल कर तीनों बहिनों को मनाएँ और कहें कि वे उन्हें उनके हिस्से के बदले नकद धन देने को तैयार हैं। तीनों बहिनों को बिठा कर बात करें और एक समझौते पर पहुँचें जिस में तीनों बहिनें यह लिख कर देने को तैयार हों कि उन्हें जमीन बेचने से प्राप्त धनराशि में से उन के हिस्से की धनराशि मिल गयी है और अब इस मुकदमे को वे नहीं चलाना चाहती हैं। यह समझौता अदालत में पेश हो और इस के अनुसार अदालत अपना निर्णय पारित कर यह फैसला दे कि सभी उत्तराधिकारियों को उन का हिस्सा मिल चुका है। तभी इस विवाद से मुक्ति प्राप्त हो सकती है।

राजस्थान की मीना जनजाति में तलाक

December 23, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

एक मीना पंचायत

समस्या-

रजत ने करौली, राजस्थान से पूछा है-

मैं मीना जाति से हूँ। मैं पत्नी से तलाक़ चाहता हूँ। हम दोनो सरकारी नौकरी मैं हैं। पत्नी का स्वभाव क्रूर प्रकृति का है, मेरी सास व साले का हमारे बीच दखल है। ये लोग दहेज का केस करने की धमकी देते हैं। पत्नी कई बार आत्महत्या का प्रयास कर चुकी है, जैसे चलती बाइक से कूद जाना, मेरी बिना सहमति व जानकारी के 4 बार गर्भपात करवा देना जिसके हॉस्पिटल के जाँच के पेपर मेरे पास हैं। इस कृत्य के लिए मैने लीगल नोटिस दिनांक 02 मई 2018 को भिजवाया था। लेकिन उसने रजिस्टर्ड डाक को डाकिये से लेने से इनकार कर दिया था। अब पिछले 6 महीने से मेरे 2 साल के पुत्र को पत्नी ने अपनी मां के पास छोड़ रखा हैं व खुद नौकरी करती है। बालक से मुझे जब भी मिलने गया तो पत्नी की मां छुपा देती है। पत्नी द्वारा साल भर पहले मुझे दहेज लेने का नोटिस दिया व उसके बाद नौकरी के लिए शपथ पत्र दिया कि विवाह के समय दहेज न तो लिया गया और न ही दिया गया। पत्नी से मुझे किसी भी स्थति में तलाक़ चाहिये।  सामाजिक पंचायत के अलावा तलाक़ के लिए क्या सीधे कोर्ट में आवेदन किया जा सकता है?

समाधान-

आप मीना जाति से हैं जो कि राजस्थान में एक घोषित अनुसूचित जनजाति है। हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 2 के अनुसार आप की जाति पर यह अधिनियम प्रभावी होना चाहिए, किन्तु इसी धारा की उपधारा (2) में यह उपबंधित है कि भारत के संविधान के अनुच्छेद 366 के क्लॉज (25) में घोषित अनुसूचित जनजातियों पर इस अधिनियम का कोई उपबंध प्रभावी नहीं होगा। इस तरह हिन्दू विवाह अधिनियम आप के विवाह पर प्रभावी नहीं है। आप पर परंपरागत विधि ही प्रभावी होगी जो कि आप की जाति में निरन्तर तथा समान रूप से प्रचलित है।

आप की मीना जाति की परंपरागत विधि है कि विवाहित युगल के बीच विवाह विच्छेद केवल पंच पटेल ही स्वीकृत कर सकते हैं। इस कारण आप को अपने पंच पटेलों की पंचायत ही बुलानी होगी, उसी में तलाक संभव है अन्य किसी प्रकार से नहीं।

पंच पटेलों द्वारा तलाक स्वीकृत या अस्वीकृत कर देने के बाद आप पारिवारिक न्यायालय में जा कर घोषणा का वाद संस्थित कर सकते हैं कि अब आप दोनों वैवाहिक संबंध में नहीं रहे हैं, और इस आशय की डिक्री प्राप्त कर सकते हैं।  यदि आप सीधे ही न्यायालय में आवेदन करेंगे तो वह क्षेत्राधिकार न होने के कारण निरस्त हो जाएगा।

समस्या-

अमन ने 510 धानमंडी, जोधपुर, राजस्थान से पूछा है-

मेरे पिताजी ने खुद के पैसे से 1976 में एक मकान खरीदा था। 1976 से अभी तक मैं और मेरी माताजी साथ रह रहे हैं। मेरी चार शादीशुदा बहनें हैं। मेरे पिताजी की 2001 में निर्वसीयत मृत्यु हो चुकी है। अभी मैंने मकान को वापस बनाया है। कानून मे बेटियों को 2005 में  हक दिया गया था। अब क्या मुझे बहनों हक-तर्कनामा की जरूरत पडेगी। मैने सुना है कि अगर बेटी अपना हक माँगती है तो पिता 9 दिसंबर 2005 को जीवित होना चाहिए। जबकि मेरे पिताजी की मृत्यु 2005 अधिनियम लागू होने से पहले 2001 में हो चुकी है। अतः अब मुझे क्या करना चाहिए?

समाधान-

आप 2005 के जिस कानून का उल्लेख कर रहे हैं वह कानून केवल पुश्तैनी / सहदायिक संपत्तियों के संबंध में है। आप का मकान आप के पिता ने खुद अपने धन से 1976 में खरीदा था। इस कारण वह उन की स्वअर्जित संपत्ति है। उस का दाय हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा -8 के अनुसार होगा। आप के मामले में 1905 का संशोधन अधिनियम प्रभावी नहीं है।

धारा -8 के अनुसार मृतक पुरुष की पत्नी, पुत्र व पुत्रियाँ और माता समान हिस्सा प्राप्त करने के अधिकारी हैं। आप का मकान आप के पिता की मृत्यु के उपरान्त संयुक्त हिन्दू परिवार की संपत्ति है जिस में आप की माताजी, चार बहनों तथा आप सब को 1/6 हिस्सा प्राप्त है। इन में से कोई भी विभाजने की मांग कर सकता है और अपना हिस्सा प्राप्त कर सकता है।

यदि आप की बहनें चाहती हैं कि उन का हिस्सा औऱ आप की माँ का हिस्सा भी आप को ही प्राप्त हो तो आप को आप की बहनों और माताजी से हक-त्याग विलेख या रीलीज डीड अपने हक में निष्पादित करानी होगी। तभी आप उक्त मकान के एक मात्र स्वामी हो सकते हैं।

सहदायिक और स्वअर्जित संपत्तियों में बँटवारा

December 19, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

राजेश कुमार ने भूठन कलाँ, ज़िला फ़तेहाबाद, हरियाणा से पूछा है-

हमारे घर की ज़मीन मेरे दादा जी के नाम है जो कि अभी जीवित हैं। उनके एक बेटा और एक बेटी है। हम २ भाई और एक बहन हैं। अब मेरी बुआ जी अपना हिस्सा माँग रही हैं तो हमारे घर का बँटवारा कैसे होगा? क्या ज़मीन के 5 हिस्से होंगे या पापा और बुआ के नाम आधी ज़मीन होगी, बाद में पापा को जो जमिन मिलेगी उसमें हमारा हिस्सा होगा? अगर दादा जी अपनी इच्छा से ज़मीन अपने बेटे के नाम कर देते हैं तो क्या बुआ ज़मीन का हिस्सा ले सकती है?

समाधान-

आप की संपत्ति का बंटवारा इस तथ्य पर निर्भर करता है कि दादाजी के नाम जो जमीन है वह पुश्तैनी /सहदायिक है या नहीं? यदि वह सहदायिक नहीं हो कर उन की स्वअर्जित संपत्ति हुई तो उस का बँटवारा भिन्न रीति से होगा।

यदि संपत्ति स्वअर्जित है तो दादाजी के जीवन काल में किसी का कोई हिस्स नहीं है और बुआ को हिस्सा मांगने का कोई अधिकार नहीं है। यदि दादाजी उस संपत्ति की वसीयत कर देते हैं तो जिस के नाम वसीयत होगी उसे यह संपत्ति प्राप्त होगी।  वसीयत किए बिना ही दादाजी का देहान्त हो जाता है तो उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अनुसार दाय होगा और आप के पिता और बुआ को आधी आधी संपत्ति प्राप्त होगी। आप को पिता के हिस्से की संपत्ति में इसी प्रकार अधिकार प्राप्त होगा।

दि संपत्ति पुश्तैनी /सहदायिक है (पुश्तैनी सहदायिक संपत्ति क्या है यह इसी साइट पर अन्यत्र देखा जा सकता है) तो इस संपत्ति में आप के पिता, बुआ और दादाजी तीनों का समान हिस्सा है। दादाजी के रहते बुआ अपना हिस्सा मांगती है तो उसे 1-3 हिस्सा मिलेगा। यदि दादाजी वसीयत कर देते हैं तो दादाजी के जीवनकाल के बाद भी बुआ को 1/3 हिस्सा ही प्राप्त होगा। यदि वे वसीयत करते हैं तो उन के देहान्त के बाद जिस के नाम वसीयत होगी उसे उनके हिस्से की 1-3 संपत्ति प्राप्त हो जाएगी। अन्यथा यह हिस्सा भी उन के जीवनकाल के बाद आधा आधा आपकी बुआ और पिता के बीच बंट जाएगा।

हिन्दू विधि में दाय के प्रश्न -1

November 30, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

भूपेन्‍द्र ‍सिंह ने सिवनी, मध्‍यप्रदेश से पूछा है –

1. मेरे दादा जी के पास 1925 में लगभग 4 एकड खेत था उनके मरने के बाद लगभग 1930 में उसमे मेरे ‍पिता जी एवं बडे पिता जी का नाम संयुक्‍त रूप से नाम आ गया बाद में मेरे ‍पिता जी को कुछ जमीन का हिस्‍सा गिफट में 8 एकड ( किसी की सेवा करने के बदले ) मौखिक रूप से ‍मिला था, जिसे संयुक्‍त खाता ‍पिता एवं बडे पिता जी के खाते में जोड दिया गया इस तरह कुल रकबा 12 एकड हो गया। क्‍या बाद में जोडा गया रकबा जो ‍कि गिफट के रूप में मिला था सहदायिक संपत्ति है?

2. बाद में मेरे ‍पिता जी एवं बडे ‍पिता जी का बँटवारा हुआ। चूंकि यह संयुक्‍त खाता था, इस कारण दोनों भाइयों को 6 – 6 एकड खेत ‍मिला। बाद में मेरे ‍पिता जी ने मेरे जन्‍म से पहले ही 6 एकड में से 3 एकड बेच दिया गया। यदि वह सम्‍पत्ति सहदायिक थी तो ‍फिर उसमें मेरा अंश क्‍या होगा जब हम तीन बहन दो भाई एवं एक मॉ जीवित हो त‍ब।

3. मेरे पिता जी की मृत्‍यु 1990 में हुई म़त्‍यु के पहले उन्‍होंने हम दो भाइयों के मान से लगभग 3 एकड खेत में बटवारा नामा करवा कर रजिस्‍टर्ड कर दिया है कुछ अंश बचा है ‍जिसमें दो बहनों हम दो भाइयों एवं एक माँ का नाम अंकित है। क्‍या बहनें उस बटवारे नामे से भी हिस्‍सा ले सकती है क्‍या यदि ले सकती हैं तो ‍हिन्‍दू उत्‍तराधिकार अधिनियम की धारा 5 (6) के अंतर्गत 20 ‍दिसम्‍बर 2004 के पूर्व हुए बटवारा का नियम कहां लागू होगा।

4. यदि बहनें ‍हिस्‍सा लेंगी तो फिर कितने रकबे में से कुल रकबा जो पहले 6 एकड था ‍जिसमें से मेरे पिता जी ने 3 एकड बेच चुके हैं या शेष बची 3 एकड जो अभी वर्तमान में है जो पहले बेच चुके रकबे जो ‍कि मेरा उस समय जन्‍म भी नही हुआ था किस के ‍हिस्‍से में जुडेगी।

समाधान-

प की समस्या का बहुत कुछ हल तो इस बात से तय होगा कि रिकार्ड में क्या दर्ज है और समय समय पर जो दस्तावेज निष्पादित हुए हैं उन में अधिकार किस तरह हस्तांतरित हुए हैं। यहाँ आप ने जो भी तथ्य हमारे सामने रखे हैं उन के तथा हिन्दू विधि के आधार पर हम आप को अपने समाधान प्रस्तुत कर रहे हैं।

प के पिता जी को जो गिफ्ट के रूप में 8 एकड़ मिला है वह सहदायिक संपत्ति नहीं है, सहदायिक संपत्ति केवल वही हो सकती है जो किसी पुरुष पूर्वज से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हौ। वैसी स्थिति में यह 8 एकड़ भूमि स्वअर्जित भूमि थी। चूंकि इस का नामांतरण आप के पिता व बड़े पिता के नाम हुआ इस कारण यह दोनों की संयुक्त संपत्ति तो हुई लेकिन सहदायिक नहीं हुई।

प के पिता व बडे पिता के बीच बंटवारा हुआ और दोनों को 6-6 एकड़ भूमि मिली। आप के पिता को मिली भूमि में से उन्हों ने 3 एकड़ भूमि बेची। शेष भूमि को सहदायिक भी माना जाए तब भी उस सहदायिक भूमि का दाय पिता की मृत्यु पर होगा। पिता की मृत्यु 1990 में हुई है। तब कानूनी स्थिति यह थी कि सहदायिक संपत्ति में किसी पुरुष का हि्स्सा उस की मृत्यु पर यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई स्त्री होगी तो वह हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से दाय निर्धारित होगा। ऐसे में आप की माँ, तीन बहनें और दो भाई कुल 6 उत्तराधिकारियों में बराबर हिस्से होंगे। इस तरह प्रत्येक को 1/2 एकड़ भूमि का हिस्सा प्राप्त होगा।

दि पिता के जीवित रहते ही कोई बंटवारानाम रजिस्टर हुआ है तो उस संपत्ति में आप की बहनें हिस्सा प्राप्त नहीं कर सकेंगी। क्यों कि वह बंटवारा नामा पिता की मृत्यु के पहले हो चुका था। शेष बची भूमि जो कि पिता के हिस्से की रह गयी होगी उस में वही बराबर के छह हि्स्से होंगे प्रत्येक बहिन 1/6 हिस्सा प्राप्त करेगी।

समस्या-

नितिका चौहान ने ग्राम खेडली, पोस्ट भद्रबाद, जिला हरिद्वार, उत्तराखंड से पूछा है-

मेरा जन्म 1992 में हुआ था। मेरे मेरे दादाजी के दो पुत्र मेरे ताऊजी आदित्य कुमार और मेरे पिताजी रविंद्र कुमार थे। मैं रविंद्र कुमार जी की इकलौती संतान हूँ। मेरे पिताजी रविंद्र कुमार जी का देहांत 1994 में हो गया था।  उसके पश्चात मेरे दादा जी का देहांत 2011 में हो गया। मेरे दादाजी के बैंक खाते में जो धनराशि थी, मेरे दादाजी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी ने उसको निकाल लिया और उसमें मुझे कोई हिस्सा नहीं दिया। मुझे बैंक जाकर पता चला कि मेरे ताऊजी ने परिवार रजिस्टर की जो नकल वहां लगाई थी उसमें मेरे ताऊजी ने मुझे अपनी पुत्री दर्शाते हुए बैंक खाते से धनराशि प्राप्त कर ली है।  मैं जानना चाहती हूं कि क्या उस धनराशि पर मेरा भी उतना ही हक था, जितना कि मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद मेरे ताऊजी का था।

समाधान-

बिलकुल आप ने सही कहा। उस धनराशि पर आप का उतना ही अधिकार था जितना की आप के ताउजी को था। किसी पुरुष की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार धारा 8 हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम के अंतर्गत तय होता है। धारा 8 में सब से पहले उन लोगों का बराबर का अधिकार होता है जो अधिनियम की अनुसूची की प्रथम श्रेणी के उत्तराधिकारी हों। उस में पुत्र और पूर्व मृत पुत्र के पुत्र-पुत्री एक साथ रखे गए हैं। क्यों कि आप अपने पिता की इकलौती संतान हैं तो आप का अपने दादाजी की संपत्ति पर उतना ही अधिकार है जितना कि आप के ताऊजी को है।

बैंक किसी भी प्रकार से आप के ताऊ जी को यह धन नहीं देता और उत्तराधिकारी प्रमाण पत्र की मांग करता। लेकिन आप के ताऊजी ने आप को अपनी पुत्री बता दिया। जीवित पुत्र की पुत्री तो प्रथम श्रेणी की उत्तराधिकारी नहीं है इस कारण बैंक ने वह धन आप के ताऊजी को दे दिया।

लेकिन इस तरह गलत सूचना दे कर बैंक से धन प्राप्त करना धारा 402 भारतीय दंड संहिता व अन्य कुछ धाराओं के अंतर्गत अत्यन्त गंभीर अपराध है। यदि आप पुलिस में रिपोर्ट करें या पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर मजिस्ट्रेट के न्यायालय में परिवाद करें और आप के ताऊजी के विरुद्ध अभियोजन संस्थित हो तो उन्हें हर हाल में कारावास की सजा हो जाएगी।

स के अतिरिक्त आप जितना धन आप के ताऊजी ने बैंक से प्राप्त किया है उस के आधे धन और वह धन प्राप्त करने से लेकर उस की अदायगी तक के ब्याज प्राप्त करने के लिए आप दीवानी न्यायालय में दीवानी वाद संस्थित कर सकती हैं।

समस्या-

हरगोबिंद सिंह ने ग्राम पो. मालारामपुरा, जिला हनुमानगढ़, राजस्थान से पूछा है-

त्नी की मृत्यु के बाद पुरूष ने किसी महिला से शादी कर ली, तो इस पुरुष की मौत के बाद इस दूसरी जीवित पत्नी का जमीन-संपत्ति पर क्या हक होगा? मृत पुरुष के दोनों पत्नियों से दो-दो बच्चे इसी पुरूष की संतान हैं।

समाधान-

पुरुष ने अपनी पहली पत्नी की मृत्यु के उपरान्त दूसरा विवाह किया है इस तरह दूसरी पत्नी उस की उसी तरह वैध पत्नी है जैसे पहली पत्नी वैध थी। इस कारण इस दूसरी पत्नी को वही अधिकार प्राप्त होंगे जो अधिकार पहली पत्नी को उस के पति के मरने के बाद हासिल होते।

इस पुरुष की दो  संतानें पहली पत्नी से और दो ही संतानें दूसरी पत्नी से हैं। इस कारण से उस की चारों ही सन्ताने भी वैध संतानें हैं। दूसरी पत्नी से उत्पन्न होने वाली संतानों को भी उसी तरह अधिकार प्राप्त होंगे जैसे पुरुष की पहली पत्नी से मृत्यु नहीं हुई थी और बाद वाली दोनों संतानों का जन्म भी पहली पत्नी से ही हुआ है।

हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 से मृत हिन्दू पुरुष का उत्तराधिकार तय होगा। यदि खेती की जमीन है तो उस का उत्तराधिकार भी धारा 8 से ही तय होगा। इस धारा के अनुसार माता (यदि जीवित हो तो), पत्नी और सभी सन्तानों को बराबर उत्तराधिकार प्राप्त होगा। आप के मामले में लगता है कि माता जीवित नहीं है। वैसी स्थिति में प्रथम श्रेणी के पाँच उत्तराधिकारी हैं। चारों संतानें और पत्नी। पाँचों में से प्रत्येक को 1/5 हिस्सा प्राप्त होगा। खेती की जमीन में मृत्यु के कारण खुलने वाले नामान्तरण (फौती इन्तकाल) में पाँचों के नाम 1/5 हिस्सा दर्ज होगा। शेष अचल संपत्ति में भी पाँचो को बराबर हिस्सा प्राप्त होगा।

समस्या-

स्वाति साहू ने राजा तालाब, गाँधी चौक, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे दादा जी ने अपने स्वयं के पैसे से लिये हुए मकान में मेरी बेवा माता जी और हम पांच बहनों को अपने साथ रखा है, पिछले 30 साल से। दादा जी का निधन होने पर मेरे बड़े पापा और चाचा हम लोगों को घर खाली करने के लिए धमकी दे रहे हैं। दादा जी ने मम्मी के नाम पर वसीयत किये हैं। पर वो रजिस्टर्ड नहीं हुआ है, नोटरी से अटेस्टेड कराया है। जो कि तहसील में मान्य नही है। हमे क्या करना चाहिए जिससे हमें कोई घर से निकाल न पाए?

समाधान-

दादाजी की वसीयत के अनुसार मकान आप की मम्मी का है और आप को वहाँ से निकाला जाना गैर कानूनी होगा। इस कारण से आप सभी वहाँ से निकलने से साफ मना कर दें। बड़े पापा और चाचा वगैरा से कह दें कि वे यदि यह समझते हैं कि वे मकान खाली कराने के अधिकारी हैं तो अदालत में दावा करें, यदि अदालत से फैसला हो जाता है कि मकान हमें खाली करना होगा तो कर देंगे। पर किसी के कहने से न करेंगे।

किसी भी वसीयत का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है, यहाँ तक कि किसी स्टाम्प पेपर तक पर होना जरूरी नहीं है। वसीयत एक खाली कागज पर भी लिखी जा सकती है। आप को किस ने कह दिया कि यह तहसील में मान्य नहीं है? वसीयत पर वसीयत करने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए और दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए जिन की उपस्थिति में वह वसीयत की गयी हो. नोटेरी से अटेस्टेशन हुआ है इस से नोटेरी एक और गवाह हो गया है तथा नोटेरी का रजिस्टर वसीयत के सही होने का एक ठोस सबूत है। इस वसीयत को आप लोग जब भी कोई मुकदमा चलेगा तब अदालत में गवाहों के बयान से प्रमाणित करा सकते हैं।

आप के चाचा ताऊ को उन के पिता की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने का आधिकार है। लेकिन आप की माँ के नाम मकान की वसीयत है तो उसे प्राप्त करने का चाचा ताऊ का अधिकार समाप्त हो चुका है।  यदि आप को लगता हो कि आप के चाचा, ताऊ जबरन आप को मकान से बेदखल कर सकते हैं तो आप अदालत में दावा कर के गैर कानूनी तरीके से मकान से बेदखल करने पर रोक लगाने के लिए स्थायी और अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

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