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समस्या-

स्वाति साहू ने राजा तालाब, गाँधी चौक, रायपुर, छत्तीसगढ़ से पूछा है-

मेरे दादा जी ने अपने स्वयं के पैसे से लिये हुए मकान में मेरी बेवा माता जी और हम पांच बहनों को अपने साथ रखा है, पिछले 30 साल से। दादा जी का निधन होने पर मेरे बड़े पापा और चाचा हम लोगों को घर खाली करने के लिए धमकी दे रहे हैं। दादा जी ने मम्मी के नाम पर वसीयत किये हैं। पर वो रजिस्टर्ड नहीं हुआ है, नोटरी से अटेस्टेड कराया है। जो कि तहसील में मान्य नही है। हमे क्या करना चाहिए जिससे हमें कोई घर से निकाल न पाए?

समाधान-

दादाजी की वसीयत के अनुसार मकान आप की मम्मी का है और आप को वहाँ से निकाला जाना गैर कानूनी होगा। इस कारण से आप सभी वहाँ से निकलने से साफ मना कर दें। बड़े पापा और चाचा वगैरा से कह दें कि वे यदि यह समझते हैं कि वे मकान खाली कराने के अधिकारी हैं तो अदालत में दावा करें, यदि अदालत से फैसला हो जाता है कि मकान हमें खाली करना होगा तो कर देंगे। पर किसी के कहने से न करेंगे।

किसी भी वसीयत का रजिस्टर्ड होना जरूरी नहीं है, यहाँ तक कि किसी स्टाम्प पेपर तक पर होना जरूरी नहीं है। वसीयत एक खाली कागज पर भी लिखी जा सकती है। आप को किस ने कह दिया कि यह तहसील में मान्य नहीं है? वसीयत पर वसीयत करने वाले के हस्ताक्षर होने चाहिए और दो गवाहों के हस्ताक्षर होने चाहिए जिन की उपस्थिति में वह वसीयत की गयी हो. नोटेरी से अटेस्टेशन हुआ है इस से नोटेरी एक और गवाह हो गया है तथा नोटेरी का रजिस्टर वसीयत के सही होने का एक ठोस सबूत है। इस वसीयत को आप लोग जब भी कोई मुकदमा चलेगा तब अदालत में गवाहों के बयान से प्रमाणित करा सकते हैं।

आप के चाचा ताऊ को उन के पिता की संपत्ति उत्तराधिकार में प्राप्त करने का आधिकार है। लेकिन आप की माँ के नाम मकान की वसीयत है तो उसे प्राप्त करने का चाचा ताऊ का अधिकार समाप्त हो चुका है।  यदि आप को लगता हो कि आप के चाचा, ताऊ जबरन आप को मकान से बेदखल कर सकते हैं तो आप अदालत में दावा कर के गैर कानूनी तरीके से मकान से बेदखल करने पर रोक लगाने के लिए स्थायी और अस्थायी निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं।

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समस्या-

प्रतापचंद्र ने ग्राम करवनियां, ब्लाक नगवां, जिला सोनभद्र (उ.प्र.) से पूछा है-

मेरी बहन कंचन का केस अप्रैल 2016 से ही रावर्ट्सगंज जिला न्यायालय में चल रहा है। 2013 में बस्ती जिले के करमांव निवासी किसोर चंद्र मणी से उसकी शादी हिंदू रिवाज से हुई थी, जिसके बाद तीन बार वह क्रमशः 1 सप्ताह, 1 माह, 3 माह के लिए, ससुराल गयी है। उसे बार बार दहेज के लिए प्रताड़ित किया गया और उस पर जानलेवा हमला किया गया, उसके पति का उसकी भाभी से संबंध है, इसका विरोध करने पर परिवार वालों ने इसे भी देवर से संबंध रखने की सलाह दे डाली। तीन साल तक सुलह-समझौता करवा कर दोनो पक्षों द्वारा मामले को हल करने की भरसक कोशिश की गई, पर हल न निकला। दहेज की मांग व शारिरिक प्रताड़ना और भी बढ़ती गई।  जब उसे जान से मार देने की कोशिश की गई तब से वह अपने मायके में ही है, और वह उससे तलाक लेना चाहती है। पहले मिल कर बातचीत से तलाक़ का मामला हल न होने पर, साल 2016 अप्रैल में हम लोग की तरफ से दहेज प्रथा, घरेलू हिंसा तथा गुजाराभत्ता लड़के पक्ष वालों पर मुकदमा कर दिया गया। लड़के वाले पहले की ही तरह अब भी धोखाधड़ी वाली बात करते हैं कि अब सब ठीक हो जायेगा विदाई कर दो। पर लड़की का स्टैंड क्लीयर है- कि मुझे तलाक़ चाहिए। दो-ढाई सालों में कोर्ट में वे लोग पेशी पर अबतक तीन या चार बार ही आये हैं, किंतु उनका कुछ नहीं हुआ। अक्टूबर 23, 2018 को मेंटेनेंस (125) का फैसला आया पर कोर्ट द्वारा तय रू. 2500 गुजारा भत्ता नहीं मिल रहा है, बाकी दो केसों का क्या हुआ वकील कुछ नहीं बताता। मुझे जानकारी नहीं है। मै बाहर ही रहता हूँ गाजियाबाद. कृपया बतायें की अब कोर्ट क्या करेगी? या हमें क्या करना होगा। ताकि जल्दी से मामले का निपटारा हो?

समाधान-

2013 में शादी हुई, बहिन तीन बार में कुल मिला कर चार माह एक सप्ताह ससुराल में रह रही है। उसी में इतने झगड़े हैं। आप ने जब सुलह समझौते की बात शुरू की तभी आप को ये सारे मुकदमें और तलाक का मुकदमा कर देना चाहिए था। सुलह समझौते की बातचीत तो मुकदमों के लंबित रहते भी चल सकती थी।

दो-ढाई साल पहले 2016 आप की बहिन की और से तीन मुकदमे किए गए हैं।  अब आप को जल्दी पड़ी है। तीनों मुकदमों में सामने वाले पक्ष को जवाब देने का मौका होगा, आप की साक्ष्य होगी, उस की साक्ष्य होगी फिर बहस और फिर फैसला होगा। समय तो लगेगा। यह अमरीका नहीं है जहाँ दस लाख की आबादी पर 140 अदालतें हों, यहाँ इतनी आबादी पर 12-13 अदालतें हैं। लोग ज्यादा अदालतों के लिए तो लड़ेंगे नहीं, वोट देंगे तब हिन्दू मुसलमान हो जाएँगे। तो ऐसे ही भुगतना होगा।

आप की बहिन को तलाक चाहिए और अभी तक तलाक का मुकदमा तक नहीं किया है। तलाक कैंसे मिलेगा? जिस दिन आप को यह पता लगा कि पति के उस की भाभी के साथ संबंध है और बहिन को भी देवर के साथ संबंध रखने की सलाह दी गयी है तभी आप को तुरन्त तलाक का मुकदमा करवाना चाहिए था। अब भी बहिन के लिए तलाक चाहते हैं तो उस के लिए मुकदमा तुरन्त करें। आप ने 2013 से 5 साल बहिन के जीवन के बरबाद हो चुके हैं। थोड़ा धैर्य रखिए नतीजे भी आएँगे। न्याय ऐसी चीज नहीं है जो जाए और बाजार से खरीद लाए, बस काम खत्म। समय तो लगेगा।

आप खुद अपनी बहिन के वकील से दैनन्दिन संपर्क में नहीं हैं। एक बार जाइए, उस से मिलिए और विस्तार से बात कीजिए। उसे कहिए कि आप उस से फोन पर पूछताछ करते रहेंगे। तो वकील सब कुछ बताएगा। यदि एक दो मुलाकातों के बाद लगे कि वकील ठीक से काम नहीं कर पा रहा है तो किसी अच्छे वकील को कर लें। हालांकि वकील बदलने से मुकदमे में लगने वाला समय कम होगा ऐसा लगता नहीं है।

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माता-पिता के प्रति कानूनी दायित्वों का त्याग संभव नहीं है।

November 3, 2018 को वेबसाईट प्रशासक द्वारा लिखित

समस्या-

उदय कुमार ने ग्राम गोबिन्दपुर, पोस्ट मांझागढ़, जिला गोपालगंज, बिहार से पूछा है-

मेरे एक मित्र की समस्या है कि वह अपने माता-पिता की सुख-दुख, परवरिश, बुढ़ापे के लिए अपना हक व हिस्सा छोड़ना चाहता है, यह कैसे संभव है बताएँ?

 समाधान-

प के प्रश्न में दो चीजें सम्मिलित हैं जिन्हें आप के मित्र त्यागना चाहते हैं। पहली तो यह कि वे अपने माता-पिता के प्रति अपने कानूनी दायित्वों के निर्वाह को त्याग देना चाहते हैं।  दूसरा यह कि माता-पिता की जो भी संपत्ति है उस में अपना उत्तराधिकार भी त्याग देना चाहते हैं।

माता-पिता का संतानों के साथ और संतानों का माता-पिता के साथ संबंध और एक दूसरे के दायित्व और अधिकार किसी कानून से पैदा नहीं होते हैं। वे प्राकृतिक संबंध हैं। कोई व्यक्ति चाहे तो भी इन संबंधों को किसी घोषणा से या कानून से समाप्त नहीं कर सकता। केवल दत्तक ग्रहण का कानून है जिस में दत्तक दे दिए जाने पर माता –पिता अपने पुत्र /पुत्री पर अपना अधिकार और दायित्व दोनों ही समाप्त कर देते हैं। फिर भी यदि किस संपत्ति में दत्तक जाने वाले का अधिकार पहले ही उत्पन्न हो चुका होता है तो उस संपत्ति में दत्तक गई संतान का अधिकार समाप्त नहीं होता।

माता पिता की संपत्ति में आप के मित्र का अधिकार अभी उत्पन्न ही नहीं हुआ है। वह तो उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार खुलने पर पैदा होगा। जो अधिकार आप के मित्र को अभी मिला ही नहीं है उसे वह कैसे त्याग सकता है? यदि कोई पुश्तैनी –सहदायिक संपत्ति हो और उस में कोई अधिकार आपके मित्र का पहले ही /जन्म से उत्पन्न हो चुका हो तो उसे जरूर वह किसी अन्य के हक में त्याग सकता है।

इसी तरह माता-पिता के प्रति उन की असहायता की स्थिति में उन के पालन पोषण का जो दायित्व है वह भी किसी भी तरीके से नहीं त्यागा जा सकता। वैसे भी जिस का दायित्व होता है वह व्यक्ति कभी अपने दायित्व को नहीं त्याग सकता।

कोई भी व्यक्ति अपने माता-पिता, पत्नी और अपनी संतानों के प्रति अपने कानूनी दायित्वों को कभी नहीं त्याग सकता। इस तरह आप के मित्र की समस्या का कोई हल नहीं है।

समस्या-

सोनू कुमार ने सलेमपुर, जिला देवरिया, उत्तरप्रदेश से पूछा है-

मारी एक सौतेली बहन है, पिताजी के मर जाने के बाद वो प्रॉपर्टी में हिस्सा मांग रही है। जबकि माँ अभी जिन्दा है।  वो धमका रही है।  क्या वो प्रॉपर्टी में हिस्सेदार है या नहीं? कृपया बताएँ?

समाधान-

प के पिता की मृत्यु के साथ ही आप के पिता की संपत्ति के लिए उत्तराधिकार खुल चुका है। उन की जो भी संपत्ति है उस में हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा 8 के अंतर्गत सभी उत्तराधिकारियों के अधिकार निश्चित हो चुके हैं।

आप के पिता की मृत्यु के बाद उन की जीवित पत्नी अर्थात आप की माता जी तथा सभी संतानों का बराबर का हक उन की संपत्ति में उत्पन्न हो गया है और कोई भी उत्तराधिकारी आप के पिता द्वारा छोड़ी गयी संपत्ति के बंटवारे की मांग कर सकता है।

आप की सौतेली बहिन का भी अपने पिता की संपत्ति में अधिकार उत्पन्न हो चुका है। वह आप से उस के अधिकार की मांग कर रही है तो आप आपसी सहमति से बंटवारा कर के उसे उस का हिस्सा दे सकते हैं। या उस के हिस्से के बराबर धन उसे दे कर उस का हिस्सा शेष सभी या किसी एक उत्तराधिकारी के पक्ष में रिलीज करवा कर इस विवाद का निपटारा कर सकते हैं। अन्यथा स्थिति में आप की सौतेली बहिन बंटवारे का वाद संस्थित कर सकती है।

समस्या

भारत सिंह, गाँव मानपुरा गुजराती, तहसील नरसिंहगढ़, जिला राजगढ़,  मध्यप्रदेश ने पूछा है-

मारे दादा जी के नाम की खेती की ज़मीन थी जो उन्हे उत्तराधिकार मे उनके पिता से प्राप्त हुई थी 1960 के दशक में जो दूसरे गाँवं में थी। कुछ समय के बाद हमारे दादा जी ने वो ज़मीन बेच दी  और दूसरे गाँव में 3 बीघा उनके नाम से तथा 4 बीघा दादी के नाम से खरीद ली।  हमारे दादा जी के दो पुत्र थे एक मेरे पापा दूसरे मेरे चाचा। मेरे पिता जी का देहांत 1993 में हो गया।  जिसके बाद मेरे चाचा ने दादा दादी को बहला फुसला के पूरी ज़मीन उनके नाम 2011 में करवा ली, हमें और हमारे भाई को बिना बताए। जिसकी जानकारी हमें अभी लगी तो मैने वकील से पूछताछ की तो उन्होंने कहा प्रॉपर्टी उनके नाम से खरीदी हुई है वो जिसे चाहे दे सकते हैं।  वकील को दूसरे गांव का ज़रूर नहीं बताया कि वहाँ से बेचकर यहाँ खरीदी है।  आप से निवेदन है कि मुझे क्या कार्यवाही करनी चाहिए जिससे हमें भी हमारे पिता का हिस्सा मिल जाए। और क्या क्या डॉक्युमेंट इकट्ठे करने पड़ेंगे? अभी तक दादा दादी के नाम से हमें कुछ भी प्राप्त नाहीं हुआ है। दादा दादी चाचा के सपोर्ट में है। जो नामानन्तरण हुआ है उसमें ये ज़िक्र है हमारी उम्र अधिक हो जाने से हम हमारी ज़मीन हमारे एकमात्र पुत्र को दे रहे हैं।

समाधान-

प की समस्या गंभीर है और विवरण अपूर्ण है। आप के दादाजी को उक्त जमीन 1960 के दशक में उत्तराधिकार में प्राप्त हुई। तब तक हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 प्रभावी (17.06.1956) हो गया था। इस तरह यदि यह जमीन आपके दादा जी के पिता की स्वअर्जित भूमि थी तो वह उत्तराधिकार अधिनियम के अनुसार आपके दादाजी को उत्तराधिकार में मिली और वे उस जमीन के स्वामी हो गये। यह जमीन सहदायिक नहीं हो सकती थी यदि यह उक्त अधिनियम प्रभावी होने के पहले सहदायिक नहीं हो गयी हो। क्यों कि इस अधिनियम में सहदायिक संपत्ति के अस्तित्व में आने की स्थिति को समाप्त कर दिया गया है। हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम 1956 के अनुसार उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति स्वअर्जित संपत्ति जैसी ही है।  इस का अर्थ है कि यदि यह जमीन आपके दादाजी को भी उन के पिता, दादा या परदादा से प्राप्त हुई होती तभी वह सहदायिक हो सकती थी। आप को इस बात का दस्तावेजी सबूत तलाशना होगा कि पूर्व में जो जमीन  आप के दादा जी ने बेची वह उन के पिता को भी उत्तराधिकार में पिता से प्राप्त हुई थी। इस के बाद आपको यह सबूत लाना होगा कि वह जमीन बेची उस से जो धन प्राप्त हुआ उसी से वर्तमान जमीन खरीदी गयी। तब आप यह स्थापित कर पाएंगे कि उक्त जमीन सहदायिक है उस में आपके पिता और आप का जन्म से अधिकार है। यदि ये दोनों तथ्य स्थापित नहीं कर सके तो वर्तमान भूमि दादाजी की स्वअर्जित भूमि है और उसे वे जिसे चाहें दे सकते हैं। आप का कोई कानूनी अधिकार उस पर नहीं है।

दूसरे आप के द्वारा दिए गए विवरण से पता लगता है कि नामान्तरण के माध्यम से जमीन चाचा की हो गयी है। लेकिन नामान्तरण का आधार क्या है? यह स्पष्ट नहीं है। यदि दान करना है तो उस के लिए दान पत्र पंजीकृत होना आवश्यक है। यदि वसीयत है तो उस के आधार पर दादा दादी के जीवित रहते नामान्तरण नहीं हो सकता।  इस कारण आपको यह भी जानकारी करनी चाहिए कि नामान्तरण का आधार क्या है? क्या उस आधार पर नामांतरण हो सकता है। नामांतरण को चुनौती दी जा सकती है, यदि वह कानून के अनुसार नहीं हो। लेकिन आप को उक्त संपत्ति में से तभी कुछ प्राप्त हो सकता है जब कि आप को उस में कोई अधिकार हो। आप के विवरण से नहीं लग रहा है कि उक्त संपत्ति में आपका कोई अधिकार है। चाचा ने दादा दादी से किसी तरह जमीन अपने नाम करवा ली है तो उसे चुनौती देने का आप को कोई अधिकार नहीं है। यदि इसी तरह आप दादा दादी से उक्त जमीन अपने नाम करवा लेते तो चाचा को चुनौती देने का कोई अधिकार नहीं होता।

समस्या-

मेरी पत्नी बबीता देवी (68 वर्ष) एक पैर से विकलांग है। मेरे बाबा अंबिका सिंह जिनको 1940 में 7 एकड़ 42 डिसमिल जमीन उनके हिस्से में प्राप्त हुआ था। मेरे पिता दो भाई थे मेरे पिता का नाम वेशर सिंह और मेरे चाचा का नाम वादों सिंह। मेरी चाचा वादों सिंह ने विवाह नहीं किया था। मेरे चाचा वादों सिंह ने 3 एकड़ 42 डिसमिल जमीन 1948 में खरीदा था मेरे चाचा वादों सिंह की मृत्यु 2004 में हुई। उनके मरणोपरांत वह जमीन अभी मेरे पास है। क्या मेरे चाचा के द्वारा जो जमीन मुझे मिला उस पर मेरे पुत्र या पुत्री का अधिकार है। जिस वक्त मेरे चाचा ने जमीन खरीदा था उस वक्त वो संयुक्त परिवार के ही सदस्य थे किंतु उनके द्वारा खरीदे गए जमीन के केवाला पर सिर्फ उन्हीं का नाम है, मेरे पिताजी का नाम नहीं है। मुझे 3 पुत्र पैदा हुऐ परंतु तीनो जन्म के समय मृत पाए गए, तीनों की मृत्यु पेट में ही हो गई थी। फिर मुझे दो पुत्रियां हुई। क्या उन मृत पुत्रों का भी कोई हिस्सा हमारे संपत्ति में होता है? यदि हां तो फिर क्या वह हिस्सा मेरी पत्नी को स्थानांतरित होगा? मेरी पुत्री ने मुझ पर टाइटल पार्टीशन सूट किया है। उसका हिस्सा इस संपत्ति में कितना हो सकता है । जबकि 7 एकड़ 42 डिसमिल जो कि मेरे बाबा का हिस्सा था, उस में मेरे चाचा का जो हिस्सा होता है वह तो मेरा पर्सनल प्रॉपर्टी कहलायेगा।

उमेश सिंह vishnukr1506@gmail.com

समाधान-

आप के दादा अम्बिका सिंह को 2014 में जो जमीन उत्तराधिकार में प्राप्त हुई है वह आप की पुश्तैनी/ सहदायिक संपत्ति है। इस संपत्ति का उत्तराधिकार उत्तरजीविता से तय होगा। 2005 से पुत्रियाँ भी सहदायिक संपत्ति में पुत्र के समान अधिकार रखने लगी हैं। इस कारण आप की पुत्री आप की सहदायिक संपत्ति में अपना हिस्सा अलग कराने की अधिकारी है। आप के पुत्र मृत पैदा हुए इस कारण उन का कोई अलग से हिस्सा नहीं है। वह हिस्सा आपकी पत्नी को प्राप्त नहीं होगा।  दादा की जमीन में आप के चाचा का हिस्सा भी आप को मिल गया है। लेकिन वह फिर भी आप की स्वअर्जित संपत्ति नहीं है क्यों कि वह आपको उत्तराधिकार में प्राप्त हुआ है।  आप की पुत्री इस भूमि में अपना हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है। उस का हिस्सा कुल जमीन में 1/3 ही होगा। आप के चाचा ने जो हिस्सा खुद खरीदा है और जिस का केवाला उन के नाम है वह जमीन आप की स्वअर्जित मानी जाएगी और आप के जीतेजी उस में किसी को हिस्सा प्राप्त करने का अधिकार नहीं है। इस जमीन में आप की पुत्री कोई भी हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी नहीं है।

समस्या-

अभी मेरी बुआ ने मेरे पिताजी के साथ तीनों भाइयो पर केस किया है खेती की जमीन पर जो मेरे दादा जी से मिली है। यह जमीन मेरे दादा जी को मेरे पड़दादा जी से गोद के रूप में मिली थी। मेरे दादा जी की मृत्यु 2000 में हुई और मेरे दादा जी की मृत्यु के बाद सभी खसरा में मेरे पापा और तीनों भाइयों का नाम आ गया। जब प्रशासन हमारे गांव में आये तब मेरी बुआ ने कॉल पर जमीन लेने से मना कर दिया। उस समय ना हमने उनसे किसी पेपर पर सिग्नेचर करवाया। इतने सालों बाद में मेरी बुआ ने केस फ़ाइल किया है। मैंने सुना है कि हिन्दू उत्तराधिकारी कानून 2005 में बेटी का जमीन पर अधिकार नही होता। अब आगे हम क्या करे कृपया आप हमें बताएं।

– गजेंद्र सिंह, पाली, राजस्थान

समाधान-

हिन्दू उत्तराधिकार और सहदायिक संपत्ति के संबध में बहुत गलत धारणाएँ लोगों के बीच पैठी हुई हैं। यह माना जाता रहा है कि यदि किसी हिन्दू पुरुष को कोई संपत्ति उस के पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में मिली है तो वह पुश्तैनी संपत्ति है और उस में पुत्रियो को कोई अधिकार नहीं है और यह अधिकार 2005 में ही उन्हें प्राप्त हुआ है।

यह पुश्तैनी शब्द ही हमें भ्रम में डालता है। तो आप को समझना चाहिए कि वह पुश्तैनी संपत्ति जिसमें पुत्र का जन्म से अधिकार होता है वह क्या है? इस के लिए आप को तीसरा खंबा की पुश्तैनी संपत्ति से संबंधित महत्वपूर्ण पोस्ट “पुश्तैनी, सहदायिक संपत्तियाँ और उन का दाय” पढ़नी चाहिए। जिस से आप समझ सकें कि यह पुश्तैनी या सहदायिक संपत्ति क्या है। आप इसे लिंक को क्लिक कर के पढ़ सकते हैं।

उक्त पोस्ट पढ़ कर आप को पता लग गया होगा कि आप ने जिस संपत्ति पर प्रश्न किया है वह पुश्तैनी है या नहीं है।

यह सही है कि पुत्रियों को 2005 के संशोधन से ही पुत्रों के समान सहदायिक संपत्ति में जन्म से अधिकार प्राप्त हुआ है, लेकिन 2005 के पहले भी हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-6 मे यह उपबंध था कि यदि किसी सहदायिकी के किसी पुरुष सदस्य की मृत्यु हो जाती है तो उस का दाय उत्तरजीविता से तय होगा। लेकिन यदि उस के उत्तराधिकारियों में कोई भी स्त्री हुई तो उस के सहदायिक संपत्ति में हिस्से का दाय उत्तराधिकार अधिनियम की धारा-8 से तय होगा न कि मिताक्षर विधि के उत्तरजीविता के नियम के आधार पर। इस तरह 2005 के पूर्व भी पिता की मृत्यु पर पुत्री को उस की संपत्ति में धारा-8 के अनुसार हिस्सा मिलता था लेकिन वह सहदायिकी की सदस्य नहीं होती थी।

इस तरह पूर्व में जो नामान्तरण हुआ है वह गलत हुआ क्यों कि उस में आप की बुआ का हिस्सा तय नहीं हुआ था। आप की बुआ ने जो मांग की है वह सही है वह हिस्सा प्राप्त करने की अधिकारी है।

समस्या-

विवाहित हिन्दू स्त्री का इस्लाम धर्म अपनाने के बाद क्या उसके पहले पति से विवाह रहता है या टूट जाता है, वह दूसरी शादी के लिए तलाक ले या नहीं?

-सुलेमान,  तहसील नोहर जिला हनुमानगढ़ राज्य राजस्थान

समाधान-

को भी हिन्दू स्त्री-पुरुष जब एक बार हिन्दू विधि से विवाह कर लेते हैं तो वे दोनों उस विवाह में तब तक रहते हैं जब तक कि उस विवाह के विच्छेद की डिक्री पारित नहीं कर दी जाती है। यदि उन में से कोई भी धर्म परिवर्तन कर लेता है तब भी यह विवाह बना रहता है, वे साथ साथ रह सकते हैं।।  किन्तु धर्म परिवर्तन से धर्म परिवर्तन करने वाले के पति या पत्नी को यह अधिकार उत्पन्न हो जाता है कि वह धर्म परिवर्तन के आधार पर अपने साथी से विवाह विच्छेद की डिक्री प्राप्त कर सके और वह  हिन्दू विवाह अधिनियम की धारा 13(ii) में विवाह विच्छेद के लिए आवेदन कर सकता है और साथी के धर्म परिवर्तन के आधार पर उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित हो सकती है। तब वह दूसार विवाह कर सकता/ सकती है।

यदि आप का प्रश्न यह है कि किसी स्त्त्री द्वारा इस्लाम ग्रहण कर लेने के बाद उसे दूसरा विवाह करने के लिए अपने पूर्व पति से तलाक लेना जरूरी तो नहीं? तो उस का उत्तर यह है कि उसे विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करा कर अपने पूर्व पति से  विवाह विच्छेद करना होगा। इस्लाम धर्म के अनुसार भी एक स्त्री एक विवाह में रहते हुए निकाह नहीं कर सकती। उसे पहले पूर्व विवाह से तलाक लेना पड़ेगा और फिर इद्दत की अवधि भी व्यतीत करनी होगी। इस मामले में हिन्दू स्त्री को धर्म परिवर्तन कर मुस्लिम हो जाने के बाद भी अपने हिन्दू पति से हिन्दू विधि से विवाह विच्छेद की डिक्री पारित करनी होगी। डिक्री पारित होने के उपरान्त इद्दत की अवधि गुजर जाने पर ही वह इस्लामी शरीयत के अनुसार निकाह कर सकती है।

 

समस्या-

मेरी मां की मृत्यु 2 साल पहले हो चुकी है। मेरे पिता हम लोगो से 15 साल से अलग दुसरी औरत के साथ रह  रहे हैं। हम  जो लोग के पास जो मकान और जमीन हैं वो मां के नाम हैं। कया  मेरे पिता को यह अधिकार है कि  मेरी मां की  सपंति का दुरुपयोग कर पायेगे।

-राहुल, रांची, झारखंड

समाधान-

प की माँ के नाम से जो जमीन और मकान हैं वे सभी आप की माँ की एब्लोल्यूट संपत्ति थीं। उन की मृत्यु के साथ ही उन का उत्तराधिकार तय हो गया और संपत्ति का आधिकार उन के उत्तराधिकारियों को प्राप्त हो चुका है। हिन्दू स्त्री का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिाकर अधिनियम की धारा 15 व 16 से निर्धारित होता है।

प्राथमिक रूप से एक स्त्री की संपत्ति पर उत्तराधिकार उस की संतानों और और पति का होता है। लेकिन यदि कोई संपत्ति उसे अपने मायके से मिली हो तो उस पर पति का अधिकार नहीं होता। यदि उक्त संपत्ति या उस का कोई भाग आप की माताजी को अपने मायके से प्राप्त हुई है तो उस में आप के पिता का कोई अधिकार नहीं है।

यदि संपत्ति आप के माता पिता की आय से बनी है तो उस में आप के पिता का भी हिस्सा है। इस कारण आप यदि चार भाई बहिन हैं तो एक पिता का हिस्सा जोड़ कर कुल पाँच हिस्से हुए और पाँचवें हिस्से पर आप के पिता का अधिकार है वे चाहेँ तो उसे आप से ले सकते हैं, लेकिन उस के लिए उन्हें पहले संपत्ति का कानूनी तौर पर विभाजन करना होगा। हालांकि वे चाहें तो बिना विभाजन के अपना हिस्सा किसी को हस्तांतरित कर सकते हैं। इस से जैसे अभी वे हिस्सेदार हैं वैसे ही खरीददार हिस्सेदार हो जाएगा।

Women rights

समस्या-

रघुनदंन सोलंकी ने विजयनगर, सवाईमाधोपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मारी पुस्तैनी जमीन है।  मेरे पिताजी के हम तीन पुत्र हैं, कोई पुत्री नहीं है। मेरे पिताजी का देहान्त हो चुका है, तथा हमारी माताजी जीवित हैं।  हमारे दोनो बड़े भाईयो की शादी हो चुकी है।  परन्तु शादी के 1 साल बाद हमारे मंझले भाई की निसंतान अवस्था मे मृत्यु हो गई। उसके 1 माह बाद हमारी भाभी मायके चली गई,  6 माह बाद उनके घरवालो ने बिना हमें बताये उनका नाता किसी के साथ कर दिया (नाता प्रथानुसार)।  मेरी भाभी और उनके दूसरे पति ने हम बताये बिना धोखे से हमारी पुस्तैनी जमीन पर नामांतरण खुलवाकर 1/4 में से 1 हिस्सा स्वंय के नाम कर लिया।  नामांतरण 2015 में खुलवाया गया जबकि उनका नाता 2013 में हुआ, जिसके सबूत के रुप मे हमारे पास 2014 में बनाये गये आधार, पहचान पत्र, राशन कार्ड की प्रति है जिनमे पति के रुप में उनके दूसरे पति का नाम है।  उसे दूसरे पति से एक पुत्र भी है।  तो क्या इस स्थिति में भी वह हमारी पुस्तेनी जमीन मे हिस्सेदार है?  क्योंकि हमे डर है कि कहीं वो जमीन बेच न दे? कृपया मदद करें।

समाधान-

प की निस्संतान विधवा भाभी ने नाता विवाह कर लिया है और उस के बाद उस ने आप की पुश्तैनी जमीन का नामान्तरण राजस्व रिकार्ड में करवा लिया है। जिस के अनुसार एक चौथाई संपत्ति उस के नाम दर्ज हो गयी है। इन तथ्यों के साथ मूलतः आप की समस्या यह है कि कही विधवा भाभी उस के नाम नामान्तरित एक चौथाई संपत्ति को  विक्रय न कर दे? क्या उसे नाता करने के बाद भी पुश्तैनी संपत्ति में हिस्सा प्राप्त करने और नामान्तरण कराने का अधिकार था?

सब से पहले तो आप को यह समझना चाहिए कि पुश्तैनी संपत्ति क्या है?  पुश्तैनी संपत्ति जिन संपत्तियों के सम्बंध में कहा जाता है उन्हें हमें सहदायिक संपत्ति कहना चाहिए। ऐसी संपत्ति जो कि किसी हिन्दू पुरुष को उस के पिता, दादा या परदादा  से उन की मृत्यु के उपरान्त उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो। ऐसी संपत्ति में उत्तराधिकारी के पुत्र का हिस्सा जन्म से ही निश्चित हो जाता था। लेकिन 17 जून 1956 से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू हो गया। इस तरह किसी भी स्वअर्जित संपत्ति का उत्तराधिकार हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम से शासित होने लगा। जिस में पुत्रों के साथ साथ पुत्रियोँ, पत्नी और माँ को बराबर का हिस्सा दिया गया था।  इस का अर्थ यह हुआ कि उक्त तिथि 17.06.1956 के बाद से कोई भी संपत्ति सहदायिक संपत्ति बनना बन्द हो गयी। इस कारण यदि कोई संपत्ति दिनांक 17 जून 1956 के पहले किसी हिन्दू पुरुष को उसके पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई थी तो वह सहदायिक होगी। लेकिन इस तिथि के बाद कोई भी स्वअर्जित संपत्ति सहदायिक नहीं हो सकती थी।तो पहले आप जाँच लें कि जिसे आप अपनी पुश्तैनी संपत्ति बता रहे है वह वास्तव में सहदायिक संपत्ति भी है या नहीं है।

आप का मामला 2005 के बाद का है। इस कारण आप की इस संपत्ति पर 2005 के संशोधन के बाद का हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम लागू होगा। उस की धारा 6(3) में यह उपबंध है कि किसी सहदायिक संपत्ति मेंं हि्स्सेदार हिन्दू (पुरुष और स्त्री दोनों) की मृत्यु हो जाती है तो यह माना जाएगा कि सहदायिक संपत्ति में उस का जो हिस्सा था वह संपूर्ण सहदायिक संपत्ति का विभाजन हो कर उसे मिल चुका था और उस का उस हिस्से का उत्तराधिकार उत्तरजीविता के आधार पर नहीं बल्कि हिन्दू उतराधिकार अधिनियम के उपबंधों के अनुसार निश्चित किया जाएगा।

उक्त नियम के अनुसार जिस दिन आप के पिता जी की मृत्यु हुई उस दिन उन का हिस्सा तीन भाइयों और माँ को बराबर के चार हिस्सों में मिल गया अर्थात संपत्ति में सभी का 1/4 हिस्सा हो गया। अब एक विवाहित निस्संतान भाई की मृत्यु हो गयी तो उस का हिस्सा उस की पत्नी के हिस्से में उसी दिन चला गया जिस दिन आप के भाई की मृत्यु हो गयी थी। उस भाभी ने बाद में नाता कर लिया। उस ने नाता किया। विधवा होने के बाद तो वह  वैधानिक विवाह भी कर सकती थी। इस नाते को भी वैधानिक विवाह ही माना जाएगा। लेकिन नाता होने से या विवाह कर लेने से  किसी विधवा को उस के पति से उत्तराधिकार में प्राप्त संपत्ति वापस अन्य उत्तराधिकारियों में जाने की कोई विधि या कानून नहीं है। पति से उत्तराधिकार प्राप्त कर लेने से विधवा के विवाह में भी किसी तरह की रोक नहीं है।

इस तरह आप की विधवा भाभी ने नाता करने के उपरान्त भी जो नामान्तरण खुलवाया है वह विधिपूर्वक है। वह आज भी उस 1/4 हिस्से की स्वामिनी है। वह जमीन का बंटवारा करवा कर अपने हिस्से को अलग करवा कर अपना खाता अलग खुलवा सकती है अपने हिस्से पर अलग से कब्जा प्राप्त कर सकती है और उसे विक्रय या किसी भी प्रकार से हस्तान्तरित कर सकती है। वह बिना बंटवारा कराए भी अपने हिस्से की भूमि का विक्रय कर सकती है।

 

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