Possession Archive

प्रतिकूल कब्जा प्रतिरक्षा का सिद्धान्त है।

December 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_kisan-land3.jpgसमस्या-

राजेश तिवारी ने सोरों बदरिया, उत्तर प्रदेश से समस्या भेजी है कि-


मारे गाँव से दो किलो मीटर की दुरी पर ४ बीघा जमीन को हमारे पूर्वज 40साल से करते आ रहे थे।  उनकी मोत के बाद अब हम कर रहे हेै।  उस जमीन में २६ लोगों के नाम हैं, सब ने वह जमीन छोड़ रखी है।  अब एक आदमी आता है  वह जमीन छोड़ने के लिए कहता है।  उस आदमी के बाप का नाम उस जमीन में है, बाप जिन्दा है।  हम जानना चाहते हैं कि क़ानूनी तरीके से उस जमीन पर हमारा कुछ हक बनता है कि नहीं, जब कि 40 साल से कोई जमीन पर अपना हक जताने नहीं आया। हम किस कोर्ट में कोन सी धारा में अपना मुकद्दमा डाल सकते हैं। हमें उचित सलाह दें।


समाधान-

जिस जमीन पर आप और आप के पूर्वज 40 वर्ष से खेती करते आ रहे हैं और इन 40 वर्षों में किसी ने आप के खेती करने पर कोई आपत्ति नहीं की इस तरह आप का उस जमीन पर प्रतिकूल कब्जा (Adverse Possession) है। लेकिन प्रतिकूल कब्जे का यह सिद्धान्त केवल प्रतिरक्षा के लिए। यह हथियार हमले के लिए नहीं बल्कि रक्षा के लिए है। जिस का सीधा अर्थ ये है कि यदि कोई आप को उस जमीन से हटाने  के लिए वाद संस्थित करे या कोई भी कानूनी कार्यवाही करे तो आप इस हथियार का उपयोग कर सकते हैं। इस तरह आप को अदालत जा कर किसी तरह का आवेदन देने, वाद प्रस्तुत करने या कोई और कार्यवाही करने की जरूरत नहीं है। आप तो जमीन पर अपना कब्जा बनाए रखें।

यदि कोई आप को धमकी देता है कि वह जबरन कब्जा छीन लेगा तो यह अपराधिक कार्यवाही है। आप को उस के विरुद्ध पुलिस में रपट दर्ज करानी चाहिए और पुलिस द्वारा कोई कार्यवाही न करने पर अपराधिक परिवाद मजिस्ट्रेट के न्यायालय में प्रस्तुत करना चाहिए।  आप दीवानी /राजस्व न्यायालय में  इस तरह की निषेधाज्ञा प्राप्त करने का वाद संस्थित कर सकते हैं कि आप 40 वर्षों से अधिक से भूमि पर काबिज काश्त हैं, आप का कब्जा अवैध तरीके से नहीं हटाया जा सकता है, यदि किसी का अधिकार है तो वह न्यायालय से आदेश या डिक्री प्राप्त किए आप को न हटाए।

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आप से अब मकान का कब्जा कोई छीन नहीं सकता।

November 1, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_property1.jpgसमस्या-

शब्बीर खान ने रीठी, मध्यप्रदेश से पूछा है-

मारे पूर्वजों ने 25 वर्ष पहले कच्चा लेख लिखवा कर भूमि खरीदी और मकान बना कर रहने लगे। जिस से भूमि खरीदी थी वह अब अपना हक बता कर कब्जा खाली कराना चाहता है। हमें क्या करना चाहिए।

समाधान-

ह इस बात पर निर्भर करेगा कि कच्चा लेख जो लिखा गया है उस में क्या लिखा है। यदि उस में जमीन बेचने का लिखा है और बेचने की रकम प्राप्त कर कब्जा देने की बात लिखी है तो वह एक एग्रीमेंट है। जिस के अनुसार धन दे कर तथा विक्रेता ने कब्जा दे कर आंशिक रूप से एग्रीमेंट का पालन कर दिया है। यदि ऐसा है तो आप से उक्त प्लाट का कब्जा कोई भी नहीं छीन सकता। आप चुपचाप रहें और विक्रेता को कब्जा वापस प्राप्त करने के लिए कानूनी कार्यवाही करने दें। वैसे भी आप का कब्जा 25 वर्ष का है इस तरह आप का प्रतिकूल कब्जा भी उक्त संपत्ति पर है।

यदि विक्रेता किसी प्रकार से आप को तंग करे तो आप पुलिस में रिपोर्ट लिखा सकते हैं। यदि आप को ऐसी आशंका हो कि विक्रेता जबरन आप को बेदखल कर सकता है तो आप जबरन बेदखली के विरुद्ध दीवानी वाद संस्थित कर अस्थाई निषेधाज्ञा व स्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त कर सकते हैं। इस संबंध में आप को किसी स्थानीय वकील की मदद से कार्यवाही करनी चाहिए। स्थानीय वकील दीवानी मुकदमों के मामले में जानकार और अनुभवी हो तो बेहतर होगा।

 

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हिबानामा पंजीकृत होना जरूरी नहीं।

September 14, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

gift propertyसमस्या-

इमरान ने बसना, रायपुर छत्तीसगढ़ से पूछा है-

म लोग 5 साल हुआ मेरे नाना जी के साथ रहते हैं…मेरे नाना age 65 और उनकी अम्मी age ७५ ..और मेरे नानी जी और मामा 40 साल से अलग ररहते थे…..और मेरे नाना जी के पास नहीं आते थे और ओ लोग बोहत तकलीफ उठाते थे …तब मेरे नाना जी ने मेरे अम्मी को बुलाया और हम उनको 4 साल से केयर किआ तो मेरे नाना जी ने खुश होके उनका आबादी मकान मेरे अम्मी के नाम कर दिए हैं …१०० का स्टाम्प में नोटरी करके दिए हैं .अब ओ इस दुनिया में नहीं हैं।  तो मेरे मामा और नानी .. जो मकान नाना जी ने हम को दे दिए हैं उस पर हम से हिस्सा मांग ‘रहे हैं …और परेसान कर रहे हैं ….अब हम क्या करें सर? …. …..और नाना जी ने स्टाम्प पे उल्लेख किए हैं कि … मैं हाजी कदर अपनी राजी खुसी से @ … मेरी बेटी अमरीन बनो को अपना मकान दे रहा हूँ। मेरे चलने फिरने में तकलीफ होती है इसलिए मेरी सेवा मेरी बेटी अमरीन बानो ने की है इस से उस को खुस होके दे रहा हूँ …आज १२-३-२०१२ से उक्त मकान की मालिक अमरीन होगी और मेरा नाम राजस्व अभिलेख और पटवारी अभिलेख से हटा कर खुद का नाम जोड़ लें …………. हम लोगों ने नगर पंचायत से उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम जोड़ लिए हैं .. …पर पटवारी अभिलेख में उनका नाम हटा कर अम्मी का नाम कैसे कैसे जोड़े …पटवारी के पास जाने से ओ जबाब नहीं दे रहा है …उस को मेरे मामा पैसा खिला दिया है …. हम को क्या करना होगा।

समाधान-

प के नानाजी ने मकान अपनी बेटी, आप की माँ के नाम तहरीर कर दिया। यह हिबा है। आप की माँ उसी मकान में निवास भी कर रही है इस कारण से उस का कब्जा भी उस मकान पर है। इस तरह यह हिबानामा अन्तिम हो चुका है। आप के नानाजी चाहें तो वे स्वयं भी इस मकान को वापस नहीं ले सकते।

आप को जो परेशानी आ रही है वह इस कारण से कि हिबा एक दान भी है और दान पत्र का पंजीकरण होना जरूरी है। लेकिन यदि हिबा किया गया हो और हिबा की गयी संपत्ति पर कब्जा भी प्राप्त कर लिया गया हो तो ऐसे मामले में हिबानामा को पंजीकृत होना कतई जरूरी नहीं है।

हालांकि आप के नाना जीवित हैं और आप चाहें तो उन से इस हिबानामा को उप पंजीयक के कार्यालय में पंजीकृत करवाया जा सकता है। उस के बाद इस संपत्ति का स्वामित्व आप की माँ का होने के मामले में किसी तरह की कोई शंका शेष नहीं रहेगी। बस यही है कि इस संपत्ति के बाजार मूल्य पर आप को स्टाम्प ड्यूटी व पंजीयन शुल्क अदा करना होगा।

यदि आप पंजीयन न भी करा पाएँ तो भी आप की माँ के इस संपत्ति पर स्वामित्व को उन से नहीं छीना जा सकता। सुप्रीम कोर्ट ने हफीजा बीबी बनाम शेख फरीद के मामले में यह निर्धारित किया है कि इस तरह के हिबानामा का पंजीकृत होना जरूरी नहीं है।

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सन्नी गुप्ता ने सांबा, जम्मू और कश्मीर से पूछा है-

मेरे पापा ने अपने भाई पर कोर्ट केस किया है अपनी दुकान वापस लेने के लिए। पापा के भाई ने पापा से दुकान 1995 में अपने बेटे के लिए ली थी। लेकिन अब वो खाली नहां करते। कहते हैं कि हम 1979 से दुकान करते हैं और उन्हों ने श्रम विभाग से फार्म ओ बनाया है 1979 से। जब कि वे तब सरकारी कर्मचारी थे। 2005 में रिटायर हुए हैं। हम ने आरटीआई के जरिए उन का रिकार्ड लिया और विजिलेंस में कम्प्लेंट की। लेकिन विजिलेंस वाले कहते हैं कि वे सेवा निवृत्त कर्मचारी के खिलाफ कोई कार्यवाही नहीं कर सकते। क्या हम उन के इस फ्राड के विरुद्ध कोर्ट में कार्यवाही कर सकते हैं और कोर्ट से कह सकते हैं कि उन की पेंशन बन्द की जाए। क्या ये कार्यवाही उच्च न्यायालय में होगी और क्या ये सिविल पिटीशन होगी।

समाधान-

प की मूल समस्या दुकान खाली कराना है और आप उलझ रहे हैं अपने चाचा को सजा दिलाने के लिए।

आप ने यह भी नहीं बताया कि दुकान का स्वामित्व किस का है यदि आप के पिताजी दुकान के स्वामी हैं तो आप के चाचा को उन्हों ने दुकान व्यवसाय के लिए दी तो वह एक तरह से लायसेंस पर थी। आप के पिताजी को लायसेंस कैंसल करने का नोटिस दे कर नोटिस की अवधि की समाप्ति पर दुकान के कब्जे का दावा करना चाहिए था। हो सकता है ऐसा ही दावा किया गया हो। पर आपने दावे की तफसील नहीं बताई है।

आपने उन्हें दुकान 1995 में लेना बताया है जब कि वे कह रहे हैं कि यह तो 1979 से उन के पास है। श्रम विभाग से जो लायसेंस बनाया है उस का ध्यान से निरीक्षण करना चाहिए हो सकता है वह 1995 में या उस के बाद पिछली तारीखों से बनवाया गया हो।

आप को किसी स्थानीय अच्छे वकील से राय कर के अपने दीवानी मुकदमे को लड़ना चाहिए। यदि आप यह साबित करने में सफल हो गए कि उन्हों ने दुकान 1995 में बेटे के लिए लायसेंस पर ली थी तो आप अपना मुकदमा जीत जाएंगे। चाचा के श्रम विभाग से प्राप्त लायसेंस को इसी आधार पर फर्जी सिद्ध किया जा सकता है कि उस समय वे सरकारी नौकरी में थे। चाचा के विरुद्ध कोई भी कार्यवाही अब उन का पुराना विभाग नहीं करेगा। उन्हें पेंशन अपनी सेवाओं के बदले मिलती है वह बन्द होना संभव नहीं है। वैसे भी यदि आप चाचा के विरुद्ध बदले की भावना से कोई कार्यवाही करेंगे तो अपने लक्ष्य से ही भटकेंगे। किसी के भी विरुद्ध कार्यवाही करने के पहले आप को अपने लक्ष्य को प्राप्त करना चाहिए। बेहतर यह है कि आप अपने दीवानी मुकदमे की पैरवी ठीक से कराने पर ध्यान दें।

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वाहन बेचना और कब्जा देना साबित करना होगा।

July 12, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

motor accidentसमस्या-

रविन्द्रसिंह ने जयपुर, राजस्थान से पूछा है-

मैं ने एक मोटरवाहन बेचा जिस का बीमा नहीं था। जिसने वाहन खरीदा उस ने स्टाम्प पर लिखित में खरीदना और कब्जा प्राप्त करना दे रखा है। 15 दिन बाद वाहन से दुर्घटना हो गयी। एक व्यक्ति को फ्रेक्चर हुआ है। वाहन अभी तक ट्रान्सफर नहीं हुआ था और बीमा भी नहीं कराया था। इस मामले में प्रथम सूचना रिपोर्ट दर्ज हो गयी है।

समाधान-

प इस बात से चिन्तित हैं कि आप दुर्घटना के दिन तक वाहन के पंजीकृत स्वामी थे इस कारण से आप पर क्षतिपूर्ति का दायित्व आएगा।

मोटर यान दुर्घटना में प्राथमिक दायित्व चालक और वाहन स्वामी का होता है, यदि दायित्व बीमित हों तो बीमा कंपनी इन दायित्वों को वहन कर लेती है।

आप के मामले में पुलिस वाहन के नंबर से आप तक पहुँचेगी और जानना चाहेगी कि दुर्धटना के समय वाहन कौन चला रहा था। आप उसे बता दीजिए कि यह आप नहीं बता सकते क्यों कि आप वाहन को बेच चुके थे। इस के साथ ही आप के पास वाहन प्राप्ति की जो रसीद स्टाम्प पर आप के पास है उस की स्वहस्ताक्षरित फोटो प्रति पुलिस को दे दें।

इस के बाद आप के विरुद्ध कोई मोटर दुर्घटना दावा होता है तो आप को वाहन का विक्रय और कब्जा हस्तान्तरित होना साबित करना होगा। आप वहाँ आप यह जवाब दे सकते हैं कि दुर्घटना से आप का कोई लेना देना नहीं था, आप पहले ही वाहन बेच चुके थे। स्टाम्प पर उपलब्ध रसीद के माध्यम से इसे साबित भी कर सकते हैं। इस से आप पर आ रहा दायित्व वाहन क्रेता पर पहुँच जाएगा।

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पहले पता करें कि क्या कोई संपत्ति पैतृक है?

May 26, 2016 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_courtroom7.jpgसमस्या-

अजय पाण्डे ने सीहोर मध्यप्रदेश से पूछा है-

क्या पिता अपने पुत्र को दादा की (अविभाजित) पैतृक संपत्ति के अधिकार से वंचित कर सकता है?  दादा जी ने इसे स्वयं अर्जित किया था।  दादा जी का देहान्त सन् 2001 में हुआ है।  पिता ने दादा की (अविभाजित) पैतृक संपत्ति बेच कर कंपनी से  तीन नौकरी ली है।  हम 3 भाई और 1 बहन हैं, बड़ा भाई विवाहित है, पिता ने 1 नौकरी बड़े भाई और 1 नौकरी भाभी को दे दी, 1 नौकरी मुझसे छोटे भाई को दे दी। मुझे और सबसे छोटे भाई और एक बहन को नौकरी से वंचित कर दिया है।  क्या नौकरी में मेरा, छोटे भाई और  बहन का कोई हक नही बनता है?

समाधान-

पैतृक संपत्ति क्या है, इसे समझने में अक्सर गलती की जाती है। पैतृक संपत्ति का वजूद केवल हिन्दू परंपरागत विधि में है। 17 जून 1956 से हिन्दू उत्तराधिकार अधिनियम प्रभावी होने के उपरान्त से नयी पैतृक संपत्ति अस्तित्व में आना असंभव हो चुका है। इस कारण जो भी संपत्ति इस तिथि के पूर्व किसी पुरुष को अपने पिता, दादा या परदादा से उत्तराधिकार में प्राप्त हुई हो वही पैतृक संपत्ति है। इसलिए आप पहले जाँच लें कि आप जिस संपत्ति की बात कर रहे हैं वह पैतृक संपत्ति है कि नहीं है। यदि यह पैतृक संपत्ति है तो कोई भी किसी को भी पैतृक संपत्ति से वंचित नहीं कर सकता। यदि संपत्ति दादा या परदादा द्वारा स्वअर्जित थी और दादा या परदादा का देहान्त 17 जून 1956 के बाद हुआ है तो यह संपत्ति पैतृक नहीं हो सकती। वैसी स्थिति में आप के पिता ने जो भी अपने विवेक के अनुसार वह कानून के हिसाब से सही है।

आप के बार बार यह प्रश्न तीसरा खंबा को भेजने से कुछ नहीं होगा। इस के लिए किसी अच्छे स्थानीय वकील से सलाह लें और यदि संपत्ति पैतृक है तो उचित कानूनी कार्यवाही करें। कार्यवाही करने से हल निकलेगा केवल प्रश्न पूछते रहने से नहीं। पैतृक संपत्ति क्या है इस का उत्तर तीसरा खंबा में अनेक बार दिया जा चुका है कृपया तीसरा खंबा की पुरानी पोस्टें पढ़ें।

 

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गिफ्ट डीड के आधार पर कब्जे का वाद संस्थित कर सकते हैं।

December 6, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

rp_house1.jpgसमस्या-

किशन सिंह ने जोधपुर, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

म दो भाई हैं, शहर में पिता के नाम का एक मकान है। जिस में मेरा छोटा भाई रहता है। मेरे पिता ओर माता जी भी उसके साथ रहते थे। मगर भाई ओर भाई की पत्नी ने माता-पिता को परेशान किया जिस के कारण माता-पिता अपने कमरे में ताला लगाकर गाँव में पेतृक मकान में जाकर रहने लगे। मैं अपने मकान मे अलग रहता हूँ। पिता ने छोटे भाई से परेशान हो कर हमारा शहर वाला मकान मुझे गिफ्ट डीड से गिफ्ट कर दिया है। मगर उस मकान को मेरा भाई खाली नहीं कर रहा है। पहले भी पिता ने उस के ऊपर मकान खाली करने के लिया केस किया था जो खारिज हो गया है, अभी भी अपील में केस चल रहा है। इस बीच मे पिता ने मुझे गिफ्ट कर दिया है। मैं जानना चाहता हूँ कि मैं भाई से मकान को खाली केसे कराऊँ? वह कहता है कि उस ने मकान को बनाने के लिए 2 लाख रुपए भी लगाए थे इस कारण वह कहता है कि यह मकान मेरा है।

समाधान-

प के शहर वाले मकान में भाई रहता है। यह मकान आप के पिता के नाम था। इस तरह भाई उस मकान में लायसेंसी के रूप में निवास कर रहा है। आप के पिता ने मकान आप को गिफ्ट डीड पंजीकृत करवा कर गिफ्ट कर दिया है। इस तरह मकान पर आप का स्वामित्व स्थापित हो गया है और आप भाई को लायसेंस समाप्त करने का नोटिस दे कर उस का लायसेंस समाप्त कर सकते हैं और लायसेंस समाप्त करने के नोटिस की तिथि के अनुसार लायसेंस समाप्त हो जाने पर मकान का कब्जा प्राप्त करने के लिए दीवानी वाद संस्थित कर सकते हैं। लेकिन यह सब करने में आप के पिताजी ने भाई के विरुद्ध जो मुकदमा किया था वह बाधा बन रहा है।

प के पिताजी ने वह मुकदमा किस आधार पर किया गया था और उस में क्या राहत मांगी गयी थी यह आप ने नहीं बताया है और न ही यह बताया है कि वह मुकदमा क्यों खारिज हुआ और उस में दीवानी अदालत ने क्या क्या अधिकार निर्धारित किए हैं? उस निर्णय तथा उस मुकदमे में किए गए अभिवचनों व साक्ष्य का अध्ययन किए बिना आगे की राह नहीं निकल सकती है। उस निर्णय की अपील भी अभी लंबित है। इस कारण आप के मामले में कुछ भी उपाय बताना हमारे लिए संभव नहीं है। इस तरह के मामलों में बेहतर हो कि आप के पिता के अपील में जो वकील हैं आप उन से राय करें। यदि आप को लगता है कि वे वकील समस्या को समझ नहीं पा रहे हैं या वे ठीक से मामले को नहीं देख पा रहे हैं तो आप स्थानीय स्तर पर किसी अच्छे वकील को मामले को दिखाएँ और सलाह ले कर उस के अनुरूप कार्य करें।

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Willसमस्या-

सुनील जैन ने रायपुर छत्तीसगढ़ से महाराष्ट्र राज्य की समस्या भेजी है कि-

मारे पिताजी की संपत्ति 1000 वर्गफुट पर तीन मंज़िल बिल्डिंग है। हम दो भाई और दो बहनें हैं, वह दोनों ससुराल में रहती हैं। मैं 22 साल से रायपुर रहता हूँ, हमारा परिवार भुसावल जिला जलगांव में रहता है। पिताजी का निधन 05/02/2004 में हो गया और माताजी का 07/10/2006 में। बड़े भाई ने झूठी वसीयत बनाकर 2005 में उक्त मकान का मालिक बन गया और बात दोनों बहनों को और मुझे पता नहीं चली । माताजी को उक्त संपत्ति का मालिकाना हक़ भी छीन लिया। 2013 में भुसावल नगर पालिका में गया और उक्त संपत्ति का 10 साल का रिकॉर्ड निकाला तो पता चला कि उक्त संपत्ति मालिक मेरा बड़ा भाई है। वसीयत में जो गवाह का नाम था मैं उनसे मिला और पूछा कि ये वसीयत हमारे पिताजी ने आपके सामने लिखी थी और ये हस्ताक्षर पिताजी ने आपके समक्ष किये थे। उस पर उन्होने जबाब दिया कि तुम्हारा भाई मई महीने के 2005 में हमारे पास आया और बोला कि आप मुझे पहचानते हो ऐसा हस्ताक्षर कर दो, हमने वो दस्तावेज बिना देखे तेरे भाई पर विश्वास रख कर हस्ताक्षर कर दिया और आज पता चल रहा है कि उसका इस्तेमाल वसीयत के गवाह के रूप में किया। उन दोनों गवाहों ने कोर्ट में अफेडेबिट पर शपथ पर कहा है कि मरे हुए व्यक्ति ने हमारे सामने कोई भी वसीयत नहीं बनाया और न हीं हमने कोई वसीयत पर गवाह के रूप में हस्ताक्षर किये हैं। उक्त वसीयत को फोरेंसिक लैब भेजा गया 156 (3) तहत और अभी फोरेंसिक जाँच रिपोर्ट जज साहब ने बड़े भाई के वकील के निवेदन पर खोली है जिस में ये अभिप्राय दिया कि, जो वसीयत पर हस्ताक्षर है और बाकी जो उसके बैंक में किए गए हस्ताक्षघरों के नमूने से मिलता है। अब हमें बताने का कष्ट करे हमें ये रिपोर्ट वो शासकीय अधिकारी को भी बुलाकर उनसे पूछ सकते है ये हस्ताक्षर का मिलान कैसे हो रहा है। क्या कोर्ट शासकीय राय को कितना सही मानेगी जब गवाहों के जबाब को मद्देनज़र रखकर। मैं अपने पिताजी का हस्ताक्षर जानता हूँ। मेरे बड़े भाई ने अपने को बचाने के लिए ऑलराउंडर वकील लगाया जो सब सेटिंग करने में माहिर है।

समाधान-

प न्यायालय से निवेदन कर सकते हैं कि आप अन्य हस्ताक्षर विशेषज्ञ से हस्ताक्षरों की जाँच करवाना चाहते हैं और उस का बयान कराना चाहते हैं। ऐसा आप करवा सकते हैं। लेकिन यह मुकदमा किस बात का है यह आप ने नहीं बताया है। 156(3) के उल्लेख से प्रतीत हो रहा है कि यह मुकदमा अपराधिक मुकदमा है। जिस का अधिक से अधिक परिणाम यह होगा कि आप के भाई को फर्जी दस्तावेज बनाने के कारण सजा हो जाएगी। यदि उस वसीयत पर आप के पिता के हस्ताक्षर साबित भी हो जाएँ तब भी गवाहों के हस्ताक्षर बाद में करवा कर आप के भाई ने फर्जी दस्तावेज बनाया है, उसे तो इस आधार पर भी सजा हो सकती है।

दि आप के भाई ने एक तेज तर्रार सेटिंग वाला वकील किया है तो यह उस का अधिकार है। उस से कोई फर्क नहीं पड़ता। आप को एक अच्छा और विश्वसनीय वकील अपने लिए नियुक्त करना चाहिए।

मामला मकान का है जिसे फर्जी वसीयत से भाई ने अपने नाम कर लिया है। उस का मसला इस अपराधिक मुकदमे से हल नहीं होगा। उस के लिए आप को यह मानते हुए कि वह मकान पिताजी का है और उस में चारों भाई बहनों का अधिकार है, बँटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित करना चाहिए। बँटवारे के वाद में आप का भाई वसीयत के आधार पर प्रतिवाद प्रस्तुत करेगा। वसीयत को केवल गवाहों के आधार पर प्रमाणित कराया जा सकता है। उस वसीयत पर हस्ताक्षर करने वाले गवाह न्यायालय के समक्ष पहले ही गवाही दे चुके हैं कि उन के हस्ताक्षर आप के पिताजी की मृत्यु के बाद कराए गए हैं। यदि दीवानी न्यायालय में वे यह बयान देते हैं तो वसीयत फर्जी साबित हो जाएगी और बँटवारे में आप को मकान का हिस्सा प्राप्त हो सकता है। आप को संपत्ति के बँटवारे के लिए वाद यदि अब तक नहीं किया है तो तुरन्त कर देना चाहिए, उस में देरी करना ठीक नहीं है।

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मुस्लिम विधि में उत्तराधिकारी पुत्र और पुत्रियों के अधिकार

November 30, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

muslim inheritanceसमस्या-

शाहिद अली खान ने झुन्झुनूं, राजस्थान से समस्या भेजी है कि-

मेरे दादा के चार बेटे और चार बेटियां हैं जिनका विवाह हो चुका है। मेरे दादा का देहांत हो चुका है तथा अब मेरे चाचा मेरे दादा जी के पूरे मकान और दुकानों पे कब्ज़ा कर के बैठे हैं और अपने भाइयों को हिस्सा नहीं दे रहे। कृपा कर के बताएं मुस्लिम कानून के अनुसार किस तरह बंटवारा करवाया जाये। क्या इसमें विवाहित बेटियां भी हिस्सा लेंगी?

समाधान-

मुस्लिम विधि में यदि किसी व्यक्ति के पुत्र न हो तो पुत्रियों को शेयरर माना जाता है, लेकिन यदि पुत्र हो तो वे रेजीड्युअरी हो जाती हैं। पुत्र और पुत्रियाँ दोनों होने पर पिता की संपत्ति में पुत्रों और पुत्रियों को प्राप्त होने वाली संपत्ति का अनुपात 2:1 होगा। लेकिन यदि अन्य क्यो शेयरर हुआ तो इस हिस्से में परिवर्तन हो जाएगा। इस कारण आप को यह बताना होगा कि दादा जी की मृत्यु के समय उन के कौन कौन से शेयरर तथा रेजीड्युअरी जीवित थे।

दि दादा जी के उत्तराधिकारियों में केवल 2 पुत्र और 4 पुत्रियाँ ही जीवित थीं तो चार हिस्से पुत्रियों के और 4 हिस्से पुत्रों के इस तरह कुल संपत्ति के 8 हिस्से होंगे।  दोनों पुत्रों में से प्रत्येक को 2/8 अर्थात 1/4 हिस्सा प्राप्त होगा।  जब कि प्रत्येक पुत्री को 1/8 हिस्सा प्राप्त होगा।

प के मामले में आप के चाचा ने सारी संपत्ति पर कब्जा कर लिया है तो आप के पिता को या किसी भी अन्य उत्तराधिकारी को उक्त समस्त संपत्ति के बँटवारे के लिए दीवानी वाद संस्थित करना पड़ेगा। यदि चाचा संपत्ति को कब्जे में ले कर उस की आय को स्वयं के पास रख रहे हैं तो जो भी व्यक्ति बँटवारे का वाद संस्थित करे वह संपत्ति को खुर्द-बुर्द करने अर्थात हस्तांतरित करने पर रोक लगाने के लिए आवेदन प्रस्तुत कर अस्थाई निषेधाज्ञा प्राप्त करने का प्रयत्न कर सकता है और संपूर्ण संपत्ति पर रिसीवर नियुक्त करवा सकता है जिस से संपूर्ण संपत्ति रिसीवर के आधिपत्य में रहे और जो भी आय हो वह उस के पास संग्रहीत होती रहे। जब बँटवारा हो जाए तो संपत्ति के साथ साथ रिसीवर के पास उस संपत्ति से जो भी आय हो उसे भी बाँट दिया जाए।

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दीपावली पर हार्दिक शुभकामनाएँ!!!

November 11, 2015 को दिनेशराय द्विवेदी द्वारा लिखित

मित्रों और पाठकों और सहयोगियो¡

दीपावली शुभकामनाएँ!दैव की तरह दीपावली का त्यौहार फिर आ गया है। आप सभी दीपावली के इस त्यौहार को मनाने में व्यस्त हैं। आठ वर्ष से कुछ अधिक समय पहले दीपावली के कुछ दिन पूर्व 28 अक्टूबर 2007 को ‘तीसरा खंबा’ एक ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ यह नितांत वैयक्तिक प्रयास एक दिन वेबसाइट का रुप ले लेगा और इस के पाठकों के लिए एक जरूरी चीज बन जाएगा, ऐसा मैं ने सोचा भी नहीं था।

रंभ में सोचा यही गया था कि यदा कदा मैं अपने इस ब्लाग पर न्याय व्यवस्था के बारे में अपने विचारों को प्रकट करते हुए कुछ न कुछ विचार विमर्श करता रहूंगा। जब भी कहीं विमर्श आरंभ होता है तो वह हमेशा ही कुछ न कुछ कार्यभार उत्पन्न करता है। यदि विमर्श के दौरान समस्याओं के कुछ हल प्रस्तुत होते हैं तो फिर यह बात निकल कर सामने आती है कि समस्याओं के हल की ओर आगे बढ़ा जाए।  समस्याग्रस्त लोगों के सामने जो हल प्रस्तुत करता है उसी से यह अपेक्षा भी की जाती है कि वह हल की दिशा में आगे बढ़ने के लिए कोई अभियान का आरंभ करे, उस के रास्ते पर उन का पथप्रदर्शक भी बने।  दुनिया के छोटे बड़े अभियानों से ले कर समाज को आमूल चूल बदल देने वाली क्रांतियों का आरंभ इसी तरह के विमर्शों से हुआ है।

न्याय समाज व्यवस्था का एक आवश्यक अंग है।  समाज की छोटी से छोटी इकाई परिवार से ले कर  बड़ी से बड़ी इकाई राज्य को स्थाई बनाए रखने के लिए न्याय आवश्यक है। यदि चार लोग साथ रहते हों और जीवन के लिए आवश्यक वस्तुओं को जुटाने का काम करते हों तो भी जो कुछ वे जुटा लेते हैं उस का उपयोग वे न्याय के बिना नहीं कर सकते। एक दिन के शाम के भोजन के लिए कुछ रोटियाँ जुटाई गई हैं तो उन का आवश्यकतानुसार न्यायपूर्ण वितरण आवश्यक है। यदि उन में से दो लोग सारी रोटियाँ खा जाएँ तो शेष दो लोगों को भूखा रहना होगा। एक-आध दिन  और यदा-कदा तो यह चल सकता है। लेकिन यदि नियमित रूप से ऐसा ही होने लगे तो दोनों पक्षों में संघर्ष निश्चित है और साथ बना रहना असंभव। जब चार लोगों का एक परिवार बिना न्याय के एकजुट नहीं रह सकता तो एक गाँव, एक शहर, एक अंचल, एक प्रान्त और भारत जैसा एक विशाल देश कैसे एकजुट रह सकता है। इस कारण मैं अक्सर यह कहता हूँ कि मनुष्य केलिया न्याय रोटी से पहले की आवश्यकता है।

ज समाज में न्याय पूरी तरह हमारी संवैधानिक व्यवस्था पर निर्भर है।  भारत के गणतंत्र का रूप लेने और संविधान के अस्तित्व में आने पर उसने एक न्याय व्यवस्था देने का वायदा इस देश की जनता के साथ किया। इस संवैधानिक न्याय व्यवस्था के लागू होने की एक अनिवार्य शर्त यह भी थी कि इस के वैकल्पिक उपायों का पूरी तरह उन्मूलन कर दिया जाए। लेकिन गणतंत्र के 66वें वर्ष में भी संवैधानिक न्याय व्यवस्था पूरी तरह स्थापित नहीं हो सकी है और संविधानेतर संस्थाएं (जातीय पंचायतें और खापें) अब भी मनमाना न्याय कर रही हैं और अपने जीवन को बनाए रखने के लिए समाज के जातिवादी विभाजन पर आधारित प्राचीन  संगठनों से शक्ति प्राप्त करती हैं।  एक जनतांत्रिक समाज के निर्माण के लिए इन पुरानी संस्थाओं और संगठनों का समाप्त किया जाना नितांत आवश्यक था। इन पुरानी संस्थाओं और उन के अवशेषों को पूरी तरह समाप्त करने का यह कार्यभार गणतंत्र की संवैधानिक संस्थाओं पर था।  लेकिन जब जातिवाद ही सर्वोच्च संवैधानिक संस्था संसद के सदस्यों को चुने जाने का आधार बन रहा हो वहाँ यह कैसे संभव हो सकता था? हमारा जनतांत्रिक गणतंत्र एक चक्रव्यूह में फँस गया है जिस में जातिवादी संस्थाएँ संसद को चुने जाने का आधार बन रही हैं।  संसद को इन संस्थाओं की रक्षा करने की आवश्यकता है। जिस के लिए जरूरी है कि संवैधानिक न्याय व्यवस्था अधूरी और देश की आवश्यकता की पूर्ति के लिए नाकाफी बनी रहे जिस से इन जातिवादी संस्थाओं को बने रहने का आधार नष्ट न हो सके। जनतंत्र कभी सफल हो ही नहीं सके।

ही कारण है कि भारत की केन्द्र और राज्य सरकारों ने कभी न्यायपालिका को जरूरी स्तर की सुविधाएँ प्रदान नहीं कीं। जब देश में अंग्रेजों का शासन था तो अदालतें सिर्फ इतनी थीं कि वे देश की जनता पर अपना आधिपत्य बनाए रखें। उन्हें सामाजिक न्याय की कोई आवश्यकता नहीं थी। लेकिन एक जनतांत्रिक गणतंत्र बन जाने के बाद देश की गरीब से गरीब जनता को न्याय प्रदान करना इस गणतंत्र की प्राथमिक आवश्यकता है। यदि यह आवश्यकता पूरी नहीं की जा सकी है तो हमें जानना चाहिए कि हमारा यह गणतंत्र अधूरा है। आप इस से अनुमान कर सकते हैं कि संयुक्त राज्य अमरीका में 10 लाख की आबादी पर 135-140 जज नियुक्त हैं जब की भारत में 10 लाख की इसी आबादी पर केवल 12-13 जज नियुक्त हैं। अमरीका के मुकाबले केवल दस प्रतिशत अदालतें हों तो न्याय व्यवस्था कैसे चल सकती है। यही कारण है कि अदालतों में अम्बार लगा है। एक एक जज दस दस जजों का काम निपटा रहा है। ऐसे में न्याय हो सकना किसी तरह संभव नहीं है। अदालतें सिर्फ कागजी न्याय (पेपर जस्टिस) कर रही हैं। जज न्याय करने के काम ऐसे कर रहे हैं जैसे उन्हें मशीन से लॉन की घास काटना हो। अब भी न्याय केवल कारपोरेट्स, वित्तीय संस्थाओं, धनपतियों और दबंगों को मिल रहा है। इस के बाद जिस विवाद में ये लोग पक्षकार नहीं हैं उन विवादों में इन का किसी पक्षकार के पक्ष में हस्तक्षेप न्याय को अन्याय में परिवर्तित कर देता है। अदालतें कम होने पर मुकदमों का अंबार लगा है। कई कई पीढियाँ गुजर जाने पर भी न्याय नहीं मिलता। अनेक निरपराध लोग जीवन भर जेलों में सड़ते रहते हैं। जरूरी होने पर अनेक वर्षों तक तलाक नहीं मिलता, बच्चों को उपयुक्त अभिरक्षा नहीं मिलती। मकान मालिक को अपना ही मकान उपयोग के लिए नहीं मिलता तो किराएदार बिना वजह मकान से निकाल दिए जाते हैं। न्याय के अभाव में जितना अन्याय इस देश में हो रहा है उस का सानी किसी जनतांत्रिक देश में नहीं मिल सकता। उस पर जब हमारे लोग इसे दुनिया का सब से बड़ा लोकतंत्र कहते हैं तो शर्म से सिर झुकाने के सिवा कोई रास्ता नहीं सूझता।

दि देश की जनता को वास्तविक जनतंत्र चाहिए तो उसे इस चक्रव्यूह को तोड़ना होगा। वास्तविक जनतंत्र इस देश की श्रमजीवी जनता, उजरती मजदूरों-कर्मचारियों, किसानों, विद्यालयों-महाविद्यालयों-विश्वविद्यालयों में पढ़ने वाले विद्यार्थियों, बेरोजगार व रोजगार के लिए देस-परदेस में भटकते नौजवानों की महति आवश्यकता है। वे ही और केवल वे ही इस चक्रव्यूह को तोड़ सकते हैं। लेकिन उन्हें इस के लिए व्यापक एकता बनानी होगी।

ह एक मकसद था जिस के लिए तीसरा खंबा ब्लाग के रूप में आरंभ हुआ था।  एक न्यायपूर्ण जीवन की स्थापना सुंदर और उत्तम लक्ष्य तो हो सकता है पर उस की प्राप्ति के लिए जीवन को जीना स्थगित नहीं किया जा सकता। वह तो जैसी स्थिति में उस में भी जीना पड़ता है।  वर्तमान समस्याओं से लगातार निपटते हुए जीना पड़ता है।  यह एक कारण था कि तीसरा खंबा से पाठकों की यह अपेक्षा हुई कि वह वर्तमान समस्याओं के अनन्तिम और अपर्याप्त ही सही पर मौजूदा हल भी प्रस्तुत करे। तीसरा खंबा को यह आरंभ करना पड़ा।  आज स्थिति यह है कि तीसरा खंबा के पास सदैव उस की क्षमता से अधिक समस्याएँ मौजूदा समाधान के लिए उपस्थित रहती हैं।  पिछले एक डेढ़ वर्ष में यह भी हुआ कि तीसरा खंबा जो बात लोगों के सामने रखना चाहता था वे नैपथ्य में चली गईं और समस्याओं के मौजूदा समाधान मंच पर आ कर अपनी भूमिका अदा करते रहे।

श्री बीएस पाबला

   बीएस पाबला

स बीच 1 जनवरी 2012 को तीसरा खंबा को वेब साइट का रूप मिला।  शायद यह कभी संभव नहीं होता यदि तीसरा खंबा के आरंभिक मित्र श्री बी.एस.पाबला  इस के लिए लगातार उकसाते न रहते और इसे तकनीकी सहायता प्रदान न करते। उन के कारण ही तीसरा खंबा को आप एक वेबसाइट के रूप में देख पा रहे हैं।  इस रूप में इस के पाठकों की संख्या के साथ कानूनी समस्याओं में भी वृद्धि हुई।  पहली जनवरी 2012 से 10 नवम्बर 2015 तक 3 वर्ष 10 माह दस दिनों में (11,69,400) ग्यारह लाख उनहत्तर हजार चार सौ से अधिक पाठक तीसरा खंबा पर दस्तक दे चुके हैं। वर्तमान में लगभग 2000 पाठक तीसरा खंबा पर प्रतिदिन दस्तक दे रहे हैं। हमें यह महसूस हुआ कि प्रतिदिन एक समस्या का समाधान प्रस्तुत करना पर्याप्त नहीं है। उसे बढ़ा कर दो करना पड़ा। लेकिन उसे हम अधिक दिन नहीं चला पाए। वह तभी संभव हो सकता है जब कि तीसरा खंबा को व्यवसायिक स्तर पर चलाया जाए। पर वह भी फिलहाल संभव नहीं है। कानूनी समस्याओं के समाधान प्रस्तुत करना मात्र इस वेब साइट का एक-मात्र लक्ष्य न तो कभी था और न हो सकता है। हम चाहते हैं कि सप्ताह में कुछ विशिष्ठ आलेख वर्तमान न्याय व्यवस्था की समस्याओं और एक जनतांत्रिक आवश्यकता के लिए आवश्यक आदर्श न्याय व्यवस्था के लक्ष्य पर प्रकाशित किए जाएँ।  लेकिन यह तभी संभव है जब तीसरा खंबा के कुछ सक्षम मित्रों की सहभागिता इस में रहे।  सभी सक्षम मित्रों से आग्रह है कि इस काम में तीसरा खंबा के साथ खड़े हों और न्याय व्यवस्था के संबंध में अच्छे आलेखों से इस वेब साइट की समृद्धि में अपना योगदान करें।

श्री मनोज जैन, एडवोकेट

       मनोज जैन

बी.एस. पाबला जी जैसे निस्वार्थ व्यक्तित्व के निशुल्क तकनीकी सहयोग के बिना इस साइट को यहाँ तक लाना संभव नहीं था। मुझे हमेशा महसूस होता है कि इस काम में कुछ विधिज्ञो को और जोड़ा जा सके तो हम इसे अधिक विस्तार दे सकते हैं। इस वर्ष मेरे एक युवा ऊर्जावान साथी श्री मनोज जैन इस के साथ जुड़े हैं। हम दोनों अपने प्रोफेशन में भी सहभागी हैं। उन का योगदान तीसरा खंबा को नई ऊंचाइयों तक जाने में महत्वपूर्ण साबित हो सकता है।  हम तीसरा खंबा में उन का स्वागत करते हैं।

दीपावली के अवसर पर तीसरा खंबा अपने सभी पाठकों और मित्रों का हार्दिक अभिनंदन करता है।  सभी के लिए हमारी शुभकामना है कि वे आने वाले समय में जीवन को और अधिक उल्लास के साथ जिएँ।  साथ ही यह आशा भी है कि तीसरा खंबा को पाठकों और मित्रों का सहयोग लगातार प्राप्त होता रहेगा।

                                                                                                                                                                                                  … दिनेशराय द्विवेदी

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